वसीअ् और पुर असरार काएनात
अगर इस असरार-ओ-रुमूज़ से भरी हुई काएनात की किसी भी चीज़ पर ग़ौर से नज़र डाली जाए और फ़िक्र की जाए तो जिस ज़ात ने इस को वजूद ब़ख्शा है उस की क़ुदरत-ओ-अज़्मत मुजस्सम हो कर अक़्ल के सामने आ जाती है।
अब ज़रा इन मिसालों पर ग़ौर कीजिएः
मोह़क्मए देफ़ा़अ्
मुल्क की फ़ला़ह-ओ-बहबूद के लिए जहाँ येह ज़रूरत है कि दाख़िली हालात दुरुस्त हों और अम्न-ओ-अमान क़ाएम हो वहाँ बेगाना ह़मलों से मह़फ़ूज़ रहने के लिए एक ‘मोह़क्मए देफ़ा़अ्’ की भी ज़रूरत है ताकि मुल्क दुश्मनों के ह़मलों से मह़फ़ूज़ रह सके और तरक़्क़ी की राह में क़दम ब़ढा सके।
इन्सानी जिस्म की ह़ैसियत भी एक मुल्क की ह़ैसियत है जहाँ जिस्म की सेहत-ओ-तंदुरुस्ती के लिए दाख़िली निज़ाम का दुरुस्त होना ज़रूरी है वहीं येह भी ज़रूरी है कि ख़ारिज से कोई ह़मला न हो सके। बाक़ा़एदा देफ़ा़अ् उसी वक़्त हो सकता है कि जब दुश्मन के हमले के मुताबिक़ उस का जवाब दिया जाए।
अब ज़रा ग़ौर फ़रमाइए कि ख़ुदावंद आलम ने इस इन्सानी जिस्म में किस ए़अ्तबार से ‘मोह़क्मए देफ़ा़अ्’ को वदी़अत फ़रमाया है।
दानिशमंदों ने मुद्दतों ग़ौर-ओ-फ़िक्र के बअ्द येह बात कश्फ़ की है कि बदन का देफ़ाई अमला मुतअद्दिद क़िस्म के ‘ग़दूद’ हड्डी के गूदे और दूसरे मुख़्तलिफ़ सेल्स (Cells) वग़ैरह पर मुश्तमिल है। गरचे येह तमाम चीज़ें एक दूसरे से मुख़्तलिफ़ हैं लेकिन इस इ़ख्तेलाफ़ के बावजूद भी अगर कोई बेगाना बदन पर ह़मला-आवर होता है तो सब मिलकर उस का मुक़ाबला करते हैं और उस में कोई कसर भी नहीं उठा रखते हैं। उनकी तमामतर कोशिश येह होती है कि येह ज़हरीला माद्दा जो बदन में दाख़िल हुआ है किसी ए़अ्तबार से नाबूद कर दिया जाए और इस बात का मौक़़अ् न दिया जाए कि बकि़या बदन में सरायत कर सके और ख़राबियाँ वजूद में ला सके।
जिस वक़्त कोई बेगाना जिस्म की मम्लकत में दाख़िल होता है तो सब के सब उस जगह पर जम़अ् हो जाते हैं कि जहाँ से वोह दाख़िल हुआ है और फ़ौरन उस बेगाने जरासीम के सामने एक मुस्त़हकम दीवार की तरह़ खड़े हो जाते हैं और मुख़्तलिफ़ रास्तों से इस बात की कोशिश करते हैं कि येह ज़हरीला माद्दा बकि़या जिस्म में सरायत न करने पाए।
तअज्जुब ख़ेज़ बात तो येह है कि ऐसा नहीं है कि हर जरासीम के मुक़ाबले में एक जैसा अमल अंजाम देते हों बल्कि जैसे जरासीम होते हैं वैसा अमल अंजाम देते हैं।
मसलन बअ्ज़ तो जरासीम के जिस्मों को नीस्त-ओ-नाबूद करते हैं बअ्ज़ ज़हर को सारे जिस्म में सरायत होने से मानेअ् होते हैं। ख़ाह वोह ज़हर किसी क़िस्म का हो। बअ्ज़ का काम येह है कि वोह जरासीम को अधमरा कर देते हैं बअ्ज़ का काम ज़हरीले माद्दा को तह नशीन करना होता है और बअ्ज़ की ज़िम्मेदारी येह है कि जिस वक़्त बाहर से ख़ून जिस्म में दाख़िल किया जाता है तो वोह चीज़ें जो उस जिस्म के ख़ून के मुताबिक़ नहीं हैं उनको जिस्म के ख़ून के मुवाफ़िक़ बनाना होता है।
