इस्लामी तअ़्लीमात और अ़हकाम की मुकम्मल तर्जुमानी और तफ़सीर रसूले ख़ुदा सल्लल्लाहो अ़लैहे व आलेही व सल्लम की ज़िंदगी और सीरते पाक है। वोह व़ही के ज़री़ए ख़ुदावंद आलम से अ़हकाम-ओ-क़वानीन ह़ासिल फ़रमाते थे और इस्लामी मुआशरे में उस को नाफ़िज़ फ़रमाते थे। वोह मुस्लिम समाज के सियासी रहबर और क़ाएद भी थे। आपका किरदार मुजस्सम क़ानून, आपकी रफ़्तार सरापा अख़्लाक़, आपकी गुफ़्तार इलाही क़ानून। आपकी रहबरी अ़क़्ल की बुनियाद, आपकी हेदायत नजात की ज़िम्मेदार। आप सिर्फ़ मौ़एज़ा और नसीह़त पर इक्तेफ़ा नहीं करते थे बल्कि अ़द्ल-ओ-इन्साफ़ की बुनियाद पर इस्लामी मुआशरे की तश्कील की हमेशा कोशिश करते थे।
क्योंकि इस्लाम के पास मुआशरे की फ़लाह-ओ-बहबूद के लिए ‘नेफ़ाज़ी ज़मानत’ भी मौजूद है। ऐसा हरगिज़ नहीं है कि मुजरिमीन और फ़साद फैलाने वालों, समाज में बुराइयों को आम करने वालों .... को सिर्फ़ उख़रवी अ़ज़ाब से डराया गया हो बल्कि उन लोगों के लिए इस दुनिया में भी सज़ाएँ मुक़र्रर की गई हैं। येह क़वानीन इस बात की दलील हैं कि एक ह़ुकूमत की तश्कील भी आँह़ज़रत (स.अ़.) की ज़िम्मेदारियों में शामिल थी।
दुनिया के दूसरे मकातिबे फ़िक्र और निज़ामहाए ह़यात के बरख़ेलाफ़ इस्लाम ने सिर्फ़ माद्दी पह्लू पर नज़र नहीं रखी है बल्कि इन्सानी ज़िंदगी के दूसरे रुख़ यअ़्नी मअ़्नवीयत को भी ख़ास अहम्मीयत दी है इस लिए इस्लाम की अक्सर तअ़्लीमात में मअ़्नवी और इन्सानी फज़ीलातों के ह़ुसूल की तरग़ीब दिलाई गई है।
आज की मुतमद्दिन दुनिया में जिस चीज़ को बिल्कुल फ़रामोश कर दिया गया और जिसके मुज़िर असरात भी रोज़ बरोज़ ज़ाहिर हो रहे हैं - ‘वोह है ‘‘इन्सानियत और आख़ेरत’’ इन दोनों ही चीज़ों को भुला दिया गया है।
लेकिन इस्लाम ने इन बातों पर ख़ास तवज्जोह दी है। इस्लामी रहनुमाओं ने अपनी तअ़्लीमात की बुनियाद मअ़्नवीयत को क़रार दिया है।
अक्सर अफ़राद ‘‘इन्सानियत के गराँ क़द्र जौहर’’ से नावाक़िफ़ हैं। येह जौहरे इन्सानियत इस क़द्र लतीफ़ और पाकीज़ा है कि इस को देखने के लिए चश्मे बसीरत दरकार है। येह सरसब्ज़-ओ-शादाब चमन आम निगाहों से इतना दूर है कि माद्दी निगाहें उस को दर्क नहीं कर सकती हैं चेजाएकि वोह इस सिलसिले में कुछ रहनुमाई करें।
हज़ारों साल की तलाश-ओ-जुस्तुजू के बअ़्द भी इन्सान इस बात पर क़ादिर नहीं हो सका है कि वोह अपने बदन के माद्दी अ़मल और अक़्सुल अ़मल (ऐक्शन) के निस्फ़ असरात को भी स़ही़ह तौर से पहचान सके। इस इन्सान से क्यूँकर येह उम्मीद की जा सकती है कि वोह रू़हानी पह्लू से वाकि़फ़ हो गया हो और इस सिलसिले में कोई लाएह्ए अ़मल पेश कर सकता हो।
बग़ैर किसी बह्स-ओ-गुफ़्तगू के येह बात यक़ीन से कही जा सकती है कि इस मैदान में वही रहनुमाई कर सकता है जिसका जौहरे वजूद रू़हानियत और मअ़्नवीयत से हम-आग़ोश रहा हो। जो मअ़्नवी दुनिया के नशेब-ओ-फ़राज़ से ख़ूब अच्छी तरह वाकि़फ़ हो बल्कि इस दुनिया के गोशे गोशे की सैर कर चुका हो।
मौजूदा ह़ालात को देखते हुए इन्सान की मअ़्नवी तरक़्क़ी और रू़हानी सर-बलंदी की कोई उम्मीद न रखी जाए?
