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सबक़ - १४

नशेब-ओ-फ़राज़े ज़िंदगी

मख़्लूक़ात में तफ़ावुत का राज़

आपने यक़ीनन फ़ेज़ाई राकेट ‘अपोलो’ का नाम सुना होगा। येह इल्मी और टेक्नालोजी मैदान में इन्सानी तरक़्क़ी का शाहकार है।

येह राकेट बादलों को चीरता हुआ फ़ेज़ा का सीना शिगा़पता करके चाँद तक पहुँचा और इन्सान ने सरज़मीने चाँद पर अपना क़दम रखा और दुनियाए फ़िक्र-ओ-अमल में एक नए बाब का एज़ाफ़ा हुआ।

अगर राकेट को नज़र में रखें तो हम देखेंगे येह अज़ीम पेच, बोल्ट और मु़ख्तलिफ़ क़िस्म की छोटी बड़ी मशीनों से आरास्ता है। एक वोह ह़िस्सा जहाँ से उसे कंट्रोल किया जाता है, एक उस का अस्ली ह़िस्सा, उस का एक वोह ह़िस्सा जो चाँद पर उतरेगा, वोह ह़िस्सा जो वापस आएगा, ज़रूरी ईंधन का ज़ख़ीरा, जेनरेटर, मुवासलाती निज़ाम, हेफ़ाज़ती वसाएल..... उनमें से हर एक अपना मख़्सूस काम अंजाम देता है। येह बात साफ़ और वाज़े़ह है कि अगर इस राकेट में अन्वा़अ्‌-ओ-अक़्साम की चीज़ें न होतीं तो हरगिज़ ‘अपोलो’ का वजूद न होता और न उस के ज़री़ए स़ख्त और दुश्वार तरीन मसाफ़त तै की जाती और न इस दुनिया का इन्सान चाँद की सरज़मीन पर क़दम रखता।

इस मिसाल से जो चीज़ हमारे सामने आती है वोह येह है कि एक मुऩज्ज़म और मुर्तबित मज्मू़ए में मु़ख्तलिफ़ और मुतफ़ावित चीज़ों का वजूद लाज़िमी और ज़रूरी है।

अब एक नज़र इस दुनिया पर डालते हैं ताकि देखें कि इस दुनिया में भी ज़ेर-ओ-ज़बर ज़िंदगी और नशेब-ओ-फ़राज़े हयात बेमक़्सद और बेसबब नहीं है। यक़ीनन ज़िंदगी की ज़ेबाई (ख़ूबसूरती) हयात की कशिश और पेचीदगी इसी इ़ख्तेलाफ़ और नशेब-ओ-फ़राज़ का नतीजा है।

अगर सारी काएनात यक-रंग और एक अंदाज़ पर होती, फ़िक्र अंगेज़ और दिल-नवाज़ रंगीनियाँ न होतीं तो फिर इन्सान का वजूद बेम़अ्‌ना होता। येह भी बेम़अ्‌ना होता कि वोह पानी पिए, सब्ज़ियाँ पकाए और खाए, तलातुम-ख़ेज़ मौजों से तहरीक चलाना सीखे, बेआब-ओ-गेयाह सहराओं से सुकून-ओ-इत्मीनान का दर्स ले।

गुंचों से शगु़पतगी, क़त्राते शबनम से पाकीज़गी, सीनए आबे दरिया से लताफ़त और नर्मी, आबशारों से तवाज़ो़अ्‌ और फ़रोतनी।

दुनिया की ख़ूबसूरती, ज़ेबाई, कशिश, जाज़ेबीयत सब इन्हीं रंगीनियों और नशेब-ओ-फ़राज़े हयात की मर्हूने मिन्नत हैं। येह तमाम इ़ख्तेलाफ़ात न तो बेजा और बेकार हैं और न ही बरख़ेलाफ़े अदालत।

ख़ेलाफ़े अदालत तो उस सूरत को कहते हैं जब दो चीज़ें हर ले़हाज़ से बराबर हों मगर क़ानूनी हैसियत से उनके साथ यकसाँ बर्ताव न किया जाए।