सबसे ज़्यादा तअज्जुब ख़ेज़ और ह़ैरत अंगेज़ बात तो येह है कि जिस्मे इन्सानी का ‘मोह़क्मए देफ़ा़अ्’ इस बात पर भी क़ादिर है कि ज़रूरत के वक़्त देफ़ा़अ् के लिए कुछ ऐसे मवाद पैदा करे जिन्हें आज तक इल्मी दुनिया कश्फ़ नहीं कर सकी है।
काएनात की वुसअतें
‘पालो मार’ नामी पहाड़ पर ‘रसद ख़ानए लिसोन’ क़ाएम किया गया है इस के सरबराह का बयान हैः
जब तक इस रसद ख़ाना की दूरबीन ईजाद नहीं हुई थी उस वक़्त तक दुनिया की वुस्अत जो हम लोगों को मअ्लूम थी पाँच सौ नूरी साल से ज़्यादा नहीं थी लेकिन जब इस रसद ख़ाना की दूरबीन वजूद में आई तो उस वक़्त दुनिया की वुस्अत एक अरब (१०००००००००) नूरी साल तक पहुँच गई जिसके नतीजे में लाखों नई कहकशाएँ कश्फ़ हुई हैं और बअ्ज़ कहकशाएँ तो हमसे इतनी दूर हैं कि उन तक पहुँचने के लिए एक अरब नूरी साल की मसाफ़त दरकार है। और इस अज़ीम मसाफ़त के बअ्द जो चीज़ हमारे सामने आती है वोह एक ख़ौफ़नाक और तारीक फ़ेज़ा है जिसमें कोई चीज़ भी दिखाई नहीं देती। वहाँ पर रोशनी का गुज़र तक नहीं है जिसकी बेना पर येह दूरबीन किसी चीज़ से मुतअस्सिर नहीं हो पाती। जिसके नतीजे में कोई भी तस्वीर उभर कर सामने नहीं आ पाती। लेकिन इस घटाटोप तारीकी के बावजूद भी येह बात यक़ीन से कही जा सकती है कि उस तारीक फ़ेज़ा में लाखों, करोड़ों कहकशाएँ मौजूद हैं और येह उन्हींं कहकशाओं की क़ूवते जाज़ेबा है जिसकी बेना पर हमारी दुनिया क़ाएम और बाक़ी है।
‘येह दुनिया जिसमें हम और आप ज़िदगी बसर कर रहे हैं अपनी तमाम वुस्अतों और तमाम कहकशाओं के बावजूद उस अज़ीम काएनात के मुक़ाबला में एक म़अ्मूली से ज़र्रे की ह़ैसियत रखती है और येह बात यक़ीन से नहीं कही जा सकता कि इस अज़ीम दुनिया के अलावा और दुनिया है या नहीं।’
इस बयान की रोशनी में अब अगर ज़रा मौलाए काएनात ह़ज़रत अली अलैहिस्सलाम के कलेमात की तरफ़ तवज्जोह फ़रमाइए तो ह़क़ीक़त किस तरह़ मुजस्सम हो कर सामने आ जाती है।
‘परवरदिगार! हमारी क़ुदरत से बाहर है कि तेरी अज़्मत और क़ुदरत की तह तक पहुँच सकें। हाँ इतना जानते हैं कि तू ‘ह़य्य-ओ-क़य्यूम’ है। न तुझे नींद आती है और न ऊँघ न निगाहें तुझ तक पहुँच सकती हैं और न बसारतें तुझे पा सकती हैं फ़िक्र की तुझ तक रसाई नहीं लेकिन तू लोगों की निगाहों से वाकि़फ़ उनकी तमाम उम्रें तेरे इल्म में और तू हर चीज़ पर क़ादिर है…
बावजूद इस के कि तेरी पैदा-कर्दा चीज़ों में से किसी एक को भी सह़ीह़ म़अ्नों में नहीं समझ सके हैं। फिर भी तेरी क़ुदरत-ओ-ताक़त ने हमारी आँखें ख़ीरा कर दी हैं और तेरी अज़्मत को हमारे सामने मुजस्सम कर दिया है। जब सूरते हाल येह है कि जो कुछ हमारी नज़रों से पोशीदा है या हमारी आँखें उस के देखने की ताक़त नहीं रखतीं, ग़ैब के पर्दे हमारे और उनके दरमियान पड़े हुए हैं वोह इन नज़र आने वाली चीज़ों से कहीं ज़्यादा अज़ीम हैं।’
