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सबक़ - १६

इस्मते अम्बिया (अ.स.)

ख़ुदावंद ह़कीम और मेह्रबान ने अम्बिया मब़्ऊस फ़रमाए ताकि उनकी रहबरी में कारवाने बशरीयत सही़ह राह पर गामज़न रहे और ज़लालत की वादियों में न भटके। मे़अ्‌राजे कमाल-ओ-इतेक़ा की आख़िरी मंज़िल तक पहुँच जाए और अपने को इन्सानी सिफ़ात और अख़्लाक़ी आदात से आरास्ता करे।

इसी बेना पर ख़ुदावंद ह़कीम और मेह्रबान ने अपने तमाम अम्बिया को हर क़िस्म की ख़ता और इश्तेबाह और गुनाह से महफ़ूज़ और मअ्‌सूम रखा ताकि ज़िंदगी के हर शोअ्‌बे में इन्सान की सही़ह और कामिल रहनुमाई कर सकें और उनमें अहकाम ख़ुदा की एताअत और फ़रमाँबर्दारी का ज़ज्बा कूट कूट कर भर दें और उन्हें इधर उधर भटकने से महफ़ूज़ रखें।

वोह दलील जो ज़रूरते अम्बिया के ज़ैल में बयान की गई है, वही दलील अम्बिया के लिए इस्मत को ज़रूरी क़रार देती है। इन्सानियत की रहबरी के लिए अम्बिया का मअ्‌सूम होना नेहायत ही ज़रूरी है। क्योंकि बे़अ्‌सते अम्बिया की ग़र्ज़ और मक़सद इन्सान की तरबियत और कारवाने बशरीयत की हेदायत की तरफ़ रहनुमाई है। येह मक़सद सिर्फ़ इस्मते अम्बिया के साए में ह़ासिल होता है। येह बात बदीही (वाज़ेह) है कि गुनाह, ख़ता, इश्तेबाह, बेमक़्सद उमूर, इन तमाम चीज़ों का अंजाम येह है कि लोग मुतनि़प़फर हो जाएँगे और उनका एअ्‌तेमाद उठ जाएगा और इस तरह़ मक़सदे बे़अ्‌सत फ़ौत हो जाएगा और लोगों की हेदायत और तरबियत न हो पाएगी।

येह बात सभी जानते हैं कि कोई भी अक़्लमंद अपने मक़सद-ओ-ह़दफ़ को बेकार नहीं करता है। बतौरे मिसाल एक शख़्स की ख़ाहिश है कि उस की महफ़िल-ओ-जश्न में मोअज़्ज़ज़ और मोहतरम हस्तियाँ शिरकत करें, उसे इस बात का भी इल्म है कि येह शख्सीयतें उस वव़त तक तश्रीफ़ नहीं लाएँगी जब तक उन्हें बाक़ा़एदा दअ्‌वत न दी जाए। इन लोगों को दअ्‌वत देने के लिए वोह कभी भी ऐसे शख़्स को मुंतख़ब नहीं करेगा जिसको देखते ही लोग मुतनि़प़फर हो जाएँ, बल्कि वोह ऐसे शख़्स को तलाश करेगा जो उन लोगों के ऩज्दीक मोहतरम और क़ाबिले एअ्‌तेमाद हो। अगर उस के अलावा कोई और सूरत इख़्तेयार की तो कोई भी उस के फ़ेअ्‌ल को आक़िलाना न कहेगा और न उस शख़्स को अक़्लमंद कहेगा बल्कि सब उस की मज़म्मत ही करेंगे।

ख़ुदावंद ह़कीम और मेह्रबान ने उन तमाम चीज़ों का ले़हाज़ रखा है जो इन्सान की हेदायत और तरबियत में मोअस्सर हैं। ख़ुदावंद आलम ने कभी येह न चाहा कि इन्सान हवा-ओ-हवस का पैरव रहे और हवस रानों का आलए कार बना रहे। जिसकी बेना पर वोह अपने इरतेक़ाई सफ़र को तै न कर सके और अपनी ज़िंदगी को कामिल न बना सके।

