उसूले दीन
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सबक़ - १९

नूरे रेसालत

क़ब्ले इस्लाम

इस्लाम से पहले दुनिया की जो गिरी हुई ह़ालत थी उस का अक्स तारी़ख के साफ़ आईने में ब़खूबी नज़र है।

फ़ित्ना-ओ-फ़साद की तारीकी, सितम की आँधियाँ, ख़ूँरेज़ी के सैलाब, बुत परस्ती के बादल...... तारी़ख के आईने में बाक़ा़एदा नज़र आ रहे हैं।

इस्लाम से पहले बशरीयत का क़ाफ़ेला तबाही-ओ-बर्बादी के दहाने पर खड़ा था और हर आन उस की हलाकत का ख़ौफ़ लगा रहता था कि एक ज़रा सी जुम्बिश में हमेशा के लिए नीस्त-ओ-नाबूद हो सकता है।

मज़ाहिब और अक़ाएद

जज़ीरए अरब

अरबों ने अपना दिल-ओ-दिमाग़ बुतों के हवाले कर दिया था। जिस चीज़ पर निगाह पड़ती उसी को बुत मान लेते थे और उस के सामने सिर्फ़ सज्दा ही नहीं करते थे बल्कि अपनी सारी पूँजी उसी पर भेंट चढ़ा देते थे, यहाँ तक अपनी ज़रा़अत का भी ब़अ्‌ज़ हिस्सा बुतों की ऩज्र कर देते थे।

(सूरए अऩ्आम, आयत १३६)

उनका अक़ीदा येह था कि जो कुछ है बस यही दुनिया है इस के अलावा कोई और ज़िन्दगी नहीं है।

(सूरए जासिया, आयत २४)

जिन बुतों को उन्होंने अपना ख़ुदा मुंतख़ब किया था उस की कस्मपुर्सी से बिल्कुल नावाक़िफ़ थे। वोह अरब जो बुतों की लाचारी को न समझ पाते हों वोह ह़याते आख़ेरत के क्या मो़अ्‌तक़िद होते।

यक़ीनन येह बात त़अज्जुब ख़ेज़ है कि उन लोगों ने उस घर को बुतों से सजाया था जिसे ह़ज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने ख़ुदा के ह़ुक्म से ख़ुदा के लिए त़अ्‌मीर किया था।

(मेलल-ओ-ने़हले शह्रिस्तानी, जि॰ २; तारी़खे य़अ्‌क़ूबी, जि॰ १, स॰ २२४)

ईरान

उस वक़्त ईरान में भी मु़ख्तलिफ़ मज़ाहिब का वजूद था लेकिन अक्सरीयत जिस दीन-ओ-मज़हब की मो़अ्‌तक़िद थी वो ‘ज़रतुश्त’ था और यही ईरान की ह़ुकूमत का दीन था।

अगर येह तस्लीम भी कर लिया जाए कि ‘ज़रतुश्त’ ख़ुदा के पैग़म्बर थे और उन्होंने ‘तौ़हीद’ की बुनियाद पर दीन की इमारत उस्तवार की थी लेकिन येह भी ह़क़ीक़त है कि उनकी त़अ्‌लीमात ज़माने की दस्ते बुर्द (बेजा तसर्रुफ़) से म़हफ़ूज़ न रह सकींं। और इस में इतनी त़हरीफ़ की गई कि रफ़्ता-रफ़्ता येह दीन ह़ुक्मराँ तब़्के के मफ़ाद का ज़ामिन हो गया। और उस की शक्ल-ओ-सूरत सब ही बदल गई।

इस दीन के ख़ुशनुमा और पुर म़ग्ज़ उसूल एक पर्दा बन गए जिसकी आड़ लेकर मज़हबी रहनुमा जिस तरह़ चाहते उन उसूल की त़प्‌Àसीर-ओ-तौजीहात बयान करते। हर त़प्‌Àसीर अपने मफ़ाद और ह़ुक्मराँ के मफ़ाद के त़ह़फ़्फ़ुज़ के लिए होती। यहाँ तक कि तौ़हीद की जगह शिर्क ने ले ली। दीन की सिर्फ़ ज़ाहिरी सूरत बाक़ी रह गई और अंदर से दीमक चाट गई।

‘आर्या’ क़ौम के पुराने ख़ुदाओं ने ज़रतुश्त मज़हब में दुबारा जन्म लिया।

आर्या क़ौम के बहुत पुराने ख़ुदा बनाम ‘बाज़ारता’ उन ख़ुदाओं का दुबारा ज़हूर ‘यश्त’ (Yasht) की किताब ओस्ता में हुआ। इसी तरह़ हवा के ख़ुदा ‘वायु’ (Vayu) का भी ज़हूर हुआ लेकिन सबसे ज़्यादा अहम ख़ुदाए रह़्मत ‘मिथरा’ (Mithra) है जिसका ज़िक्र ओस्ता के आख़िरी दस्तावेज़ात में अज्मत के साथ किया गया है। लोगों ने मिथरा को ख़ुदाए नूर और रोशनी जाना है जो सच्चों को सवाब देता है और जो उस से मदद का तालिब हो उस की मदद करता है। ‘मिथरा’ की अज्मत इतनी ज़्यादा ब़ढ गई कि ज़रतुश्ती कहने लगे कि अह्‌रमन-ओ-य़ज्दान भी उस की बारगाह में क़ुर्बानी पेश करते हैं। ईरानियों ने अह्‌रमन-ओ-य़ज्दान के लिए सिर्फ़ शरीक ही क़रार न दिए बल्कि वोह ए़अ्‌तेक़ाद की मंज़िल में भी पुराने आर्याइयों से आगे गए।