इन्सान के वजूद में जो रू़हानी इस्तेअ़्दाद और मअ़्नवी सलाह़ियतें पाई जाती हैं उन को नज़र अंदाज़ कर लिया जाए? और इन्सान को ह़ैवान का दर्जा दे दिया जाए जिसकी सारी फ़िक्र और सारी कोशिश बस खाना पीना, सोना जागना, ख़ाहिशात... की बर-आवरी (पूरी होना).... है।
येह बातें इन्सानियत की बलंद-ओ-बाला मन्ज़ेलत की तौहीन हैं।
इन्सान में रू़हानी सलाह़ियतें और मलकूती सन्अ़तें वदीअ़त की गई हैं। ख़ुदावंद आलम ने इन्सान को मअ़्नवी इस्तेअ़्दाद से सरशार किया है। इन्सान शाहकारे क़ुदरत और आलमे मख़्लूक़ का नय्यरे ताबान है। इन्सान को चाहिए कि वोह आफ़ताब की तरह बलंदियाँ ह़ासिल करे और उन बलंदियों से सूरज की तरह सारी दुनिया में अपनी शुआएँ फैलाए और काएनात को नूरे इल्म और ह़रारते ईमान से माला-माल कर दे।
येह मुंतख़ब रोज़गार इस निज़ामे शम्सी में सरगर्दां-ओ-हैराँ नहीं छोड़ा गया है बल्कि इस ज़र्रा पर ख़ुर्शीदे रुबूबियत ने अपनी शुआ़़एँ डाली हैं और अपनी ख़ास एनायतों से नवाज़ा है।
ख़ुदावंद आलम की येह ख़ास एनायतें बेअ़्सते अम्बिया (अ़.स.) की शक्ल में ज़ाहिर हुईं। इन्सान की हेदायत और रहनुमाई के लिए हर दौर में नबी आते रहे ताकि हर पह्लू से इन्सान की रहनुमाई कर सकें और फज़ीलातों की मुतलाशी रू़ह को सआदतों और इलाही ख़सलतों के साह़िल से हमकनार कर सकें।
इस ह़क़ीक़त की तरफ़ क़ुरआन ने अपनी मुतअ़द्दिद आयतों में इशारा किया है। एक जगह जनाब इब्राहीम अ़लैहिस्सलाम की ज़बानी इर्शाद होता किः
ख़ुदाया! मेरे फ़र्ज़न्दों पर उन्हीR में से एक पैग़म्बर मब़्ऊस फ़रमा। जो उनके सामने तेरी वाज़े़ह आयतों की तिलावत करे, उन्हें किताब और ह़िकमत की तअ़्लीम दे और उन्हें पाकीज़ा करे, तू अ़ज़ीज़ और ह़कीम है।
(सूरए बक़रा, आयत १२९)
इस आयत में हेदायत और इल्म-ओ-ह़िकमत की तअ़्लीम के अ़लावा एक बात का और तज़्केरा किया गया है और वोह है ‘पाकीज़गीये नफ़्स’ और रू़ह की पाकीज़गी, जिसको इस्तेलाही तौर पर ‘तज़्कियए नफ़्स’ कहते हैं। येह मअ़्नवी और रू़हानी तरबियत अम्बिया (अ़.स.) की बेअ़्सत का एक ख़ास रुक्न है।
पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ़.) की तरबियत-गाह में ऐसे अफ़राद नज़र आते हैं जो इस मअ़्नवी और रू़हानी तरबियत से सरशार थे, फज़ीलातों के दिल-दादा, हक़ीक़तों के मुतलाशी और अअ़्ला सिफ़ात का मुजस्समा थे। जिनकी रू़हानी बलंदियाँ हैं। सलमान, अबूज़र, मिक़दाद, अ़म्मार, मीसम, उवैसे क़र्नी..... येह अफ़राद इसी चमन के गुले सरसब्ज़ हैं।
जिनका वजूद पाकीज़गी और नेकी का सरचश्मा, तमाम बुराइयों से पाक, जुम्ला आलूदगियों से दूर उनकी रग-ओ-पै में बस ख़ुदा का तसव्वुर था। ख़ुदा से हट कर न कुछ चाहते थे और न उस के अ़लावा कोई और फ़िक्र करते थे उनकी रू़ह, उनके क़ल्ब, उनके दिमाग़, उनके अफ़्कार, उनके ख़यालात...... उनके रोएँ रोएँ पर बस ख़ुदा की ह़ुक्मरानी थी।
इसी लिए उनमें से हर एक मुकम्मल इन्सान था बल्कि आने वाली नस्लों के लिए मनारए हेदायत, इन्सान की मअ़्नवी और रू़हानी इतेक़ा में हर एक ने बेपनाह ख़िदमतें अंजाम दी हैं और फज़ीलातों की तरफ़ मुआशरे की रहनुमाई की है।
लेहाज़ा अख़्लाक़, पाकीज़गीये नफ़्स, कोई इज़ाफी चीज़ नहीं है ताकि हम उस की तरफ़ कोई तवज्जोह न दें और अगर मुतवज्जेह भी हों तो उस वक़्त जब ज़िंदगी का कोई और काम न हो हरगिज़ ऐसा नहीं है बल्कि अख़्लाक़, पाकीज़गीये नफ़्स सबसे अहम चीज़ है, ज़िंदगी का एक अहम जुज़ है आली सिफ़ात, पाकीज़गीये नफ़्स, सफ़ाए बातिन वोह अ़ज़ीम और तहदार ख़सलतें हैं जहाँ इन्सान शक्ल-ओ-सूरत के ज़ाहिरी नक़्श-ओ-निगार से गुज़र कर ह़याते मअ़्नवी और ह़क़ीक़ी इन्सानी ज़िंदगी के अअ़्ला मदारिज पर फ़ाएज़ हो जाता है जहाँ उस की निगाहों के सामने से पर्दे हट जाते हैं और वोह उन चीज़ों का मुशाहेदा करता है जिसको देखने से आम निगाहें क़ासिर हैं।
मअ़्नवी ज़िन्दगी और क़ुरआन
मन अ़मे-ल साले़हन मिन ज़-करिन औ उन्सा व हो-व मोअ्मेनुन फ़-ल-नुह्येयन्नहू ह़यातन तय्येबतन
(सूरए नम्ल, आयत ९७)
जिसका (मर्द हो या औरत) किरदार भी अच्छा होगा और ईमान भी हम उसे पाकीज़ा ज़िंदगी अ़ता करेंगे।
या अय्योहल्लज़ी-न आ-मनुस्तजीबू लिल्लाहे व लिर्रसूले एज़ा दआकुम लेमा यु़ह्यीकुम
(सूरए अन्फ़ाल, आयत २४)
ऐ मोअ्मिनो! जब ख़ुदा और रसूल तुम्हें उस चीज़ की दअ़्वत दें जो तुम्हें ज़िंदगी अ़ता करे तो तुम उनकी आवाज़ पर लब्बैक कहो ताकि तुम्हें ज़िंदगी दी जाए।
येह बात बिल्कुल वाज़े़ह है कि जिस ह़यात और पाकीज़ा ज़िंदगी का तज़्केरा इन आयात में किया गया है वोह इस ज़ाहिरी ह़यात से यक़ीनन मुख़्तलिफ़ ज़िंदगी है। और वोह ह़यात, मअ़्नवी ह़यात और रू़हानी ज़िंदगी है जहाँ ज़िंदगी की अ़लामत, नेक किरदार, इन्सानी सिफ़ात, पाकीज़गीये नफ़्स, सफ़ाए बातिन.... है।
इन आयात में जिस पाकीज़ा ज़िंदगी का तज़्केरा किया गया है उसे मजाज़ी न समझना चाहिए बल्कि येह वोह ह़क़ीक़ी ज़िंदगी है जो ऐसे बा ईमान को अ़ता की जाती है जिस का किरदार बलंद होता है। इस ह़क़ीक़ी ज़िंदगी की अ़लामत वोह ख़ास बसीरत, श़ऊर, इदराक और क़ुदरत है जो मोअ्मिन को अ़ता होती है और आम लोगों में जिस का सुराग़ नहीं मिलता है। इस आयत की तफ़सीर में मुफ़स्सिरों ने दूसरी बातें बयान की हैं लेकिन हम ने येह मफ़हूम दौरे ह़ाज़िर के अ़ज़ीम मुफ़स्सिर ह़ज़रत अ़ल्लामा तबातबाई ताब-सराह की गराँ बहा तफ़सीर ‘अल मीज़ान’ से इस्तेफ़ादा किया है।
मअ़्नवी ज़िंदगी किस तरह ह़ासिल होती है?
