हज़रत मरियम, मादरे ईसा अलैहिस्सलाम
जनाब इमरान की ज़ौजा बाँझ और अक़ीम थीं, लेकिन उनके शौहर ने सुन रखा था कि ख़ुदावंद आलम ने उनसे येह व़अ्दा किया है कि उन्हें एक फर्ज़ंद अता करेगा जो ह़ुक्मे ख़ुदावंदी से बीमारों को शेफ़ा देगा और मुर्दों को ज़िन्दा करेगा।
(मज्म़उल बयान, जि॰ २, स॰ ४३५)
ख़ुदावंद आलम की कुदरत पर मुकम्मल ईमान-ओ-ए़अ्तेक़ाद था। बारगाहे ख़ुदावंदी में दस्ते दु़आ बलंद किए कि उन्हें एक फर्ज़ंद अता फ़रमाए।
ख़ुदावंद आलम ने उनकी येह दु़आ क़बूल फ़रमाई। वोह ह़ामेला हुईं इस ने़अ्मत के शुक्राने के तौर पर येह नज़र की कि अपने फर्ज़ंद को ख़ानए ख़ुदा ‘बैतुल-मुक़द्दस की ख़िदमत के लिए वक़्फ कर देंगी।
(सूरए आले इमरान, आयत ३४-३५, तक़नियातुद्दरर, जि॰ २, स॰ १८८)
जो बच्चा मुतवल्लिद (पैदा) हुआ वोह लड़की थी जब माँ की निगाहें अपनी लड़की पर पड़ी तो कहने लगींः
ख़ुदाया! येह मौलूद लड़की है मैंने अपनी नज़र को वफ़ा करते हुए उस का नाम ‘मरियम’ रखा है। (मरियम एबादतगुज़ार औरत को कहते हैं।) परवरदिगार इसे और इस की औलाद को शैतान से म़हफ़ूज़ रख!
( मज्म़उल बयान, जि॰ २, स॰ ४३६)
ज़ौजए इमरान ‘मरियम’ को ख़ानए बैतुल-मुक़द्दस ले गईं और उन्हें वहाँ के मुतवल्लियों के ह़वाले कर दिया। जनाब इमरान चूँकि उनके रहनुमा थे। लेहाज़ा हर एक की ख़ाहिश थी कि जनाब मरियम की केफ़ालत और तर्र्बियत उस से सिपुर्द की जाए मुतवल्लियों के दरमियान इस मसअला में जो कशीदगी पैदा हो गई थी उस कशीदगी को दूर करने के लिए क़ुऱआ अंदाज़ी की गई। कुऱआ जनाब ज़करिया (अ.स.) के नाम निकला। ह़ज़रत ज़करिया जनाब मरियम की केफ़ालत और तर्र्बियत करने लगे। जनाब मरियम रफ़्ता-रफ़्ता बड़ी होती रहीं एबादत और ख़ानए ख़ुदा की ख़िदमत के अलावा और कोई काम न था।
जनाब मरियम की एबादत और ख़ुलूस इस हद तक पहुँच गया था कि जिस वक़्त जनाब ज़करिया ह़ज़रत मरियम की मेहराबे एबादत में वारिद होते थे तो जनाब मरियम के पास आसमानी ग़ेज़ाओं को पाते थे। मरियम से त़अज्जुब से पूछतेः ऐ मरियम येह ग़ेज़ाएँ कहाँ से आई हैं? जनाब मरियम कहतींः
येह सब ख़ुदा की तरफ़ से है वोह जिसको चाहता है उसे
बे-ह़िसाब रोज़ी देता है।
ज़करिया (अ.स.) और य़ह्या (अ.स.)
