उसूले दीन
मेनू
पिछला
अगला
सूची
प्रतियोगिता
सबक़ - २२

इस्लामी तअ़्‌लीमात

इस्लामी तअ़्‌लीमात

इस्लामी तअ़्‌लीमात की रू़ह इस एक जुम्ले में बयान की जा सकती है।

ला इला-ह इल्लल्लाह! ख़ुदाए वाह़िद के सिवा कोई और मअ़्‌बूद नहीं है।

दरख़्ते इस्लाम के सरसब्ज़, शादाब और फलदार होने का यही राज़ है। अगर हम इस्लाम की मिसाल एक दरख़्त से दें और उस की आइडियालोजी को उस की जड़ क़रार दें तो जानना चाहिए कि दरख़्त की सलामती और फलों की शादाबी जड़ की सलामती पर मौ़कूफ़ है।

इस एक जुम्ले में इस्लामी आइडियालोजी की बुनियाद को बयान किया गया है। येह आइडियालोजी किस क़द्र मुस्त़हकम और पाएदार है।

सआदत और ईमान

अगर इन्सान की तमाम ज़रूरियात की बुनियाद माद्दीयत पर होती मावराए माद्दा किसी चीज़ की ए़हतेयाज न होती तो माद्दी आसूदगी से सआदत ह़ासिल हो जाती।

लेकिन हम जानते हैं और देख रहे हैं कि टेक्नोलोजी, सनअ़त और माद्दीयत की गहराइयों से रू़हे इन्सानी की येह आवाज़ आ रही किः

जिस क़द्र माद्दी वसाएल में एज़ाफ़ा हो रहा है, रू़ह की प्यास बढ़ती जा रही है और समाज की मअ़्‌नवी ज़रूरियात में एज़ाफ़ा होता जा रहा है आज के समाज की इज़्तेराबी कैफ़ीयत इस ह़क़ीक़त की मुकम्मल अ़क्कासी कर रही है। बीसवीं सदी की इब्तेदा से समाज के ऊपर नाइत्तेफ़ाक़ी और बोहरानी कैफ़ीयत ने साया डाल रखा है। मुआशरे के अफ़राद ख़ासकर जवान एक ऐसे रू़हानी बोहरान का शिकार हैं जिसको कंट्रोल करना नामुमकिन हो गया है।

‘माद्दीयत की मुतमद्दिन सक़ाफ़त (कल्चर) में इन्सान एक ज़िंदा जिस्म है...... वोह किसी पैग़ाम, अक़दार और ख़ूबियों का अ़लमबरदार नहीं है। उस की रू़हानी कमालात और मअ़्‌नवी ज़रूरियात की तकमील के लिए किसी राह का इंतेख़ाब नहीं किया गया है।’

इन्सान की औज पसंद रू़ह शाहीने बलंद परवाज़ की तरह कोहसारों की बलंदियों पर परवाज़ करना चाहती है और जब तक बलंदियों को तै न कर ले, रू़हानी फज़ीलतों और मअ़्‌नवी अक़दार के सरचश्मे में ग़ोताज़न न हो ले उस वक़्त तक इन्सान को सुकून ह़ासिल न हो सकेगा। उस की रू़ह मुज़्तरिब रहेगी।

येह तमाम सरकशी तुग़्‌यानियत, फ़सादात, इन्सान की रू़हानी तश्नगी के असरात हैं। जब तक इन्सान रू़हानी अक़दार के साह़िल से हमकनार न होगा उस वक़्त तक आराम नसीब न होगा।

साह़िले नजात सिर्फ़ लाम़ह्दूद ताक़त, लामुतनाही इल्म, कमाले मुतलक़ पर ईमान लाना और तमाम ख़याली ख़ुदाओं का इन्कार है। ऐसी ज़ात की याद, उस पर मुस्त़हकम ईमान, और पुख़्ता अ़क़ीदे से दिलों को आराम मिलता है।

क़ुरआने करीम ने इस ह़क़ीक़त की तरफ़ एक मुख़्तसर से जुम्ले में इशारा किया हैः

أَلَا بِذِكْرِ اللهِ تَطْمَئِنُّ الْقُلُوبُ۔

अला बेज़िक्रिल्लाहे तत्‌मइन्नुल क़ुलूब.