सूरज और आग की भी परस्तिश का रवाज था, इसी लिए जब सासानी किसी ईसाई आलिमे दीन को ईसाइयत छोड़ने पर मजबूर करते थे तो उस से दूसरे ख़ुदाओं की एबादत के अलावा येह भी अह्द लेते थे कि वोह सूरज की भी पूजा करेगा।

शहज़ादए दुवुम ने ‘सीमों बरसई’ से कहा उस की जान उस वक़्त बख़्श सकता है जब वोह सूरज की मद़ह-ओ-सना करे।

(ईरान दर ज़माने सासानियान, स॰ १६४)

किताब ‘सददर’ जिसमें ज़रतुश्ती मज़हब के अ़हकाम की तशरी़ह की गई है। येह मिलता है किः

‘तमाम हम मज़हब अ़प्‌Àराद के लिए ज़रूरी है कि रोज़ाना तीन मर्तबा सूरज की परस्तिश करें और उसी तरह़ चाँद और आग की भी परस्तिश करें। लेहाज़ा दीन में इन चीज़ों की एबादत करना वाजिब है।

(किताब (सददर) दर ९५, स॰ १२४)

रूम

उस वक़्त रूम की ह़ालत ईरान से कुछ बेहतर न थी, रूम में भी ईसाइयत त़हरीफ़ हो चुकी थी। तौ़हीद की जगह शिर्क और तस्लीस का एज़ाफ़ा कर दिया गया था।

फ्रांस, बर्तानिया और स्पेन में भी ख़ुदाए वाह़िद का अक़ीदा न था।

हिन्दुस्तान में तरह़ तरह़ के दीन राएज थे लेकिन सबसे ज़्यादा बुत परस्ती का रवाज था।

तबक़ाती इ़ख्तेलाफ़ और नस्ली इम्तेयाज़

ईरान में लोगों को तबक़ात में तक़्सीम कर दिया गया था। हर तबक़ा ख़ास इम्तेयाज़ का मालिक था। सबसे ज़्यादा मुम्ताज़ वोह तबक़े थे जो ह़ुकूमते वक़्त से ऩज्दीक थे।

मशहूर मुवर्रि़ख तबरी के बक़ौलः तबक़ात के दरमियान इतना ज़्यादा फ़ासला था कि ‘अनूशीरवान’ के ज़माने में भी मज़दूर तब़के के लिए लिखने प़ढने की आज़ादी न थी।

येह त़प्‌Àरीक़ उस वक़्त इस क़द्र नुमायाँ थी, जब अनूशीरवान की इल्म दोस्ती और अदालत गुस्तरी का चर्चा सुन कर रूम के फ़लास्‌फ़ा ने ईरान में पनाह ली तो वोह इस त़प्‌Àरीक़ को बर्दाश्त नहीं कर पाए और ईरान से वापस चले गए।

(ईरान दर ज़माने सासानियान, तालीफ़ प्रोफ़ेसर क्रिस्टनसन, तर्जुमा रुशैद यासमी, स॰ ४६०)

फ़िरदौसी ने अपने शाहनामा में इस त़प्‌Àरीक़ की मंज़रकशी की हैः

‘ग़मोरियह’ और ‘ह़लब’ के दरमियान अनूशीरवान की फ़ौज और सिपाहे रूम में ज़बरदस्त जंग छड़ी थी। जब जंग की आग भ़डकते भ़डकते ईरान की छावनी ‘कि़ल़अए सक़ीला’ के दरवाज़े तक पहुँच गई तो उस वक़्त ईरान के तीन लाख सिपाही पैसे की कमी और अस्लह़े की कि़ल्लत से फ़रियाद बलंद करने लगेः इस वक़्त फ़ौज को पैसाें की स़ख्त ज़रूरत है और जंगी घोड़े और दीगर वसाएले जंग की फ़ौरी ़ह़ाजत है।

जब येह ख़बर अनूशीरवान तक पहुँची तो वोह सोच में पड़ गया जिसने उसे मरीज़ कर दिया। उसने अपने वज़ीर ‘बुज़ुर्ग मेह्र’ को बुलाया और कहाः

फ़ौरन ‘माज़ंदरान’ (येह माज़ंदरान  मौजूदा माज़ंदरान के अलावा है) चले जाओ और खज़ाने में जो कुछ है ले आओ।

वज़ीर को शिकस्त सर पर मंडलाती नज़र आ रही थी। माज़ंदरान की मसाफ़त काफ़ी तूलानी थी जिसकी बेना पर वज़ीर को येह ख़तरा था कि माज़ंदरान से आते आते कहीं शिकस्त न हो जाए। लेहाज़ा उसने अनूशीरवान कहाः

बादशाह! ख़ज़ाने तक जाने में काफ़ी वक़्त लगेगा जब कि फ़ौज को फ़ौरी ज़रूरत है मेरी राय येह है कि अगर आप मुनासिब समझें तो यहीं किसी ऩज्दीक शह्र के रुअसा से क़र्ज़ ले लिया जाए और इस तरह़ इस मुश्किल से नजात ह़ासिल की जाए।