ख़ुदावंद आलम ने मअ्‌सूम अम्बिया को भेजा ताकि लोगों की हेदायत करें और बेहतरीन तरीके पर उनकी तरबियत करें।

अम्बिया अलैहिमुस्सलाम का मअ्‌सूम होना क्यों ज़रूरी है? एक ज़रा तफ़सीली जाएज़ा लेते हैं।

तरबियत

गुज़श्ता दर्स में येह बात पढ़ चुके हैं कि बे़अ्‌सते अम्बिया की ग़र्ज़ इन्सान की तअ्‌लीम-ओ-तर्बियत है। येह बात बदीही (वाज़ेह)है कि तरबियत में मु़अल्लिम और मुरब्बी का अमली किरदार उस के क़ौल से कहीं ज़्यादा मोअस्सर होता है।

मुरब्बी (तरबियत करने वाला) के किरदार में येह असर है कि वोह लोगों में एक बुनियादी इन्क़ेलाब पैदा कर सकता है। तरबियत के उसूल में येह बात क़तई है कि इन्सान ऩपसीयाती तौर पर मुरब्बी के अख़्लाक़-ओ-किरदार, आदात-ओ-अत्वार को अपनाने की कोशिश करता है और इतना ज़्यादा उस का हम-रंग हो जाता है जिस तरह़ साफ़-ओ-शपफ़ाफ़ पानी में आसमान का अक्स। येह पानी भी आसमानी रंग का मअ्‌लूम होता है।

सिर्फ़ गुफतार में येह सलाह़ियत नहीं है कि वोह सही़ह तौर पर तरबियत कर सके। बल्कि तरबियत (जो कि मक़सदे बे़अ्‌सत है) के लिए ज़रूरी है कि अम्बिया अलैहिमुस्सलाम ऐसे सिफ़ात-ओ-आदात से आरास्ता हों जिसमें किसी क़िस्म के शक-ओ-शुब्हे की गुंजाइश न हो और उनसे ख़ता-ओ-लग्ज़िश का भी इम्कान न हो, ताकि कामियाबी से इन्सान की तरबियत कर सकें और एक मुक़द्दस मक़सद की तरफ़ उस की सलाह़ियतों को जज़्ब कर सकें।

येह वाज़ेह है कि जो ख़ुद गुनाहगार होगा ख़ाह उसने गुनाह का इतेकाब कितनी ही तन्हाई में किया हो किसी को इस की ख़बर तक न हुई हो और येह शख़्स अपने को लोगों के सामने कितना ही ज़्यादा पार्सा-ओ-पाकीज़ा ज़ाहिर करे, ऐसे शख़्स में हरगिज़ वोह रू़ही इस्तेक़ामत और मअ्‌नवी सबात न होगा जिसकी बेना पर इन्सानों में बुनियादी और रू़ही इन्क़ेलाब ला सके।

जो शख़्स ख़ुद शराब ख़ार है वोह दूसरों को शराब ख़ारी से क्यूँकर रोकेगा, और क्यूँकर इस लत (ख़सलत) से बरसरे पैकार होगा।

अम्बिया अलैहिमुस्सलाम ख़ासकर आँह़ज़रत (स.अ.) का गुनाह आलूद और फ़साद परवर मु़आशरे से सख्त अज़ीयत महसूस करना और समाज के दर्द में बेकल(बेचैन) रहना ख़ुद इस बात की दलील है कि येह तमाम हज़रात गुनाह और ख़ता से पाक थे।

अम्बिया अलैहिमुस्सलाम की कामियाबी का एक अहम राज़ है कि उन के किरदार-ओ-गुफतार, अफ़्आल-ओ-अक़वाल में ज़बरदस्त इत्ते़हाद था। यही गुफतार-ओ-किरदार का इत्ते़हाद था जिसने समाज में इन्क़ेलाब बर्पा कर दिया और लोगों की मंज़िले कमाल-ओ-इरतेक़ा की तरफ़ रहनुमाई की।

