ख़ैर-ओ-शर
मुशरिकीन का येह अक़ीदा है कि मौजूदाते आलम की दो किस्में हैं (१) ख़ैर (२) शर और इसी बुनियाद पर वोह इस बात के क़ाएल हैं कि इस काएनात के दो ख़ालिक़ हैं। एक वोह ख़ुदा जिसने ख़ैर (अच्छाइयों) को वजूद दिया है और उस का नाम ‘य़ज्दाँ’ है। दूसरा वोह ख़ुदा जिसने शर (बुराइयों) को पैदा किया है और उस ख़ुदा को येह लोग ‘अह्रेमन’ के नाम से याद करते हैं। इन लोगों का येह अक़ीदा था कि ख़ुदा को हर नक़्स-ओ-ऐब से पाक और मुऩज्ज़ह होना चाहिए और इसी बेना पर येह दो ख़ुदाओं का अक़ीदा वजूद में आया। मगर येह लोग इस बात से ग़ाफ़िल थे कि येह नज़रिया उनको तौह़ीद से निकाल कर शिर्क की वादी में खड़ा कर देगा। इसी के साथ एक दूसरे इश्तेबाह का भी शिकार हो गए जो अस्ल और बुनियादी था और वोह इश्तेबाह येह है कि इन लोगों ने मौजूदात की दो कि़स्में की हैं एक ‘ख़ैर’ और दूसरे ‘शर‘।
लेकिन अगर पूरे निज़ामे काएनात को नज़र में रखा जाए और वुस्अते फ़िक्र-ओ-नज़र से काम लिया जाए तो हर चीज़ अपनी जगह ‘ख़ैर’ है और ‘शर’ का वजूद नहीं है। उन लोगों का ख़याल है कि ख़ैर और शर में कोई वास्ता नहीं है और एक दूसरे का वजूद बिल्कुल जुदागाना है और चूँकि ख़ैर और शर दो अलग अलग ह़क़ीक़तें हैं लेहाज़ा दोनों के जुदागाना ख़ालिक़ हैं। य़ज्दाँ ख़ैर का ख़ालिक़ है और अह्रेमन शर को वजूद देने वाला। मगर येह तसव्वुर इस मसअले का हल नहीं है।
क्योंकि अगर ज़रा भी ग़ौर-ओ-फ़िक्र से काम लिया जाए तो अक्सर मुक़ामात ऐसे हैं जहाँ ख़ैर-ओ-शर का वजूद एक दूसरे से बिल्कुल जुदा नहीं है। जैसे कि बारिश येह किसानों, काश्तकारों और बा़गबानों वग़ैरह के लिए ने़अ्मत है। इसी लिए येह लोग बारिश के लिए दु़आएँ करते हैं। मगर यही बारिश उन लोगों के लिए जिनके मकानात मिट्टी और गारे से बने हुए हैं एक अज़ाब है; येह लोग हमेशा बारिश के न होने की दु़आ करते हैं।
बारिश का दो अलग अलग वजूद नहीं है कि जिनमें एक ख़ैर हो और दूसरा शर ताकि हर एक का पैदा करने वाला दूसरे से जुदा हो। यहाँ तो बारिश का सिर्फ़ एक वजूद है तो अब उस के लिए दो ख़ालिक़ की ज़रूरत ही नहीं है। लेहाज़ा अब येह बात बिल्कुल वाज़े़ह है कि मुशरिकीन का नज़रियए ‘सनवीयत‘ (दो ख़ुदा होना) इस मसअले का हल नहीं है।
इस मसअले का हल जो क़ुरआन और अह़ादीस से इस्तेफ़ादा होता है और जिसकी अक़्ले सलीम भी ताईद करती है वोह येह है कि तमाम चीज़ें जिनकी अच्छाइयाँ हमारे लिए रोशन नहीं हैं मसलन भूख, प्यास, रंज-ओ-ग़म सर्दी गर्मी, ज़हरीले जानवर साँप, बिच्छू वग़ैरह .....येह सब इस बेना पर हैं कि हम इन तमाम चीज़ों को बहुत ही सत़्ही निगाह से देखते हैं। लेहाज़ा उनका सिर्फ़ एक पह्लू हम देख पाते हैं लेकिन अगर हम ज़रा वुस्अते नज़र से काम लें और सारी दुनिया के निज़ाम को निगाह में रखें तो बहुत जल्द हम इस ह़क़ीक़त से वाकि़फ़ हो जाएँगे कि हर चीज़ अपनी जगह लाजवाब है और ख़ैर ही ख़ैर है। मज़ीद वज़ाहत के लिए ज़ैल की बातों पर ग़ौर फ़रमाइए।