तमाम दूसरी चीज़ों की तरह मअ़्नवी ज़िंदगी के ह़ुसूल के कुछ शराएत हैं।
मअ़्नवी ज़िंदगी इन्सान के अच्छे किरदार और पाकीज़ा अख़्लाक़ का लाज़िमी नतीजा है। अलबत्ता वोह किरदार और वोह अख़्लाक़ जो आसमानी रहबरों और अख़्लाक़ी मुरब्बियों के बताए हुए नुक़ूश पर तअ़्मीर हुआ हो।
ख़ुदावंद आलम ने अवामिर और नवाही जिसे इस्तेलाही तौर पर ‘तशरीअ़् ‘कहा जाता है और काएनात के वोह ह़क़ाएक़ और अस्रार-ओ-रुमूज़ से जिसे इस्तेलाही तौर पर ‘तक्वीन’ कहा जाता है हम-आहंग हैं। हमारा इल्म चूँकि म़ह्दूद है इस लिए हम काएनात के अस्रार-ओ-रुमूज़ और उनकी मस्ले़हतों से नावाक़िफ़ हैं। इसी लिए हम ह़याते मअ़्नवी के स़ही़ह नुक़ूश से भी बे-ख़बर हैं। लेकिन इमाम (अ़.स.) काएनात के हर अस्रार-ओ-रुमूज़ और उनकी तमाम मस्ले़हतों से वाकि़फ़ हैं। वोह इन ह़क़ाएक़ को एक मेह्रबान और शफ़ीक़ उस्ताद की तरह आम फ़हम अल्फ़ाज़ में इन्सानों के लिए बयान करते हैं ताकि हम उन हेदायतों पर अ़मल करके सआदत-मंद और कामियाब ज़िंदगी बसर करें।
लेहाज़ा दीन ऐसे ह़क़ाएक़ और मआरिफ़ का मज्मूआ है जो आम इन्सानों की फ़ह्म से बालातर है जिसे ख़ुदावंद आलम ने अपने पैग़म्बरों और उनके मअ़्सूम जानशीनों के ज़री़ए हम तक भेजा है ताकि हम ह़याते मअ़्नवी से सरशार हो जाएँ और हमारी सआदत-ओ-कामियाबी यक़ीनी हो जाए।
अगर हम इन अ़हकाम और फ़रामीन की पैरवी करेंगे तो सआदत-मंद होंगे और अगर हम ना-फ़रमानी करेंगे तो नुक़सान में रहेंगे। एक बच्चे की तरह जिसकी तरबियत एक मुअ़ल्लिमे अख़्लाक़ के ज़िम्मे है जहाँ बच्चा मुअ़ल्लिम के इशारों पर अ़मल करता है। जिन चीज़ों का ह़ुक्म देता है उन्हें अंजाम देता है और जिन बातों से रोकता है उस से परहेज़ करता है गरचे बसा-औक़ात उन चीज़ों की ह़क़ीक़त और उनकी मस्ले़हतों से नावाक़िफ़ रहता है। लेकिन तरबियत की मुद्दत गुज़रने के बअ़्द इस बच्चे में अअ़्ला सिफ़ात, इन्सानी ख़सलतें, रू़हानी फ़ज़ीलतें कूट कूट के भर जाती हैं जिसकी बेना पर उस की ज़िंदगी सआदतों से माला-माल और कामियाबियों से सरशार रहती है। अगर येह बच्चा इब्तेदा में मुअ़ल्लिम की हेदायतों पर अ़मल न करे, उस के अ़हकाम की ना-फ़रमानी करे तो कुछ दिनों के बअ़्द मअ़्लूम होगा कि किस क़द्र नुक़सान में है।
रहनुमा कौन?
अब देखना येह है कि इस मअ़्नवी ज़िंदगी में और इस के इतेक़ाई मराहिल में रहबरी के फ़राएज़ कौन अंजाम दे?