(सूरए माएदा, आयत २८)

हाँ यक़ीनन अल्लाह की याद से दिलों को इत्मीनान ह़ासिल होता है।

हाँ इत्मीनाने क़ल्ब यादे ख़ुदा में है, ख़ुदा पर ईमान और उस की तरफ़ तवज्जोह वोह चीज़ है जिससे फ़ितरी तक़ाज़ों में एअ़्‌तेदाल बाक़ी रहता है और सआदतों की सिम्त रहनुमाई होती है।

इसी मेअ़्‌यार पर इस्लाम ने इन्सानी अक़दार को परखा हैः

إِنَّ أَکْرَمَکُمْ عِندَ اللّہِ أَتْقَاکُمْ۔

इन-न अक-र-मकुम इन्दल्लाहे अत्क़ाकुम

(सूरए ह़ुजुरात, आयत १३)

सबसे ज़्यादा बुज़ुर्ग वोह है जो सबसे ज़्यादा परहेज़गार है।

 इस्लाम का मक़सद माद्दी कसाफ़तों और पस्त ख़ाहिशात से इन्सान को नजात दिलाना और बलंद-ओ-बाला उफ़ुक़ की निशानदेही है ताकि इन्सान मअ़्‌नवी और ह़क़ीक़ी लज़्ज़तों के सदाबहार गुलिस्ताँ से वाकि़फ़ हो, माद्दीयत की उजा़ड़ राहों से किनारा-कश हो और सआदत-ओ-नजात के रास्ते पर गामज़न हो।

يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُواْ اسْتَجِيبُواْ لِلّهِ وَلِلرَّسُولِ إِذَا دَعَاكُم لِمَا يُحْيِيكُمْ

या अय्योहल्लज़ी-न आ-मनुस्तजीबू लिल्लाहे व लिर्रसूले एज़ा दआकुम लेमा यु़ह्‌यीकुम

(सूरए अन्फ़ाल, आयत २४)

ख़ुदा और रसूले ख़ुदा की आवाज़ पर लब्बैक कहो जब वोह उन चीज़ों की तरफ़ तुम्हें बुलाएँ जो तुम्हें ज़िंदगी अ़ता करती हैं।

इस्लामी तअ़्‌लीमात से नीम-जाँ इन्सानियत को ह़यात और दबी हुई सलाह़ियतों को उजागर होने का मौक़अ़्‌ मिलता है। इस्लामी तअ़्‌लीमात के साए में इन्सानी सलाह़ियतें फूलती हैं, फलती हैं, फैलती हैं। ज़िंदगी की येह बहारें इस्लामी तअ़्‌लीमात के चमन ज़ार में बाक़ा़एदा नज़र आती हैं। ज़ैल की सत्‌रों में इस्लामी तअ़्‌लीमात के बअ़्‌ज़ उसूलों को बतौर इख़्तेसार पेश किया जा रहा है।

(१) उख़ूवते इस्लामी

(२) आम निगरानी

(३) इल्म-ओ-दानिश

(४) काम और कोशिश

(५) तश्कीले ख़ानदान

उख़ूवते इस्लामी

उख़ूवते इस्लामी आली तरीन इन्सानी उसूलों की बुनियाद पर क़ाएम है। ग़ैर मअ्‌़कूल तकल्लुफ़ात से इस का कोई वास्ता नहीं है। इस्लामी उख़ूवत का ह़दफ़ हर मुसलमान में फ़ेदाकारी और ईसार के जज़्बात को मुस्त़हकम करना, ख़ुलूस और सफ़ाए बातिन को तक़वियत पहुँचाना है। इस उख़ूवत और बरादरी का असर ज़िंदगी के तमाम शोअ़्‌बों में एक को दूसरे का ज़िम्मेदार क़रार देना है। इस उख़ूवत की बेना पर नामुमकिन है कि एक मुसलमान दूसरे मुसलमान के दर्द-ओ-ग़म में शरीक न हो।