जज़्ब-ओ-एअ्‌तेमाद

कहने वाले पर जिस क़द्र एअ्‌तेमाद होगा और जितना ज़्यादा ईमान होगा, उसी क़द्र लोग उस की बात को जज़्ब और क़बूल करेंगे। इस के बर ख़ेलाफ़ जिस क़द्र एअ्‌तेमाद-ओ-ईमान में कमी होगी लोग उसी क़द्र उस बात को कम क़बूल करेंगे।

अम्बिया अलैहिमुस्सलाम जो अहकाम ख़ुदावंदी के तर्जुमान थे और लोगों को गुनाह की आलूदगी से बअ्‌ज़ रखने वाले थे उन के लिए ब-दरजए औला लाज़िमी है कि वोह हर आली सिफ़त से मुत्तसिफ़ हों। और हर इन्सानी अख़्लाक़ से आरास्ता हों। हर क़िस्म के गुनाह, ख़ता, बल्कि इश्तेबाह से दूर हों। ताकि लोगों का एअ्‌तेमाद बढता जाए और ईमान-ओ-अक़ीदत में एज़ाफ़ा होता जाए और जिस क़द्र येह ईमान मुस्तहकम होगा उसी क़द्र लोग उनकी बातों को ज़्यादा से ज़्यादा जज़्ब और क़बूल करेंगे। और उनके अहकाम के नेफ़ाज़ के लिए, उनको अमली बनाने के लिए हर मुम्किन कोशिश करेंगे। और दिल की गहराइयों से उनको अपना रहबर और हादी मानेंगे ताकि बे़अ्‌सत का मक़सद ह़ासिल हो जाए और इन्सान मे़अ्‌राजे कमाल तक पहुँच जाए। अगर येह सूरत न हुई (अम्बिया (अ.स.) का मअ्‌सूम होना) तो मक़सदे बे़अ्‌सत ह़ासिल न होगा। येह बात ह़िकमते ख़ुदावंदी से बहुत दूर है।

येह अम्बिया (अ.स.) की इस्मत थी जिसकी बेना पर लोग उनके दिल बा़ख्ता और आशिक़ हो गए थे। बअ्‌ज़ लोग मोहब्बते पैग़म्बर (स.अ.) में इस क़द्र आगे बढ गए थे और ख़ुद फ़रामोश हो गए थे कि एताअते पैग़म्बर (स.अ.) में अपनी जान तक की बाज़ी लगा दी।

आया हो सकता है कि एक इन्सान हर क़िस्म के गुनाह-ओ-लग्ज़िश से पाक-ओ-पाकीज़ा हो और इस्तेला़ह में मअ्‌सूम हो? आइये इस सवाल का जाएज़ा लेते हैं और इस सिलसिले में गु़पतुगू करते हैं।

ह़क़ीक़ी मोहब्बत

अम्बिया अलैहिमुस्सलाम इश़्के इलाही से सरशार थे और क्यों न हों? क्योंकि येह हज़रात ख़ुदावंद आलम को तमाम दूसरे लोगों से ज़्यादा पहचानते थे। उस की अज़्मत, बुज़ुर्गी, शिकोह, जलाल सब उनकी निगाह के सामने थीं। उनको ख़ुदा की बुज़ुर्गी का यक़ीन था। ख़ुदा को क़ाबिले इश्क़ और उस को एताअत के लाएक़ जानते थे। सिर्फ़ उनकी रज़ा और ख़ुश्नूदी उनकी नज़रों के सामने थी। ख़ुदा के अलावा कोई भी चीज़ उनकी नज़रों में न आती थी। तमाम चीज़ों को उस पर फ़ेदा कर देते थे। वोह येह जानते थे कि किस की एताअत करनी चाहिए।