क्या आम इन्सान इस ज़िम्मेदारी को निभा सकता है? या रहबरी के फ़राएज़ वोह अंजाम दे जिसकी बातें और जिसके अल्फ़ाज़ सरापा सदाक़त हों जो हर तरह की ख़ता और लि़ग्ज़श से पाक हो यअ़्नी इस्तेलाहन मअ़्सूम हो जो ख़ुद भी ह़याते मअ़्नवी के अअ़्ला तरीन दर्जे पर फ़ाएज़ हो।
क्योंकि जो शख़्स ख़ुद हेदायत याफ़्ता न हो ख़ुदा हरगिज़ उसे दूसरों का रहबर क़रार नहीं देगा। (अ-फ़मन यह्दी एलल ह़क़़्के अ़हक़्क़ो अन युत्त-ब-अ़ अम्मन ला यहिद्दी इल्ला अन युह्दा फ़मा लकुम त़ह्कोमून-सूरए यूनुस आयत ३५) जो ख़ुद हेदायत का मो़हताज हो वोह दूसरों की क्या हेदायत करेगा।
इस के अ़लावा इमामत का मफ़हूम आम और मअ़्मूली हेदायत नहीं है क्योंकि इस मेअ़्यार की हेदायत और रहनुमाई हर मुसलमान का फ़र्ज है ख़ास इमाम की ज़िम्मेदारी नहीं है।
जिस हेदायत की ज़िम्मेदारी इमाम (अ़.स.) को अंजाम देना है वोह ‘हेदायत बेअम्र’ है। जब तक वोह ख़ुद ह़यात मअ़्नवी में डूबा हुआ न हो और जब तक ख़ुद उस पर काएनात के अस्रार-ओ-रुमूज़ मुन्कशिफ़ न हों वोह दूसरों की रहबरी क्यूँकर कर सकेगा।
क़ुरआन की आयतों में ग़ौर करने से वाज़े़ह हो जाता है कि जहाँ इमामत का तज़्केरा किया गया है वहाँ अक्सर इमामत के बअ़्द ‘हेदायत बेअम्र’ का ज़िक्र तौज़ीह और तफ़सीर के उन्वान से किया गया है।
हेदायत बेअम्र क्या है?
अ़हकाम की तअ़्लीम और ज़ाहिरी हेदायत के अ़लावा बातिनी हेदायत और रू़हानी रहनुमाई में भी इमाम (अ़.स.) को वेलायत और ़ह़ाकिमीयत ह़ासिल है।
वोह अफ़राद जिनमें सलाह़ियत और इस्तेअ़्दाद पाई जाती है इमाम उनकी बातिनी तौर पर हेदायत करते हैं और मअ़्नवीयत की इतेक़ाई मंज़िलों की सिम्त उनकी रहनुमाई करते हैं।
इस हेदायत की बुनियाद चूँकि मअ़्नवी फ़ुयूज़-ओ-बरकात और बातिनी-ओ-रू़हानी उमूर पर क़ाएम है इस लिए इस सिलसिलए हेदायत को ‘हेदायत बेअम्र’ कहा जाता है।
बातिनी हेदायत वोह बलंद-ओ-बाला मन्सब है जिस पर अम्बिया (अ़.स.) मन्सबे नबूवत-ओ-रेसालत के बअ़्द फ़ाएज़ होते हैं। ख़ुदावंद आलम ने जनाब इब्राहीम अ़लैहिस्सलाम को नबूवत-ओ-रेसालत के अ़ज़ीम मन्सब के बअ़्द हेदायते मअ़्नवी यअ़्नी इमामत का मन्सब अ़ता फ़रमाया।
इन्नी जा़एलो-क लिन्नासे इमामन
(सूरए बक़रा, आयत १२४)
यक़ीनन हमने आपको लोगों का इमाम क़रार दिया।
इमाम को वेलायते अम्र और हेदायते अम्र का मन्सब ह़ासिल है इस लिए इमाम ऐसे उमूर अंजाम दे सकते हैं जो दूसरों की निगाहों में हैरत-अंगेज और नामुमकिन मअ़्लूम हों।
क़ुरआन इस बात पर गवाह है कि ह़ज़रत ‘सुलैमान’ (अ़.स.) के वज़ीर जनाब ‘आसिफ़ इब्ने बर्ख़िया’ ने पलक झपकने से पहले मल्कए ‘सबा’ का तख़्त उनके सामने हाज़िर कर दिया था। वोह इस बेना पर कि जनाब ‘आसिफ़ इब्ने बर्ख़िया’ इस काएनात के बअ़्ज़ अस्रार-ओ-रुमूज़ और ह़क़ाएक़ का इल्म रखते थे और वोह उस बातिनी निज़ाम से वाकि़फ़ थे जो इस काएनात पर ह़ुक्म फ़रमा है।
हमारे अइम्मा अ़लैहिमुस्सलाम का दर्जा और इल्म आसिफ़ इब्ने बर्ख़िया से कहीं ज़्यादा बलंद और लाम़ह्दूद है। इस बात पर वोह बेशुमार वा़केआत गवाह हैं जो तारीख़ और मोअ़्तबर रवायात के दामन में म़हफ़ूज़ हैं जहाँ इमाम की बातिनी हेदायत और वेलायते अम्र जल्वागर है।
इमाम ख़ुद ह़याते मअ़्नवी और रू़हानी ज़िंदगी के अअ़्ला तरीन नुव़तए इतेक़ा पर फ़ाएज़ हैं। इस बेना पर इमाम में रू़हानी कशिश पाई जाती है जिससे पाक बातिन और ज़ी सलाह़ियत अफ़राद असर क़बूल करते हैं। रू़हानी इतेक़ा की मंज़िलों की तरफ़ क़दम बढाते और अपने दिल-ओ-दिमाग़ को ह़यात नौ से आश्ना करते और मअ़्नवी फ़ज़ीलतों से लुत्फ़ अ़ंदोज़ होते हैं। ज़ैल में चंद अफ़राद का तज़्केरा करेंगे जो इमाम की हेदायते मअ़्नवी से बहरा-मंद हुए हैं। जिनके किरदार पर तारीख़ फ़़ख्र-ओ-मुबाहात कर रही है।
(१) मदे दमश्क़ी
‘अ़ली इब्ने ख़ालिद’ ज़ैदी थे (यअ़्नी इमाम ज़ैनुल आबेदीन अ़लैहिस्सलाम के बअ़्द दूसरे इमामों के मोअ़्तक़िद नहीं थे। और इमाम मो़हम्मद तक़ी अ़लैहिस्सलाम के हम अ़स्र थे।