जनाब ज़करिया (अ.स.) की ज़ौजा भी जनाब मरियम की वालेदा की तरह़ बाँझ और अक़ीम थीं, यही वजह थी कि जनाब ज़करिया बु़ढापे तक लावलद रहे। जनाब मरियम के म़अ्नवी दर्जात और ख़ुदावंद आलम की बेपनाह रह़्मत-ओ-अता को देखकर जनाब ज़करिया के दिल में येह आर्ज़ू पैदा हुई कि उन्हें भी मरियम जैसी औलाद नसीब हो।
बारगाहे ख़ुदावंदी में दु़आ फ़रमाईः ख़ुदावंदा मुझे एक ऐसा साले़ह फर्ज़ंद अता फ़रमा जिसमें तेरी ख़ुशनूदी हो और जो मेरा और आले यअक़ूब का वारिस हो।
(सूरए आले इमरान की आयत ३९, तफ़सीरे अल-मीज़ान, जि॰ ३, स॰ १९०. सूरए मरियम आयात १-६)
जनाब ज़करिया (अ.स.) मेहराबे एबादत में नमाज़ प़ढ रहे थे कि फ़रिश्तों ने उन्हें बशारत दी कि ख़ुदा आपको एक फर्ज़ंद अता करेगा जिसका नाम ‘य़ह्या’ होगा और जो पार्सा पैग़म्बरों में से होगा।
जनाब ज़करिया की नज़र जब अपने बु़ढापे पर और अपनी ज़ौजा के बाँझपन पर पड़ी, (आम तौर से उन ह़ालात में औलाद की तवक़्क़ो़अ् नहीं होती) तो त़अज्जुब और शौक़ के मिले जुले ज़ज्बात से कहा ख़ुदाया इन ह़ालात में और इस उम्र में किस तरह़ मुझे फर्ज़ंद अता फ़रमाएगा? जवाब मिलाः
येह काम ख़ुदा के लिए बहुत आसान है क्यंकि वही ख़ुदा तुमको अदम से वजूद में लाया है। जनाब ज़करिया के यहाँ फर्ज़ंद मुतवल्लिद (पैदा)हुआ जिस का नाम पहले ही से य़ह्या रखा जा चुका था।
जनाब य़ह्या पैग़म्बर थे जिन्होंने अपनी तमाम उम्र तब्लीग़ और लोगों को रुश्द-ओ-हेदायत की द़अ्वत देने में सिर्फ़ कर दी। बनी इस्राईल के एक बादशाह ने उन्हें उस वक़्त क़त्ल कर दिया जब उन्होंने बादशाह को इस बात से मऩअ् किया कि वोह अपनी भतीजी के साथ शादी नहीं कर सकता है।
(तफ़सीर अल मीज़ान, जि. १४, स॰ २६-२७)
ईसा मसी़ह
मरियम (वही बच्ची जिसकी केफ़ालत और तर्र्बियत की ज़िम्मेदारी जनाब ज़करिया जैसे पैग़म्बर (स.अ.) ने अपने सर ली थी और जिसकी परवरिश ख़ानए ख़ुदा में हुई थी एक रोज़ एबादत में मश़गूल थीं कि इन्सानी शक्ल-ओ-सूरत में एक फ़रिश्ता उनके सामने आ खड़ा हुआ।
मरियम जो उसे वाक़़अन इन्सान समझ रही थीं ख़ौफ़ के मारे ख़ुदा से पनाह माँगी लेकिन फ़रिश्ते ने उनको येह बशारत दी मैं तुम्हारे परवरदिगार की तरफ़ से आया हूँ, ताकि एक पाक-ओ-पाकीज़ा बच्चा तुम्हें अता करूँ।
मरियम ने कहा येह कैसे मुम्किन है जब कि मैं न किसी मर्द से मिली और न ही मैं बदकार और ज़ेनाकार हूँ।
फ़रिश्ते ने कहा तुम्हारे परवरदिगार का यही कुछ इरादा है और उसने कहा कि येह काम मेरे लिए आसान है ताकि उस बच्चा को लोगों के लिए एक अलामत क़रार दूं और उसे अपनी रह़्मतों का मर्कज़ बनाऊँ।