गुज़श्ता सबक़ में इस बात की तरफ़ इशारा किया था कि ज़ुल्म-ओ-सितम सि़र्फ़ उस सूरत में है कि किसी एक चीज़ से इस्तेफ़ादा करने का हर एक को बराबर का हक़ हो लेकिन उनके दरमियान तफ़ावुत और इम्तेयाज़ बरता जाए।

लेकिन येह दुनिया की चीज़ें, पहले इनका कोई वजूद न था और उनमें कोई किसी चीज़ की हक़दार न थीं, ताकि उनके दरमियान इ़ख्तेलाफ़ और तफ़ावुत का वजूद अद्‌ल के ख़ेलाफ़ होता।

येह एक हक़ीक़त है कि अगर येह इ़ख्तेलाफ़ और तफ़ावुत न होता तो इस दुनिया का भी कोई वजूद न होता। येह दुनियावी चीज़ों का आपस में इ़ख्तेलाफ़ और तफ़ावुत ही दुनिया की ख़िल्क़त का सबब है। येह मख़्लूक़ात का आपस में मु़ख्तलिफ़ होना इस बात का सबब है कि येह चीज़ें वजूद पैदा करें। ऐटम, निज़ामे शम्सी, कहकशाँ, गेयाह (घास) सरसब्ज़-ओ-शादाबी, हैवानात इन तमाम चीज़ों का वजूद मौजूदात के मु़ख्तलिफ़ होने की बेना पर है।

अब आपकी तवज्जोहात इन्सान के दरमियान जो तफ़ावुत है उस की तरफ़ मुतवज्जेह करना चाहते हैं।

इन्सानों के दरमियान इ़ख्तेलाफ़ भी दुनिया की दीगर मख़्लूक़ात के तफ़ावुत और इ़ख्तेलाफ़ से जुदा नहीं है। अगर येह कहा जाए कि क्यों तमाम इन्सान होश और इस्ते़अ्‌दाद के ले़हाज़ से बराबर नहीं हैं? तो सबसे पहले तो येह ए़अ्‌तराज़ करना चाहिए कि नबातात और जमादात को क्यों होश-ओ-इस्ते़अ्‌दाद से म़हरूम रखा गया?

लेकिन हक़ीक़त येह है कि दोनों सूरतों में कोई भी सूरत क़ाबिले ए़अ्‌तराज़ नहीं है क्योंकि येह ए़अ्‌तराज़ उस वव़त स़ही़ह होता जब किसी का हक़ पामाल हुआ हो। लेकिन दोनों सूरतों में किसी का भी वजूद पहले से न था और न कोई किसी चीज़ का मुस्त़हक़ था ताकि उनके दरमियान तफ़ावुत का वजूद अद्‌ल-ओ-इन्साफ़ के ख़ेलाफ़ होता।

इस हक़ीक़त की तरफ़ भी तवज्जोह करना चाहिए कि ख़ुदावंद आलम ने हर इन्सान को सि़र्फ़ उसी क़द्र ज़िम्मेदार क़रार दिया है और सि़र्फ़ उसी क़द्र उस से एता़अत चाही है जितनी उस में ताब-ओ-तवानाई है। किसी से भी उस के होश-ओ-इस्ते़अ्‌दाद से ज़्यादा मुतालबा नहीं किया है और येह बात बिल्कुल मुताबिक़े अदालत है।

ज़रा इस मिसाल पर तवज्जोह फ़रमाइएः

अगर एक स्कूल का प्रिंसिपल दर्जा शशुम का सवाल उन तलबा से करे जो अभी पहले क्लास में तअ्‌लीम हासिल कर रहे हैं तो प्रिंसिपल का येह सवाल यक़ीनन ज़ुल्म होगा लेकिन अगर यही प्रिंसिपल दर्जा अव्वल का सवाल पहले क्लास के तलबा से करे और दर्जा शशुम का सवाल छठे क्लास के तलबा से करे येह तो ऐन अक़्लमंदी और मुताबि़के अदालत है। इस सूरत में कोई भी उसे ज़ालिम नहीं कहेगा बल्कि हर एक उसे इंसाफ़ पसंद और आदिल कहेगा।

