उसूले दीन
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सबक़ - १३

ख़ुदाए आदिल

गुज़श्ता अस्बाक़ पर एक नज़र

– इस काएनात का ऩज्म-ओ-ज़ब्त ख़ुद इस बात का बेहतरीन गवाह है कि इस काएनात को वजूद बख्शने वाला ‘आलिम’ भी है और ‘क़ादिर’ भी।

– उस के इल्म-ओ-क़ुदरत का अंदाज़ा हमारी म़ह्दूद फ़िक्र-ओ-अक़्ल नहीं लगा सकती क्योंकि हम सि़र्फ़ उन्हीं चीज़ों से उस के इल्म-ओ-क़ुदरत का अंदाज़ा लगा सकते हैं जिन्हें हम देखते और दर्क करते हैं और येह चीज़ें उस अज़ीम और लाम़ह्दूद काएनात का एक म़अ्‌मूली सा ह़िस्सा हैं। इस काएनात का हर ज़र्रा उस की बेपनाह अज्मतों की तर्जुमानी करता है।

– सारी काएनात उस ख़ुदाए व़ह्दहू लाशरीक की मो़हताज है मगर

वोह किसी का भी मो़हताज नहीं है।

– ख़ुदावंद आलम अपने तमाम बंदों पर बेइंतेहा मेह्रबान है और उसने अपनी तमाम ने़अ्‌मतों को तमाम बंदों के लिए आम कर रखा है और इस में किसी की कोई तफ़रीक़ नहीं है। जैसा कि ख़ुदावंद आलम क़ुरआने करीम में इर्शाद फ़रमाता हैः

اَللہُ الَّذِیْ جَعَلَ لَکُمُ الْاَرْضَ قَرَارًا وَّالسَّمَاءَ بِنَاءً وَّ صَوَّرَکُمْ فَاَحْسَنَ صُوَرَکُمْ وَرَزَقَکُمْ مِنَ الطَّیِّبَاتِ۔ ذٰلِکُمُ اللہُ رَبُّکُمْ فَتَبَارَکَ اللہُ رَبُّ الْعَالَمِیْنَ۔

अल्लाहुल्लज़ी ज-अ-ल लकोमुल अर-ज़ क़रारन वस्समा-अ बेनाअन व सव्व-रकुम फ़-अ़ह्स-न सो-व-रकुम व र-ज़-क़कुम मिनत्तय्येबाते ज़ालेकुमुल्लाहो रब्बोकुम फ़-तबा-र कल्लाहो रब्बुल आ-ल-मी-न

(सूरए मोअ्‌मिन, आयत, ६४)

वोह ख़ुदा है जिसने ज़मीन-ओ-आसमान को तुम्हारी आसाइश और फ़ाएदे के लिए पैदा किया और तुम्हें बेहतरीन शक्ल-ओ-सूरत में पैदा किया। और तुम्हारी रोज़ी के लिए पाकीज़ा ग़ेज़ाएँ फ़राहम कीं और ख़ुदा तुम्हारा परवरदिगार है वोह बाबरकत है और आलमीन का पालने वाला है।’’

अब आइये ख़ुद अपने आपसे सवाल करें वोह ख़ुदा जिसने इस क़द्र ने़अ्‌मतें अपने बंदों के लिए आम कर रखी हैं और तमाम ज़रूरियाते ज़िंदगी को फ़राहम किया है, क्या वोह ख़ुदा ज़ालिम हो सकता है? जब कि हमें येह बात अच्छी तरह़ म़अ्‌लूम है कि ज़ुल्म-ओ-सितम हमेशा जेहालत और कमज़ोरी का नतीजा है या मन्सब-ओ-मुक़ाम वग़ैरह की तलाश उसे ज़ुल्म पर आमादा करती है और ख़ुदावंद आलम की ज़ात इन तमाम चीज़ों से पाक और मुऩज्ज़ह है। ज़ुल्म-ओ-सितम के अस्बाब और उस का सरचश्मा येह चीज़ें भी हैं।

ए़ह्तेमाले शिकस्त-ओ-नाकामी

जब एक कारखाने का मालिक येह देखता है कि दूसरे कारखाने का वजूद उस के मुनाफ़े पर-असर अंदाज़ हो रहा है और हो सकता है कि कभी उस को नुक़सान भी उठाना पड़ जाए तो इस ए़ह्तेमाल के पेशे नज़र इस बात की भरपूर कोशिश करता है कि जिस तरह़ से भी हो सके दूसरे कारखाने को ठप करा दिया जाए और उस का बाज़ार बंद कर दिया जाए और वोह इस सिलसिले में हर मुम्किन कोशिश करता है। हाँ अगर कोई ताक़त उसे इस काम से बअ्‌ज़ रख सकती है तो वोह सि़र्फ़ ईमाने ख़ुदावंदी है जो उसे बातिनी तौर पर ज़ुल्म करने से मऩअ्‌ किया करता है।

