अक़्ले इंसानी की तरकि़्क़याँ जेहालत और नादानी के दबीज़ पर्दे यके ब़अ्द दीगरे उठा रही हैं और ग़लत नज़रियात की बुनियादें इल्मे वज़ाएफ़ुल अ़अ्ज़ा और दूसरे तज्रेबाती उलूम की वजह से मुतज़लज़िल होती जा रही हैं।
मसलन गुज़श्ता ज़माने में जिस्मे इन्सानी के ब़अ्ज़ अ़अ्ज़ा को बेकार और बेफ़ाएदा ख़याल किया जाता था लेकिन आज की इल्मी तरक़्क़ी ने येह साबित कर दिया है कि वोह अ़अ्ज़ा जिनको बेफ़ाएदा शुमार किया जाता था वोह बहुत ही मुफ़ीद हैं और उनके ज़िम्मा एक अज़ीम काम सिपुर्द किया गया है और जैसे जैसे इल्म तरक़्क़ी करता जाएगा वैसे ही वैसे काएनात के राज़हाए सरबस्ता खुलते जाएँगे। अब ज़रा चंद मिसालों की तरफ़ तवज्जोह फ़रमाइएः
ग़ुद्दए थायमस (Thymus Gland)
येह जिस्मे इन्सानी का एक छोटा सा ग़ुद्दा है कि जिसकी जगह सीने की हड्डी के पीछे और साँस की नली के ऊपर है। ज़मानए गुज़श्ता में लोग उस के फ़वाएद से नाआशना थे बल्कि इस ग़ुद्दा को एक ज़ाएद अज़ू गुमान करते थे लेकिन आज की त़हक़ीक़ ने येह बात वाज़े़ह कर दी है कि इस ग़ुद्दा की ज़िम्मेदारी बदन में ‘कैल्शियम’, विटामिन ‘डी’ और ‘फ़ास्फ़ोरस’ Metabolism को मुऩज्ज़म करना है। यही ग़ुद्दा ‘लनफ़ूसीत’ (lymphocyte) नाम का माद्दा पैदा करने में काफ़ी मोअस्सिर है और यही ग़ुद्दा ऐन्टीबॉडीज़ (Antibodies) मवाद भी तैयार करता है।
ग़ुद्दा एपीफ़ाइसिस (Pineal Gland)
येह ग़ुद्दा थायमस से कहीं ज़्यादा पेचीदा है। येह ग़ुद्दा म़ग्ज़ के अंदर वा़के़अ् है। गुज़श्ता ज़माने के डाक्टर इस को बेकार और बेफ़ाएदा ख़याल करते थे लेकिन इल्मी तरक़्क़ी ने इस नज़रिया को बिल्कुल बदल दिया है आजकल इस ग़ुद्दा के काफ़ी फ़वाएद बताए जाते हैं। मसलन येह ग़ुद्दा जिन्सियात में एक तवाज़ुन बरक़रार रखता है और क़ब्ल अज़ वव़त बुलूग़ से माने़अ् है। ख़ुलासा येह कि इस ग़ुद्दा में ख़लल वा़के़अ् होना इन्सान को मौत के घाट उतार देता है
टान्सेल्ज़
पुराने ज़माने के डाक्टरों का ख़याल येह था कि येह ग़दूद बेफ़ाएदा और बेकार हैं और इसी वजह से जब भी इन ग़दूद में वरम पैदा हो जाता था तो फ़ौरन आप्रेशन करके उनको निकाल देते थे। लेकिन आज की इल्मी तरक़्क़ी ने इन ग़दूद के काफ़ी फ़ाएदे कश्फ़ किए हैं और इन ग़दूद के लिए काफ़ी अहम्मीयत के क़ाएल हैं जिसकी बेना पर बदर्जए मजबूरी ही उनको आप्रेशन करके निकाल देने की राय देते हैं।
येह ग़दूद सफ़ेद रंग का कार्पसेल्ज़ (White Blood corpuscles) बनाते हैं कि जिनका काम जरासीम से देफ़ा़अ् करना है। येह ग़दूद साँस की नाली में एक ज़बरदस्त दरबान की ह़ैसियत रखते हैं। जरासीम और मुज़िर चीज़ों को दाख़िल नहीं होने देते। जिस वव़त हवा ज़्यादा कसीफ़ हो जाती है और इस में तऱह तऱह के जरासीम पैदा हो जाते हैं तो उनको ज़बरदस्त मुक़ाबला करना पड़ता है जिसके नतीजे में उनमें वरम पैदा हो जाता है।
अगर उन को निकाल दिया जाए तो हल्क़ (हलक़) में आलूदगी पैदा हो जाती है तो उस वव़त येह सूज कर ख़तरे की घंटी की तऱह सामने आ जाते हैं और डाक्टर के सामने हलक़ की ़हालत की तर्जुमानी करते हैं। अगर येह इस काम को अंजाम न दें तो हलक़ की कैफ़ीयत ज़रा देर से म़अ्लूम होगी जिसकी बेना पर और दूसरी बीमारियाँ पैदा होने का अंदेशा है जैसे निमोनिया वग़ैरह।