ह़ेफ़ाज़ती एक़्दामात
इन्सान का जिस्म गोश्त और हड्डियों का मज्मू़आ है जिसकी बेना पर येह ख़तरात से मह़फ़ूज़ नहीं है। सिर्फ़ आग इस बात पर क़ादिर है कि चंद लम्हों में इस को जला कर बिल्कुल ख़ाकिस्तर और राख का ढेर बना दे। दूसरी चीज़ें उसे नुक़सान पहुँचा सकती हैं, उस को ख़त्म कर सकती हैं एक म़अ्मूली सा तसादुम (टकराओ) इस की ह़ैअते इज्तेमा़ई (मज्मू़ई शक्ल) को बिगाड़ सकता है। इस क़िस्म के ख़तरात से मह़फ़ूज़ रखने के लिए ख़ुदावंद आलम ने इस बदन में ऐसी चीज़ें वदी़अत फ़रमाई हैं जो बदन को ख़तरात से मह़फ़ूज़ रखती हैं और हलाक होने से बचाती हैं।
(१) भूख और प्यास हो सकता है इब्तेदा में अच्छी म़अ्लूम न हों और इनको लोग एक ज़़ह्मत ख़याल करें। मगर यही चीज़ें बदन में अहम किरदार अदा करती हैं। बदन में जो लात़अ्दाद छोटे छोटे ‘ख़लिये’ हैं येह इस क़द्र ह़स्सास हैं कि ज़रा भी उनकी ग़ुद्दा में कमी वा़के़अ् हो जाए तो येह फ़ौरन दम तोड़ देते हैं जिसके नतीजे में इन्सान भी मौत से हमकनार होने लगता है तो येह भूख और प्यास का ए़हसास इन्सानी ज़िदगी की बक़ा के लिए बहुत ही ज़रूरी और लाज़िमी है।
(२) दर्द-ओ-ग़म का ए़हसास भी एक अज़ीम ने़अ्मत है। इन्सान के अ़अ्साब जो एक जाल की तरह़ सारे जिस्म में फैले हुए हैं येह इन्सान के बदन में मुवासलाती काम अंजाम देते हैं। येह म़अ्मूली रंज-ओ-दर्द से इन्सान को बाख़बर कर देते हैं और इन्सान को इस बात पर आमादा करते हैं कि वोह इस ताज़ा मुसीबत के मुक़ाबले में कोई एक़दाम करे ताकि वोह सह़ीह़-ओ-सालिम रहे।
अगर येह दर्द-ओ-ग़म का ए़हसास न होता मरीज़ कभी भी इलाज की तरफ़ तवज्जोह न देता। अगर येह ए़हसास की दौलत इन्सान के पास न हो तो उस का जिस्म जल कर भस्म हो जाए और उसे ख़बर भी न हो हड्डियाँ टूट जाएँ और उस का पता न चले। इसी तरह़ इन्सान ज़िदगी की ने़अ्मत से म़हरूम हो जाए।
येह जो इन्सान में इस क़द्र ह़स्सासियत पाई जाती है जिसकी बेना पर इन्सान ज़रा सी भी तकलीफ़ बर्दाश्त नहीं कर पाता येह इस बेना पर है कि इन्सान बराबर ख़तरात से आगाह होता रहे। अपनी सलामती और बक़ा के लिए कोशाँ रहे और अगर जिस्म को कोई नुक़सान पहुँचा है तो उस का इलाज करे ताकि दुबारा सह़ीह़-ओ-सालिम हो कर अपनी ज़िदगी को बाक़ी रखे। और आइन्दा के लिए ए़हतेयाती तदाबीर इख़्तेयार करे।
सख़्तगी और पुख़्तगी