(नहजुल बलाग़ा ख़ुतबाः १५९)
यक़ीनन ख़ुदावंद आलम ने इन तमाम चीज़ों को अपनी क़ुदरत कामिला से पैदा किया है और कोई भी चीज़ ऐसी नहीं है कि जो उस क़ुदरत की हदों से बाहर हो। येह दुनिया उसी ख़ुदा के इरादे से बाक़ी है और जब तक वोह चाहेगा बाक़ी रहेगी। झिलमिल झिलमिल करते हुए सितारे, येह दमकता हुआ माहताब, येह चमकता हुआ आफ़ताब सब के सब उस की क़ुदरत के गीत गा रहे हैं। येह दुनिया का अजीब-ओ-ग़रीब निज़ाम उस की क़ुदरते कामिला का क़सीदा प़ढ रहा है ख़ुदावंद आलम इस बात पर भी क़ादिर है कि जब चाहे इस अज़ीम काएनात को जिसका हर ज़र्रा ग़ौर-ओ-फ़िक्र के क़ाबिल है दरहम बरहम कर दे और इस की जगह एक नई दुनिया वजूद में लाए। हरगिज़ ऐसा नहीं है कि दुनिया को पैदा करने के बअ्द उस के इख़्तेयार में कुछ न हो बल्कि हरकत-ओ-सुकून, इ़ज्तेराब और अम्न सब उसी के करम का नतीजा है ब़गैर उस के इरादे के न तो कई चीज़ वजूद में आ सकती है और न बाक़ी ही रह सकती है। इस काएनात का वजूद और उस की बक़ा सब उस के इरादे का नतीजा है।
इसी बेना पर इस जहान पर अज़्मत का पैदा करने वाला, बाक़ी रखने वाला, नज़्म-ओ-नस्क़ की ह़ेफ़ाज़त करने वाला सिर्फ़ ख़ुदावंद आलम है।
निज़ाम बालाए निज़ाम
ख़ुदावंद आलम ने इस दुनिया में गरचे एक ख़ास क़िस्म का निज़ाम मु़अय्यन किया है जिसकी बुनियाद पर आइन्दा होने वाले वा़के़आत की ख़बर दी जा सकती है और मुस्तक़बिल के बारे में पेशन गोई की जा सकती है लेकिन बअ्ज़ मवाक़ेअ् ऐसे भी आते हैं कि जिस वक़्त ख़ुदावंद आलम अपनी क़ुदरत का ख़ास एक जल्वा लोगों के सामने पेश करता है जिसमें एक अजीब क़िस्म का निज़ाम ह़ुक्म फ़रमा होता है और येह निज़ाम मौजूदा और आम निज़ाम पर फ़ौक़ियत रखता है।
इस अजीब निज़ाम की मिसालें दामने तारीख़ में तो बेशुमार बल्कि हमारी रोज़मर्रा की ज़िदगी में भी कम-ओ-बेश आती रहती हैं। यही वोह मवाक़ेअ् हैं जब येह बात रोशन होकर सामने आ जाती है कि दुनिया की बक़ा ख़ुदावंद आलम के इरादे की मर्हूने मिन्नत है। हम सब के सामने ऐसी कितनी मिसालें मौजूद हैं। ख़ुदावंद आलम ने किस तरह़ सा़हेबाने क़ुदरत-ओ-ताक़त, जाह-ओ-जलाल से सब कुछ छीन लिया और उनको कौड़ी का मो़हताज कर दिया और किस तरह़ म़ज्लूमों और फ़क़ीरों को साहेबे इक़्तेदार-ओ-शौकत बना दिया।
यही वजह है कि वोह अश्ख़ास जो ख़ुदावंद आलम पर ईमान रखते हैं वोह अपनी ज़िदगी में किसी वक़्त भी और किसी लम्हा भी मायूस नहीं होते। बल्कि जिस वक़्त मायूसी की तारीकी हर तरफ़ छा जाती है उस वक़्त भी उम्मीद की शम़अ् उनके दिल में रोशन रहती है और उस श़ख्स को इतना यक़ीन-ओ-इत्मीनान होता है कि इस भयानक और डस लेने वाली तारीकी में भी ख़ुदा उस को नजात दिला सकता है और उम्मीद की सुबह (सुब्ह) से हमकनार करा सकता है।