यही वजह थी कि अम्बिया अलैहिमुस्सलाम तब्लीग़ की राह में हर मुश्किल और हर ह़ादसे का इस्तेक़बाल करते थे। वोह बो़हरानी दौर में भी कुशादा रवी और ख़ंदापेशानी से पेश आते थे और ख़ुदा की तरफ़ मुतवज्जेह रहते थे। ख़ुदा की राह में सि़ख्तयाँ बर्दाश्त करने में उन्हें ख़ुशी महसूस होती थी।

अम्बिया अलैहिमुस्सलाम की फ़ेदा कारियाँ, जाँबाज़ियाँ, क़ुर्बानियाँ और इस के मुक़ाबला में लोगों की बद सुलूकी, बद ऱपतारी..... सब तारीख के दामन में महफ़ूज़ हैं। मुश्किलात में साबित क़दम रहना, पामर्दी से उनका मुक़ाबला करना, ख़ुदा के अहकाम की तब्लीग़ करना इन सब का सर चश्मा इश्क़े ख़ुदावंदी के अलावा और क्या है।

जो राहे ख़ुदा में इस क़द्र डूबा हुआ हो, फ़िक्र-ओ-ख़याल में सिर्फ़ और सिर्फ़ ख़ुदा का तसव्वुर हो, दिल-ओ-दिमा़ग की गहराइयों में बस उसी का ख़याल हो तो क्या ऐसे शख़्स से ख़ुदा की नाफ़रमानी की उम्मीद की जा सकती है? नहीं - बल्कि येह शख़्स हमेशा उस की एताअत में हमातन मशगूल-ओ-मसरूफ़ रहेगा।

रसूले ख़ुदा सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम की ख़िदमते अव़दस में अर्ज़ किया गयाः या रसूलुल्लाह (स.अ.) आप (एबादत में) इस क़द्र क्यों ज़़ह्मत बर्दाश्त करते हैं जब कि आप हर क़िस्म के गुनाह से पाक-ओ-पाकीज़ा हैं? तो उस वव़त रसूले ख़ुदा (स.अ.) ने इर्शाद फ़रमायाः

اَفَلَا اَکُوْنَ عَبْدًا شَکُوْرًا۔

अ-फ़ला अकू-न अब्दन शकूरन.

क्या मैं शुक्र गुज़ार और सेपास गुज़ार बंदा न बनूँ।

(तफ़सीर नूरुस्सक़लैन, जि॰ २, स॰ ३६७)

ह़ज़रत अली इब्ने अबी तालिब अलैहिस्सलाम ने पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.) की सिफ़ात की तरफ़ यूँ इशारा फ़रमायाः

‘ख़ुदावंद आलम ने आँह़ज़रत (स.अ.) को रसूल और पैग़म्बर बना कर मब़्ऊस फ़रमाया इस ह़ालत में कि आप (स.अ.) लोगों को बशारत देने वाले और उनको डराने वाले थे। अपने बचपन में सबसे बरतर और बुढ़ापे में सबसे अफ़ज़ल-ओ-बेहतर थे। आप (स.अ.) की तबी़अत हर मुत्तक़ी से पाकीज़ा तर थी बाराने जूद-ओ-सखा हर सखी से कहीं ज़्यादा वसीअ्‌ और तेज़ थी।’

(तारीख तबरी, जि॰ ५, स. २२६९, स॰ २२७१)

‘आप (स.अ.) हर मुत्तक़ी-ओ-परहेज़गार के इमाम और हर हेदायत या़पता की रोशनी हैं।’

(नहजुल बला़गा, ख़ुतबा ११५)

हाँ अम्बिया अलैहिमुस्सलाम की मअ्‌रेफ़ते कामिल और इश्क़े ह़क़ीक़ी उन्हें हर ख़ता और हर लग्ज़िश से महफ़ूज़ रखे था। इतेकाबे गुनाह कैसा, बल्कि येह लोग ख़याल और तसव्वुरे गुनाह से कोसों दूर थे।