दानिशवरों का क़ौल है कि सख़्तगीये दुनिया, दुनियाए ह़रकत और कमाल है। तरक़्क़ी और कमाल का सख़्तियों और दुश्वारियों से एक ख़ास रब्त है और दोनों का चोली दामन का साथ है क्योंकि यही मुश्किलात और सख़्तियाँ हैं जो राहे इन्सानी को क़वी और पुख़्ता बनाती हैं। यही सख़्तियाँ हैं जो बड़े बड़े सूरमाओं और अज़ीम मुफ़क्किरों को वजूद में लाती हैं जब तक इन्सान मुश्किलात और मसाएब की भट्टी में तपाया नहीं जाता उस वक़्त तक उस की रू़ह कुन्दन नहीं बनती और उस के जौहर सामने नहीं आ पाते। यही सख़्तियाँ उस के कमाल के ज़हूर का सबब क़रार पाती हैं और उसे इतेक़ाई मदारिज तक पहुँचाती हैं।
तारी़खे बशरीयत में अज़ीम शख़्सीयतें वही हैं जिन्होंने ज़िदगी के नशेब-ओ-फ़राज़ देखे और मुश्किलात को मुस्कुरा कर बर्दाश्त किया है। शम़अ् उस वक़्त रोशनी फैलाती है जब ख़ुद जलती है।
रंग लाती है हेना पत्थर पे घिस जाने के बअ्द
नेपोलियन का कहना है किः ‘आलाम-ओ-शदाएद इन्सानी सलाह़ियतों को बरूए कार लाते हैं और उसे कामिल तर बनाते हैं।’
दुश्वारियाँ और मुश्किलात इन्सान के पोशीदा कमालात और सलाह़ियतों को उजागर करने का बेहतरीन ज़री़आ और वसीला हैं जिसकी बेना पर इन्सान माद्दी, म़अ्नवी, इल्मी, सन्अती ...... तमाम मंज़िलों को बआसानी तै कर सकता है।
यही वजह है कि जितने बड़े बड़े लोग गुज़रे हैं उन में से अक्सर वोह हैं जो बहुत ही म़अ्मूली और ह़क़ीर झोपड़ियों में ज़िदगी बसर करने वाले थे। सख़्तियों और मशव़क़तों ने उनके अंदर पोशीदा सलाह़ियतों को उजागर कर दिया और फ़िक्री गिरोहों को खोल दिया। कमाल और तरक़्क़ी की दुश्वार गुज़ार राहें भी उन के लिए आसान हो गईं।
तुंदिए बादे मु़खालिफ़ से न घबरा ऐ ओक़ाब
येह तो चलती है तुझे ऊँचा उड़ाने के लिए
इल्म और तमद्दुन की तारीख़ गवाह है कि सख़्तियाँ ही आज की तमाम तऱव़कीयात का पेश ख़ैमा हैं क्योंकि अगर येह सख़्तियाँ न होतीं तो इन्सान को कभी येह फ़िक्र तक न होती कि इस से बेहतर ज़िदगी भी बसर की जा सकती है और जब फ़िक्र न होती तो सई-ओ-कोशिश का क्या सवाल पैदा होता है और जैसे जैसे इन्सान मुश्किलात पर क़ाबू पाता गया वैसे वैसे तरक़्क़ी की राहें रोशन होती गईं।
अब येह बात साफ़ रोशन हो जाती है वही लोग सख़्तियों और मुश्किलात से बेज़ार हैं जो उनके अज़ीम फ़वाएद से आश्ना नहीं हैं।
अच्छाई और बुराई का मेअ्यार
आर्या जो सर्दी, गर्मी, साँप, बिच्छू...... के बुरे होने के क़ाएल थे, वोह इस बेना पर थे कि उन लोगों ने अच्छाई और बुराई का मेअ्यार अपनी ज़ात को क़रार दिया था और अपने ज़ाती फ़ाएदे और नुक़सान की बेना पर चीज़ों की अच्छाई (ख़ैर) या बुराई (शर) के मोअतक़िद थे जब कि अपने ज़ाती मफ़ाद को मेअ्यार क़रार देना सरासर ख़ेलाफ़े अक़्ल है बल्कि देखना चाहिए कि येह चीज़ निज़ामे काएनात के लेहाज़ से कैसी है और इस ऩज्मे काएनात में क्या किरदार अदा कर रही है।