जनाब मूसा अलैहिस्सलाम और फ़िरऔन के वा़के़आ को हम सब ने मुतअद्दिद बार सुना और प़ढा होगा। ज़ुल्म ढाने में फ़िरऔन अपनी आप मिसाल था। येह फ़िरऔन था जो बनी इस्राईल के लड़कों को सिर्फ़ इस लिए क़त्ल करवा देता था कि जनाब मूसा अलैहिस्सलाम वजूद में न आ सकें। क्योंकि उसने सुन रखा था कि जनाब मूसा अलैहिस्सलाम के हाथों उस का तख़्त-ओ-ताज ख़ाक में मिलेगा। फ़िरऔन अपने तईं येह ख़याल किए हुए था कि मैं अपनी इस तदबीर और इन मज़ालिम की बेना पर इस बात पर क़ुदरत पैदा कर लूंगा कि जनाब मूसा अलैहिस्सलाम वजूद में न आएँ।
लेकिन उस की तमाम कोशिशें नक़्श बर आब साबित हुईं और सारी तदबीरें राएगाँ और ख़ुद फ़िरऔन ही की आग़ोश में जनाब मूसा अलैहिस्सलाम ने परवरिश पाई।
जनाब मूसा अलैहिस्सलाम की मादरे गेरामी को ख़ुदा की तरफ़ से येह इल्हाम हुआ कि मूसा (अ.स.) को एक संदूक़ में रखकर दरियाए नील की मौजों के ह़वाले कर दें। मौजों ने संदूक़ को अपनी आग़ोश में लिया और लोरियाँ देती हुई फ़िरऔन के क़स्र की तरफ़ ले गईं। संदूक़ का क़स्र से ऩज्दीक होना था कि ज़ौजए फ़िरऔन की नज़र संदूक़ पर पड़ी संदूक़ को दरिया से उठाया, देखा कि एक ़खूबसूरत बच्चा इस में खेल रहा है। येह देखकर ज़ौजए फ़िरऔन ने फ़िरऔन से कहा कितना अच्छा हो कि हम इस बच्चे को अपनी औलाद क़रार दें। ज़ौजए फ़िरऔन की येह तमन्ना पूरी हुई और फ़िरऔन इस बात पर राज़ी हो गया।
वही बच्चा जिसके लिए लाखों करोड़ों बच्चे क़त्ल कर डाले गए फ़िरऔन ने पूरी ताक़त सर्फ़ कर दी जो कुछ उस के इम्कान में था उस में कोई कसर उठा न रखी लेकिन फिर भी आजिज़-ओ-नातवाँ रहा। जनाब मूसा अलैहिस्सलाम वजूद में आ के रहे और ख़ुद उसी के हाथों जनाब मूसा (अ.स.) परवान चढ़े उसी के घर में पले ब़ढे और जिस तख़्त-ओ-ताज की ह़ेफ़ाज़त के लिए फ़िरऔन दिन रात कोशाँ रहता था, आख़िर कार जनाब मूसा (अ.स.) ने उस के ग़ुरूरे शाही को ख़ाक में मिला दिया। तख़्त-ओ-ताज को मिस्मार कर दिया। येह ख़ुदा की लामह़दूद क़ुदरत का एक करिश्मा था।
जनाब यूसुफ़ अलैहिस्सलाम और उनके भाइयों का क़िस्सा भी हम सब ने सुना और प़ढा होगा। जनाब यूसुफ़ (अ.स.) के भाइयों ने जान तोड़ कर कोशिश कर डाली कि जनाब यूसुफ़ (अ.स.) को क़त्ल कर डालें और इसी बेना पर उन्होंने जनाब यूसुफ़ (अ.स.) को कुएँ में डाल दिया। ज़ाहिरी अस्बाब-ओ-निज़ाम की बेना पर जनाब यूसुफ़ का डूब कर मर जाना ज़रूरी था लेकिन ख़ुदावंद आलम ने जनाब यूसुफ़ (अ.स.) को बचा कर ज़ाहिर कर दिया कि उन ज़ाहिरी अस्बाब के अलावा भी अस्बाब हैं जो तुम्हारे इख़्तेयार से बाहर हैं लेकिन हमारे इख़्तेयार में हैं। तुम्हारा ख़याल था कि तुम यूसुफ़ (अ.स.) को पानी में डुबो दोगे लेकिन हम उसे अज़ीज़े मिस्र बनाएँगे।