इसी तरह़ से अगर तमाम मौजूदात के सर एक जैसी ज़िम्मेदारी सौंपी जाती तो इस सूरत में यक़ीनन मौजूदात का आपस में मु़ख्तलिफ़ होना ज़ुल्म और बरख़ेलाफ़े अदालत होता। लेकिन हमें येह बात बदीही (वाज़े़ह) तौर पर म़अ्‌लूम है कि हर एक के सर एक जैसी ज़िम्मेदारी नहीं सौंपी गई है बल्कि हर एक से उसी क़द्र मुतालबा किया गया है जितनी उस में इस्ते़अ्‌दाद और सकत है।

जिस तरह़ से एक मशीन के छोटे से पुर्ज़े से उस काम की उम्मीद रखी जाए जो एक बहुत बड़े पुर्ज़े से तवक़्क़ो़अ्‌ है तो येह यक़ीनन ज़ुल्म और ख़ेलाफ़े अदालत है लेकिन अगर हर एक पुर्ज़े से उस की हैसियत के मुताबिक़ काम लिया जाए तो येह ऐने अदालत है।

इस के अलावा हमारा येह अक़ीदा है कि ख़ुदावंद आलम हकीम है और उस का कोई काम मस्ले़हत से ख़ाली नहीं होता। हमें इस बात का भी यक़ीन है कि सारी काएनात पर एक ख़ास क़िस्म का निज़ाम ह़ुक्म फ़रमा है और इस दुनिया का कोई भी ज़र्रा बगैर किसी ऩज्म-ओ-ज़ब्त के वजूद में नहीं आया है। गुज़श्ता अस्बाक़ में येह बात तपसील से गुज़र चुकी है कि दुनिया में कोई भी चीज़ ग़ैर मुऩज्ज़म नहीं है। हाँ येह हो सकता है कि सत़्ही और पहली नज़र में वोह चीज़ बेफ़ाएदा और ग़ैर मुऩज्ज़म नज़र आए। और येह भी इस बेना पर है कि हमारी अक़्ल की रसाई उस की हक़ीक़त तक नहीं है। येह बात सभी जानते हैं कि किसी चीज़ का न जानना उस के न होने की दलील नहीं है।

गुज़श्ता बयानात की बुनियाद पर येह बात बिल्कुल साफ़ और रोशन हो जाती है कि मौजूदात का आपस में इ़ख्तेलाफ़ और तफ़ावुत यक़ीनन मस्ले़हत की बेना पर है और वजूदे काएनात के लिए उस का होना नेहायत ज़रूरी और लाज़िमी है। गरचे हमारी नाकि़स अक़्ल उस की हक़ीक़त समझने से क़ासिर ही क्यों न रहे।

अगर येह कहा जाए येह तो बहरहाल मुम्किन था कि तमाम अ़फ़राद होश और इस्ते़अ्‌दाद के ले़हाज़ से बराबर होते और मु़ख्तलिफ़ क़िस्म के ज़ौक़ में यक्जा होते। इस के बअ्‌द येह तमाम अ़फ़राद ज़रूरत और ए़हतेयाज के मुताबिक़ आपस में तमाम काम तक़्सीम कर लेते तो इस का जवाब येह है कि उस सूरत में येह होता कि आरामतलब अ़फ़राद उस काम को इख़्तेयार करते जिसमें मेहनत कम और मन्फ़़अत ज़्यादा होती। ज़़ह्मत तलब और कम फ़ाएदे वाला काम कोई न करता वोह यूँही प़डा रह जाता क्योंकि उनमें से हर एक होश और इस्ते़अ्‌दाद के ले़हाज़ से बराबर है। लेहाज़ा कोई भी ऐसे काम को क्यों इख़्तेयार करने लगा जिसमें मेहनत मशव़क़त ज़्यादा हो फ़ाएदा कम हो और कोई ख़ास शोहरत वग़ैरह भी न हो।

ज़िंदगी के हर पह्लू से इस्तेफ़ादा

इन्सान की रू़ह अख़्लाक़ी ज़ेवरात से आरास्ता होने के लिए और कमाल की आख़िरी मंज़िल तक पहुँचने के लिए अजब सलाह़ियत की मालिक है।

आराम-ओ-मुश्किलात का आहिस्ता-आहिस्ता सामना करते हुए रपता-रपता ज़िंदगी की तलि़्खयाँ और शीरीनी का ज़ाएक़ा चखते हुए इन्सान की रू़ह कामिल होती जाती है।