जनाब मरियम ह़ामेला हो गईं। मगर चूँकि उनका कोई शौहर न था लेहाज़ा ब़अ्ज़ लोगों ने उल्टी सीधी बातें करना शुरू़अ् कर दीं और तरह़ तरह़ के ख़यालात का इज़्हार करने लगे।
येह बातें जनाब मरियम के लिए स़ख्त तकलीफ़-देह थीं। तोह्मत-ओ-इल्ज़ाम के कर्ब-ओ-बेचैनी से नजात ह़ासिल करने के लिए उन लोगों से किनारा-कशी इख़्तेयार कर ली और दूर दराज़ मुक़ाम पर चली गईं और वहाँ अपने बच्चे की वेलादत का इन्तेज़ार करने लगीं।
आख़िर कार वक़्ते वेलादत आ पहुँचा। जनाब मरियम दर्दे ज़ह से बेचैन थीं। सहरा में खजूर के एक सूखे दरख़्त के नीचे पनाह ली। तमाम लोगों से दूर जहाँ कोई भी यार-ओ-मददगार न था। वहाँ बच्चे की वेलादत हुई। तन्हाई, दर्द, इ़ज्ज़त-ओ-आब्रू का ख़ौफ़, इन चीज़ों ने जनाब मरियम को मुतफ़क्किर और परेशान कर दिया। अपने आपसे कहने लगींः
‘ऐ काश मैं इस के क़ब्ल ही मर गई होती। मेरा नाम भी ख़त्म हो गया होता।’
उसी वक़्त जनाब मरियम ने एक आवाज़ सुनी जिसने उन्हें दिलासा दिया और उनके ह़ैसले बलंद किए।
‘ग़मगीन मत हो, तुम्हारे परवरदिगार ने तुम्हारे पाँव के नीचे एक शीरीं चश्मा जारी किया है, इस सूखे हुए दरख़्त की शा़खों को हिलाओ इस से तर-ओ-ताज़ा ख़ुरमे गिरेंगे उनको खाओ पियो और मुत्मइन रहो। अगर कोई मर्द तुम्हारे पास आए तो उसे इशारे से येह समझा दो कि मैंने ख़ामोशी के रोज़े की नज़र की है। मैं आज किसी भी मर्द से गुफ़्तगू नहीं करूँगी।
मो़अ्जेज़ात और यके ब़अ्द दीगरे ग़ैबी इमदाद ने मरियम को क़ूवते क़ल्ब अता की जिसकी वजह से जनाब मरियम अपने नौ मौलूद बच्चे के साथ अपनी रिहाइश गाह वापस आ गईं जब लोगों ने मरियम की आग़ोश भरी देखी तो हर एक की ज़बानें ए़अ्तराज़ के लिए खुल गईं। कहने लगेः ‘न तो तुम्हारे वालिद बद किर्दार थे और न तुम्हारी वालेदा ही बद किर्दार थीं।’
जनाब मरियम ने कुछ कहे बग़ैर बच्चे की तरफ़ इशारा किया। यअनी जो कुछ सवाल करना हो इस बच्चे से दरियाफ़्त करो और इसी से अपने सवाल का जवाब माँगो।
वोह लोग हँसकर कहने लगे हम कैसे इस छोटे से बच्चे से गुफ़्तगू करें।
जनाब मरियम का येह नौ मौलूद क़ुदरते ख़ुदा से गोया हुआ और बहुत ही साफ़ रोशन अल्फ़ाज़ में उनसे कहाः
‘मैं ख़ुदा का बंदा हूँ, उसने मुझे किताब अता की है, उस ने मुझे पैग़म्बर मुंतख़ब किया है। मुझे हर जगह बाबरकत और ख़ैर रसाँ क़रार दिया है, और मुझे इस का ह़ुक्म दिया है कि मैं तादमे ह़यात नमाज़ प़ढता रहूँ, ज़कात अदा करता रहूँ, उसने मुझे मेरी माँ के लिए मेह्रबान क़रार दिया है।’
(सूरए मरियम आयत १६-३२, तफ़सीरे अल-मीज़ान, जि॰ १४, स॰ २३-४८)