अनूशीरवान ने वज़ीर की राय से इत्तेफ़ाक़ किया और कहा कि फ़ौरन किसी को भेज कर क़र्ज़ा ह़ासिल कर लिया जाए।

बुज़ुर्ग मेह्र ने एक वजीह और अक़्लमंद शख़्स को मुंतख़ब किया और ऩज्दीक ही एक शह्र की तरफ़ रवाना कर दिया ताकि वोह वहाँ के रुअसा से क़र्ज़ ह़ासिल करे।

नुमाइंदा शह्र पहुँचा और तलाश करते हुए एक बू़ढे मोची के पास पहुँचा जो मज़दूर तब़के से त़अल्लुक़ ज़रूर रखता था मगर सारी ज़रूरतें पूरा करने की क़ुदरत रखता था। वोह ख़ुशी ख़ुशी राज़ी हो गया लेकिन उस की एक तमन्ना येह थी कि बादशाह उस के इकलौते फर्ज़ंद को त़अ्‌लीम ह़ासिल करने की इजाज़त दे दे जो उस वक़्त ऊँचे तब़के का ह़क़ थी।

नुमाइंदे ने वापस आकर बुज़ुर्ग मेह्र के सामने सारा क़िस्सा बयान कर दिया। बुज़ुर्ग मेह्र अनूशीरवान के पास गया और सारा क़िस्सा दोहरा दिया।

अनूशीरवान ने उस बू़ढे मोची की इस तमन्ना को तौहीन म़हसूस किया और कमाले बे-ह़याई के साथ उस की येह तमन्ना रद्द कर दी और अपनी स़ख्त ज़रूरत के बावजूद भी उस के क़र्ज़े की पेशकश को क़बूल न किया। ग़ुस्से के आलम में बुज़ुर्ग मेह्र से कहने लगा तुम्हारी अक़्ल पर पत्थर पड़ गया है क्या? फ़ौरन उस नुमाइंदे को वापस बुलाओ कहीं वोह उस से क़र्ज़ ह़ासिल न कर ले। अब तो येह नौबत आ गई है कि निचले तब़के के अ़प्‌Àराद अपनी औलाद को त़अ्‌लीम दिलाने की तमन्ना करें ताकि जब वोह त़अ्‌लीम ह़ासिल कर लें और हमारी औलाद त़ख्त नशीन हो तो उस पर बरतरी ह़ासिल करे। ब़अ्‌द में आने वाली नस्लें हमें किस नाम से याद करेंगी सिवाए हम पर ल़अ्‌नत के।

(शाहनामा फ़िर्दौसी, तब़अ्‌ हिजरी अमीर बहादुर ख़ते एमादुल किताब १३२६ ह़ि॰)

येह वा़के़आ तबक़ात के दरमियान इ़ख्तेलाफ़-ओ-इम्तेयाज़ को ब़खूबी बयान कर रहा है। यही कुछ ह़ालत उस वक़्त रूम और हिन्दुस्तान की भी थी ऊँचे तबक़े के लिए सारे वसाएल फ़राहम थे और निचला तबक़ा हर सहूलत से म़हरूम था।

उस वक़्त लोग नस्ली इम्तेयाज़ पर फ़ख़्‌र-ओ-मुबाहात करते थे और अपने को दूसरों से बलंद-ओ-बाला जानते थे (यही सूरते ह़ाल इस वक़्त भी है मगर पहले से कुछ कम)।

औरत की मन्ज़ेलत इस्लाम से क़ब्ल

अरब

इन्सान दूसरी तमाम चीज़ों की तरह़ औरत का भी मालिक होता था। बेटे को जहाँ और चीज़ें बाप से विरसे में मिलती वहाँ औरत भी मिलती थी। औरत, बाप, बेटे या शौहर की मिल्कियत होती थी।

(तारी़ख वेल डूरांट, जि॰ ११, स॰ ८)

लड़कियाँ उनके लिए बा़इसे ज़िल्लत थीं। ब़अ्‌ज़ क़बीला तो लड़की को इस क़द्र बा़इसे ल़अ्‌नत समझते थे कि उस को ज़िन्दा द़पन कर देते थे।

(सूरए ऩह्ल, आयत ५९, तारी़ख वेल डूरांट, जि॰ ११, स॰ ७)

ईरान

पस्त तबक़ाती निज़ाम ने औरत के साथ कोई अच्छा सुलूक न किया था हर एक की तरह़ उस के भी ह़ुक़ूक़ पामाल किए जा रहे थे।

यूनान

औरत नजिसुल ऐन तसव्वुर की जाती थी। उस को शैतान की औलाद जानते और मुजस्सम जानवर समझते थे।

हिन्दुस्तान

यहाँ भी औरत की ह़ालत दूसरी जगहों से बेहतर न थी। औरत हमेशा बाप शौहर या बेटे की ग़ुलाम रहती थी, इस के लिए ज़रूरी था कि वोह अपने शौहर को आक़ा कह कर ख़ेताब करे। और अगर उस की ज़िन्दगी में शौहर का इंतेक़ाल हो जाता था तो उस को भी इस के साथ ज़िन्दा जला दिया जाता था।

जापान

औरतें ता-ज़िन्दगी, बाप, बेटे या शौहर की सरपरस्ती में ज़िन्दगी बसर करती थीं। लड़कियों के लिए वेरासत में कोई जगह न थी।