अपेनडिक्स (Appendix)
डाक्टरों की एक अंजुमन बेइंतेहा ज़़ह्मत और मशव़क़त के ब़अ्द इस नतीजा पर पहुँच सकी है कि अपेनडिक्स कैंसर के साथ मुक़ाबला में काफ़ी मोअस्सिर है और अगर उनको ब़गैर किसी मजबूरी के निकाल दिया जाए तो कैंसर के लिए मैदान हमवार हो जाता है
एक तिब्बी माहनामा में लिखा है कि वोह अश्ख़ास कि जिनके बारे में कैंसर का अंदेशा हो अगर इस सूरत में अपेनडिक्स को निकाल दिया जाए तो हो सकता है यही बात कैंसर की पैदाइश का सबब बने।
येह मिसालें और इस के अलावा बहुत सी मिसालें अगर उनमें ग़ौर-ओ-फ़िक्र से काम लिया जाए तो येह बात रोशन हो जाती है कि हम अपनी नादानी की बेना पर किसी चीज़ का फ़ाएदा न म़अ्लूम कर सकें तो इस का मतलब हरगिज़ येह नहीं है कि बस वोह चीज़ बेकार और बेफ़ाएदा है बल्कि हमको चाहिए कि हम उस वव़त का इन्तेज़ार करें कि जिस वव़त हक़ाएक़ और अस्रार के चेहरे से पर्दा उठेेगा तो उस वक़्त म़अ्लूम होगा कि उस चीज़ का फ़ाएदा क्या है आज इल्मी दुनिया ने बहुत ज़्यादा तरक़्क़ी कर ली है लेकिन चूँकि इल्म का मैदान एक वसी़अ् मैदान है इस लिए येह तमाम तरकि़्क़याँ इब्तेदाई मराहिल की हैसियत रखती हैं।
यही वजह है कि ‘आइंस्टाइन’ अपनी किताब ‘फ़लसफ़ए निस्बीयत’ में लिखता है कि हमने जो कुछ इस काएनात से दर्स ़हासिल किया है जितनी भी किताबें प़ढी हैं गरचे उसने हमको बहुत कुछ सिखाया है लेकिन फिर भी हम इस बात पर क़ादिर नहीं हैं कि काएनात के तमाम अस्रार-ओ-रुमूज़ को समझ सकें।
विलियम जेम्स क़ाएल है कि ‘हमारा ़इल्म हमारे जेह्ल के मुक़ाबले में बिल्कुल ऐसा ही है जैसे एक क़त्रा एक अज़ीम समुंदर के सामने।’
गुज़श्ता बयानात से येह बात साफ़ ज़ाहिर हो जाती है कि अगर कोई श़ख्स अपने म़ह्दूद इल्म-ओ-दानिश की बेना पर किसी चीज़ का फ़ाएदा न समझ पाए और फ़ौरन कह बैठे कि इस चीज़ का कोई फ़ाएदा नहीं है तो येह बात अक़्ल से क़द्रे दूर होगी। अगर येह लोग ज़रा भी अक़्ल-ओ-ख़ेरद से काम लें तो समझ जाएँगे कि न ‘जानने’ और न ‘होने’ के दरमियान कितना फ़़र्क है। और न जानने को न होने की दलील क़रार देना सरासर अक़्ल के ख़ेलाफ़ है।
लात़अ्दाद मौजूदात में से अगर चंद की ख़ासियत और फ़ाएदा न म़अ्लूम हो सके तो येह इस बात का हरगिज़ सबब नहीं हो सकता कि इन्सान इन तमाम हैरत अंगेज़ मिसालों और अक़्ल को हैरान कर देने वाले निज़ाम में ज़रा ग़ौर-ओ-फ़िक्र करके उस के बाश़ऊर ख़ालिक़ का पता न लगा सके बल्कि यही मौजूदात जिनको वोह समझ चुका है इस बात के लिए काफ़ी हैं कि उस को ख़ालिक़े हक़ीक़ी की तरफ़ राहनुमाई करें।
अगर आपको एक किताब मिले कि जिसमें शुरू़अ् से आख़िर तक एक से एक अ़अ्ला और इल्मी मतालिब हों मगर उनमें से चंद सत्रें ऐसी भी हों कि जिनका म़पहूम आप न समझ पा रहे हों तो क्या इस सूरत में आपको येह हक़ हासिल है कि आप येह फ़ैसला कर बैठें कि इस किताब का मुसन्निफ़ एक नाफ़ह्म और नासमझ इन्सान है या आप येह फ़ैसला करेंगे कि इस किताब का मुसन्निफ़ अज़ीम और बलंद पाया मुफ़क्किर श़ख्स है कि जिसकी अक़्ल-ओ-फ़ह्म की तर्जुमानी येह मतालिब कर रहे हैं और चंद सत्रें जो बज़ाहिर मेरी नज़र में नाम़प्Àहूम हैं उस में मेरा क़ुसूर है।