म़हरूमियत

जब इन्सान अपने जाएज़ हुक़ूक़ हासिल करने के लिए हर मुम्किन कोशिश करता है और ज़़ह्मतें बर्दाश्त करता है मगर जब उसे नाकाम और म़हरूमियत नसीब होती है तो उस वव़त उस में एक इंतेक़ामी कैफ़ीयत पैदा हो जाती है जो उसे आपे से बाहर कर देती है और फिर वोह हर्बा इस्ते़अ्‌माल करना चाहता है जिससे अपने मद्दे मुक़ाबिल को ज़क (शिकस्त) दे सके और फिर वोह जाएज़ और नाजाएज़ के फ़़र्क को भी रवा नहीं रखता है जिसके नतीजे में अद्‌ल का दामन उस के हाथों से छूट जाता है और वोह ज़ुल्म कर बैठता है और यही म़हरूमियत कभी उस को क़त्ल-ओ-ग़ारतगरी पर भी आमादा कर देती है और मुक़ाबिल की आह-ओ-ज़ारी उस के लिए इत्मीनान बख़्श होती है और उस के कानों को भी भली म़अ्‌लूम है।

जेहालत

वोह क़वानीन जिन्हें इन्सान की म़ह्दूद अक़्ल-ओ-फ़िक्र ने बनाया है उनका नेफ़ाज़ अक्सर-ओ-बेश्तर ज़ुल्म-ओ-बे इंसाफ़ी का सबब क़रार पाता है इन्सान का इल्म ख़ाह जितना भी हो मगर म़ह्दूद है और वोह जिस दुनिया में ज़िंदगी बसर कर रहा है उस के अस्रार-ओ-रुमूज़ लाम़ह्दूद हैं। जब एक म़ह्दूद नज़रिया का बनाया हुआ क़ानून लाम़ह्दूद दुनिया पर मुंतबिक़ (टैली) होगा तो इस सिलसिले में ज़ुल्म-ओ- जौर का वजूद में आना एक लाज़िमी नतीजा है।

सियाह फ़ामों पर जो ज़ुल्म के पहाड़ ढाए जा रहे हैं और उन के हुक़ूक़ को ग़स्ब किया जा रहा है वोह सि़र्फ़ इस बात का नतीजा है कि इन क़ानून बनाने वालों ने अपनी जगह येह तै कर लिया है कि हमारा बनाया हुआ क़ानून सबसे बेहतर है और इस के अलावा कोई और क़ानून नहीं हो सकता। इन लोगों ने रंग-ओ-नस्ल के फ़़र्क को मे़अ्‌यारे शराफ़त-ओ-इ़ज्ज़त समझा है जिनकी बेना पर सफ़ेद फ़ाम को सियाह फ़ाम पर बरतरी हासिल है। दरआँहालेकि येह बात सब जानते हैं शराफ़त का मे़अ्‌यार इल्म-ओ-अमल है और इन्सान के रू़हानी सिफ़ात हैं जो उसे तमाम दूसरे मौजूदात से मुन्फ़रिद कर देती हैं और इस सिलसिले में सियाह-ओ-सफ़ेद की कोई क़ैद नहीं है।

इन तमाम बातों का सरचश्मा इन्सान की जेहालत, कमज़ोरी, ज़ो़अ्‌फ़ वग़ैरह है और इन बातों में से किसी एक का तसव्वुर भी ख़ुदा के बारे में नहीं किया जा सकता। कोई चीज़ उस की नज़र से पोशीदा नहीं है और कोई भी शै उस के दाएरए इख़्तेयार से बाहर नहीं है। हर चीज़ का उसे इल्म है और हर चीज़ पर उस की क़ुदरत है। सारी दुनिया उस की मो़हताज है मगर वोह किसी का भी मो़हताज नहीं है। लेहाज़ा ख़ुदा के बारे में ज़ुल्म-ओ-सितम का तसव्वुर भी नहीं हो सकता। येह तमाम बातें इस क़द्र वाज़े़ह और रोशन हैं जिनमें किसी क़िस्म के शक-ओ-शुब्हे की गुंजाइश नहीं है और जो लोग इस हक़ीक़त से इन्कार करते हैं या तो दानिस्ता तौर पर इन्कार करते हैं या फिर हक़ीक़ते अद्‌ल से वाकि़फ़ नहीं हैं।