मअ्‌रेफ़ते कामिल

तमाम इन्सानों की फ़िक्र और मअ्‌रेफ़त एक जैसी नहीं है। एक जाहिल कभी भी जरासीम के बारे में इस तरह़ फ़िक्र नहीं करेगा जैसा कि एक डाक्टर फ़िक्र करता है। एक वोह डाक्टर जिसने मुद्दतों जरासीम के बारे में तहक़ीक़ और जुस्तजू की है और बरसों ख़ूर्दबीन के ज़रीए उस की आ़ज्माइश की है और उस के असरात को देखा है उसे तमाम अश्ख़ास का अंजाम मअ्‌लूम है जो इस मसअला में ला उबाली हैं और जरासीम को कोई अहम्मीयत नहीं देते हैं। येह डाक्टर कभी भी जरासीम के बारे में लापरवाही नहीं बरतेगा।

इसी लिए हम देखते हैं कि जाहिल जरासीम के असरात से नावाक़िफ़ गंदा पानी इस्तेअ्‌माल कर लेता है उसे किसी चीज़ की कोई फ़िक्र भी नहीं होती है। लेकिन वोह डाक्टर हरगिज़ उस पानी को इस्तेअ्‌माल नहीं करेगा बल्कि उस के इस्तेअ्‌माल की फ़िक्र भी नहीं करेगा।

इस इज्तेनाब का सबब डाक्टर का इल्म और उस की मअ्‌रेफ़त है जिस तरह़ से जाहिल कीच़ड को इस्तेअ्‌माल नहीं करता है क्योंकि कीच़ड के नुक्सानात से आगाह है और इस के नुक्सानात का उसे इल्म है लेकिन एक साल का बच्चा कीच़ड से भी परहेज़ नहीं करेगा क्योंकि उसे उस के नुक्सानात का बिल्कुल इल्म नहीं है।

दूसरी बात येह है कि अक्सर अश्ख़ास तदरीजी नुक्सानात को कोई ख़ास अहम्मीयत नहीं देते हैं जब कि यही लोग नागहानी बला से वहशतज़दा हो जाते हैं और उस के रोक-थाम की कोशिश करते हैं। जैसे वोह शख़्स जिसके दाँत में कीड़े लग गए हैं वोह उनको निकलवाने में काहिली और सुस्ती बरतता है और डाक्टर तक जाने के लिए आज और कल लगाए रहता है यहाँ तक कि उस के सारे दाँत ख़राब हो जाते हैं फिर येह शख़्स मु़ख्तलिफ़ अमराज़ का शिकार हो जाता है और तरह़ तरह़ के दर्द में मुब्तेला हो जाता है लेकिन येह शख़्स जब गुदे में तकलीफ़ महसूस करता है तो फ़ौरन डाक्टर के पास जाता है और उस का बाक़ा़एदा इलाज कराता है।

अगर कोई प़ढा लिखा डाक्टर शराब ख़ारी का आदी बन जाए तो वोह इस वजह से है कि वोह शराब के रू़हानी और मअ्‌नवी नुक्सानात से बे-ख़बर है। ख़ाहिशाते ऩपस की पैरवी करते हुए उस के तदरीजी ज़रर को कोई ख़ास अहम्मीयत नहीं देता है।

आम तौर से लोग गुनाह को एक सत़्ही निगाह से देखते हैं और उस के तमाम दूसरे पह्लूओं पर नज़र नहीं डालते हैं, गुनाह का असर रू़ह और जिस्म पर क्या होता है इस से लोग बेबहरा रहते हैं। लेकिन अम्बिया अलैहिमुस्सलाम जो मअ्‌रेफ़त और इल्म के ले़हाज़ से तमाम लोगों से अफ़ज़ल और बरतर हैं वोह गुनाह की ह़क़ीक़त और ख़ौफ़ से वाक़िफ़ हैं। दुनियाए आख़ेरत में गुनाह के असरात क्या होंगे उसे वोह इसी दुनिया में अपनी मअ्‌नवी ताक़त की बेना पर मुशाहेदा करते हैं। लेहाज़ा कभी भी ख़ाहिशाते ऩपस के सामने तस्लीम नहीं होते हैं और न वोह अपने दामन को गुनाह से आलूदा करते हैं बल्कि उनके दिल-ओ-दिमा़ग में फ़िक्रे गुनाह भी राह नहीं पाती है।

