इस्लाम इब्तेदा ही है आख़िरी पैग़ाम के उन्वान से ज़ाहिर हुआ, मुसलमानों ने अ़क़्ल-ओ-ईमान की रोशनी में इस ह़क़ीक़त को बाक़ा़एदा तस्लीम किया कि इस्लाम व़ह्य (व़ही) और नबूवत का जल्वए आख़िर है और गुज़श्ता के तमाम पाकीज़ा अदियान की तकमील कुनंदा बेपनाह आयतों और बे शुमार ह़दीसों की बेना पर तमाम मुसलमान इस बात के मोअ़्तक़िद हैं कि पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ़.) ख़ुदा के आख़िरी पैग़म्बर हैं।
क़ुरआन मजीद ने अपनी मुतअ़द्दिद आयतों में इस्लाम की जामेईयत पर रोशनी डाली है और सराहत से येह बयान किया है कि पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ़.) ख़ुदा के आख़िरी रसूल हैं।
मा का-न मो़हम्मदुन अबा अ-ह़दिन मिन रेजालेकुम वलाकिन रसूलल्लाहे व ख़ा-तमन्नबीयी-न व कानल्लाहो बेकुल्ले शैइन अ़लीमन.
(सूरए अ़हज़ाब, आयत ४०)
मो़हम्मद (स.अ़.) तुम में किसी एक मर्द के बाप नहीं हैं बल्कि वोह ख़ुदा के रसूल हैं और आख़िरी नबी हैं और ख़ुदा हर चीज़ का इल्म रखता है।
पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ़.) ने ह़ज़रत अ़ली अ़लैहिस्सलाम से इर्शाद फ़रमायाः
ऐ अ़ली! तुमको मुझसे वोह तमाम निस्बतें ह़ासिल हैं जो हारून को मूसा से ह़ासिल थीं। हारून मूसा के भाई थे तो तुम भी मेरे भाई हो। अगर हारून मूसा के जानशीन हुए तो तुम भी मेरे जानशीन होगे लेकिन बस फ़़र्क येह है कि मूसा आख़िरी नबी न थे और मैं आख़िरी नबी हूँ।
(या अ़लीयो अन्त मिन्नी बेमंज़ेलते हारू-न मिन मूसा इल्ला अन्नहू ला नबी-य बअ़्दी येह ह़दीस अक्सर मो़हद्देसीन ने ज़िक्र की है। त़प्Àसील के लिए देखें अलग़दीर - जि॰ ३ स॰ १९६-२०२)
आँह़ज़रत (अ़.स.) ने येह भी इर्शाद फ़रमाया
में ऐवान नबूवत की ख़िश्ते (ईंट) आख़िर हूँ मेरे बअ़्द नबूवत का सिलसिला ख़त्म हो जाएगा।
क़ा-ल रसूलुल्लाह सल्लल्लाहो अ़लैहे व आलेही व सल्लम ः मिस्ली व मिस्लुल अंबिया कमिस्ले रजुल बना दारा फ़अक्मलोहा व अ़ह्सनोहा इल्ला मौज़ेआे लिब्नते फ़का-न मन द-ख़-ल व न-ज़-र इलैहा क़ा-ल मा अ़ह्सनोहा इल्ला मौज़ेआे हाज़ेहिल लिब्नते फ़-अना मौज़े़उल लिब्नते ख़-त-म बेयल अम्बिया, मुस्नद अबी दाऊद, स॰ २४७
ह़ज़रत अ़ली अ़लैहिस्सलाम नह्जुल बलाग़ा (इल्म-ओ-दानिश का अथाह समुंदर) में इर्शाद फ़रमाते हैंः
रसूले ख़ुदा सल्लल्लाहो अ़लैहे व आलेही व सल्लम पर व़ही-ओ-नबूवत का ख़ातमा हो गया।
(नह्जुल बलाग़ा -ख़ुतबा १३३)
आठवें इमाम ह़ज़रत अ़ली रज़ा अ़लैहिस्सलाम ने फ़रमायाः
