उसूले दीन
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सबक़ - ८

बेनियाज़ ख़ुदा

एक मुसल्लम क़ानून

हम रोज़मर्रा की ज़िंदगी में ऐसी चीज़ें पाते हैं जो आसार-ओ-ख़वास रखने वाली हैं लेकिन उनके असरात हर जगह एक जैसे नहीं बल्कि दूरी और ऩज्दीकी काफ़ी हद तक मोअस्सर है। येह बात मुम्किन है किसी शै के असरात एक ख़ास हद तक हों लेकिन उस हद के ब़अ्‌द उस के असरात का नाम-ओ-निशान न हो।

ज़रा इन मिसालों में ग़ौर-ओ-फ़िक्र फ़रमाइएः

(१) क़ूवते जाज़ेबा (मक़्नातीस या चुम्बक)

येह कशिश तमाम जगहों पर एक जैसी नहीं है बल्कि लोहा जिस क़द्र मक़्नातीस से क़रीब होगा उतनी ही ज़्यादा क़ूवत के साथ मक़्नातीस की तरफ़ खिंचेगा। अगर आप लोहे की एक कील को एक मर्तबा दो सेंटीमीटर के फ़ासेले पर रखें और दूसरी मर्तबा दस सेंटीमीटर के फ़ासेले पर रखें तो पहली सूरत में कील ज़्यादा क़ूवत के साथ मक़्नातीस की तरफ़ खिंचेगी — बनिस्बत दूसरी सूरत के।

(२) ह़रारते आफ़ताब

ह़रारते आफ़ताब कुरए ‘ज़ोह्रा’ और सत्हे ज़मीन पर एक जैसी नहीं है चूँकि ज़ोह्रा आफ़ताब से ज़्यादा क़रीब है लेहाज़ा वोह ज़मीन की बनिस्बत काफ़ी गर्म है।

(३) बल्ब की रोशनी

एक बल्ब की रोशनी मुम्किन है सौ मीटर के फ़ासेले तक जाए लेकिन इन तमाम फासलों पर रोशनी एक जैसी नहीं रहती बल्कि आप जितना बल्ब से दूर होते जाएँगे रोशनी कम होती जाएगी और जितना ऩज्दीक होते जाएँगे उतनी रोशनी ज़्यादा होती जाएगी।

(४) आवाज़

एक शा़एर या एक मुक़र्रिर की आवाज़ हो सकता है पचास मीटर तक जाए लेकिन तमाम जगहों पर आवाज़ एक जैसी नहीं होगी बल्कि जितना ऩज्दीक होंगे उतना ही साफ़ सुनाई देगी।

इन मिसालों पर ग़ौर करने से येह बात वाज़े़ह हो जाती है कि अगर किसी शै का एक मर्कज़ हो तो उस के असरात तमाम जगहों पर यकसाँ नहीं रहते बल्कि मर्कज़ से जितना ऩज्दीक होते जाएँगे उतना ही उस के असरात साफ़ और ज़्यादा होते जाएँगे और जैसे जैसे दूर होते जाएँगे वैसे वैसे असरात कम होते चले जाएँगे।

क्या ख़ुदा का भी कोई मर्कज़ है?

ब़अ्‌ज़ लोग येह ख़याल करते हैं कि शायद ख़ुदा भी आफ़ताब या और दूसरी मौजूदात की तऱह एक ख़ास मर्कज़ रखता है। आसमान के ऊपर मस्नद लगाए बैठा हुआ है और वहीं से दुनिया की देखभाल करता है।

दर आँह़ालेकि ऐसी कोई भी बात नहीं है इस लिए कि समुंदरों की गहराइयों से लेकर कहकशानों की बलंदियों तक जिस ज़र्रे पर नज़र डालिए जिसको भी नज़र उठा कर देखिए एक ख़ास क़िस्म का ऩज्म-ओ-ज़ब्त आपको नज़र आएगा। कोई भी ज़र्रा ऐसा नहीं मिलेगा जो ऩज्म-ओ-ज़ब्त का लेबास न पहने हो। ऐसा हरगिज़ नहीं है कि एक ख़ास मर्कज़ हो कि उस के इर्द गिर्द जो चीज़ें हों उनमें तो ऩज्म-ओ-ज़ब्त की ऩगमा सराई हो और वोह चीज़ें जो उस मर्कज़ से दूर हैं उनमें बद ऩज्मी पाई जाती हो।

अगर आप सारी काएनात के चप्पे चप्पे को तलाश कर डालें तब भी आपको कोई ज़र्रा नहीं मिल सकता है जिसमें ऩज्म-ओ-ज़ब्त न हो।

हर जगह और हर मुक़ाम पर छोटी से छोटी चीज़ में ऩज्म का पाया जाना इस बात की वाज़े़ह दलील है कि ख़ालिक़े काएनात ख़ुदावंद आलम का कोई ख़ास मर्कज़ नहीं बल्कि वोह हर जगह और हर वक़्त मौजूद है।

इस के अलावा ख़ुदावंद आलम ने ख़ुद मकान को पैदा किया है और येह बात मु़हाल है कि ख़ालिक़ ख़ुद अपनी मख़्लूक़ का मो़हताज हो।