अ़ली इब्ने ख़ालिद का बयान है किः मैं इराक़ के शह्र सामर्रार् में था। वहाँ मुझे येह ख़बर मिली कि दमिश्क़ से एक शख़्स को यहाँ लाकर क़ैद किया गया है जो पैग़म्बर होने का दअ़्वा कर रहा है।
मैं उस की मुलाक़ात को गया और उस से उस की सरगुज़श्त दरियाफ़्त की।
उसने कहा शाम में जिस जगह इमाम हुसैन अ़लैहिस्सलाम का सरे अव़दस रखा गया था वहाँ में एबादत किया करता था एक शब नागाह एक शख़्स को अपने सामने देखा उसने मुझसे कहा उठो।
मैं लाश़ऊरी तौर पर उठ खड़ा हुआ और चंद क़दम उस के साथ चला कि अपने को मस्जिदे कूफ़ा में पाया।
फ़रमायाः क्या तुम इस मस्जिद को जानते हो।
अ़र्ज़ कियाः जी हाँ येह मस्जिदे कूफ़ा है।
उन्होंने वहाँ नमाज़ पढी मैं ने भी उनके साथ नमाज़ अ़दा की। इस के बअ़्द उनके हमराह चल दिया अभी चंद क़दम ही गया था कि अपने को मस्जिदे मदीना में पाया।
उन्होंने रसूले ख़ुदा सल्लल्लाहो अ़लैहे व आलेही व सल्लम पर दुरूद भेजा। हम दोनों ने वहाँ नमाज़ें पढीं।
वहाँ से बाहर निकले और चंद क़दम चलने के बअ़्द अपने को मक्का में पाया। तवाफ़ किया और वहाँ से रवाना हो गए और थोड़ी देर बअ़्द अपने को वहीं दमिश्क़ में पाया जहाँ मैं एबादत किया करता था उस के बअ़्द वोह शख़्स मेरी निगाहों से ओझल हो गया।
गोया नसीमे सुब्ह थी जिसकी चंद नर्म-ओ-लतीफ़ लहरें आईं और ख़त्म हो गईं।
इस वा़केआ को एक साल का अ़र्सा गुज़र गया। साल भर के बअ़्द फिर उसी शख़्स की ज़ेयारत नसीब हुई। पहली मर्तबा की तरह इस मर्तबा भी तमाम सफ़र किए और उस बुज़ुर्ग की हमराही में गुज़श्ता सफ़र की तरह सारी चीज़ें अंजाम दीं इस मर्तबा जब मैं अपनी जगह वापस पहुँचा जिस वक़्त वोह शख़्स जाने लगा मैंने उनसे कहाः
क़सम है आपको उस ज़ात की जिसने आपको येह क़ुदरत-ओ-तवानाई अ़ता फ़रमाई है! अपना तआरुफ़ कराइए।
फ़रमायाः मैं मु़हम्मद इब्ने अ़ली इब्ने मूसा इब्ने जअ़्फ़र (यअ़्नी मो़हम्मद तक़ी) हूँ।
जिससे भी मुलाक़ात होती थी मैं येह वा़केआ उस से बयान कर देता था रफ़्ता-रफ़्ता इस वा़केआ की ख़बर ‘‘मु़हम्मद इब्ने अ़ब्दुलमलिक ज़य्यात’’ तक पहुँची। उसने मेरी गिरफ़्तारी का ह़ुक्म दिया और येह मशहूर किया कि मैं पैग़म्बरी का दअ़्वेदार हूँ और इस वक़्त जैसा कि तुम देख रहे हो उस के क़ैदख़ाना में क़ैद-ओ-बंद की ज़िंदगी गुज़ार रहा हूँ।
मैंने इस से कहा तुम मुझे इस बात की इजाज़त देते हो कि स़ही़ह वा़केआत से मो़हम्मद इब्ने अ़ब्दुलमलिक को बाख़बर करूँ हो सकता है उस को स़ही़ह वा़केआ न मअ़्लूम हो।
उसने कहाः लिखो तुम्हें इजाज़त है।
मैंने पूरा वा़केआ मु़हम्मद इब्ने अ़ब्दुलमलिक को लिखा। उसने मेरे जवाब में लिखा किः
‘उस से कह दो कि जो शख़्स उसे एक शब में शाम से कूफ़ा, मदीना और मक्का ले गया और वहाँ से फिर वापस शाम ले आया उसी से रिहाई तलब करे। वही उस को क़ैदख़ाना से नजात दिलाए।
येह जवाब सुनकर मुझे बड़ी शारंमदगी हुई और मायूसी भी।
दूसरे दिन सुबह (सुब़्ह) क़ैदख़ाना गया ताकि उसे जवाब से बाख़बर कर दूँ और सब्र-ओ-इस्तेक़ामत की तल्क़ीन करके उस का ़हौसला बढाऊँ।
जब मैं क़ैदख़ाना पहुँचा तो देखा कि काफ़ी तअ़्दाद में सिपाही और दूसरे अफ़राद क़ैदख़ाना के इर्द गिर्द तलाश कर रहे हैं मैंने उनसे दरियाफ़्त किया कि क्या तलाश कर रहे हो।
कहने लगे वोह क़ैदी जो पैग़म्बरी का दअ़्वा कर रहा था वोह क़ैदख़ाना में नहीं है, नहीं मअ़्लूम कहाँ गया ज़मीन निगल गई कि आसमान उठा ले गया।
अ़ली इब्ने ख़ालिद का बयान है कि इस वा़केआ के बअ़्द में ज़ैदी मज़हब से दस्त-बरदार हो गया। और मो़हम्मद तक़ी अ़लैहिस्सलाम की इमामत का क़ाएल हो गया और उनके शीओं में शामिल हो गया।
(इर्शादे मुफ़ीद, स॰ ३०४-३०५)
मीसमे तम्मार
क़ाफ़ेलए तक़्वा और परहेज़गारी के क़ाफ़ेला सालार, नेकूकारों के इमाम, पाक तीनतों के रहनुमा ह़ज़रत अ़ली इब्ने अबी तालिब अ़लैहिस्सलाम ने जनाब मीसम को ख़रीदा और आज़ाद कर दिया। उनसे दरियाफ़्त किया किः तुम्हारा नाम क्या है?