अद्‌ल क्या है।

अद्‌ल के म़अ्‌ना हैं तमाम इन्सानों के हुक़ूक़ की मुरा़आत (रे़आयत) की जाए। बिला वजह और बगैर किसी इस्ते़हक़ाक़ के किसी के साथ कोई मुरा़आत (रे़आयत) न बरती जाए। क्लास में जितने भी शागिर्द हैं उनमें से जितने शागिर्द अच्छे नम्बर लाते हैं उन सब को एक नज़र से देखा जाए और सब को एक साथ तरक़्क़ी दी जाए। अब मुम्ति़हन या किसी उस्ताद को येह हक़ हासिल नहीं है कि वोह एक शागिर्द को तो दरजाते आलिया में जगह दे और दूसरे को इस तरक़्क़ी से म़हरूम रखे जब कि दोनों के नम्बर एक जैसे हैं। अब अगर शागिर्दों के दरमियान फ़़र्क किया जाए तो येह शागिर्दों के हक़ में ज़ुल्म होगा।

हाँ अगर उन मुक़ामात पर ‘हक़’ का मसअला न हो सि़र्फ़ ए़हसान की बुनियाद पर बअ्‌ज़ को तरक़्क़ी दी जाए तो इस सूरत में बकि़या अ़फ़राद पर ज़ुल्म न होगा। जैसे कि कोई शख़्स फ़ुक़रा की द़अ्‌वत या उनकी कोई मदद करना चाहता है और येह शख़्स सि़र्फ़ बअ्‌ज़ फ़क़ीरों की द़अ्‌वत करे या द़अ्‌वत तो सब को दे मगर बअ्‌ज़ की ज़्यादा मदद करे और बअ्‌ज़ की कम। तो इस सूरत में जिनको द़अ्‌वत नहीं दी गई है या जिनकी कम मदद की गई है तो उन लोगों के हक़ में कोई ज़ुल्म नहीं हुआ है। क्योंकि उस शख़्स की गर्दन पर किसी का हक़ नहीं था और न येह द़अ्‌वत इस्ते़हक़ाक़ की बुनियाद पर हुई थी बल्कि येह तो इस शख़्स ने सि़र्फ़ ए़हसान की ग़र्ज़ (ग़रज़) से किया था।

अलबत्ता वहाँ पर अदालत और मुसावात लाज़िमी और ज़रूरी है जहाँ हुक़ूक़ के ए़अ्‌तबार से सब एक जैसे हों तो इस सूरत में बअ्‌ज़ को नज़र अंदाज़ कर देना सरासर ज़ुल्म और नाइंसाफ़ी होगी। लेकिन वोह मुक़ामात जहाँ किसी का कोई हक़ न हो तो उस सूरत में ज़ुल्म और नाइंसाफ़ी का कोई सवाल नहीं पैदा होता है और उस सूरत में बअ्‌ज़ को नज़र अंदाज कर देना उनके हक़ में ज़ुल्म नहीं कहलाएगा।

वोह लोग जो ख़िल्क़ते काएनात के बारे में येह ए़अ्‌तराज़ करते हैं कि ख़ुदावंद आलम ने सब को एक जैसा क्यों नहीं पैदा किया? येह मौजूदात के दरमियान इ़ख्तेलाफ़ कैसा? सब के साथ एक जैसा बर्ताव क्यों नहीं किया गया और येह मौजूदात का इ़ख्तेलाफ़ ख़ुदावंद आलम की अदालत के ख़ेलाफ़ है।

येह ए़अ्‌तराज़ करने वाले दरअस्ल अदालत का स़ही़ह मफ़हूम न समझ पाए और ग़लत फ़ह्मी का शिकार हो गए। क्योंकि येह सारी की सारी मौजूदात ख़ुदावंद आलम पर कोई हक़ नहीं रखतीं ताकि येह इ़ख्तेलाफ़-ओ-तफ़ावुत इस बात का सबब क़रार पाता कि उनमें बअ्‌ज़ के हक़ में ज़ुल्म हुआ है। जब किसी का कोई हक़ ही नहीं है तो फिर ज़ुल्म का क्या सवाल पैदा होता है क्योंकि अगर ख़ुदावंद आलम किसी एक को भी पैदा न करता तब भी कोई ज़ुल्म और नाइंसाफ़ी न थी।

लेकिन चूँकि ख़ुदावंद आलम बेपनाह इल्म-ओ-क़ुदरत का मालिक है और उस का कोई भी फ़े़अ्‌ल ह़िकमत और मस्ले़हत से ख़ाली नहीं होता लेहाज़ा अब हम येह सवाल कर सकते हैं कि इस इ़ख्तेलाफ़ और तफ़ावुत की मस्ले़हत क्या है?

क्या येह इ़ख्तेलाफ़ और तफ़ावुत निज़ामे काएनात के लिए लाज़िमी और ज़रूरी है?

येह वोह सवालात हैं जिनका जवाब इंशाअल्लाह आइन्दा सबक़ में पेश किया जाएगा।