लोग बच्चे की गुफ़्तगू सुनकर मब्हूत (ह़ैरान) हो गए। और अल्लाह की इस अज़ीम निशानी ने अपनी माँ के दामन से तमाम तोह्मत और बद-गुमानी के धब्बे धो दिए और उनकी समझ में येह बात आ गई कि येह बच्चा जो बग़ैर बाप के पैदा हुआ है वोह ह़ुक्मे ख़ुदा से मुस्तक़बिल में एक अज़ीम मन्सब पर फ़ाएज़ होगा और एक बड़ी ज़िम्मेदारी उसे सौंपी जाएगी।
ह़ज़रत ईर्सा (अ.स.) की रेसालत के क़ब्ल की ह़ालत
जनाब ईसा की वेलादत से पहले फ़िलिस्तीन रूमियों के क़ब्ज़े में था फ़िलिस्तीन के लोग अपनी कम-माएगी और बग़ैर किसी पुश्त पनाही के बावजूद हमेशा रूमी अजनबियों से बर सरे पैकार रहते जिसकी बेना पर वोह हमेशा परेशान ह़ाल रहते थे। उनकी इक़्तेसादी ह़ालत ख़राब थी। ह़ुकूमत के ज़बरदस्त टैक्स ने उन्हें और कमर-ख़मीदा कर दिया था। येह आज़ादी तलब करने वाले क़ैदख़ाना में या फिर बरसरे पैकार रह कर अपनी तमाम उम्र गुज़ार देते थे। आबादियाती और तमाम त़अ्मीराती काम रुक गए थे और हर प्रोग्राम बेबुनियाद हो गया था। यहाँ तक कि उनका ईमान भी इस ज़द से बाहर न था। वोह मज़हबी अक़दार की भी पाबंदी नहीं कर थे।
ईमान का येह ज़ो़अ्फ़ रूमी सामराज का तोह्फ़ा था जो उसने फ़िलिस्तीनियों को दिया था।
सामराज ने हमेशा इस रास्ते से इस्तेफ़ादा किया है और आज भी कर रहा है क्यंकि इस क़िस्म की जंग में किसी अस्लह़े की ज़रूरत नहीं होती। क्यों कि लोग अगर ईमान से हाथ धो बैठें तो लाश़ऊरी तौर पर रफ़्ता-रफ़्ता ख़त्म हो जाएँगे।
हाँ उन शराएत में और उस पुर आशोब ज़माने में एक आसमानी रहबर की ज़रूरत शिद्दत से म़हसूस हो रही थी जो लोगों को इऩ्हेराफ़ से रोके और उन्हें गुमराही से नजात दिलाए।
ख़ुदावंद आलम के रह़्म-ओ-करम के तक़ाज़े के बमूजिब ह़ज़रत ईसा अलैहिस्सलाम पैदा हुए, आपकी वेलादत अजाएबात में घिरी हुई है जो आपकी अज्मत और बलंदी की गवाही दे रही है। येह तमाम बातें इस ह़क़ीक़त की निशानदेही कर रही हैं कि आप ख़ुदा के नुमाइंदा हैं। उस के मुंतख़ब कर्दा रहबर हैं और दस्ते क़ुदरत ने उन्हें एक अज़ीम इन्क़ेलाब बर्पा करने के लिए पैदा किया है।
ह़ज़रत ईसा अलैहिस्सलाम की रेसालत
जनाब ईसा अलैहिस्सलाम पर ‘इंजील’ नाज़िल हुई ताकि गुमराहियों के लिए हादी और रहनुमा हो।
जनाब ईसा अलैहिस्सलाम ने अपनी रेसालत का ए़अ्लान किया और वसी़अ् पैमाने पर तब्लीग़ात शुरू़अ् की। यहूदियों को गुमराही से नजात दिलाने के लिए और उन्हें इऩ्हेराफ़ से रोकने के लिए ज़़ह्मतें बर्दाश्त कीं और मसाएब सहे।
लेकिन यहूदी पेशवाओं को अपना मन्सब-ओ-मुक़ाम ज़्यादा अज़ीज़ था। वोह ह़ज़रत ईसा अलैहिस्सलाम के वजूद को अपने जाह-ओ-मुक़ाम के लिए ख़तरा तसव्वुर कर रहे थे और उनकी रेसालत से ़खौफ-ज़दा थे। आपस में राए और मश्वरा करने के ब़अ्द इस नतीजे पर पहुँचे कि ह़ज़रत ईसा अलैहिस्सलाम के ख़ेलाफ़ क़याम करना चाहिए और फ़ित्ना बर्पाकर के उनकी तब्ली़गी सरगर्र्मियों को रोकना चाहिए।