सालिम
मैंने पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ़.) की ज़बानी सुना है कि तुम्हारा अस्ली नाम ‘मीसम’ है।
आँह़ज़रत (स.अ़.) ने सच्च फ़रमाया और आपने भी स़ही़ह फ़रमाया मेरा अस्ली नाम ‘मीसम’ है।
जो नाम पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ़.) ने बयान फ़रमाया है उसी को इख़्तेयार करो और दूसरे नामों को तर्क कर दो।
इस तरह ह़ज़रत अ़ली अ़लैहिस्सलाम ने एक ग़ुलाम को ख़रीद कर आज़ाद कर दिया लेकिन अपनी शफ़क़त और मो़हब्बत से उस को हमेशा के लिए अपना गिरवीदा कर लिया और वोह रिश्ता उस्तवार किया कि मौत भी उसे मुन्क़तअ़् न कर सकी, दुनिया-भर की साज़िशें इन दोनों में जुदाई न डाल सकीं।
मीसम वोह बंदए आज़ाद थे जिनमें सलाह़ियतें कूट कूट कर भरी हुई थीं। ह़ज़रत अ़ली अ़लैहिस्सलाम की तरबियत में रफ़्ता-रफ़्ता पोशीदा सलाह़ियतें ज़ाहिर होती रहीं। मौला की तअ़्लीम ने इस को गौहरे आब-दार बना दिया यहाँ तक कि मीसम ह़ज़रत अ़ली अ़लैहिस्सलाम के ख़ासुल-ख़ास अस्ह़ाब में शुमार होने लगे।
अस्रार-ओ-रुमूज़ से वाकि़फ़ हुए और ह़क़ाएक़ का इल्म ह़ासिल किया। मौलाए काएनात पर दिल-ओ-जान से आशिक़ हुए जैसे ख़ुश्क घास और अब्रे बाराँ, वोह अ़ली अ़लैहिस्सलाम की तअ़्लीमात से दिल-ओ-दिमाग़ मुनव्वर करते और उन्हीं में डूबे हुए थे। चश्म-ओ-अब्रू के इशारों पर ज़िंदगी बसर करते, उनको देखकर अपने वजूद में रोशनियाँ जमअ़् करते यहाँ तक कि ख़ुद नूर हो गए। और इस से उनको वोह लज़्ज़त ह़ासिल होती थी जिसके मुक़ाबले में सारी दुनिया की नेअ़्मतें हीच थीं।
एक दिन ह़ज़रत अ़ली अ़लैहिस्सलाम ने उनसे फ़रमायाः
मेरे बअ़्द तुम्हें सूली दी जाएगी! तुम्हारे जिस्म को अस्ल़हे से ज़ख़्मी किया जाएगा। तीसरे दिन तुम्हारी दा़ढी, तुम्हारी नाक और दहन के ख़ून से रंगीन होगी तुम्हें अ़म्र इब्ने हरीस के घर के पह्लू में दार पर च़ढाया जाएगा! तुम्हारे साथ ९ आदमियों को सूली दी जाएगी। तुम्हारे दार की लकड़ी सबसे छोटी होगी। आओ चलो! उस दरख़्ते ख़ुरमा की तरफ़ चलें जिसकी शाख़ पर तुम लटकाए जाओगे।
ह़ज़रत अ़ली अ़लैहिस्सलाम ने वोह दरख़्त मीसम को दिखला दिया। इस वा़केआ को एक मुद्दत गुज़र गई।
यहाँ तक कि ह़ज़रत अ़ली अ़लैहिस्सलाम शहीद कर दिए गए।
बनी उमय्या अ़वाम पर बाक़ा़एदा मुसल्लत हो गए।
मीसम बराबर उस दरख़्त के पास जाते थे। वहाँ नमाज़ पढ़ते थे और उस दरख़्त से बातें करते थे।
ऐ दरख़्त ख़ुदा तुझे बरकत दे - मैं तेरे लिए पैदा किया गया हूँ और तू मेरे लिए नश्व-ओ-नुमा कर रहा है।
जिस साल जनाब मीसम शहीद होने वाले थे उस साल वोह मक्का तशरीफ़ ले गए ख़ानए कअ़्बा की ज़ेयारत का शर्फ़ ह़ासिल किया और जनाब ‘उम्मे सलमा’ से मुलाक़ात की।
जनाब ‘उम्मे सलमा’ ने उनसे फ़रमाया मैंने पैग़म्बर (स.अ़.) से तुम्हारा नाम बारहा सुना है वोह ह़ज़रत अ़ली (अ़.स.) से तुम्हारे बारे में बराबर ताकीद फ़रमाया करते थे।
मीसम ने उनसे इमाम हुसैन अ़लैहिस्सलाम के बारे में दरियाफ़्त किया। मअ़्लूम हुआ इमाम शह्र से बाहर तशरीफ़ ले गए हैं, कहा इमाम की ख़िदमत में मेरा सलाम पहुँचा दीजिएगा और कह दीजिएगा कि अ़न्क़रीब हम और आप दूसरी दुनिया में ख़ुदा के हुज़ूर में एक दूसरे से मुलाक़ात करेंगे।
जनाब उम्मे सलमा ने इत्र मँगवाया कि मीसम की डा़ढी को मुअ़त्तर किया जाए उस के बअ़्द फ़रमाया कि बहुत जल्द (मो़हम्मद व आले मो़हम्मद की दोस्ती की बेना पर तुम्हारी डा़ढी तुम्हारे ख़ून से रंगीन की जाएगी।
मीसम कूफ़ा पहुँचे इब्ने ज़ेयाद के सिपाही उन्हें गिरफ़्तार करके इब्ने ज़ेयाद के पास ले गए। वहाँ येह गुफ़्तुगू हुईः-
- तुम्हारा ख़ुदा कहाँ है?