जब हम काएनात को नज़र में रखने के बअ्द चीज़ों का मुतालेआ करेंगे तो हमें बहुत जल्द इस बात का यक़ीन हो जाएगा कि वोह चीज़ें जिन्हें हम बुरा ख़याल करते थे उनका वजूद इस काएनात की तरक़्क़ी और कमाल के लिए किस दर्जा ज़रूरी है। इसी सर्दी और गर्मी की बेना पर रुश्द-ओ-नुमू पैदा होता है। ख़ेज़ाँ बहार में तब्दील हो जाती है। हर एक ज़र्रए बेह़िस में ह़यात दौड़ने लगती है।
जो लोग अच्छाई और बुराई का मेअयार अपनी ज़ात को क़रार देते हैं उनकी मिसाल उस च्यूँटी जैसी है जो इन्सान के बारे में इस नज़रिये का इज़्हार करे कि इस इन्सान के वजूद का क्या फ़ाएदा येह तो सिर्फ़ हमें कुचला करता है और इस का कोई काम नहीं और चूँकि इस का वजूद हमारे लिए बेफ़ाएदा है लेहाज़ा येह ‘शरे महेज़’ है और इस के वजूद से क्या फ़ाएदा।
या यू कहेंः येह हवाई जहाज़, येह बड़ी बड़ी मशीन चूँकि हमारे लिए मुफ़ीद नहीं हैं लेहाज़ा बिल्कुल बेफ़ाएदा और मुज़िर हैं।
क्या इन्सान च्यूँटियों के इस फ़ैसले को क़बूल करने पर तैयार है जो इन्सान और उस की मस्नू़आत के बारे में किया है।
इन्सान कभी भी इस फ़ैसले को क़बूल नहीं करेगा और येह कहेगा कि येह फ़ैसला एक ज़बरदस्त इश्तेबाह का नतीजा है और वोह इश्तेबाह येह है कि उसने सूद-ओ-ज़ियाँ फ़ाएदा और नुक़सान का मेअ्यार अपनी ज़ात को क़रार दिया है और अपने ज़ाती मफ़ाद पर हर एक चीज़ को परखा है। येह बिल्कुल ऐसा है कि जैसे समुंदर के साह़िल पर बसने वाला येह कहे कि येह बुख़ारात जो समुंदर से उठते हैं येह बिल्कुल बेफ़ाएदा और मुज़िर हैं क्योंकि बुख़ारात की बेना पर हमारी ज़िदगी जिसका शिकार हो गई है उस आब-ओ-हवा ने तो हमें काम करने से रोक दिया है। फ़ेज़ा में हमेशा एक घुटन सी रहती है। जब कि हम येह बात ब़खूबी जानते हैं कि यही बुख़ारात समुंदरी एलाक़ों से हवाओं के दोश पर परवाज़ करते हुए ख़ुश्क और गर्म एलाक़ों को बाराने रह़मत बन कर सेराब करते हैं जिससे दरख़्त हरे हो जाते हैं, खेतियाँ लहलहा उठती हैं। गर्मी से झुलसते हुए एलाक़ों में ज़िदगी की लहर दौड़ने लगती है वहाँ के बसने वाले इसी बुख़ार को जो बारिश की शक्ल में बरसता है अपने लिए एक अज़ीम ने़अ्मत शुमार करते हैं। यही बारिश इन्सान को क़हत की लअ्नत से मह़फ़ूज़ रखती है।
साह़िल नशीनों की ग़लती सिर्फ़ इतनी है कि उन्होंने सिर्फ़ अपने ज़ाती मफ़ाद को पेशे नज़र रखा है और उसी को अच्छाई और बुराई का मेअ्यार भी क़रार दिया। अगर येह लोग सारी काएनात को नज़र में रखने के बअ्द फ़ैसला करते तो कभी भी समुंदर से उठने वाले बुख़ारात को ‘बुरा’ न जानते।
गुज़श्ता बयानात की रोशनी में येह बात वाज़ेह़ हो जाती है कि अच्छाई और बुराई का मेअ्यार कभी अपनी ज़ात और अपने ज़ाती मफ़ाद को नहीं क़रार देना चाहिए बल्कि हर चीज़ को निज़ामे काएनात के लेहाज़ से देखना चाहिए और निज़ामे काएनात को मेअ्यार क़रार देना चाहिए और फिर उस के बअ्द कोई फ़ैसला करना चाहिए और फ़ैसला करते वक़्त माज़ी, मुस्तक़बिल और हाल को भी पेशे नज़र रखना चाहिए।