ह़ज़रत ईसा अलैहिस्सलाम उनके मन्सूबों से आगाह थे। वोह राहे तब्लीग़ में पहाड़ की तरह़ जमे रहे। लोगों की हेदायत करते रहे, उन्हें इऩ्हेराफ़ से ब़अ्ज़ रखते रहे, उन्हें ख़ुराफ़ात से आगाह करते रहे और ह़ज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के दीन में जो कुछ भी त़हरीफ़ की गई थी उस से भी उन्हें बाख़बर करते रहे। राहे तब्लीग़-ओ-हेदायत में ह़ुक्मे ख़ुदा से कभी किसी मरीज़ को शेफ़ा देते, कभी ह़ुक्मे ख़ुदा से किसी मुर्दे को ज़िन्दा कर देते ताकि सब को यक़ीन हो जाए कि वोह जो ख़ुदा के नुमाइंदा हैं और ख़ुदाए व़ह्दहू लाशरीक ने उन्हें अपना पैग़ाम्बर बना कर भेजा है।
अंजामे कार
ह़ज़रत ईसा अलैहिस्सलाम के अ़अ्वान-ओ-अन्सार और उनकी पैरवी करने वालों की त़अ्दाद में रोज़ बरोज़ एज़ाफ़ा होता चला गया। उनकी त़अ्दाद में जिस क़द्र एज़ाफ़ा होता यहूदी पेशवा भी अपनी मुख़ालेफ़त तेज़ कर देते। यहाँ तक कि उन लोगों ने जनाब ईसा अलैहिस्सलाम के क़त्ल की ठान ली।
लेकिन ख़ुदावंद आलम ने जनाब ईसा अलैहिस्सलाम को उनकी निगाहों से पोशीदा रखा और उन लोगों ने जनाब ईसा अलैहिस्सलाम से मुशाबेह एक शख़्स को सूली पर चढ़ा दिया और इसी शुब्हा में मुब्तेला रहे कि उन्होंने ह़ज़रत ईसा अलैहिस्सलाम को सूली दे दी है।
क़ुरआन करीम ने इस ह़क़ीक़त की तरफ़ साफ़ ल़पज़ों में इशारा किया हैः
व मा क़-त-लूहो व मा स-लबूहो व लाकिन शुब्बे-ह लहुम व इन्नल्लज़ीऩख्तलफ़ू फ़ीहे लफ़ी शक्किन मिन्हो मा लहुम बेही मिन इल्मिन इल्लात्तेबा अ़ज्ज़न्ने व मा क़-तलूहो यक़ीनन. बल र-फ़-अहुल्लाहो इलैहे व कानल्लाहो अज़ीज़न ह़कीमन
‘न उन्हें क़त्ल किया और न उन्हें सूली दी बल्कि ह़क़ीक़त उनके लिए मुश्तबा हो गई। जिन लोगों ने इस मसअला में इ़ख्तेलाफ़ किया है उन्हें इसका इल्म न था। (वह्म-ओ-गुमान की बुनियाद पर कह रहे थे) येह लोग सिर्फ़ गुमान की पैरवी करते हैं। यक़ीनन ईसा को क़त्ल नहीं किया है बल्कि ख़ुदावंद आलम ने उन्हें ऊपर बुला लिया है। ख़ुदा साहेबे इ़ज्ज़त और ह़कीम है।’
जनाब ईसा अलैहिस्सलाम का सूली पर चढ़ाया जाना बिल्कुल बेबुनियाद है। इसी तरह़ इस तर्ज़े फ़िक्र की भी कोई ह़ैसियत नहीं है जो ईसाइयों के दरमियान आज भी राएज है कि ‘तमाम लोग ज़ाती तौर पर गुनाहगार हैं गरचे उन्होंने तमाम उम्र एक गुनाह भी न किया हो।
इसी लिए जनाब ईसा ने दार पर जाना गवारा किया ताकि तमाम इन्सानों के गुनाहों का क़पफ़ारा अदा हो जाए और इस तरह़ तमाम इन्सान आतशे जहन्नम से आज़ाद हो जाएँ‘। येह तमाम बातें बे असास हैं।