चीन

बाप को येह क़ुदरत ह़ासिल थी कि वोह अपनी ज़ौजा और औलाद को ग़ुलाम बना कर फ़रो़ख्त कर सकता था। बसा-औक़ात वोह क़त्ल भी कर सकता था।

वेल डूरांट ने चीन के क़दीमी शा़एर का एक क़त़अ्‌ नक़्ल किया है जिससे औरत की ह़ैसियत का ब़खूबी अंदाज़ा हो जाता है। क़त़अ्‌ का म़पहूम येह हैः

औरत होना किस क़द्र ग़म अंगेज़ है।

ज़मीन पर कोई भी चीज़ औरत से सस्ती नहीं है।

जिस वक़्त लड़की पैदा होती है उस वक़्त किसी के भी चेहरे से ख़ुशी नज़र नहीं आती है। किसी के लब पर मुस्कुराहट नहीं खेलती।

(तारी़खे तमद्दुन - वेल डूरांट, तीसरी फ़स्ल, स॰ १०६३-१०६८)

उस समाज में औरत की कोई भी व़व्‌Àअत न थी तभी तो उस को बयाबानों में भेड़िये के ़ह़वाले कर देते थे।

रूम (रोम)

यहाँ भी औरत को बुराइयों का पुतला जाना जाता था और बच्चों की तरह़ उस की भी निगरानी ज़रूरी समझी जाती थी।

उस वक़्त सारी दुनिया फ़ित्ना-ओ-फ़साद की तारीकी में डूबी हुई थी कहीं भी कोई रोशनी नज़र नहीं आ रही थी, गरचे फ़ितरत की तहों में इस्ला़ह की शम़अ्‌ टिमटिमा रही थी लेकिन कभी शहवत और ज़ुल्म-ओ-सितम की सियाही में एक तरफ़ से और दूसरी तरफ़ से फ़क़्र-ओ-फ़ाक़ा की फ़लाकत बाज़ फ़ेज़ा में खो गई थी। येह फ़ितरी आर्ज़ू इस क़द्र बे-नूर हो गई थी जो रहरवाने राहे रास्त की रहनुमाई करने से क़ासिर थी। घटाटोप अँधेरा सारी ज़िन्दगी को अपनी लपेट में लिए था सारी दुनिया उसी तारीकी में सर धुन रही थी चारों तरफ़ ज़ुल्मत इस क़द्र फैली हुई थी जिसे सिर्फ़ चमकता दमकता सूरज ही दूर कर सकता था।

सारी दुनिया से ज़्यादा अरब में तारीकी थी जहाँ हर तरफ़ अँधेरा ही अँधेरा था। गोया येह लोग पस्ती और फ़साद की आख़िरी हद को पहुँच गए थे।

उस वक़्त की अक्कासी ह़ज़रत अली इब्ने अबी तालिब अलैहेमस्सलाम ने इन अल्फ़ाज़ में फ़रमाई हैः

ऐ गिरोहे अरब तुम इस से पहले बदतरीन दीन की पैरवी करते थे और बदतरीन जगह ज़िन्दगी गुज़ार रहे थे। संगलाख़ वादियों और साँपों के दरमियान दिन गुज़ार रहे थे। ऐसे साँप जो बहरे थे। किसी आवाज़ का उन पर कोई असर न होता था।

तुम गंदा पानी पीते थे, ख़राब ग़ेज़ा इस्ते़अ्‌माल करते थे, एक दूसरे का ख़ून बहाते थे और रिश्तेदारों से दूर रहते थे।

बुत की परस्तिश करते थे और गुनाहों में मुलव्विस रहते थे।

(नह्जुल बला़गा, स॰ ६८, ख़ुतबा २६, सुब़्ही साले़ह)

पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.) की वेलादत

ह़ज़रत मो़हम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम की वेलादत १७ रबी़उल अव्वल ५७० ई॰र् िह़जरत से ५३ साल क़ब्ल मक्कए मो़अ़ज्ज़मा में हुई।

आपके वालिद जनाब अब्दुल्लाह, जनाब इस्माईल अलैहिस्सलाम की नस्ल से त़अल्लुक़ रखते थे। आपका इंतेक़ाल आँह़ज़रत की पैदाइश से पहले ही हो गया था। आपकी वालिदए माजेदा जनाब आमना अपने वक़्त की पार्सा तरीन ख़ातून थीं।

आँह़ज़रत (स.अ.) को पाकीज़ा तरीन औरत जनाब ह़लीमा के सिपुर्द किया गया ताकि वोह आपको दूध पिलाएँ और साथ ही साथ देख-भाल भी रखें।

अभी आँह़ज़रत चार साल के नहीं हुए थे कि जनाब ह़लीमा से फ़र्माइश की कि अपने रज़ाई (दूध शरीकी) भाईयों के हमराह सहरा जाएँगे। जनाब ह़लीमा का बयान है कि मैंने दूसरे दिन आँह़ज़रत को नहलाया बालों को सँवारा आँखों में सुर्मा लगाया और एक यमनी पत्थर (येह एक यमनी पत्थर है जिस में सफ़ेद, ज़र्द और सु़र्ख तिल होते हैं येह पत्थर अक़ीक़ की कान में पाया जाता है - फ़रहंगे उमैद) आँह़ज़रत के गले में लटका दिया ताकि सहराई भूत आपको कोई गज़ंद न पहुँचाने पाएँ। लेकिन आँह़ज़रत ने इस को उतार दिया फ़रमायाः मादरे गेरामी आप मुत्मइन रहें मेरा ख़ुदा मेरे साथ है जो मेरी ह़ेफ़ाज़त करेगा।