आलमे आख़ेरत और आलमे बर्ज़़ख में गुनाह के असरात का बाक़ा़एदा मुशाहेदा करते थे और लोगों के सामने बयान करते थे। इस ज़ैल में पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.) से मुतअद्दिद रवायतें वारिद हुई हैं उनमें से बअ्‌ज़ को यहाँ ज़िक्र किया जाता है।

ह़ज़रत अली इब्ने अबी तालिब अलैहेमस्सलाम का बयान है हम ह़ज़रत फ़ातेमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा के हमराह पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.) की ख़िदमत अव़दस में हाज़िर हुए देखा कि आँह़ज़रत (स.अ.) बशिद्दत गिर्या फ़रमा रहे हैं। मैंने रसूले ख़ुदा सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम की ख़िदमत में अर्ज़ कियाः या रसूलल्लाह (स.अ.) मेरे माँ बाप आप पर फ़ेदा हो जाएँ आप क्यों गिर्या फ़रमा रहे हैं।

आँह़ज़रत ने इर्शाद फ़रमाया मैं जिस शब मे़अ्‌राज में ले जाया गया, वहाँ मैंने अपनी उम्मत की औरतों को सख्त तरीन अज़ाब में मुब्तेला देखा। एक औरत को देखा कि बाल बाँध कर लटका दी गई है और उस का भेजा आग की शिद्दत से खौल रहा है। दूसरी औरत को देखा कि ज़बान बाँध कर लटका दी गई है और उस की हलक़ में खौलता हुआ पानी डाला जा रहा है। एक दूसरी औरत को देखा कि वोह अपने बदन का गोश्त खा रही है और उस के पैर के नीचे आग के शोअ्‌ले भड़क रहे हैं। एक और औरत को देखा कि उस के हाथ पैर बाँध दिए गए हैं और जहन्नम के साँप-ओ-बिच्छू उस पर मुसल्लत हैं किसी के गोश्त को आग की क़ैंची से काट रहे हैं, कोई कुत्ते की सूरत में है नीचे की तरफ़ से आग डाली जाती है और मुँह से निकलती है। अज़ाब के फ़रिश्ते उस पर आग के कोड़े बरसा रहे हैं।

ह़ज़रत फ़ातेमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा ने ख़िदमते रसूल (स.अ.) में अर्ज़ की कि उन औरतों ने क्या किया था जो इस तरह़ के अज़ाब में मुब्तेला हुईं।

पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.) ने इर्शाद फ़रमाया, वोह औरत जो अपने बालों में लटकी हुई थी येह वोह औरत है जो दुनिया में अपने बालों को नामहरमों से नहीं छिपाती थी। वोह औरत जो ज़बान पर लटक रही थी येह वोह औरत है जो अपने शौहर को अज़ीयत देती थी। वोह औरत जो अपने बदन का गोश्त खा रही थी येह वोह औरत है जो नामहरमों के लिए आराइश करती थी। वोह औरत जिसके हाथ पैर बाँध दिए गए थे और उस पर जहन्नम के साँप और बिच्छू मुसल्लत थे येह वोह औरत है जो वुज़ू, तहारत, पाकीज़गिए लेबास और ग़ुस्ले जनाबत और हैज़ को कोई अहम्मीयत नहीं देती थी और नमाज़ को हल्का और सुबुक ख़याल करती थी। वोह औरत जिसके गोश्त को आग की क़ैंची से काटा जा रहा था येह वोह औरत है जो अपने को अजनबी और नामहरम के सिपुर्द कर देती थी। वोह औरत जो कुत्ते की सूरत में मह्शूर हुई थी और उस के नीचे से आग डाली जाती थी और मुँह से निकलती थी येह वोह औरत थी जो दुनिया में गाती बजाती थी........