(तरी़कुल ह़यात, डाक्टर फ़न्दर जरमन, स॰ १३५ -१३८)
ईसा (अ.स.) मसी़ह या बंदए ख़ुदा
क़ुरआने करीम और इंजील के ब़अ्ज़ मौजूदा नुस्ख़ों से इस बात का इस्तेफ़ादा होता है कि ह़ज़रत ईसा अलैहिस्सलाम ने अपने को बन्दए ख़ुदा कहा, हमेशा उस की एबादत की और उसी की लोगों को द़अ्वत देते रहे।
(इंजीले मरक़स, बाब १२ बन्द २९)
जनाब ईसा अलैहिस्सलाम फ़रमाया करते थे किः
हमारा और तुम्हारा परवरदिगार सिर्फ़ एक है उस की परस्तिश करो यही राहे रास्त है।
(सूरए आले इमरान, आयत ५१)
ह़ज़रत ईसा अलैहिस्सलाम ने कभी भी ख़ुदाई का द़अ्वा नहीं किया। येह जो ईसाइयों ने ह़ज़रत ईसा को ख़ुदा मान लिया है येह ख़ुद उनके ज़ेह्न की पैदावार है।
जवाहर लाल नेहरू ने अपनी किताब ‘निगाही ब तारी़ख जहाँ’ (दुनिया की तारी़ख पर एक नज़र) में लिखा है ह़ज़रत मसी़ह उलूहियत और ख़ुदाई के मुद्द़ई न थे लेकिन लोग इस बात की कोशिश करते हैं कि वोह अपनी अज़ीम शख़्सीयतों को किसी तरह़ ख़ुदा साबित कर दें।
(जि. १, स. २००)
दूसरे पैग़म्बरों की तरह़ ह़ज़रत ईसा अलैहिस्सलाम भी एक इन्सान थे। जिन पर ख़ुदा की तरफ़ से व़ही नाज़िल होती थी और आप लोगों की रुश्द-ओ-हेदायत के लिए मबऊस किए गए थे। अगर ह़ज़रत ईसा के पास मो़अ्जेज़ात थे तो दूसरे पैग़म्बर भी अपने साथ मो़अ्जेज़ात लाए थे। अगर वोह बग़ैर बाप के पैदा हुए थे तो ह़ज़रते आदम अलैहिस्सलाम भी बग़ैर माँ बाप के पैदा हुए थे, लेकिन किसी ईसाई ने ह़ज़रत आदम अलैहिस्सलाम को ख़ुदा का फर्ज़ंद कहा?
क़ुरआन का इर्शाद हैः
मरियम के फर्ज़ंद मसी़ह सिर्फ़ ख़ुदा के पैग़म्बर थे। उनसे पहले भी उनकी तरह़ पैग़म्बर आए थे और इस दुनिया से गुज़र गए। उनकी वालेदा एक रास्त-गो ख़ातून थीं। वोह और उनकी वालेदा दोनों ही खाना खाते थे।
(सूरए माएदा, आयत ७५.)
यअनी बशरी ह़यात के तमाम लवाज़ेमात उनमें पाए जाते थे और तमाम इन्सानों की तरह़ उन्हें उन तमाम चीज़ों की ज़रूरत थी।
कलामे ख़ुदावंदी ने जिस रोशन ह़क़ीक़त की तरफ़ इशारा किया है अक़्ल और फ़िक्र भी उस की ताईद करती है। क्यंकि वोह इन्सान जिसे दूसरे तमाम इन्सानों की तरह़ ज़िन्दगी के तमाम लवाज़ेमात की ज़रूरत और ए़हतेयाज हो, उसे भी दूसरे इन्सानों की तरह़ खाने और सोने की ज़रूरत हो तो अक़्ल येह ह़ुक्म देती है कि ऐसे शख़्स की एबादत करना सज़ावार नहीं है।
लेहाज़ा
बेना बर ह़ुक्मे अक़्ल
और मुताबि़के तस्दीक़े, क़ुरआन
और मुवाफ़िक़े मौजूदा इंजील (इंजील मरक़स) (उदेजत् दि शीव्)
और बतस्दीक़े अव़वाले मुवरेर्ख़ीन
ह़ज़रत ईसा अलैहिस्सलाम बंदए ख़ुदा और ख़ुदा के पैग़म्बर थे। उन्होंने कभी ख़ुदाई का द़अ्वा नहीं किया।