(बेह़ारुल अनवार, जि॰ १५, स॰ ३९२, तब़अ्‌ जदीद)

इब्तेदा ही से रह़्मते इलाही आँह़ज़रत (स.अ.) के शामिले ह़ाल थी। मुसलसल फ़रिश्तों के ज़री़ए आपकी मदद होती रही और तमाम ग़लत बातों के सुधार के लिए आपको इल्हाम किया जाता रहा।

आँह़ज़रत की रफ़्तार-ओ-गु़पतार ने बचपने ही में लोगों को अपना गिरवीदा बना लिया था। अय्यामे जवानी में भी आप तमाम जाहिली आदाब-ओ-रुसूम से दूर रहे। कभी भी किसी ब़ज्मे गज़ल-ख़ानी, महफ़िले रक़्स-ओ-सुरूद में शिरकत नहीं की। शराब मुँह न लगाई, बुतों को हमेशा दुश्मन समझा, आप रास्त बाज़ और रास्त किरदार थे। ए़अ्‌लाने नबूवत से बरसों क़ब्ल लोग आपको ‘अमीन’ के लक़ब से याद करते थे। पाक-दिल, रोशन फ़िक्र और इलाही ख़ूबियों के मालिक थे। हर साल एक महीना ़गारे ह़ेरा में रहते थे और अपने ख़ुदा से राज़-ओ-नियाज़ की बातें करते थे। एक माह के ब़अ्‌द जब ़गारे ह़ेरा से बाहर आते तो घर जाने के बजाए ख़ानए क़़अ्‌बा का तवाफ़ करते थे उस के ब़अ्‌द घर तश्रीफ़ ले जाते थे।

चालीस साल की उम्र में जब आप ़गारे ह़ेरा में एबादत में मश़गूल थे उस वक़्त आपको मबऊस ब-रेसालत किया गया।

तीन साल तक आप पोशीदा तौर से तब्लीग़ करते रहे इस मुद्दत में बहुत कम लोग ईमान लाए। मदोर्ं में ईमान लाने वाले ह़ज़रत अली इब्ने अबी तालिब अलैहेमस्सलाम थे और औरतों में जनाब ख़दीजतुल कुब्रा की ज़ाते गेरामी थी।(तारी़खे तबरी जि॰ ३, स॰ ११५९) तीन साल ब़अ्‌द आपको येह ह़ुक्म मिला कि आप खुले आम लोगों को दीने इलाही की द़अ्‌वत दें। इस लिए आपने अपने अ़इ़ज्ज़ा को रात के खाने पर द़अ्‌वत दी, ४० अ़प्‌Àराद इस द़अ्‌वत में शरीक थे। लेकिन आँह़ज़रत ने द़अ्‌वत के लिए खाना जो तैयार कराया था वोह सिर्फ़ एक आदमी की ग़ेज़ा से ज़्यादा न था। लेकिन ख़ुदा के फ़़ज्ल से इस मु़ख्तसर सी ग़ेज़ा से सब सैर हो गए। येह देखकर अबूलहब ने बग़ैर सोचे समझे कह दिया किः ‘मो़हम्मद जादूगर है।’ इस दिन क़ब्ल इस के कि आँह़ज़रत कुछ बयान फ़रमाते सारे रिश्तेदार उठकर चले गए। आँह़ज़रत ने दूसरे दिन फिर उन लोगों को द़अ्‌वत दी। दूसरे दिन खाना तमाम होने के ब़अ्‌द आँह़ज़रत ने उनसे कहाः ऐ फ़र्रज़ंदाने अब्दुल मुत्तलिब किसी भी क़ौम में कोई भी जवान उस चीज़ से बेहतर कोई चीज़ नहीं लाया है जो मैं तुम्हारे लिए लाया हूँ। मैं तुम्हारे लिए दुनिया-ओ-आख़ेरत की नेकी लेकर आया हूँ। मुझे ख़ुदा की तरफ़ से येह ह़ुक्म मिला कि मैं तुम्हें उस की तरफ़ बुलाऊँ, तुम में से कौन है जो मेरी मदद करे ताकि मेरा भाई और जानशीन क़रार पाए?

ह़ज़रत अली अलैहिस्सलाम के अलावा किसी ने कोई जवाब न दिया। अली अलैहिस्सलाम ने नुसरत का व़अ्‌दा किया। आँह़ज़रत ने अली अलैहिस्सलाम के शानों पर हाथ रखकर फ़रमाया येह मेरा भाई है, येह मेरा वसी है तुम्हारे दरमियान, इस की बातें सुनो और इस की एता़अत करो।

(तारी़ख तबरी जि॰ ३, स॰ ११७१, स॰ ११७३. मज्म़उल बयान, जि॰ ७, स॰ २०६)

एक रोज़ आप कोहे सफ़ा पर तश्रीफ़ ले गए और लोगों को अपने पास बुलाया और उनसे फ़रमायाः लोगो अगर मैं तुमसे येह कहूँ कि दुश्मन तुम्हारी घात में है, जो सुब्ह या शाम किसी वक़्त ह़मला कर सकता है। तो क्या तुम मेरी बात का यक़ीन करोगे, सबने मिलकर कहा हाँ, यक़ीनन। आप ने फ़रमायाः मैं तुम्हें उस स़ख्त अज़ाब से डरा रहा हूँ जो तुम पर नाज़िल होने वाला है। इस ख़ौफ़ से कि कहीं ह़ज़रत (अ.स.) की बात लोगों पर असर अंदाज़ न हो जाए, फ़ौरन अबू लहब ने कहा आपने यही बात सुनाने के लिए हमें बुलाया था।