ह़ज़रत मो़हम्मद सल्लल्लाहो अ़लैहे व आलेही व सल्लम का दीन क़यामत तक मंसूख़ नहीं होगा और आँह़ज़रत (स.अ़.) के बअ़्द क़यामत तक कोई पैग़म्बर नहीं आएगा।
(बेह़ारुल अनवार, तबअ़् जदीद जि॰ ११ स॰ ३४)
पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ़.) के आख़िरी नबी और आप (स.अ़.) के दीन की जामे़ईयत और उस की अबदीयत के सिलसिले में हज़ारों ह़दीसें किताबों में मज़्कूर हैं इन ह़दीसों का एक मुख़्तसर सा नमूना आपकी ख़िदमत में पेश किया गया है।
इस्लाम की जामे़ईयत
इस्लाम के अबदी होने का सबसे बड़ा राज़ इस्लाम की ‘जामे़ईयत’ है। इस्लाम एक ऐसा जामेअ़् मंशूर (आईन) है जिसकी बुनियाद इन्सानी फ़ितरत पर रखी गई है। उसने ज़िंदगी के तमाम पह्लूओं इन्फ़ेरादी, इज्तेमा़ई, माद्दी, मअ़्नवी, एअ़्तेक़ादी, जज़्बाती, इक़्तेसादी.... पर राहनुमाई के चराग़ रोशन किए हैं। हर एक उसूल बहुत ही दिलचस्प ह़क़ाएक़ पर मबनी, हर नस्ल के लिए, हर ज़माने के लिए, हर जगह के लिए बयान किया गया है।
यूरोप के इस्लाम शनास दानिशवरों ने अपने मुतालआ और अपनी तहक़ीक़ात के मुताबिक़ इस्लाम की जामे़ईयत का एअ़्तेराफ़ किया है।
(किताब तमद्दुन व उलूमे इस्लामी)
इस्लाम की जामे़ईयत के बअ़्ज़ गोशे बयान किए जा रहे हैंः
ख़ुदा, क़ुरआन और इस्लाम
इस्लाम का ख़ुदा तमाम काएनात का परवरदिगार है! किसी ख़ास क़बीला या क़ौम का ख़ुदा नहीं है ताकि बस उन्हीं तक म़हदूद रहे। नमाज़ में पढ़ते हैं कि अल़हम्दो लिल्लाहे रब्बिल आ-लमी-न (सूरए फ़ाते़हा, आयत २) हम्दो सताइश उस ख़ुदा से मख़्सूस है जो सारी काएनात का परवरदिगार है।
हर वक़्त, हर जगह जो चाहे पैदा कर दे, उस की ज़ात में किसी क़िस्म की म़हदूदियत नहीं है। सारी काएनात पर उस का इख़्तेयार है।
(तबा-रकल्लज़ी बे-यदेहिल मुल्क वहो-व अ़ला कुल्ले शैइन क़दीर, सूरए मुल्क, आयत १)
ज़ाहिर-ओ-बातिन, गुज़श्ता और आइन्दा यहाँ तक कि वोह उन तमाम चीज़ों से भी वाकि़फ़ है जो हमारे दिलों में हैं।
(यअ़्लमो मा फ़िस्समावाते वल अज़े यअ़्लमो मा तोसिर्रू-न व मा तोअ़्लेनू-न, वल्लाहो अ़लीमुम बेज़ातिस्सुदूर वल्लाहो बेकुल्ले शैइन अ़लीम; सूरए तग़ाबुन, आयत ४)
वोह हर जगह है, हर जगह उस की बारगाह में रसाई मुम्किन है, उस तक पहुँचने के लिए सहरा नवर्दी और दरबानों से इजाज़त की ज़रूरत नहीं है। उस से ज़्यादा क़रीब कोई चीज़ नहीं है। (व ऩह्नो अक़्रबो इलैहे मिन ह़ब्लिल वरीद; सूरए क़ाफ़, आयत १६) वोह ऐसी ह़क़ीक़त है जिसका कोई सानी नहीं। दूसरे मकातिबे ख़याल के बरख़ेलाफ़ वोह तमाम इन्सानी सिफ़ात से मुनज़्ज़ह, वोह किसी मख़्लूक़ या बशर के मानिंद नहीं है। इस लिए उसे मकान की ज़रूरत नहीं है क्योंकि वोह ख़ुद ही मकान का ख़ालिक़ है।