लेकिन ह़ज़रत ईसा के ब़अ्द उनका पाक-ओ-पाकीज़ा आईन अपनी अस्ली ह़ालत पर बाक़ी न रहा। शिर्क और बुत परस्ती की रस्म इस में शामिल कर दी गई। यहाँ तक कि ‘वेल डुरांट’ को अपनी किताब ‘तारी़खे तमद्दुन’ की तीसरी जिल्द की तीसरी फ़स्ल के सफ़ह़ा २३९/२४० पर लिखना प़डा कि ‘ईसाइयत ने शिर्क को ख़त्म न किया बल्कि उस को बाक़ा़एदा क़बूल किया है।’
जो शख़्स भी ईसाई अक़ाएद का मुताल़आ करेगा वोह इस बात की ज़रूर तस्दीक़ करेगा कि इस मुवर्रि़ख ने एक तारीख़ी ह़क़ीक़त को बयान किया है कि ईसाइयों के दरमियान आज भी इस क़िस्म के अक़ाएद पाए जाते हैं।
(१) ह़ज़रत ईसा अलैहिस्सलाम ख़ुदा की ज़ात का एक हिस्सा हैं वोह मख़्लूक़ नहीं हैं बल्कि वोह र्फ़ज़ंदे ख़ुदा हैं।
(तारी़खे कलीसाए क़दीम, स॰ २४४)
(२) ह़ज़रत ईसा अलैहिस्सलाम एक बशर थे मगर ऐसे बशर जिसमें ख़ुदा ह़ुलूल कर गया था।
(तरी़कुल हयात अज़ डाक्टर फन्दर जरमन ईसाई)
(३) ह़ज़रत ईसा अलैहिस्सलाम ख़ुद ख़ुदा हैं जो बसूरते बशर ज़ाहिर हुए हैं।
(निज़ामुत्त़अ्लीम, तब़अ बेरूत १८८८ ई., जि॰ २, स॰ २०४)
लेकिन येह बात सभी जानते हैं कि ख़ुदा जिस्म नहीं है ताकि उसे किसी जगह की ए़हतेयाज हो और जब वोह जिस्म नहीं है तो उस से किसी जुज़ का अलग होना बेम़अ्ना है ताकि कोई उस का फर्ज़ंद बन सके। अक़्ल की रोशनी में हर एक इस ह़क़ीक़त से वाकि़फ़ है कि ख़ुदा के लिए किसी जगह की ज़रूरत नहीं है ताकि वोह उस में समा जाए या ह़ुलूल कर जाए और बशरी शक्ल-ओ-सूरत में ज़ाहिर हो।
इस के अलावा येह बात क्यूँकर मुम्किन है वोह ख़ुदा जो मुस्तग़नी हो, बेनियाज़ हो, वोह ख़ोराक़-ओ-पोशाक का मो़हताज हो।
अगर ईसाई स़ही़ह म़अ्नों में ग़ौर-ओ-फ़िक्र करें तो वोह इस बात की ज़रूर तस्दीक़ करेंगे कि तमाम दूसरे पैग़म्बरों की तरह़ ह़ज़रत ईसा (अ.स.) भी ख़ुदा के बंदे हैं और ह़ज़रत ईसा की उलूहियत और ख़ुदाई का मसअला बिल्कुल बेबुनियाद है।
क़ुरआने करीम का इर्शाद हैः
‘वोह लोग जो कहते हैं कि मरियम के पेसर ईसा ‘ख़ुदा हैं’ वोह काफ़िर हैं। उनसे कह दो अगर ख़ुदा मरियम के पेसर ईसा और उनकी वालेदा और रूए ज़मीन पर तमाम बसने वालों को हलाक करना चाहे तो कौन उसे रोक सकता है? आसमान-ओ-ज़मीन और वोह तमाम चीज़ें जो उनके दरमियान हैं उस की बादशाहत और ह़ुक्मरानी सिर्फ़ ख़ुदा के लिए है। ख़ुदा जिस चीज़ को चाहता है पैदा करता है और ख़ुदा हर शै पर क़ुदरत रखता है।’
(सूरए माएदा, आयत ९७)
ह़ज़रत ईसा अलैहिस्सलाम के अक़्वाल
पैग़म्बरे इस्लाम ह़ज़रत रसूल अकरम (स.अ.) ने फ़रमायाः
‘ह़ज़रत ईसा के ह़वारियों ने ह़ज़रत ईसा अलैहिस्सलाम से पूछा किस के साथ हम रहन सहन रखें?