इस के बअ्‌द आँह़ज़रत ने इर्शाद फ़रमाया लअ्‌नत हो उस औरत पर जो अपने शौहर को ग़ुस्सा दिलाए और ख़ुश क़िस्मत है वोह औरत जिससे उस का शौहर राज़ी और ख़ुश्नूद हो।

(बेह़ारुल अनवार, जि॰ १८, स॰ ३५१)

रसूले ख़ुदा सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम इर्शाद फ़रमाया करते थे कि मैंने बअ्‌ज़ लोगों को देखा कि उन्हें आग के क़ुलाबे में लटकाया गया है। मैंने जिबरईल से पूछाः येह लोग कौन हैं? जिबरईल ने कहा येह वोह लोग हैं जिन्हें ख़ुदा ने रि़ज़्के ह़लाल दिया था और उन्हें ह़राम से बेनियाज़ -ओ-मुस्त़गनी कर दिया था लेकिन येह लोग ह़राम का इतेकाब करते रहे।

दूसरे बअ्‌ज़ लोगों को देखा कि उन की जिल्द आग के धागे से सिली जा रही थी पूछाः येह कौन लोग हैं? जिबरईल ने कहा येह वोह लोग हैं जो लड़कियों से नाजाएज़ रवाबित रखते थे।

(बेह़ारुल अनवार, जि॰र् १८, स॰र् ३३३)

आँह़ज़रत ने इर्शाद फ़रमायाः जो लोग सूद ख़ोर हैं ख़ुदावंद आलम उनके पेट को आतशे जहन्नम से भर देगा जिस क़द्र उन्होंने सूद खाया होगा।

(सवाबुल अअ्‌माल व एक़ाबुल अअ्‌माल, स॰ ३३६)

इस तरह़ आँह़ज़रत ने शराब ख़ारी और दूसरे गुनाहों के बारे में इर्शाद फ़रमाया है। येह वोह बयानात हैं जो इन्सानों को गुनाह से रोकते हैं चेजाएकि पैग़म्बर (स.अ.) जो ख़ुद अपनी निगाहों से बर्ज़़ख और आख़ेरत में गुनाहों के असरात देख रहे थे।

मु़ख्तसर येह कि आख़ेरत की याद, आख़ेरत में गुनाहों के असरात का मुशाहेदा, येह वोह चीज़ें हैं जिसकी बेना पर फ़ेअ्‌ले गुनाह तो दरकिनार अम्बिया फ़िक्रे गुनाह भी न करते थे।

ख़ुदावंद आलम क़ुरआन में इर्शाद फ़रमाता हैः

وَاذْكُرْ عِبَادَنَا إبْرَاهِيمَ وَإِسْحٰقَ وَيَعْقُوبَ أُوْلِي الْأَيْدِي وَالْأَبْصَارِ ﴿४५﴾ إِنَّا أَخْلَصْنَاهُم بِخَالِصَةٍ ذِكْرَى الدَّارِ ﴿४६﴾ وَإِنَّهُمْ عِندَنَا لَمِنَ الْمُصْطَفَيْنَ الْأَخْيَارِ ﴿४७﴾

व़ज्कुर एबा-दना इब्राही-म व इस़्हा-क़ व य़अ्‌कू-ब उलिल ऐदी वल अब्सारे (४५) इन्ना अख्लस्नाहुम बे़खाले-सतिन ज़िकरद्दार (४६) व इन्नहुम इन्दना ल-मेनल मुस्तफ़ैनल अख्यार (४७)

(सूरए साद, आयत ४५, ४६, ४७)

ऐ मेरे पैग़म्बर याद कीजिए हमारे बंदों में से इब्राहीम, इस़्हाक़ और य़अ्‌क़ूब (अ.स.) को, कि सब सा़हेबे इक़्तेदार और बाबसीरत थे हमने उन्हें इस बेना पर ख़ालिस क़रार दिया कि वोह आख़ेरत की याद किया करते थे तो बेशक यही हमारे ऩज्दीक मुंतख़ब और नेक बंदे हैं।