सद्रे इस्लाम में इस्लामी उख़ूवत की बुनियाद इस ख़ुश-उस्लूबी से डाली गई कि अमीर-ओ-ग़रीब, दिल-ओ-जान, माल-ओ-मताअ़्‌ से एक दूसरे के भाई क़रार पाए।

उख़ूवते इस्लामी के मफ़हूम को बहुत ही सादा और वसीअ़्‌ दाएरे में ह़ज़रत इमाम जअ़्‌फ़र सादिक़ अ़लैहिस्सलाम ने इन अल्फ़ाज़ में बयान फ़रमाया हैः

मोअ्‌मेनीन इस तरह आपस में भाई भाई हैं जिस तरह इन्सानी जिस्म के मुख़्तलिफ़ अअ़्‌ज़ा। अगर किसी एक उज़्व (अ़ज़ू) में दर्द हो तो बकि़या अअ़्‌ज़ा भी बेचैन रहते हैं।

(बेह़ारुल अनवार, जि॰ ७४, स॰ २६८)

आप ने येह भी इर्शाद फ़रमायाः

उख़ूवते इस्लामी इस बात की इजाज़त नहीं देती किः

ख़ुद सेर-ओ-सेराब रहो और तुम्हारा मुसलमान भाई भूखा प्यासा रहे।

तुम्हारे पास लेबास हों और तुम्हारा भाई बरह्ना रहे।

जो कुछ अपने लिए पसंद करते हो वही उस के लिए भी पसंद करो।

जिस तरह वोह तुम्हारा सहारा है तुम भी उस को सहारा दो।

जब वोह सफ़र में हो तो उस के माल और नामूस की ह़ेफ़ाज़त करो।

जब वोह सफ़र से वापस आए तो उस की मुलाक़ात को जाओ। उस का ए़हतेराम करो।

वोह तुमसे है और तुम उस से हो।

अगर उस को कोई अच्छाई नसीब हुई तो उस ख़ुशी में ख़ुदा का शुक्र अदा करो अगर वोह मुश्किलात में गिरफ़्तार हो तो उस की मदद करो।

(बेह़ारुल अनवार, जि॰ ७४, स॰ २४३)

 आम निगरानी

ख़ुदावंद आलम ने हमारे बदन में सफ़ेद ख़लिये पैदा किए हैं जो एक होशियार मु़हाफ़िज़ की तरह जरासीम (से़हत-ओ-सलामतीये बदन के दुश्मन) से हमारे बदन की ह़ेफ़ाज़त करते हैं।

येह चीज़ मुसलमानों के लिए बेहतरीन नमूना बन सकती है। समाज के मसाएल में मुसलमानों को भी होशियार मु़हाफ़िज़ की तरह होना चाहिए। जिस वक़्त मअ़्‌नवीयत और सिद्‌क़-ओ-सफ़ा पर माद्दीयत और ज़ाहिरदारी के अह्‌रेमन ह़मला आवर हों उस वक़्त उनका जम कर मुक़ाबला किया जाए और उनके क़दम उखाड़ दिए जाएँ और वक़्त आने पर मअ़्‌नवीयत के त़ह़पफुज़ में जान तक की बाज़ी लगा दें।

वर्ना समाज बे-जान पैकर की तरह रह जाएगा। अगर बुराइयों के ह़मलों के मुक़ाबले में मुसलमान ख़ुश रहें तो ऐसे ठहरे हुए गंदे पानी की तरह हो जाएँगे जिस में तरह तरह के जरासीम परवरिश पाते हैं जिसकी बेना पर उनका ताबनाक समाज तीरा-ओ-तारीक हो जाएगा, सेहत मंद मुआशरा अम्राज़ का शिकार हो जाएगा।

लेहाज़ा समुंदर की मौजों की तरह हमेशा हरकत में रहना चाहिए एक लह्ज़ा भी सई-ओ-कोशिश के लिए रुकना न चाहिए ताकि बुराइयाँ असर-अंदाज़ न हो सकें।