वोह ज़मान में समा नहीं सकता क्योंकि उसी ने ज़माना को पैदा किया है।
वोह हमेशा से है और हमेशा रहेगा। उस की कोई इब्तेदा और इंतेहा नहीं है लेहाज़ा उस का कोई मिस्ल-ओ-नज़ीर नहीं है।
(लै-स कमिस्लेही शैउन व होवस्समी़उल बसीर; सूरए शूरा, आयत ११)
उस की ज़ात नींद, थकन, पशेमानी, इश्तेबाह... जुम्ला तमाम उयूब से पाक है।
(ला ताख़ोज़ोहू सेनतुँंव वला नौम; सूरए बक़रा, आयत २५४)
अकेला है उस का कोई नज़ीर नहीं। न उस की कोई औलाद है और न वोह किसी की औलाद।
उस का न कोई शरीक है और न मददगार।
येह वोह ह़क़ाएक़ हैं जो सूरए तौ़हीद में बयान किए गए हैं इस सूरा को मुसलमान बार-बार नमाज़ों में पढ़ते हैं ताकि वोह हर तरह के शिर्क से पाक रहें।
(क़ुल होवल्लाहो अ़़हद ता आख़िर. सूरए तौ़हीद)
इस्लाम का ख़ुदा वोह ख़ुदा है जिसके सिफ़ात क़ुरआन के अल्फ़ाज़ में ऊपर बयान किए गए हैं कि जिनके मफ़्हूम की वुस्अ़त, शौकत-ओ-अ़ज़्मत का ए़हाता अ़क़्ल नहीं कर सकती। फ़िक्रे इंसानी में इतनी वुस्अ़त नहीं है कि मफ़ाहीम की वुस्अ़त को समेट सके। वोह बेनियाज़ है, बिला शरीक है, क़ादिर है, नज़्दीक है, बरतर है, मेह्रबान है और वोह बहुत ज़्यादा मेह्रबान, हर वक़्त उस तक रसाई मुम्किन है। हर वक़्त हर शख़्स उस से अपना राज़े दिल कह सकता है। उस की बारगाह में राज़-ओ-नियाज़ कर सकता है। अपनी तमाम ह़ाजतें उस से तलब कर सकता है। वोह ह़स्बे मस्ले़हत-ओ-मफ़ाद अ़ता करता है। ख़ुद उस का इर्शाद हैः इन्नल्ला-ह बेकुम ल-रऊफ़ुर्ऱहीम यक़ीनन ख़ुदा तुम पर मेह्रबान है अ़ता करने वाला है।
(सूरए ह़दीद, आयत ९)
इस्लाम और मसावात
तमाम नस्ली और तबक़ाती इम्तेयाज़ात न सिर्फ़ इस्लाम ने यकसर ल़ग्व क़रार दिए बल्कि इन्सानों की बराबरी और मसावात का भी एअ़्लान किया।
तमाम इन्सान एक दूसरे के भाई हैं। सब एक माँ बाप की औलाद हैं ख़ानदानी और नसबी शराफ़त में बाहम शरीक हैं। किसी को किसी पर तक़्वा और परहेज़गारी के अ़लावा कोई फ़ौक़ियत नहीं है।
या अय्योहन्नासो इन्ना ख़लक़्नाकुम ज़-करिन व उन्सा व जअ़ल्नाकुम शो़ऊबन व क़बाए-ल ले-तआ-रफ़ू इन-न अक-र-मकुम इन्दल्लाहे अत्क़ाकुम, इन्नल्ला-ह अ़लीमुन ख़बीर, सूरए ह़ुजोरात, आयत १३
इस्लाम और आज़ादिये फ़िक्र
इस्लाम मंतिक़-ओ-इस्तेदलाल की आज़ादी का ज़बरदस्त हामी है नज़रियात और अ़क़ाएद को ज़बरदस्ती मनवाने का इस्लाम क़ाएल नहीं है।