आँह़ज़रत ने अपनी द़अ्‌वत का आग़ाज़ कलमए तौ़हीद से फ़रमाया। तौ़हीद ही को तमाम अक़ाएद की बुनियाद क़रार दिया, लोगों को उस ख़ुदा से वाकि़फ़ कराया जो उनकी बनिस्बत उनसे ज़्यादा ऩज्दीक है। तमाम क़िस्म की बुत परस्ती और शिर्क को ग़लत क़रार दिया। मक्का की फ़ेज़ा में अज़ीम इन्क़ेलाब बर्पा कर दिया लोगों के अ़पकार अपने दीन की तरफ़ मोड़ दिए, गरचे क़ुरैश इस्लाम की तरक़्क़ी से स़ख्त नाराज़ थे। आँह़ज़रत (स.अ.) को तब्लीग़ से बाज़ रखने की हर मुम्किन कोशिश की और कभी आँह़ज़रत (स.अ.) के क़त्ल का भी मन्सूबा बनाया लेकिन ख़ुदावंद आलम की नुसरत-ओ-मदद और आँह़ज़रत (स.अ.) के सबाते क़दम से क़ुरैश की हर कोशिश नक़्श बर आब साबित हुई। इस्लाम रोज़-अ़पज़ूँ तरक़्क़ी करता गया यहाँ तक कि मक्का से बाहर वाले भी इस्लाम के मो़अ्‌तक़िद होने लगे और लोग जान की बाज़ी लगा कर दीन इलाही क़बूल करने लगे।

बे़अ्‌सत के ग्यारहवें साल ‘क़बीलए ख़ज़रज’ के कुछ अ़प्‌Àराद ह़ज की ग़र्ज़ (़गरज़) से मदीना से मक्का आए। पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.) ने उन्हें दीने मुक़द्दस इस्लाम की द़अ्‌वत दी जिसको उन्होंने क़बूल कर लिया और साथ ही साथ येह व़अ्‌दा भी किया जब हम अपने वतन मदीना वापस जाएँगे तो लोगों को आपके दीन की द़अ्‌वत देंगे। येह लोग मदीना वापस आए और पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.) का पैग़ाम सारे मदीना में नश्र कर दिया। दूसरे साल मदीना के १२ अ़प्‌Àराद ने ‘अक़बा’ के मुक़ाम पर आँह़ज़रत (स.अ.) के हाथों पर बै़अत की और येह इक़रार कियाः कभी शिर्क नहीं करेंगे, चोरी नहीं करेंगे, ज़ेना नहीं करेंगे, अपनी औलाद को क़त्ल नहीं करेंगे, किसी पर तोह्मत नहीं लगाएँगे और जिस चीज़ का आँह़ज़रत (स.अ.) ह़ुक्म देंगे उस पर अमल करेंगे। उस वक़्त आँह़ज़रत (स.अ.) ने ‘मुस़अब’ नामी जवान को क़ुरआन की त़अ्‌लीम देने के लिए उनके हमराह मदीना भेजा। इस तरह़ मदीना का भारी गिरोह आपका गिरवीदा और दीन इस्लाम का मो़अ्‌तक़िद हो गया।

हिजरत

पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.) बे़अ्‌सत के तेरहवें साल तक मक्का में रहे और लोगों को दीन इस्लाम की द़अ्‌वत देते रहे। बहुत ही पामर्दी और सबाते क़दम के साथ क़ुरैश के तमामतर मज़ालिम का मुक़ाबला करते रहे। हर तरह़ से शिकस्त खाने के ब़अ्‌द क़ुरैश ने आँह़ज़रत (स.अ.) के क़त्ल का अजीब-ओ-ग़रीब नक़्शा तैयार किया। लेकिन आँह़ज़रत के एक़दाम ने इस नक़्शा पर भी पानी फेर दिया। आँह़ज़रत (स.अ.) ने ह़ुक्मे ख़ुदा से ह़ज़रत अली अलैहिस्सलाम को अपने बिस्तर पर सुलाया और रात ही रात मक्का से कूच कर गए। पहले ग़ारे ह़ेरा में पनाह ली फिर वहाँ से मदीना की तरफ़ रवाना हो गए।

आँह़ज़रत (स.अ.) की हिजरत ने तारी़खे इस्लाम में एक नए बाब का एज़ाफ़ा किया जिसके सबब बहुत ही नुमायाँ कामियाबी इस्लाम को नसीब हुई और यही हिजरत मुसलमानों की तारी़ख की इब्तेदा क़रार पाई।

क़बीलए औस-ओ-ख़ज़रज की पुरानी जंग आँह़ज़रत (स.अ.) की बरकत से ख़त्म हो गई और इस्लामी त़अ्‌लीमात ने देरीना दुश्मनों को एक दूसरे का भाई बना दिया, बर सरे पैकार रहने वाले क़बीले एक दूसरे का त़आवुन करने लगे और दोनों एक दूसरे के गहरे दोस्त हो गए।