समाज की से़हत-ओ-सलामती, मुआशरे की ज़िंदगी के लिए इस्लाम ने आम निगरानी को मुसलमानों के अहम फ़राएज़ में क़रार दिया है। इस ह़क़ीक़त की तरफ़ तवज्जोह दिलाई है कि इज्तेमा़ई ज़िम्मेदारियाँ इन्फ़ेरादी ज़िम्मेदारियों से कम नहीं हैं। मुसलमानों को चाहिए कि वोह इज्तेमा़ई ज़िम्मेदारियाँ भी पूरी तन देही (दिल जम़ई) से अंजाम दें।

इस सिलसिले में क़ुरआन ने दो उसूली बातें बयान की हैंः

(१) अच्छाइयों का ह़ुक्म - अम्र बिल मअ़्‌रूफ़

(२) बुराइयों से रोकना - नह्‌य अज़ मुन्कर

(सूरए आले इमरान, आयत ११)

ह़ज़रत इमाम मो़हम्मद बाक़िर अ़लैहिस्सलाम का इर्शाद हैः

ان الامر بالمعروف والنہی عن المنکر فریضۃ عظیمۃ بھا تقام الفرائض۔

इन्नल अम्र बिल मअ़्‌रूफ़े वन्नह्‌य अ़निल मुन्करे फ़री-ज़तुन अ़ज़ी-मतुन बेहा तक़ामुल फ़राएज़

(काफ़ी, जि॰ ५, स॰ ५५)

अच्छाइयों का ह़ुक्म और बुराइयों से रोकना एक अ़ज़ीम फ़रीज़ा है जिससे दूसरे वाजिबात अदा होते हैं।

जिस दिन मुस्लिम समाज इन दो उसूलों से लापरवाही बतेगा अपनी अ़ज़्मत और बुज़ुर्गी से हाथ धो बैठेगा।

इस बेना पर इस्लाम की मंतिक़ में इस तरह बेकार बातों की कोई गुंजाइश नहीं है कि मुझे तुम्हारी क़ब्र में या तुमको मेरी क़ब्र में नहीं दफ़्न किया जाएगा!

हम अपने रास्ते पर, तुम अपने रास्ते पर!

नंग-ओ-आर से बचने के लिए दूसरों के हम-रंग हो जाओ।

इस बात को हरगिज़ फ़रामोश नहीं करना चाहिए कि अम्र बिल मअ़्‌रूफ़ और नह्य अज़ मुन्कर हर एक मुसलमान की अ़ज़ीम ज़िम्मेदारी है जिस पर अ़मल करने से समाज ज़िंदा और मुआशरा स़ही़ह-ओ-सालिम रहेगा।

इल्म-ओ-दानिश

इस्लाम से पहले लिखने पढ़ने का आम रवाज नहीं था, अ़वाम को इल्म ह़ासिल करने की इजाज़त न थी सिर्फ़ ह़ुक्मराँ तबक़ा, बड़े ख़ानदानों और सरमायादारों को तअ़्‌लीम की इजाज़त थी। येह ख़ुसूसियत उन मुमालिक में काफ़ी नुमायाँ थी जहाँ मुलूकुत्तवाएफ़ी (क़बीला की ह़ुकूमत) थी।

तमद्दुन और सक़ाफ़त से अ़रब क़ौम और अ़रब मुमालिक के अ़वाम काफ़ी दूर थे। जिस वक़्त ह़ेजाज़ में इस्लाम आया उस वक़्त वहाँ के तअ़्‌लीम याफ़्ता अफ़राद उंगलियों पर गिने जा सकते थे।

ऐसे ज़माने में और ऐसे अफ़राद के दरमियान इस्लाम ने शुरूअ़्‌ ही से तअ़्‌लीम पर ज़ोर दिया यहाँ तक कि ह़ुसूले इल्म को वाजिब क़रार दिया।

येह क़ुरआने करीम है जो अपने मलकूती और शीरीं अंदाज़ में जगह जगह तालिबाने इल्म की मद्‌ह-ओ-सना कर रहा है और उन्हें अअ़्‌ला मरातिब अ़ता कर रहा है।