ला इव्Àरा-ह फ़िद्दीने क़द तबय्यनर्रुश्दो मिनल ग़ैये
सूरए बक़रा, आयत २५६
दीन के इख़्तेयार करने में कोई जब्र नहीं है हेदायत-ओ-ज़लालत की बाक़ा़एदा निशानदेही की जा चुकी है।
इस्लाम में उसूले अ़क़ाएद की त़हक़ीक़-ओ-जुस्तजू हर फ़र्द का फ़रीज़ा है। हर एक पर वाजिब है कि वोह बग़ैर दलील कोई बात क़बूल न करे। गरचे इस्लाम में बअ़्ज़ अ़हकाम तअ़ब्बुदी (बे चून-ओ-चरा क़बूल कर लेना) हैं। लेकिन उनके क़बूल करने की दलील येह है।
येह अ़हकाम सर चश्मए व़ही (जो हर क़िस्म की ख़ता-ओ-इश्तेबाह से म़हफ़ूज़ है) से पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ़.) और अइम्मा अ़लैहिमुस्सलाम के ज़री़ए हम तक पहुँचे हैं।
इस्लाम उन लोगों की सख़्त मज़म्मत करता है जो अंधी तक़लीद की बेना पर अपने ख़ानदानी रवायात पर क़ाएम हैं। इस्लाम उन्हें येह तअ़्लीम देता है कि ख़ुद फ़िक्र करो, त़हक़ीक़ करो बे-बुनियाद बातों से चिपके न रहो सिर्फ़ इल्म-ओ-यक़ीन की पैरवी करो।
(सूरए असरा, आयत ३६)
इस्लाम मुख़ालिफ़ीन को येह ह़क़ देता है कि वोह इल्मी इज्तेमाआत में अपने एअ़्तराज़ात बयान करें और दलीलें क़ाएम करें और जवाबात सुनें।
क़ुल हातू बुर्हा-नकुम इन कुन्तुम सादेक़ी-न.
(सूरए बक़रा, आयत १११)
कह दीजिएः अगर सच्चे हो तो अपनी दलीलें पेश करो।
तारीख़ में ऐसे वा़केआत ब-कसरत मिलते हैं कि यहूद नसारा या दूसरे मुख़ालेफ़ीने रसूले ख़ुदा सल्लल्लाहो अ़लैहे व आलेही व सल्लम या अइम्मा अ़लैहिमुस्सलाम की ख़िदमतों में हाज़िर होते थे, बह्स करते थे दलीलें पेश करते थे।
सदियों तक येह रवाज था कि मज़हबी अक़ल्लीयतें दानिशवराने इस्लाम के इज्तेमाआत में हाज़िर होती और मुनाज़रा करती थीं। सफ़हाते तारीख़ पर इस तरह के वा़केआत दर्ज हैं।
डाक्टर ‘गुस्टाव ली बोन’ अपनी किताब ‘तमद्दुने इस्लाम’ में रक़म तराज़ हैंः
‘बग़दाद में ऐसे इज्तेमाआत होते थे जिसमें हर मज़हब के दानिशवर जमअ़् होते थे, यहूदी, ईसाई, हिंदू, आतश-परस्त, दहरिया... सब शरीक होते थे और कमाले आज़ादी से अपनी बातें पेश करते थे उनके इस्तेदलाल बहुत ग़ौर से सुने जाते थे, उस बह्स में सिर्फ़ एक शर्त थी कि सिर्फ़ अ़क़्ली दलीलें पेश की जाएँ।’
डाक्टर मौसूफ़ एज़ाफ़ा करते हैंः
‘अगर ग़ौर किया जाए तो हज़ार साल की वहशियाना जंग, ख़ुद गर्ज़ाना अदावतों, बेपनाह ख़ून रेज़ियों के बअ़्द भी यूरोप में इस तरह की आज़ादी ह़ासिल नहीं है।’
(तमद्दुने इस्लाम, स॰ ७१३-७१५)
इस्लाम और इल्म