आँह़ज़रत (स.अ.) के किरदार की बलंदी, पाकीज़गी, आपकी अख़्लाक़ी ख़ुसूसीयात, रू़हानी सिफ़ात, और दीने इस्लाम की फ़ितरी त़अ्‌लीमात इस का सबब हुईं कि लोग गिरोह दर गिरोह इस्लाम क़बूल करने लगे और इस्लाम का दाएरा वसी़अ्‌ होता गया।

पैग़म्बर (स.अ.) उन्हीं लोगों में से थे और उन्हीं के साथ रहते थे। आँह़ज़रत (स.अ.) ने कभी भी लोगों से दूरी इख़्तेयार न की। आँह़ज़रत (स.अ.)लोगों के नुक़सान-ओ-फ़ाएदे में बराबर के शरीक रहे। आप ज़ुल्म-ओ-त़अद्दी के स़ख्त मुख़ालिफ़ थे और लोगों को ज़ुल्म-ओ-जौर से मऩअ्‌ करते थे। औरतों के लिए हर वोह क़ानून बयान कर दिया जिससे उनकी शख़्सीयत रुश्द करती और उन्हें तरकि़्क़याँ नसीब होतीं। आपने उन तमाम मज़ालिम की रोक-थाम की जो इस्लाम से पहले औरतों के ह़क़ में रवा समझे जाते थे लेकिन इसी के साथ साथ बे आफ़ती और बेक़ैद-ओ-शर्त आज़ादी के भी स़ख्त मुख़ालिफ़ थे। आपकी तमन्ना येह थी कि औरतें इस्लामी क़वानीन के साए में रुश्द-ओ-कमाल ह़ासिल करें और इस्लामी ह़ुदूद में रह कर तरकि़्क़याँ करें।

ग़ुलामों के हुक़ूक़ का देफ़ा़अ्‌ आप अपना फ़रीज़ा समझते थे। ग़ुलामों की आज़ादी के लिए एक जामेअ क़ानून बयान किया। आँह़ज़रत (स.अ.) ने एक ऐसे आलीशान समाज की तश्कील की जिसमें सफ़ेद-ओ-सियाह, अमीर-ओ-ग़रीब, बड़ा-छोटा, अरब, अजम, क़ुरैश ग़ैर क़ुरैश सब बराबर थे, इन्साने वाक़ई बनने के लिए इम्कानात हर एक के लिए बराबर से फ़राहम थे, हर शख़्स अपनी इन्सानियत से पूरा पूरा फ़ाएदा उठा सकता था। येह एक ऐसा समाज था जहाँ नस्ली, ख़ानदानी..... इम्तेयाज़ का कोई सवाल न था। जहाँ मेअयारे फ़ज़ीलत, इ़ज्ज़त, बुज़ुर्गी, सिर्फ़ तक़्वा, इल्म, इन्सानी सिफ़ात और अख़्लाक़ी बलंदियाँ थीं। गोरे काले का फ़़र्क न था, ज़ात पात का झगड़ा न था। शराफ़त का मेअयार परहेज़गारी थी।

ज़ैल की दास्तान समाज की बलंदी की अक्कासी कर रही है। येह उस समाज का सिर्फ़ एक नमूना है जिसकी बुनियाद पर पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.) की त़अ्‌लीमात हैं ।

‘जुवैबर’ एक ग़रीब जवान थे, कोई ख़ास सूरत न थी बल्कि किसी हद तक बदसूरत थे। इस्लाम के शौक़ में मदीना आए थे और इस्लाम क़बूल कर लिया था।

आँह़ज़रत (स.अ.)ने शुरू़अ्‌ शुरू़अ्‌ में उनको मस्जिद में जगह दी ब़अ्‌द में उस साएबान में जगह दी जिसे सु़पफ़ा कहा जाता है।

एक रोज़ पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.) ने जुवैबर से फ़रमायाः क्या अच्छा होता जो तुम शादी कर लेते अपनी पाक दामनी को म़हफ़ूज़ रखते और मुऩज्ज़म तरीक़े से ज़िन्दगी बसर करते।

मेरे माँ बाप आप पर फ़ेदा हो जाएँ मैं गरीबुल वतन, फ़क़ीर और बदसूरत हूँ, कौन लड़की मुझे पसंद करेगी और कौन मेरी हमसर बनने के लिए राज़ी होगी जब कि मैं किसी अ़अ्‌ला ख़ानदान से त़अल्लुक़ भी नहीं रखता हूँ।

जुवैबर! इस्लाम ने तमाम जाहिली आदाब-ओ-रुसूम को ख़त्म कर दिया है; शराफ़त का वोह मेअयार न रहा जो इस्लाम से पहले था। गोरे, काले, अरब, अजम सब के सब ह़ज़रत आदम की औलाद हैं और ख़ुदावंद आलम ने आदम को मिट्टी से पैदा किया था। लेहाज़ा आज के दिन सियाही-ओ-सफ़ेदी. ..... शरफ़-ओ-फ़ज़ीलत का सबब नहीं है बल्कि नक़्स-ओ-ऐब भी नहीं है।

ख़ुदावंद आलम के ऩज्दीक सबसे ज़्यादा बाइ़ज्ज़त वोह है जो सबसे ज़्यादा मुत्तक़ी और परहेज़गार हो।

बस अभी ज़ेयाद के घर जाओ और उनकी लड़की ‘ज़ुल्फ़ा’ को मेरी तरफ़ से अपने लिए ख़ास्तगारी (शादी) करो।