(सूरए मुजादेला, आयत ११)

पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ़.) का इर्शाद है कि इल्म ह़ासिल करना हर मुसलमान का फ़रीज़ा है ख़ुदा तालिबाने इल्म को दोस्त रखता है।

(उसूले काफ़ी, जि॰ १, स॰ ३०)

ह़ज़रत इमाम जअ़्‌फ़र सादिक़ अ़लैहिस्सलाम फ़रमाते हैंः इल्म ह़ासिल करना हर एक पर वाजिब है।

(उसूले काफ़ी, जि॰ १, स॰ ३०)

इमाम मो़हम्मद बाक़िर अ़लैहिस्सलाम का इर्शाद हैः (जिस तरह माल की ज़कात येह है कि उस का कुछ ह़िस्सा ख़ुदा की राह में दिया जाए) इल्म की ज़कात येह है कि दूसरों को तअ़्‌लीम दी जाए।

(उसूले काफ़ी, जि॰ १, स॰ ४१)

तारीख़े इस्लाम इस बात पर गवाह है कि इस्लाम ने इल्म-ओ-दानिश को कितना सराहा है।

इल्म ह़ासिल करने की बार-बार ताकीद इस बात का सबब हुई कि जिस वक़्त यूरोप जेहालत की तारीकियों में ज़िंदगी बसर कर रहा था उस वक़्त इल्म-ओ-तमद्दुन की मश्अ़ले फ़रोज़ाँ मुसलमानों के हाथों में थी।

येह एक ह़क़ीक़त है जिसकी तरफ़ तवज्जोह करना ज़रूरी है कि मुसलमान सिर्फ़ दुनिया की ख़ातिर इल्म ह़ासिल नहीं करते थे बल्कि ख़ुदा पर मुस्त़हकम ईमान और मअ़्‌नवी अक़दार पर मुकम्मल यक़ीन के साए में इल्म ह़ासिल करते थे।

अफ़सोस कि आख़िरी सदियों में मुसलमानों ने इस्लामी तअ़्‌लीमात से रूगरदानी की जिसकी बेना पर वोह ख़ुद भी नज़रों से गिर गए जो कारवाने इल्म के अ़लम बरदार थे वोह बहुत पीछे हो गए।

 काम और कोशिश

काम और कोशिश फ़ितरी और तख़्‌लीक़ी उसूलों में शामिल है। ख़ुदावंद आलम ने तरक़्क़ी का राज़ काम और कोशिश, हरकत-ओ-जुम्बिश में पोशीदा रखा है।

बहार की आमद, फ़स्ल की हरकत-ओ-जुम्बिश, दरियाओं और नहरों की रवानी सर चश्मों का जोश-ओ-ख़रोश, घोंसलों की तअ़्‌मीर, परिन्दों की नक़्ल-ओ-ह़रकत, नसीमे सुब्ह की ख़ुश-ख़रामी हल्की हल्की हवाओं का दरिया पर से गुज़र, सब्ज़ाज़ारों का रुश्द-ओ-नुमू .... परिन्दों की एक जगह से दूसरी जगह हिजरत..... सब असरारे ख़िल्क़त के बलीग़ इशारे हैं ताकि इन्सान जुमूद का शिकार न होने पाए। हमेशा कार-ओ-कोशिश, ह़रकत-ओ-जुम्बिश में सरगर्म रहे फले फूले, बढ़े, फैले, यक़ीने मो़हकम के साथ साथ अ़मले पैहम और सईये मुसलसल हो।

इस्लाम ने इसी फ़ितरी उसूल की बुनियाद पर इन्सानों को सई-ओ-कोशिश की दअ़्‌वत दी है।

अ़ज़ीम तरीन रहबर ह़ज़रत अ़ली अ़लैहिस्सलाम का इर्शाद हैः जिसके इख़्तेयार में ज़मीन और पानी हो (वोह इन दो अ़ज़ीम नेअ़्‌मतों और सरमाए से फ़ाएदा न उठाए) और वोह फ़क़ीर हो ख़ुदा की लअ़्‌नत हो उस पर।