ज़िंदगी का नशेब-ओ-फ़राज़ इन्सान को सब्र-ओ-शकीबाई की तअ्‌लीम देता है। कभी इन्सान ने़अ्‌मतों में घिरा रहता है और कभी उस के चारों तरफ़ मुश्किलात ही मुश्किलात होती हैं।

ख़ुश कि़स्मत तो वोह है जो ज़िंदगी के हर मोड़ से गुज़रते हुए अपनी रू़ह को कामिल बनाता रहे।

अगर दौलत-ओ-सर्वत का मालिक है तो ग़रीब और बेनवा की दस्तगीरी करे, यतीमों की सरपरस्ती करे। इस तरह़ से अपनी रू़ह को कामिल से कामिल तर बनाता रहे और इस तरह़ इन्सान की मो़हब्बत अपने दिल में कूट कूट कर भर ले। गरचे येह इन्सान इस बात पर भी क़ादिर है कि अपनी तमाम दौलत-ओ-सर्वत ऐश-ओ-तरब की ऩज्र कर दे। और इस तरह़ अपनी रू़ह को कमाल के बजाए और पस्ती में गिरा दे।

अगर तंगदस्त और फ़क़ीर है तो बजाए इस के कि दूसरों के माल पर डाका डाले उनके हुक़ूक़ ग़स्ब करे, क़नाअत, सब्र और इ़ज्ज़ते ऩपस के साथ ज़िंदगी बसर करे और अपने सब्र-ओ-अज्म-ओ-इस्तेक़लाल के पंजों से ज़िंदगी की तमाम मुश्किलात को रेज़ा रेज़ा कर दे और राहे ज़िंदगी को साफ़ और हमवार बना दे।

ज़िंदगी के तमाम नशेब-ओ-फ़राज़, रू़ह के कमाल और उस की तरक़्क़ी के लिए हैं ख़ुश कि़स्मत और होशियार वोह है जो ज़िंदगी की हर राह से गुज़रते वव़त अपनी रू़ह को कामिल से कामिल तर बनाता जाए।

अब इस का मतलब येह भी नहीं है कि इन्सान ख़ुद को अपने हाथों फ़क़ीर और तंगदस्त बना दे। अगर हमने ऐसा किया तो हमने बहुत ग़लत काम का इतेकाब किया है, क्योंकि इस सूरत में हमने उस होश-ओ-इस्ते़अ्‌दाद की क़द्र न की जिसे ख़ुदावंद आलम ने हमारी ज़ात में वदी़अत फ़रमाया है बल्कि मक़सद सि़र्फ़ इतना है कि अगर हम मुसलसल कोशिश करते रहे, लेकिन हमारी कोशिशों का कोई ख़ास नतीजा न निकला या एकाएकी हम दौलतमंद और सर्वत मंद से फ़क़ीर और तंगदस्त हो गए, सरमाया लुटाने वाला कौड़ियों का मो़हताज हो गया। इन तमाम सूरतों में हरगिज़ येह ख़याल न करना चाहिए कि हम बदबख्त हो गए, तबाह-ओ-बर्बाद हो गए बल्कि हमेशा येह अज्म-ओ-इरादा रखना चाहिए कि ज़िंदगी के समुंदर में जिस क़द्र और जिस तरह़ भी गोता लगाएँ ख़ाह ने़अ्‌मतों और आसाइशों में डूबे हुए हों और ख़ाह फ़़क्र और तंगदस्ती में हिचकोले खा रहे हों। ज़िंदगी के हर इन्क़ेलाब से, हर तब्दीली से, हर नशेब-ओ-फ़राज़ से अपनी रू़ह और अख़्लाक़ी क़द्‌रों को उजागर करते चलें। ऩपस को पाकीज़ा से पाकीज़ातर बनाएँ, स़प़हए दिल पर ईमान के नक़्श उभारें। जिस शख़्स की ज़िंदगी का येह लाए़हए अमल होगा और येह नुव़तए निगाह होगा तो ज़िंदगी कभी भी उस की निगाह में बेमक़्सद नज़र नहीं आएगी। दुनिया के किसी भी हादेसे को बेमक़्सद और ख़ेलाफ़े अदालत तसव्वुर नहीं करेगा बल्कि हर एक चीज़ को अपनी कामियाबी का वसीला क़रार देगा।