- मेरा ख़ुदा सितमगारों की ताक में है। तू भी उनमें से एक है।
- तुम्हारे मौला अ़ली (अ़.स.) ने तुम्हारे और मेरे बारे में क्या कहा है?
- फ़रमाया है किः तुम मुझे ९ आदमियों के साथ सूली दोगे और मेरे दार की लकड़ी सबसे छोटी होगी।
- मैं तुम्हारे मौला की बातों की मुख़ालेफ़त करना चाहता हूँ कि मैं तुम्हें एक दूसरे तरीक़े से क़त्ल करूँगा।
- तुम येह काम क्यूँकर कर सकते हो? मेरे मौला ने येह बात पैग़म्बर (स.अ़.) से सुनी और पैग़म्बर (स.अ़.) को जिब्रईल ने ख़बर दी है। क्या तुम ख़ुदा की मुख़ालेफ़त करोगे? मैं अपनी शहादत की जगह को भी जानता हूँ और मैं वोह पहला मुसलमान हूँ जिसके मुँह में लगाम लगाई जाएगी।
येह सुनकर उबैदुल्लाह इब्ने ज़ेयाद ग़ुस्से से भर गया और उसने ह़ुक्म दिया कि इस वक़्त मीसम को क़ैद कर दिया जाए। उसी क़ैदख़ाना में मीसम की मुलाक़ात मुख़तार सक़फ़ी से हुई और उन्हें आज़ादी की बशारत दी और कहाः
तुम ह़ज़रत सय्यदुश्शोहदा इमाम हुसैन अ़लैहिस्सलाम के ख़ून के इंतेक़ाम में इब्ने ज़ेयाद को क़त्ल करोगे और .... ऐसा ही हुआ।
जनाब मीसम को क़ुर्बानगाह की तरफ़ ले गए ....मंज़िले परवाज़ रू़हे जहाँ से अअ़्ला तरीन और बलंद तरीन रू़हानी इतेक़ा की मंज़िलें तै होती हैं जहाँ इन्सान माद्दी क़ुयूद से आज़ाद हो जाता है और मलकूते अर्ज़ी-ओ-समावी में परवाज़ करता है। मीसम को ‘अ़म्र इब्ने हरीस’ के पह्लू में उसी दरख़्त की लकड़ी पर सूली दी गई जिसको वोह बहुत पहले से पहचानते थे। अ़वाम उनके गिर्द जमअ़् हो गए। दार की बलंदी को मिम्बर क़रार देकर ह़ज़रत अ़ली अ़लैहिस्सलाम के फ़ज़ाएल बयान करना शुरूअ़् किए लोगों की निगाहों से पर्दे हटाए, अ़ली अ़लैहिस्सलाम के फ़ज़ाएल से दिल मुनव्वर किए, उनको नई रोशनी अ़ता की।
इब्ने ज़ेयाद को ख़बर दी गई कि मीसम ने तुम्हें ज़लील-ओ-रुस्वा कर दिया।
उसने ह़ुक्म दिया कि उनके मुँह में लगाम लगाओ ताकि... कुछ कह न सकें..... अस्ल़हे से उनको ज़ख़्मी किया गया, बिल्कुल उसी तरह जिस तरह ह़ज़रत अ़ली अ़लैहिस्सलाम ख़बर दे गए थे .....
मीसम ‘‘अल्लाहो अकबर’’ कह रहे थे। तीसरे दिन के आख़िरी लम़्हात में मीसम की नाक और दहन से ख़ून जारी हुआ जिससे उनकी दा़ढी रंगीन हो गई और मीसम दार पर फूल की तरह खिल गए........
ख़ुदा की बेपनाह रह्मतें और सलाम हो जनाब मीसम पर।
(इर्शादे मुफ़ीद, स़ १५२-१५४)
उवैसे क़र्नी
पैग़म्बरे इस्लाम (अ़.स.) ने इर्शाद फ़रमाया किः
‘क़र्न’ की तरफ़ से जन्नत की ख़ुश्बू आ रही है। ऐ उवैसे क़र्नी मैं तुम्हारी मुलाक़ात का बहुत ज़्यादा मुश्ताक़ हूँ, जो भी उनसे मुलाक़ात करे मेरा सलाम उन तक पहुँचा दे।’
(सफ़ीनतुल बेह़ार, जि॰ १, स॰ ५३)
जिस वक़्त लोगों ने’ ज़ी क़ार’ के मुक़ाम पर ह़ज़रत अ़ली अ़लैहिस्सलाम की बैअ़त की उस वक़्त आपने फ़रमाया कि कूफ़ा से एक हज़ार (न एक कम न एक ज़्यादा सिपाही आएँगे और मेरी बैअ़त करेंगे......
जब वोह आ गए
इब्ने अब्बास ने सिपाहियों को शुमार क्या वोह ९९९ थे। उन्हें बहुत ज़्यादा तअ़ज्जुब हुआ कि एक कम क्यों है?
कुछ ही देर गुज़री थी कि एक शख़्स ऊनी लेबास पहने तलवार-ओ-सिपर और सारे जंगी सामान लिए ह़ज़रत अ़ली अ़लैहिस्सलाम की ख़िदमत में हाज़िर हुआ और कहने लगाः
मैं ज़िंदगी के आख़िरी लम़्हात और जाँनिसारी की आख़िरी हद तक आपके हाथों पर बैअ़त करना चाहता हूँ।
ह़ज़रत अ़ली अ़लैहिस्सलाम ने दरियाफ़्त फ़रमायाः तुम्हारा क्या नाम है?