(वसाएलुश्शीआ, जि॰ १२, स॰ २४)

ह़ज़रत इमाम जअ़्‌फ़र सादिक़ अ़लैहिस्सलाम का इर्शाद है ख़ुदावंद आलम को कोई काम ज़राअ़त से ज़्यादा पसंद नहीं है।

(वसाएलुश्शीआ, जि॰ १२, स॰ १९२)

आपका येह भी इर्शाद हैः

الزارعون کنوز الانام۔

अज़्ज़ारे़ऊ-न कनूज़ुल अनाम

(वसाएलुश्शीआ, जि॰ १२, स॰ २५)

किसान अ़वाम का ख़ज़ाना हैं।

ह़ज़रत अ़ली अ़लैहिस्सलाम इर्शाद फ़रमाते हैं किः

मुख़्तलिफ़ तरह की तेजारत करो ख़ुदावंद आलम अमानतदार ताजिरों को दोस्त रखता है।

(वसाएलुश्शीआ, जि॰ १२, स॰ ४)

इमाम जअ़्‌फ़र सादिक़ अ़लैहिस्सलाम से येह रवायत नक़्ल हुई हैः इन्सान की इज़्ज़त-ओ-बुज़ुर्गी उस का कस्बे मआश और सई-ओ-कोशिश है।

(वसाएलुश्शीआ, जि॰ १२, स॰ ३)

इमाम मूसा काज़िम अ़लैहिस्सलाम इर्शाद फ़रमाते हैंः

ان اللہ لیبغض العبد الفارغ۔

इन्नल्ला-ह लेयब्ग़ज़िल अ़ब्दल फ़ारिग़

(वसाएलुश्शीआ, जि॰ १२, स॰ ३७)

ख़ुदा बेकार लोगों को नापसंद करता है।

हमारे पाँचवें इमाम और रहबर ह़ज़रत इमाम मो़हम्मद बाक़िर अ़लैहिस्सलाम सख़्त गर्मी के मौसम में जब कि आप पसीने से शराबोर थे मदीना के बाहर अपने फ़ार्म गए हुए थे (ताकि वहाँ के उमूर अंजाम दे सकें)। एक शख़्स (जो येह ख़याल करता था कि काम करना इस्लामी नुक़्तए नज़र से ज़िल्लत का सबब है) आपके सामने आया और तअ़ज्जुब आमेज़ और बज़ाहिर दर्दमंदाना लह्जे में कहने लगाः

आप क़ुरैश के बुज़ुर्ग और मो़हतरम अफ़राद में शामिल हैं। दुनिया को इस हद तक अहम्मीयत क्यों देते हैं। इतनी सख़्त गर्मी में पसीने में तर-बतर हो रहे हैं और इस ह़ालत में यहाँ तशरीफ़ लाते हैं अगर इस ह़ालत में आपको मौत आ जाए तो आपका क्या हाल होगा?!

इमाम ने फ़रमायाः अगर इस वक़्त मौत आ जाए तो ख़ुदा की एताअ़त और फ़रमाँबर्दारी में मौत आएगी। मैं यहाँ इस लिए आया हूँ ताकि अपने अह्ल-ओ-अ़याल का आज़ूक़ा फ़राहम कर सकूँ और तुम्हारे जैसों के सामने हाथ न फैलाऊँ। इन्सान को उस वक़्त से डरना चाहिए कि मौत आए और वोह गुनाह में मशग़ूल हो।

वोह शख़्स कहने लगा में आपको नसीह़त करना चाहता था लेकिन आपने मुझे ख़ुद नसीह़त कर दी।

(वसाएलुश्शीआ, जि॰ १२, स॰ १०)

इस ह़क़ीक़त की तरफ़ भी मुतवज्जेह रहना चाहिए कि गरचे इस्लाम ने तेजारत, ज़राअ़त और दूसरे काम की काफ़ी ताकीद की है और उसे एबादत शुमार किया है (वसाएलुश्शीआ, जि॰ १२, स॰ १३) लेकिन किसी भी काम में इफ़रात की भी इजाज़त नहीं दी है।

इस्लाम का उसूल येह है किः

दिन रात का एक ह़िस्सा काम और कोशिश के लिए और एक ह़िस्सा दूसरी माद्दी और मअ़्‌नवी ज़रूरियात के लिए।

(नह्जुल बलाग़ा, कलेमाते क़ेसार, शुमारा ३९०)

आराम करो, घरेलू उमूर की देख रेख करो, दीनी मसाएल का इल्म ह़ासिल करो, नमाज़ पढो, क़ुरआन की तिलावत करो, एक दूसरे की मुलाक़ात को जाओ......