फ़रमाया उस के साथ जिसकी मुलाक़ात तुम्हें ख़ुदा की याद दिलाए, जिसकी गुफ़्तगू तुम्हारे इल्म में एज़ाफ़ा करे, जिसका किरदार तुम्हारे शौ़के आख़ेरत में एज़ाफ़े का सबब हो।
(उसूले काफ़ी, जि॰ १, स॰ ३९)
नीज़ आँह़ज़रत ने इर्शाद फ़रमायाः
ह़वारियों ने ह़ज़रत ईसा अलैहिस्सलाम से इस बात की दऱखास्त की कि वोह उनकी हेदायत करें।
उस वक़्त फ़रमायाः
ह़ज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने तुमसे फ़रमाया था कि झूठी क़सम मत खाओ। मैं तुमसे कहता हूँ कि ख़ुदा के नाम की सच्ची क़सम भी न खाओ।
ह़वारियों ने मज़ीद नसा़ीहत की दऱखास्त की।
फ़रमायाः ख़ुदा के पैग़म्बर जनाब मूसा अलैहिस्सलाम ने तुमसे फ़रमाया था ज़ेना न करना। मैं तुम्हें इस बात का ह़ुक्म दे रहा हूँ कि हरगिज़ ज़ेना की फ़िक्र न करना। क्यंकि जो शख़्स ज़ेना के बारे में सोचेगा वोह उस शख़्स के मानिंद है जो नक़्श-ओ-निगार से मुरस्स़अ् (आरास्ता) घर को धुएँ से भर दे। अगर वोह न भी जले तो ख़राब और सियाह तो ही जाएगा।
(बेह़ारुल अनवार, जि॰ १४, स॰ ३३१)
अमीरुल मोअ्मेनीन ह़ज़रत अली अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया किः
ईसा इब्ने मरियम ने इर्शाद फ़रमायाः ख़ुश कि़स्मत है वोह जिसकी ख़ामोशी तफ़क्कुर और जिसकी निगाह नसीहत-आमेज़ हो, उस का घर उसे राहत-ओ-आराम पहुँचाए, अपने बुरे किरदार पर आँसू बहाए, लोग उस की ज़बान और उस के हाथ से आसूदा ख़ातिर रहें।
(बेह़ारुल अनवार, जि॰ १४, स॰ २२०)
इमाम ज़अ्फ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम ने इर्शाद फ़रमायाः
ह़ज़रत ईसा अलैहिस्सलाम ने अपने अस़्हाब से फ़रमायाः ऐ फ़र्ज़न्दाने आदम दुनिया से ख़ुदा की तरफ़ चलो, दुनिया से दिल वाबस्ता न करो, तुम सिर्फ़ दुनिया के लिए पैदा नहीं किए गए हो, दुनिया भी तुम्हारे लाएक़ नहीं है, न तुम इस में हमेशा रहोगे और न वही हमेशा बाक़ी रहेगी। इस दुनिया ने बहुतेरों को ग़ाफ़िल करके उन्हें हलाक कर दिया। जो शख़्स उस के सिलसिले में हुस्ने ज़न रखेगा और दुनिया पर ए़अ्तेमाद करेगा वोह नुक़सान उठाएगा। जो कोई उसे चाहेगा और उसे तलब करने की कोशिश करेगा वोह हलाक-ओ-बर्बाद हो जाएगा।
(बेह़ारुल अनवार, जि॰ १४, स॰ २८९)
नीज़ इमाम ज़अ्फ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम ने इर्शाद फ़रमायाःजनाब ईसा (अ.स.) ने अपने अस़्हाब से फ़रमायाः
दूसरों की औरतों पर निगाह करने से परहेज़ करो क्यंकि यही निगाह इन्सान के दिल में शहवत का बीज बोती है और इन्सान की हलाकत के लिए बस इतना ही काफ़ी है।
तुफ़ है उस पर जिसका मक़सदे ह़यात सिर्फ़ ऐश-ओ-इशरत हो और जिसका किरदार उस के गुनाह हों।
तुम्हें कुछ इस की भी ख़बर है कि क़यामत के दिन किस तरह़ ख़ुदा के सामने पेश किए जाओगे।
(बेह़ारुल अनवार, जि॰ १४, स॰ ३२४)