कुफ़्फ़ारे मक्का ने आपस में मिलकर येह मु़आहेदा किया कि पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम को क़त्ल कर डाला जाए और मुसलमानों को तरह़ तरह़ की अज़ीयतें पहुँचाई जाएँ। इन्हीं सब बातों की बेना पर तीन साल तक पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम को ‘शे़अ्बे अबी तालिब’ में मह़सूर रखा और बिल्कुल क़त़्अ तअल्लुक़ कर लिया और किसी भी क़िस्म की मदद करना जाएज़ न था। कुफ़्फ़ार की ख़ाहिश थी कि उन लोगों को इतनी ईज़ा दो कि भू़ख-ओ-प्यास की शिद्दत से येह लोग दुनिया से रुख़स्त हो जाएँ और इस्लाम की आवाज़ यहीं पर दफ़्न हो कर रह जाए।
आख़िर में तो तमाम क़बीले वालों ने मिलकर येह फ़ैसला किया कि हम सब मिलकर पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम को क़त्ल कर डालें और इस बात के लिए जितना भी इंतेज़ाम कर सकते थे कर डाला ज़रा भी कसर उठा न रखी। ज़ाहिरी अस्बाब की बेना पर पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के बचने की कोई उम्मीद न थी लेकिन ख़ुदा के इरादे ने उनकी तमाम कोशिशों पर पानी फेर दिया और उनकी उम्मीदों पर मायूसी की ओस छि़डक दी। और ख़ुद अपने पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम की किस तरह़ ह़ेफ़ाज़त फ़रमाई जिसके नतीजे में दीने मुक़द्दसे इस्लाम दिन दूनी रात चौगुनी तरक़्क़ी करता गया और कुफ़्र-ओ-शिर्क की तारीकी काफ़ूर होती गई।
अगर इन चंद मिसालों पर ग़ौर किया जाए और थोड़ी बहुत फ़िक्र की जाए तो येह बात साफ़ और वाज़े़ह हो जाती है कि दुनिया का सारा निज़ाम ख़ुदावंद आलम के इरादे का पाबंद है और वोह जब चाहे एक और निज़ाम जो इस मौजूदा निज़ाम के अलावा है उस पर हाकिम हो, जारी कर सकता है।
अब इस मुक़ाम पर अक़्ल चिराग़े हेदायत लेकर आगे ब़ढती है और इन्सान को मुतवज्जेह करते हुए यूँ ख़ेताब करती है किः
वोह ख़ुदा जो इतनी क़ुदरत-ओ-ताक़त वाला हो और इतना मेह्रबान हो तो ह़क़ येह है कि हम उस की बारगाह में सरे तस्लीम ख़म कर दें, उसकी जनाब में जिब्ह साई करें (उस के हुज़ूर सरे तस्लीम ख़म करें)। सिर्फ़ उसी की एबादत करें उसने जिन बातों को ह़ुक्म दिया उस की तअ्मील में हमेशा कोशाँ रहें और हमेशा उस की मुख़ालेफ़त से परहेज़ करें गुनाह करना तो दरकिनार फ़िक्रे गुनाह भी न करें।
येह ख़ुदा ही का करम है जिसने हमको मुख़्तलिफ़ मंज़िलों और मुतअद्दिद रास्तों से गुज़ार कर अक़्ल-ओ-शऊर की इस मंज़िल तक पहुँचाया है। हमारे पास जो कुछ भी अक़्ल-ओ-शऊर-ओ-एह़सास की दौलत है येह उस की बदौलत है। अब इस सूरत में क्या दुरुस्त है कि हम उस ख़ुदा को भूल जाएँ उस की मुख़ालेफ़त-ओ-गुनाह में सरगर्म रहें।