तश्कीले ख़ानदान

इज़्दवाज (शादी एक फ़ितरी उसूल है) यहाँ तक कि नबातात को फलदार होने के लिए एक तरह की शादी ज़रूरी है।

ऐसा हरगिज़ नहीं है कि शादी की ह़ैसियत सिर्फ़ इन्फ़ेरादी हो बल्कि उस की समाजी ह़ैसियत ज़्यादा है। क़ौमों की बक़ा और दवाम, समाज की बक़ा और उस का दवाम और दूसरे मज़ाहिर के लिए शादी एक ज़रूरी चीज़ है। बअ़्‌ज़ अफ़राद अपने अअ़्‌ला मक़ासिद और समाजी अहदाफ़ की तव्‌Àमील आइन्दा नस्ल को सौंप देते हैं।

शादी से इन्सानी ख़ाहिशात में एअ़्‌तेदाल क़ाएम होता है और इन्सान गुनाह से म़हफ़ूज़ रहता है। शायद यही वजह है कि ख़ुदावंद आलम ने शादी की बुनियाद जिन्सी ख़ाहिशात पर रखी है। अगर इन्सान शादी के दूसरे फ़ाएदों से वाकि़फ़ न हो तब भी जिन्सी ख़ाहिशात से मजबूर हो कर शादी कर ले।

लेकिन ज़रूरी येह है कि जिन्सी ख़ाहिशात इस्लामी तअ़्‌लीमात की रोशनी में अ़मली हों और उस को कंट्रोल में रखा जाए। जिस तरह एक क़वी हैकल ट्रक एक लापरवाह ड्राइवर के हाथ में हो, जिसका नतीजा किसी गढ़े में गिर कर हलाक हो जाना है। यही सूरत जिन्सी मुआमलात में लापरवाह इन्सान की होगी।

इस्लाम ने शादी के साथ साथ उस के शराएत भी आसान और सादा रखने पर काफ़ी ज़ोर दिया है।

क़ुरआन का इर्शाद है शादी अल्लाह का अ़तीया है सुकून और इत्मीनान का सबब है।

(सूरए रूम, आयत २१)

रसूले ख़ुदा सल्लल्लाहो अ़लैहे व आलेही व सल्लम का इर्शाद है शादी और तश्कीले ख़ानदान मेरी सुन्नत है।

(वसाएलुश्शीआ, जि॰ १४, स॰ ७)

आप (स.अ़.) का येह भी इर्शाद है अगर ऐसा शख़्स ख़ास्तगारी (मंगनी) के लिए तुम्हारे पास आए जिसका अख़्लाक़ और दीन-दारी तुम्हें पसंद हो उस के साथ शादी के लिए तैयार हो जाओ वर्ना रूए ज़मीन पर फ़साद फैल जाएगा।

(काफ़ी, जि॰ ५, स॰ ३४७)

ह़ज़रत इमाम जअ़्‌फ़र सादिक़ अ़लैहिस्सलाम का इर्शाद हैः

पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ़.) लड़कियों और औरतों का मह्र पाँच सौ दिरहम से ज़्यादा नहीं रखते थे। (काफ़ी, जि॰ ५, स॰ ३७६) गरचे येह रक़म उस वक़्त के हैसियतदार घरानों के एअ़्‌तबार से बहुत कम थी।

(काफ़ी, जि॰ ५, स॰ ३७८)

 येह सारी बातें इस ह़क़ीक़त की निशानदेही कर रही हैं कि इस्लाम ने जिन्सी ख़ाहिशात को कंट्रोल में रखने के लिए शादी की पेश-कश की है और इस के लिए आसान और सादा शराएत रखे हैं।