इस्लाम ने तफ़क्कुर को काफ़ी अहम्मीयत दी है। अ़क़्लमंदों से येह तक़ाज़ा किया है कि वोह ख़िल्क़ते ज़मीन-ओ-आसमान, रोज़-ओ-शब, ह़ैवान-ओ-इंसान, काएनात और जो चीज़ें काएनात में हैं उनके बारे में बहुत ज़्यादा ग़ौर-ओ-फ़िक्र करें।
सूरए बक़रा, आयत १६४
गुज़श्ता अव़वाम की तारीख़ पढें उनके ह़ालात का मुतालआ करें और देखें कि उनके स़ुकूत और हलाकत का क्या सबब था ताकि ख़ुद उनकी ज़िंदगी हलाकत का शिकार न होने पाए।
सूरए आले इमरान, आयत १३७
हाँ इस्लाम येह चाहता है कि इन्सान ख़ूब फ़िक्र करे, ख़ूब गहराई से शुब्हे का जाएज़ा ले ताकि फ़िक्र के दूर दराज़ उफ़ुक़ तक उस की रसाई मुम्किन हो सके और ज़्यादा से ज़्यादा उलूम के खज़ाने जमअ़् कर सके। अपने वजूद से बेहतरीन इस्तेफ़ादा कर सके।
इस बेना पर इस्लाम ने इल्मी तरकि़्क़यों और जदीद इन्केशाफ़ात की काफ़ी क़द्र की है ख़ासकर वोह इन्केशाफ़ात जो इन्सानी ख़िदमत के लिए हुए हैं। यही वजह है कि ज़हूरे इस्लाम के बअ़्द दानिशवराने इस्लाम उठ खड़े हुए। बशरीयत की शाहराहे तमद्दुन अपनी कोशिशों से आरास्ता कर दी आज भी इल्म के कोहसारों पर उनका नाम चमक रहा है और हमेशा चमकता रहेगा।
जैसे जाबिर इब्ने ह़य्यान, राज़ी, इब्ने सीना, ख़ाजा नसीरुद्दीन तूसी ने.... अ़क़्ली, तबई, नुजूम, केमिस्ट्री उलूम में क़ाबिले क़द्र आसार छोडे हैं। अभी आख़िरी सदियाें में इब्ने सीना की किताबें यूरोप की यूनिवर्सिटियाें में पढाई जाती थीं। डाक्टर गुस्ताव ली-बोन ने लिखा है किः सेवर्नान लिखता है कि ‘अलबर्त’ के पास जो कुछ था वोह उसने इब्ने सीना से ह़ासिल किया था। तमद्दुने इस्लाम स॰ ७१, तबअ़् अव्वल
ईसाई मुवर्रिख़ जुर्जी ज़ैदान अपनी किताब तारीख़े तमद्दुने इस्लाम स. ५९८ पर लिखता हैः
‘‘इधर इस्लामी तमद्दुन की बुनियाद पड़ी, मुसलमानों में इल्मी लहर दौड़ी उधर दानिशवराने इस्लाम उठ खड़े हुए। बअ़्ज़ उलूम में उनके अफ़्कार-ओ-नज़रियात उन उलूम के मुअस्सेसीन के अफ़्कार-ओ-नज़रियात से कहीं बलंद थे बल्कि इस्लामी दानिशवरों की तहक़ीक़ात से उन उलूम ने नई शक्ल इख़्तेयार कर ली और इस्लामी तमद्दुन से हम-आहंग हो कर तरक़्क़ी की राह पर गामज़न हुए।’’
मेसोलेबरी लिखता है कि ‘अगर इस्लाम सिलसिलए तारीख़ से अलग हो जाता तो यूरोप की इल्मी बेदारी कई सदी पीछे रह जाती।’
तमद्दुने इस्लाम, स॰ ७०६-७१५
इस्लाम और ज़िंदगी
इस्लामी नुक़्तए नज़र से माद्दी-ओ-मअ़्नवी ज़िंदगी, दीन-ओ-दुनिया में कोई तज़ाद नहीं है। वोह लोग जो दुनिया में कोई काम नहीं करते उन्हें इस्लाम पसंद नहीं करता। इसी तरह इस्लाम उन लोगों की भी मज़म्मत करता है जिनकी सारी फ़िक्र, सारी सई-ओ-कोशिश सिर्फ़ अपने लिए है।