जुवैबर ने वही किया जो पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.) ने ह़ुक्म दिया था लेकिन ज़ेयाद को जो मदीना के अ़अ्‌ला फ़र्द थे यक़ीन न आया और कहाः

हम अपनी लड़कियों की शादियाँ अपने जैसे ख़ानदान-ओ-क़बीला में करते हैं और पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.) को इस बात का बाक़ा़एदा इल्म है। लेहाज़ा तुम वापस जाओ। मैं ख़ुद पैग़म्बर (स.अ.) की ख़िदमत में हाज़िर होता हूँ और म़अ्‌ज़रत पेश करता हूँ।

जुवैबर वापस हो गए लेकिन ग़ुस्सा में ज़ोर ज़ोर येह कह रहे थे ‘ख़ुदा की क़सम!’ न क़ुरआन ने ऐसा कहा है और न पैग़म्बर (स.अ.) ने ऐसा ह़ुक्म दिया है कि अपनी लड़कियों की शादियाँ अपने जैसे ख़ानदानों में करो।’

जुवैबर की आवाज़ ‘ज़ुल्फ़ा’ ने सुन ली, बाप को बुला कर दरियाफ़्त कियाः आपने उस जवान से क्या कहा जो उसे ग़ुस्सा आ गया?

वोह मुझसे कह रहा था ‘पैग़म्बर (स.अ.) ने मुझे आपके पास भेजा है कि अपनी लड़की की शादी मेरे साथ कर दीजिए।’

जुवैबर झूठ नहीं बोल सकते। आप उन को वापस बुलाइए और ख़ुद पैग़म्बर (स.अ.) की ख़िदमत में जाकर दरियाफ़्त कीजिए ताकि बात साफ़ हो जाए।

ज़ेयाद ने लड़की के कहने पर अमल किया। म़अ्‌ज़रत करके जुवैबर को वापस बुलाया और ख़ुद पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.) की ख़िदमत में गए और कहाः

जुवैबर आपकी तरफ़ से एक पैग़ाम लाए थे। मैं आप की ख़िदमत में येह अर्ज़ करना चाहता हूँ कि हम लोग अपनी लड़कियों की शादियाँ सिर्फ़ अपने जैसे ख़ानदानों में करते हैं।

जुवैबर बाईमान शख़्स है बाईमान मर्द के लिए हम-शान बाईमान औरत है उस को अपनी लड़की का शौहर मुंतख़ब कर लो।

ज़ेयाद वापस घर पहुँचे और सारा वा़के़आ लड़की से दोहरा दिया।

लड़की ने कहा बाबा जान! पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.) के ह़ुक्म की ना-फ़रमानी कु़पर है। मैं ख़ुशी से हाज़िर हूँ। आप जुवैबर को अपना दामाद बना लीजिए।

ज़ेयाद जुवैबर को लेकर अपने ख़ानदान के अ़प्‌Àराद के पास आए और इस्लामी क़वानीन के मुताबिक़ अपनी लड़की से उनका निका़ह कर दिया। बल्कि लड़की का मह्र भी अपने पास से अदा किया और एक सजा सजाया घर भी उनको दिया ताकि हंसी ख़ुशी अपनी ज़िन्दगी गुज़ार सकें।

(फ़ुरू़ए काफ़ी, जि॰ ५, किताबे निका़ह, स॰ ३४०-३४१)

हाँ इस ख़ीरा कर देने वाली रोशनी ने, इस मरकज़े नूर ने, एक ऐसी शम़अ्‌ रोशन की जो पाकीज़ा दिलों को हमेशा राहे तौ़हीद की तरफ़ रहनुमाई करती रहे। और ऐसा हुआ भी, तारीकियों में बसने वाले जब तारीकियों से आजिज़ आ गए तो परवाने की तरह़ इस शम़ए रोशन की तरफ़ आने लगे और क़ुरआने करीम के नूरानी दस्तूर के साए में गिरोह दर गिरोह इस्लाम क़बूल करने लगे।

‘यूनुस वैली’ येह लिखता है कि

‘...... मो़हम्मद एक मुह़ज्ज़ब दीन तमाम दुनिया वालों के लिए लाए, वोह एनायते परवरदिगार के मज़हर थे।

ख़ुदावंद आलम ने उन्हें मबऊस फ़रमाया कि ़ईसाइयों को उनकी गुमराही की तरफ़ मुतवज्जेह करें, बुत तोड़ दें, ईरानियों को तौ़हीद की द़अ्‌वत दें।  उन्होंने ‘ख़ुदा शनासी’ के पाकीज़ा दीन को दीवारे चीन से स्पेन के सािह़ल तक फैला दिया।

मो़हम्मद का दीन इस क़द्र ़आ़केलाना है कि जिसकी तब्लीग़ में तलवार-ओ-ताक़त की ज़रूरत नहीं है। दीनी उसूल लोगों को समझा देना ही काफ़ी है ताकि हर शख़्स जान-ओ-दिल से उस का गिरवीदा हो जाए। उसूले दीन अक़्ले सलीम से इस क़द्र हमआहंग है कि निस्फ़ सदी से कम की मुद्दत में आधी दुनिया के बाशिंदों के दिलों में नुफ़ूज़ कर गया था।

(ज़िंदगीये मो़हम्मद, स॰ १७७)