इस सिलसिले में इस्लाम ने सुनहरे ख़ाबों और तबक़ाती इम्तेयाज़ात पर बहुत सख़्त तन्क़ीद की है और इस की मुख़ालेफ़त की है, बेजा तकल्लुफ़ात को नारवा क़रार दिया है।

मिक़दाद, ह़क़ीक़ी मुस्लिम, ईमान से सरशार दिमाग़, अ़क़ीदा से भरपूर दिल, लेकिन न कोई ख़ानदान न दौलत-ओ-सर्वत।

‘ज़बाअ़ह’ जनाब अब्दुलमुत्तलिब की पोती पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ़.) की चचाज़ाद बहन, ख़ानदाने क़ुरैश की एक फ़र्द।

पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ़.) के मश्वरे से इन दोनों की शादी हुई। इस नामवर लड़की ने मिक़दाद के ग़ुर्बतकदा में ज़िंदगी गुज़ार दी अपनी मो़हब्बत-ओ-ईसार से मिक़दाद के घर को मुनव्वर बनाए रही।

इमाम सादिक़ अ़लैहिस्सलाम ने इस शादी का फ़लसफ़ा बयान फ़रमाया है किः

पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ़.) ने येह एक़दाम इस लिए किया ताकि शादी को तकल्लुफ़ात और बेजा रस्म-ओ-रवाज से आज़ाद कर दिया जाए और दूसरे अफ़राद रसूले ख़ुदा सल्लल्लाहो अ़लैहे व आलेही व सल्लम की पैरवी करें और इस बात पर यक़ीन रखें कि ख़ुदा के नज़्दीक वही सबसे ज़्यादा मो़हतरम है जो सबसे ज़्यादा परहेज़गार है।

(काफ़ी, जि॰ ५, स॰ ३४४)

एक दूसरी मिसाल इमाम ज़ैनुल आबेदीन अ़लैहिस्सलाम की ज़िंदगी में नज़र आती है। अ़ब्दुलमलिक मरवान को येह ख़बर मिली कि इमाम ने अपनी आज़ाद कर्दा कनीज़ से अ़व़्‌Àद फ़रमाया है। अ़ब्दुलमलिक की निगाह में येह काम इमाम के लिए मुनासिब नहीं था कि इमामत की मंज़िलों पर फ़ाएज़ होने के साथ अपनी आज़ाद कर्दा कनीज़ से अ़क़्द करें। अ़ब्दुलमलिक ने इमाम अ़लैहिस्सलाम को एक ख़त लिखा कि जिसमें इस एक़दाम की मज़म्मत की थी।

इमाम ने जवाब में त़हरीर फ़रमायाः

तुम्हारा ख़त मिला।

तुम येह ख़याल करते हो कि किसी क़ुरैशी औरत से शादी करना मेरे लिए बा़इसे इज़्ज़त है?

येह तुम्हारा इश्तेबाह है। पैग़म्बर (स.अ़.) से बुज़ुर्ग तर और मो़हतरम तर कोई नहीं है (और मैं पैग़म्बर (स.अ़.) की औलाद हूँ)। मैंने अपनी आज़ाद कर्दा कनीज़ से अ़व़्‌Àद किया है क्योंकि उस के दीन और अख़्लाक़ में कोई ख़ामी नहीं थी।

ख़ुदावंद आलम ने इस्लाम की बरकत से हर तरह के ख़याली इम्तेयाज़ात की बिसात तह कर दी है और शराफ़त-ओ-बुज़ुर्गी का मेअ़्‌यार तक़्वा और ईमान क़रार दिया है।

तुमने येह जो मज़म्मत की है, येह ज़मानए जाहिलीयत की बात है। इस्लाम से पहले इस तरह की बातें रवा थीं इस्लाम के बअ़्‌द ऐसी बे बुनियाद बातों की कोई क़द्र-ओ-क़ीमत नहीं है।

(काफ़ी, जि॰ ५, स॰ ३४४)