ह़ज़रत इमाम जअ़्फ़र सादिक़ अ़लैहिस्सलाम का इर्शाद हैः
जो शख़्स दुनिया को आख़ेरत के लिए तर्क कर दे (ज़ोह्द की बेना पर दुनिया से दस्त-बरदार हो जाए) और जो आख़ेरत को दुनिया के लिए तर्क कर दे वोह हम से नहीं है।
(वसाएलुश्शीआ, जि॰ १२, स॰ ४९)
येह बात कही जा सकती है कि इस्लाम ने इस बात का बाक़ा़एदा ख़याल रखा है कि मुसलमान दुनियावी उमूर में अपनी अ़क़्ल-ओ-कोशिश से तरकि़्क़याँ करते रहें और दुनियवी मुआमलात में भी किसी से पीछे न रहें। दुनिया में भी आबाद हों दीन में भी। इस बेना पर इस्लाम में रोहबानियत और समाज पर बोझ बनना, गोशा-नशीनी इख़्तेयार कर लेना नारवा समझा गया है। पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ़.) का इर्शाद हैः
लम यक्तुब अ़लैनर्रोह्बानीया इन्नमा रोहबानीय-त उम्मतिल जेहादे फ़ी सबीलिल्लाह
(बेह़ार, जि॰ ७०, स॰ ११५)
रोहबानियत हमारा नविश्तए तक़दीर नहीं है मेरी उम्मत की रोहबानियत ख़ुदा की राह में जेहाद करना है।
इस्लामी अ़हकाम और अ़स्री तरकि़्क़याँ
तग़य्युर-ओ-तबद्दुल, कमाल-ओ-इतेक़ा, नए नए वसाएल की ईजाद, रोज़-अफ़्ज़ूँ तरक़्क़ी पज़ीर तमद्दुन इस्लामी अ़हकाम की अबदीयत के मनाफ़ी (मुतज़ाद) नहीं हैं। क्योंकि तरि़व़कयों के साथ अ़हकाम की अ़दम मुताबेक़त उस सूरत में होगी जब वोह क़ानून इब्तेदाई वसाएल और ख़ास अ़वामिल-ओ-अस्बाब की बुनियाद पर क़ाएम हो। अगर क़ानून येह हो कि लिखते वक़्त सिर्फ़ हाथ से इस्तेफ़ादा करना चाहिए और सफ़र के लिए सिर्फ़ ख़च्चर इस्तेअ़्माल करना चाहिए.... इस तरह के क़वानीन इल्म-ओ-तमद्दुन की तरक़्क़ी का साथ नहीं दे सकते हैं।
लेकिन अगर क़ानून ने किसी ख़ास अ़वामिल और वसाएल को बुनियाद न क़रार दिया हो बल्कि सिर्फ़ मिसाल के लिए पेश किया हो उस सूरत में नए वसाएल की ईजाद इल्म-ओ-तमद्दुन की तरक़्क़ी क़ानून पर असर अंदाज़ न होगी।
इस्लाम ने क़ानूनसाज़ी के वक़्त किसी ख़ास ज़माने को नज़र में नहीं रखा है। इस्लाम का ह़ुक्म है कि दूसरों के मुक़ाबले के लिए ताक़तवर हो ताकि अपने इन्सानी वजूद और हुक़ूक़ का देफ़ाअ़् कर सको।
येह क़ानून गरचे उस वक़्त वज़अ़् हुआ है जब जंगी वसाएल से घोड़े और तलवारें मुराद ली जाती थीं लेकिन इस क़ानून की नज़र उस वक़्त के जंगी वसाएल पर नहीं है। इस्लाम ने हरगिज़ येह नहीं कहा है किः
इस्लामी जेहाद सिर्फ़ तलवार से हो सकता है।
लेहाज़ा आज की दुनिया में येह क़ानून क़ाबिले नेफ़ाज़ नहीं है।
यही सूरते ह़ाल ज़िंदगी के दूसरे मसाएल में है।