बेशक जो श़ख्स ऐसे क़ादिरे मुतलक़ और मेह्रबान ख़ुदा पर दुरुस्त ईमान रखता है वोह बड़ी से बड़ी मुश्किलों में भी परेशान नहीं होता बल्कि हश्शाश बश्शाश और चेहरे से सुकून-ओ-इत्मेनान के आसार नज़र आते हैं।
बड़ी से बड़ी मुसीबतें जिसमें आम लोग होश-ओ-ह़वास खो बैठते हैं ऐसी अज़ीम मुश्किलें जिसमें बज़ाहिर कोई मुश्किल हल होती नज़र नहीं आती है लेकिन जो श़ख्स ख़ुदा पर ईमान रखता है उस की नज़र में येह सारी की सारी मुसीबतें और मुश्किलें क़ाबिले ह़ल हैं और यही वजह है कि ऐसे सख़्त और भयानक मवाक़ेअ् पर भी येह श़ख्स एक अ़ज्मे रासिख़ और मुसम्मम इरादे के साथ मुश्किल को हल करने की कोशिश में लगा रहता है और अपने इसी मुसम्मम इरादे से मायूसियों के पहाड़ के परख़्चे उड़ा देता है क्योंकि उस को इस बात का यक़ीन है कि मेरी पुश्त पनाह वोह ज़ात है जिसकी क़ुदरत-ओ-ताक़त की कोई हद-ओ-इंतेहा नहीं उस का एक हल्का सा इशारा इन तमाम मुश्किलात को पानी कर देगा।
ज़रा आप अरब के उस माह़ौल को तसव्वुर करें जिस वक़्त रसूले ख़ुदा सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम की आवाज़ पर लब्बैक कहने वाला चंद अश्ख़ास के अलावा कोई भी नहीं था बल्कि पूरा अरब मिलकर आँह़ज़रत की मुख़ालेफ़त पर तुला हुआ था हर तरफ़ मुख़ालेफ़त की आँधियाँ चल रही थीं। चारों तरफ़ से अदावत के पत्थर बरसाए जा रहे थे। आँह़ज़रत को क़त्ल करने की मुसलसल कोशिशें जारी थीं। अगर कोई भी आँह़ज़रत की आवाज़ पर लब्बैक कहता तो वोह मसाएब का शिकार हो जाता। मगर उसी ज़ुल्म-ओ-जौर से भरे हुए माह़ौल में बिलाल (रज़) ने आँह़ज़रत की आवाज़ पर लब्बैक कही। लब्बैक कहना था कि मसाएब के पहाड़ टूट पड़े। यहाँ तक कि रेगिस्तान की इस चिलचिलाती धूप में जहाँ पर दाना गिरता तो भुन जाता। बिलाल (रज़) को उस तप्ती हुई ज़मीन पर लिटा कर एक दहकता हुआ पत्थर सीने पर रखकर और ताज़ियाने लगाना शुरू़अ् कर देते लेकिन बिलाल (रज़) की ज़बान पर अह़दन अह़दन के सिवा कुछ न था। आख़िर कार ज़ालिम थक गए और बिलाल (रज़) ने अमलन बता दिया कि जो कोई ख़ुदा पर ईमान रखता है वोह मसाएब से हरगिज़ नहीं घबराता और आख़िर कार कामियाबी उसी के क़दमों का बोसा लेती है।
बेशक जिस श़ख्स के दिल में ईमाने ख़ुदावंदी की शम़अ् रोशन हो, यादे ख़ुदा से दिल लबरेज़ हो वोह कभी अपने को तन्हा म़हसूस नहीं करता और कभी भी मायूस नहीं होता।
यक़ीनन येह श़ख्स हमेशा अपने को स़आदतमंद बनाने और शरीफ़ाना ज़िदगी बसर करने के लिए सई-ओ-कोशिश में लगा रहता है और कभी भी ज़िल्लत-ओ-ख़ारी उस की ज़िदगी में राह नहीं पाती। यही श़ख्स हमेशा बाइज़्ज़त-ओ-बासुकून ज़िदगी बसर करता है और मुश्किलात के मुक़ाबले में सीना सिपर रहता है।