इस सिलसिले में क़ुरआन करीम का इर्शाद हैः

وَرَفَعَ بَعْضَکُمْ فَوْقَ بَعْضٍ دَرَجَاتٍ لِیَبْلُوَکُمْ فِیْ مَا اٰتٰیکُمْ

व र-फ़-अ बअ्‌-ज़कुम फ़ौ-क़ बअ्‌ज़िन द-र-जातिन ले-यब्लो-वकुम फ़ी मा आताकुम.

(सूरए अन्आम, आयत १६५)

ख़ुदावंद आलम ने तुम में से बअ्‌ज़ को बअ्‌ज़ पर बरतरी दी है ताकि जो कुछ उसने तुम्हें दिया है उस में तुम्हारा इम्ते़हान ले और तुम्हें आ़ज्माए।’

आ़ज्माइश और इम्ते़हान से मतलब येह है कि देखा जाए कि तुम किस तरह़ अपनी हालत से इस्तेफ़ादा करते हो। दुनिया में रूनुमा होने वाला हर वा़के़आ इन्सान के रू़ही कमालात को उजागर करता है बशर्तेकि उस से स़ही़ह तौर पर इस्तेफ़ादा किया जाए। येह ख़ुद परवरदिगार आलम का लुत्फ़े आम और अद्‌ल है।

दुनिया में नशेब-ओ-फ़राज़ और इ़ख्तेलाफ़ात का राज़ येह है जो किसी भी सूरत से अदालत के मनाफ़ी नहीं है।

अगर दुनिया के बअ्‌ज़ हवादिस के सिलसिले में हम उस की अदालत और उस का फ़ाएदा म़अ्‌लूम करने से क़ासिर रहे और उस की वजह हमारी समझ में न आ सकी तो हमें हरगिज़ येह ख़याल न करना चाहिए कि येह हादसा ख़ेलाफ़े अद्‌ल और सरासर ज़ुल्म है क्योंकि काएनात को उस ज़ात ने वजूद बख्शा है जिसके यहाँ ज़ुल्म-ओ-सितम की कोई भी गुंजाइश नहीं है। और जो कुछ हमारे लिए चाहता है वोह उस के रह्म-ओ-करम का तक़ाज़ा है।

येह वोह हक़ीक़त है जिसे हमने हवादिस की पेशानी पर बारहा देखा है। हमारी ज़ाहिरी और सत़्ही निगाह ने किसी हादसे को मुज़िर और नुव़सानदेह बताया लेकिन कुछ ही दिनों के बअ्‌द जब हक़ाएक़ सामने आए तो हमें म़अ्‌लूम हुआ कि येह हादसा मुज़िर और नुव़सानदेह तो था ही नहीं बल्कि हमारे लिए बहुत काफ़ी फ़ाएदाबख्श और मुफ़ीद था।

क़ुरआन का इर्शाद हैः

وَعَسٰی اَنْ تُکْرِھُوْ اشَیْئًا وَّھُوَ خَیْرٌ لَّکُمْ وَعَسٰی اَنْ تُحِبُّوْا شَیْئًا وَّھُوَ شَرٌّلَّکُمْ وَاللہُ یَعْلَمُ وَاَنْتُمْ لَاتَعْلَمُوْنَ۔

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व असा अन तुक्रेहू शैअन वहो-व ख़ैरुल लकुम व असा अन तोह़िब्बू शैअन वहो-व शर्रुल लकुम वल्लाहो यअ्‌लमो व अन्तुम ला तअ्‌-लमून.

(सूरए बक़रा, आयत २१६)

बहुत सी ऐसी चीज़ें हैं जिन्हें तुम पसंद नहीं करते दरआँहालेकि वोह तुम्हारे लिए बेहतर और फ़ाएदामंद हैं।

और बहुत सी ऐसी चीज़ें हैं जिन्हें तुम पसंद करते हो दरआँहालेकि वोह तुम्हारे लिए नुव़सानदेह हैं। ख़ुदा जानता है और तुम नहीं जानते हो।’’