तमद्दुन और उस के अस्बाब-ओ-अ़वामिल-ओ-वसाएल जिस क़द्र भी तरक़्क़ी याफ़्ता हो जाएँ उनका दाएरा कितना ही वसीअ़् क्यों न हो जाए किसी भी मंज़िल पर इस्लामी क़वानीन कोताह दामनी का शिकार न होंगे। इस्लाम के अबदी होने की एक वजह येह भी है।
जार्ज बर्नार्ड शा मशहूर बर्तानवी फ़लसफ़ी और दानिशवर का कहना है किः इस्लाम अकेला वोह दीन है जो ज़िंदगी के तमाम पह्लुओं के लिए साज़गार है और हर नस्ल को अपनी तरफ़ जज़्ब करने की इस में सलाह़ियत है।
(तमद्दुन व उलूमे इस्लामी, स॰ १३)
क्या जदीद नज़रियात हमें बे-नियाज़ कर सकते हैं?
इस में कोई शक नहीं कि इल्म के मैदान में इन्सान ने बेपनाह तरक़्क़ी की है लेकिन दानिशवर ख़ुद इस बात के मोअ़्तरिफ़ हैं कि जो कुछ वोह जानते हैं उस का कोई तनासुब उन चीज़ों से नहीं है जिनको वोह नहीं जानते। चूँकि उनकी मअ़्लूमात बहुत म़ह्दूद हैं लेहाज़ा वोह काएनात के तमाम अस्रार-ओ-रुमूज़ से वाकि़फ़ नहीं हैं।
इन्सान जिस क़द्र तरक़्क़ी कर जाए फिर भी ख़ता और इश्तेबाह से म़हफ़ूज़ नहीं है। इस बेना पर इन्सानी मसाएल के बारे में जो बातें पेश की जाएँगी वोह किसी भी ज़माने में सौ फ़ीसद क़ाबिले इत्मीनान न होंगी। इस बात का बहरहाल ए़ह्तेमाल है कि उस के अफ़्कार-ओ-नज़रियात पर मा़हौल या दूसरे अ़वामिल का लाश़ऊरी असर हो जो उसे स़ही़ह फ़िक्र से दूर कर दे।
इस्लामी क़वानीन का सरचश्मा व़ही (व़ह्य) है जहाँ ख़ता और इश्तेबाह का कोई गुज़र नहीं है इस लिए वोह हर ज़माने में सौ फ़ीसद क़ाबिले इत्मीनान हैं लेकिन येह शर्त है कि इस्लाम के पाकीज़ा क़वानीन में दूसरे नापाक क़वानीन मख़्लूत न होने पाएँ। अगर रस्म-ओ-रवाज इस्लामी क़वानीन का जुज़ बन जाएँगे तो इस्लामी क़वानीन से स़ही़ह इस्तेफ़ादा ह़ासिल न हो सकेगा।
ग़ैबी इम्दाद
बअ़्ज़ लोग आँह़ज़रत (स.अ़.) के ख़ातिमुन्नबीयीन (आख़िरी नबी) होने का मफ़हूम येह बयान करते हैं कि आँह़ज़रत (स.अ़.) के बअ़्द दुनियाए ग़ैब से राबेता मुन्क़तअ़् हो गया।
येह एक बेबुनियाद बात है। आँह़ज़रत (स.अ़.) के ख़ातिमुन्नबीयीन होने का मतलब येह है कि आपके बअ़्द कोई दूसरा नबी नहीं आएगा और न कोई दूसरा दीन। दुनियाए ग़ैब से राबेता मुन्क़तअ़् होने का कोई सवाल नहीR है।
हम शीआ जो बारह इमाम की इमामत-ओ-वेलायत का अ़क़ीदा रखते हैं हमारा येह एअ़्तेक़ाद है कि अइम्मा अ़लैहिमुस्सलाम के ज़री़ए दुनियाए ग़ैब से राबेता बरक़रार है। मज़हबे शीआ के इम्तेयाज़ात में येह भी एक ख़ास इम्तेयाज़ है। (जो पैग़ाम रसूले ख़ुदा सल्लल्लाहो अ़लैहे व आलेही व सल्लम लाए थे इमाम उन्हीं अ़हकाम को बयान करता है।)