- उवैस
- तुम वही उवैसे क़र्नी हो?
- जी हाँ!
- अल्लाहो अकबर’। मेरे आक़ा पैग़म्बरे ख़ुदा (स.अ़.) ने मुझे ख़बर दी थी कि मैं उनके एक पैरवकार को देखूँगा जिसका नाम उवैसे क़र्नी होगा जो ख़ुदा और रसूल के गिरोह में होगा उसे शहादत नसीब होगी और बेशुमार अफ़राद की शेफ़ाअ़त करेगा।
(इर्शादे मुफ़ीद, स॰ १४९)
चुनान्चे ऐसा ही हुआ। ह़ज़रत अ़ली अ़लैहिस्सलाम की तरफ़ से जंग करते हुए शहीद हुए।
(असदुलग़ाबा, जि॰ १, स॰ १५२)
जनाब उवैस मअ़्नवीयत और रू़हानियत की बलंद मंज़िलों पर फ़ाएज़ थे। एबादत से ख़ास लज़्ज़त मिलती थी, दुनियावी चीज़ों की तरफ़ कोई तवज्जोह न थी।
(अअ़्यानुश्शीआ, जि॰ १३, स॰ ८१-९३, तबअ़् दुवुम)
जनाब उवैस की रू़हानी बलंदियाँ उनके कलेमात से ज़ाहिर हैं। फ़रमाते थेः
ख़ुदा की क़सम मौत का तसव्वुर और आख़ेरत का ख़ौफ़ साहेबे ईमान को दुनिया में शादमानी का मौक़अ़् अ़ता नहीं करता।
अम्र बिल मअ़्रूफ़ और नही अज़ मुन्कर के सिलसिले में हमें गालियाँ देते हैं, तोह्मत लगाते हैं। इन तमाम बातों के बावजूद हम सिर्फ़ ख़ुदा के लिए काम करते हैं।
(सफ़ीनतुल बेह़ार, जि॰ १, स॰ ५३)
(४) क़म्बर
जनाब क़म्बर भी उन आज़ाद लोगों में शामिल हैं जिन पर पैग़म्बर सल्लल्लाहो अ़लैहे व आलेही व सल्लम और अ़ली अ़लैहिस्सलाम के किरदार की शुआ़़एँ पड़ीं और ज़र्रा आफ़ताब बन कर चमकने लगा।
राहे रास्त पर चलने और ह़क़ बात कहने से उन्हें कोई ख़ौफ़-ओ-ह़ेरास न था। दुनिया वालों की नज़र में वोह सिर्फ़ एक ग़ुलाम थे लेकिन मअ़्नवीयत के उस बलंद दर्जे पर फ़ाएज़ थे कि ह़ज़रत अ़ली अ़लैहिस्सलाम के राज़दाँ हो गए।
हज्जाज इब्ने यूसुफ़ (तारीख़ी सितमगरी का ख़ून आशाम ह़ुक्मराँ) से गुफ़्तुगू करते वक़्त जनाब क़म्बर ने जो ह़क़ाएक़ में डूबे कलेमात अदा किए हैं वोह आज भी तारीख़ के दामन में म़हफ़ूज़ हैं।
हज्जाज ने पूछाः
- तुम अ़ली की ख़िदमत में क्या करते थे?
- मैं उनके लिए वुज़ू का पानी लाता था।
- वुज़ू करने के बअ़्द वोह क्या कहते थे?
- इस आयत की तिलावत करते थे किः
फलम्मा नसू मा ज़ुक्केरू बेही फ़-त़ह्ना अ़लैहिम अब्वा-ब कुल्ले शैइन....
(सूरए अन्आम, आयत ४४-४५)
जब उन्होंने हमारी याद आवरीयाें को भुला दिया हमने तमाम दरवाज़े उनके लिए खोल दिए ताकि वोह हमारी चीज़ों से लुत्फ़ अ़ंदोज़ होने लगें (उस वक़्त) हम उन्हें यकबारगी गिरफ़्तार कर लेंगे, सर झुकाए हुए मायूस-ओ-नाउम्मीद उनके पास कोई दलील-ओ-उज़्र न होगा। जिन लोगों ने ज़ुल्म-ओ-सितम किया है उनका सिलसिला मुन्क़तअ़् हो जाएगा। वल़हम्दो लिल्लाहे रब्बिल आ-लमी-न....
- मेरा ख़याल येह है कि वोह इस आयत की तावील हमारे ऊपर करते थे। क़म्बर ने शुजाअत-ओ-शहामत के साथ कहाः
- हाँ यक़ीनन।
- अ़गर तुम्हें क़त्ल करूँ तो क्या करोगे?
- मैं सआदत-मंद हो जाऊँगा और तुम सख़्त नुक़सान उठाओगे।
(बेह़ार, जि॰ ४२, स॰ १३५-१३६)
- अ़पने मौला अ़ली अ़लैहिस्सलाम से बेज़ारी का एअ़्लान करो।
- अ़गर मैं उनके दीन से बेज़ार हो जाऊँ तो क्या तुम उनके दीन से बेहतर और दीन बता सकते हो?
(हज्जाज ने इस सवाल का कोई जवाब न दिया और कहाः)
मैं तुम्हारा क़ातिल हूँ जिस तरह कहो उस तरह तुम्हें क़त्ल करूँ।
- इस सिलसिले में तुम्हें इख़्तेयार देता हूँ।
- क्यों?
- इसलिए कि जिस तरह तुम यहाँ मुझे क़त्ल करोगे उसी तरह आख़ेरत में मैं तुम्हें क़त्ल करूँगा।
मेरे मौला ह़ज़रत अ़ली अ़लैहिस्सलाम ने मुझे ख़बर दी है कि मुझे नाहक़ क़त्ल किया जाएगा।
चुनांचे हज्जाज ने ह़ुक्म दिया.... और जनाब क़म्बर का सर-क़लम कर दिया गया।
(इर्शादे मुफ़ीद, स॰ १५५)