जैसा कि गुज़श्ता दर्स में बयान किया जा चुका है कि ख़ालिक़ और मूजिद में बेइंतेहा फ़़र्क है — येह हवाई जहाज़ वग़ैरह बनाने वाले मूजिद हैं ख़ालिक़ नहीं हैं और उन मूजिद हज़रात का शाहकार येह है कि उन लोगों ने ब़अ्‌ज़ चीज़ों के अमल और अक्सुल अमल (ऐक्शन और रिएक्शन) से इस्तेफ़ादा करते हुए ख़ास तर्कीब-ओ-तर्तीब के ज़री़ए ब़अ्‌ज़ चीज़ें ईजाद की हैं — लेकिन येह हज़रात उन चीज़ों के ख़ालिक़ नहीं हैं। दर आँह़ालेकि ख़ुदावंद आलम काएनात का ख़ालिक़ है वोह काएनात को अदम से वजूद में लाया है। चीज़ों के अमल और अक्सुल अमल से इस्तेफ़ादा नहीं किया है और यही फ़़र्क इस बात का सबब है कि येह हज़रात अपनी बनाई हुई चीज़ों के मो़हताज हो सकते हैं — लेकिन ख़ुदा अपनी मख़्लूक़ का मो़हताज नहीं हो सकता।

क्या ख़ुदा देखा जा सकता है?

जब येह बात वाज़े़ह हो चुकी कि ख़ुदावंद आलम कोई मकान नहीं रखता तो येह बात भी वाज़े़ह हो जाती है कि ख़ुदावंद आलम जिस्म नहीं है। इस की वजह येह है कि जिस्म को मकान की ज़रूरत होती है। कोई ऐसा जिस्म नहीं कि जो मकान का मो़हताज न हो लेकिन चूँकि ख़ुदावंद आलम जिस्म नहीं है इस लिए वोह मकान का भी मो़हताज नहीं है वोह दिखाई भी नहीं दे सकता।

ख़ुदा किसी का मो़हताज नहीं

ख़ुदावंद आलम ही तमाम की तमाम ज़रूरियाते ज़िंदगी का पैदा करने वाला है और उनका ख़ालिक़ है येह बात अभी साबित कर चुके हैं कि ख़ालिक़ अपनी मख़्लूक़ का मो़हताज नहीं है चूँकि ख़ुदावंद आलम तमाम चीज़ों का ख़ालिक़ है लेहाज़ा वोह किसी शै का मो़हताज नहीं है।

ख़ुदा उस कामिल और मुकम्मल ह़क़ीक़त का नाम है कि जो किसी शै का मो़हताज नहीं। न मकान रखता है न ज़मान, न जिस्म, न जिस्मानियात और तमाम चीज़ें उस की मो़हताज हैं।

हो सकता है कि आपके ज़ेह्न में सवाल उठे कि जब ख़ुदावंद आलम जिस्म नहीं, मकान नहीं, किसी शै का मो़हताज नहीं येह सब कुछ नहीं तो आि़खर ख़ुदा है क्या?

जवाब के लिए मिसाल काफ़ी है किः

बिजली  — जामिद नहीं

बिजली  — सैयाल नहीं है (बहने वाला माद्दा)

बिजली  — गैस नहीं है

आया येह नहीं नहीं क्या इस बात की दलील बन सकते हैं कि बस बिजली कोई चीज़ नहीं है। आया आप येह कहेंगे कि बिजली इन चीज़ों के अलावा एक दूसरी ह़क़ीक़त का नाम है।

बस ख़ुदा के बारे में भी हम यही कहते हैं किः

ख़ुदा  — जिस्म नहीं है

ख़ुदा  — मकान नहीं है

ख़ुदा  — देखा नहीं जा सकता है

य़अ्‌नी ख़ुदावंद आलम इन चीज़ों के अलावा एक दूसरी ह़क़ीक़त है। येह जिस्म-ओ-मकान नक़्स है और ख़ुदा की ज़ात कि जो ऐने कमाल है उस में इन चीज़ों का गुज़र नहीं है येह तमाम बातें ख़ुदा को तमाम दूसरी चीज़ों से जुदा और मुम्ताज़ कर देती हैं।

दर ह़क़ीक़त येह वोह ख़ुदा है कि जिसका ए़अ्‌तेक़ाद रखना चाहिए। इसी ख़ुदा को इन्सानी फ़ितरत क़बूल करती है। हर आक़िल और मुंसिफ़ मिज़ाज इस ह़क़ीक़त के सामने सर बसुजूद है।

वोह लोग जो ख़ुदा के लिए जिस्म, फ़र्ज़ंद और दूसरी बशरी सिफ़ात के क़ाएल हैं उन्होंने ख़ुदा को स़ही़ह म़अ्‌नों में बिल्कुल पहचाना ही नहीं और येह लोग इस्लामी त़अ्‌लीमात से किस क़द्र दूर हैं।

चूँकि दुनिया के सामने ख़ुदावंद आलम का स़ही़ह तसव्वुर पेश नहीं किया गया जिसकी बेना पर माद्दा परस्त वजूदे ख़ुदा के मुन्किर हो गए अगर उनके सामने स़ही़ह म़अ्‌नों में ख़ुदा के अक़ीदे को पेश किया जाए तो अजब नहीं येह लोग ह़क़ीक़ी ख़ुदा के सामने सर बसुजूद हो जाएँ।