सद्रुल मुताल्लेहीन मुल्ला सदरा शीराज़ी ‘मफ़ाती़हुल ग़ैब’ में त़हरीर फ़रमाते हैंः
‘‘व़ही का सिलसिला यअ़्नी पैग़ाम रसानी के लिए फ़रिश्तों का नुज़ूल गरचे मुन्क़तअ़् हो गया है लेकिन इल्हाम-ओ-इश्राक़ का सिलसिला जारी है और येह सिलसिला कभी भी मुन्क़तअ़् न होगा।’’
दौरे हाज़िर में इस्लामी अ़हकामात पर अ़मल
दौरे हाज़िर में हर तरफ़ फ़साद फैला हुआ है जिस क़द्र तरकि़्क़याँ हो रही हैं उसी क़द्र अख़्लाक़ी अक़दार मुतज़लज़िल नज़र आ रही हैं। येह बात भी फ़रामोश न करना चाहिए कि मर्दे आहन मुश्किलात ही में पैदा होता है। हमारी शख़्सीयत और इस्तेक़लाल इस बात का तक़ाज़ा करती है कि ज़माने के इऩ्हेराफ़ात का बहादुरी से मुक़ाबला करें।
समाज की इस्ला़ह और उस के ह़ालात पर कंट्रोल करना हमारी बुनियादी ज़िम्मेदारी है। पैग़म्बरों की ज़िंदगी ज़माने के इऩ्हेराफ़ात से मुक़ाबला करने का दर्स दे रही हैं। पैग़म्बर कभी भी समाज की पस्तियों से मुतअ्स्सिर नहीं हुए मुआशरे की ज़लालत-ओ-गुमराही उन पर असर अंदाज़ न हुई। पैग़म्बरों ने समाज को बदल डाला न कि समाज ने पैग़म्बरों को।
पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ़.) ने जाहिलीयत की पस्तियों और इऩ्हेराफ़ात का जम कर मुक़ाबला किया यहाँ तक कि समाज में इन्क़ेलाब बर्पा कर दिया।
क़बीलए क़ुरैश की बुज़ुर्ग शख़्सीयतें ख़ासकर हमेशा पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ़.) की मुस्लेहाना रविश से ख़ासी नाराज़ थीं। राए मश्वरे के बअ़्द येह तै पाया कि पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ़.) को डरा धमका कर बड़े बड़े वअ़्दे कर के उनको उनके इरादे से बाज़ रखा जाए पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ़.) ने इर्शाद फ़रमायाः
‘मेरी यही ज़िम्मेदारी है ख़ुदा की क़सम! अगर मेरे एक हाथ पर सूरज दूसरे हाथ पर चाँद रख दें तब भी मैं एक क़दम पीछे न हटूँगा और अपने ईमान से दस्त-बरदार न हूँगा यहाँ तक कि मैं कामियाबी या मौत से हमकनार हो जाऊँ।
(सीरए इब्ने हेशाम, स॰ २६६-२९५)
कामियाबी पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ़.) की पैरवी और एताअ़त में मुज़मर है।
आ तेरी राह से तोशा ह़ासिल करें।
और उस राह पर क़दम उठाएँ जिसमें पीछे हटना न हो।
हमें दुनिया को बदलना है, समाज की इस्ला़ह करना है, अख़्लाक़ी अक़्दार को ज़िन्दए जावेद बनाना है।
हमें दुनिया के रंग में रँग जाना नहीं है।