जानशीन पैग़म्बर
अलग़दीर और अ़ल्लामा अमीनीः ग़दीर के मौज़ूअ़् पर आलमी किताब ‘अलग़दीर’ जो ह़ज़रत अ़ल्लामा मुजाहिद शैख़ अ़ब्दुल ह़ुसैन अमीनी अ़लैहिर्रह़्मा की अन्थक कोशिशों का नतीजा है। येह किताब अ़ल्लामा अमीनी की सारी ज़िंदगी की तलाश-ओ-जुस्तुजू का मा-ह़सल है। येह किताब अ़रबी में है और अभी तक ग्यारह जिल्दें छप चुकी हैं। किताब की सलासत आबे सबील की तरह और मतालिब का इस्ते़हकाम पहाड़ों की तरह ओलमाए अह्ले सुन्नत के बक़ौल इस किताब ने तशैयोअ़् की ह़क़्क़ानियत साबित कर दी और तअ़स्सुब की वोह ख़लीज पाट दी जो इन दोनाें फ़िक़ाे के दरमियान थी। अ़ल्लामा अमीनी पर हमेशा अल्लाह की बे शुमार नेअ़्मतें नाज़िल हों। इस सबक़ में अलग़दीर से काफ़ी इस्तेफ़ादा किया गया है।
शीआ इस्नाअ़शरी का अ़क़ीदा येह है कि रसूले ख़ुदा सल्लल्लाहो अ़लैहे व आलेही व सल्लम के बअ़्द उम्मते इस्लामिया की क़यादत और रहबरी अ़ली अ़लैहिस्सलाम और उनके बअ़्द उनके ग्यारह मअ़्सूम फ़र्ज़न्दों का ह़क़ है और इस अ़क़ीदे की सेहत पर आफ़ताब की तरह ऐसी रोशन और वाज़े़ह दलीलें मौजूद हैं कि हर इंसाफ़ पसंद के लिए शक-ओ-शुब्हा की गुंजाइश नहीं है।
जनाब जाबिर इब्ने अ़ब्दुल्लाह अंसारी रसूले ख़ूदा सल्लल्लाहो अ़लैहे व आलेही व सल्लम के ख़ास अस्ह़ाब में हैं। आप फ़रमाते हैं किः जिस दिन आयत एताअ़ते ख़ुदा, रसूल और उलिल अम्र नाज़िल हुई, (अती़उल्ला-ह व अती़उर्रसू-ल व उलिल अम्रे मिन्कुम सूरए निसा, आयत ५९) रसूले ख़ुदा सल्लल्लाहो अ़लैहे व आलेही व सल्लम की ख़िदमत में अ़र्ज़ किया कि ख़ुदा और उस के रसूल को पहचानता हूँ लेकिन उलिल अम्र से कौन अफ़राद मुराद हैं?
फ़रमायाः वोह सब इमाम हैं और मेरे जानशीन हैं। सबसे पहले ह़ज़रत अबू तालिब (अ़.स.) के फ़र्ज़न्द अ़ली (अ़.स.) हैं उस के बअ़्द ह़सन, ह़ुसैन, अ़ली इब्निल हुसैन, मो़हम्मद इब्ने अ़ली तौरेत में उनका नाम बाक़िर म़र्कूम है और ऐ जाबिर!तुम उनसे मुलाक़ात करोगे उस वक़्त उनकी ख़िदमत में मेरा सलाम पहुँचा देना और उनके बअ़्द जअ़्फ़र इब्ने मो़हम्मद अस्सादिक़, मूसा इब्ने जअ़्फ़र, अ़ली इब्ने मूसा, मो़हम्मद इब्ने अ़ली, अ़ली इब्ने मो़हम्मद, ह़सन इब्ने अ़ली और आख़िर में हसन इब्ने अ़ली के फ़र्ज़न्द होंगे जिनका नाम मेरा नाम जिनकी कुनियत (पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ़.) का नाम ‘मो़हम्मद’ और कुनियत ‘अबुल क़ासिम’ है। मुन्तख़बुल असर, स॰ १०१ नक़्ल अज़ केफ़ायतुल असर, मोअल्लिफ़ ने पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ़.) से इस तरह की ५० ह़दीसें नक़्ल की हैं जिस में बारह इमामों के नाम बताए गए हैं।) मेरी कुनियत होगी।
(अरबी ज़बान में वोह नाम जिस में पहले ‘अब’ या ‘उम’ लगा हो उस को कुनियत कहते हैं।)
पहले इमाम
कोई भी समाज किसी भी वक़्त एक रहबर की क़यादत से बेनियाज़ नहीं हो सकता। हर वक़्त और हर जगह मुआशेरे को रहनुमा की ज़रूरत है। येह वोह ह़क़ीक़त है जिस पर सब ही मुत्तफ़िक़ हैं इस ह़क़ीक़त को बुनियाद बनाते हुए बात को आगे बढाते हैं।
अगर रहनुमा को मुआशेरे का दर्द है और वोह मुआशेरे की बक़ा का ख़ाहाँ है तो मुआशेरे की ह़ेफ़ाज़त उसका फ़रीज़ा है। अपनी ज़िम्मेदारियों का ए़हसास करते हुए और अपने इल्म, क़ुदरत और दूर अंदेशी के सहारे मुआशेरेे के ह़ाल और मुस्तक़बिले बईद की भी फ़िक्र करे, समाज की फ़लाह-ओ-बहबूदी और कामियाबी-ओ-सआदत के लिए जामेअ़् मन्सूबा पेश करे।
यही वजह है कि जब कोई रहनुमा या ह़ुक्मराँ मुसाफ़िरत करता है तो चंद दिन की अ़दम मौजूदगी के लिए भी अपना नाएब मुअ़य्यन करता है।
ख़ानदान का बुज़ुर्ग, मदरेसा का प्रिंसिपल, कारख़ाने का मालिक अपनी मुख़्तसर सी ग़ैबत में अपना जानशीन मुअ़य्यन करता है और अपनी अ़दम मौजूदगी के ज़माने में अपने जानशीन की एताअ़त और फ़र्मार्ंबरदारी का दूसरों को ह़ुक्म देता है। येह बात इस क़द्र वाज़े़ह है कि इस के लिए किसी दलील की ज़रूरत नहीं है।
दूर अंदेश और मेह्रबान पैग़म्बर (स.अ़.)
पैग़म्बर अकरम सल्लल्लाहो अ़लैहे व आलेही व सल्लम जो इस्लामी समाज के रहनुमा और क़ाएद थे उनकी भी रविश यही थी। जो लोग इस्लाम क़बूल फ़रमाते थे उनकी तअ़्दाद कितनी मुख़्तसर क्यों न हो पैग़म्बर अकरम सल्लल्लाहो अ़लैहे व आलेही व सल्लम उनके लिए एक रहनुमा ज़रूर मुअ़य्यन फ़रमाते थे उसी के ज़रीए अ़हकाम नाफ़िज़ होते थे।
लश्कर को जेहाद के लिए रवाना करते वक़्त सरदार मुअ़य्यन फ़रमाते थे और कभी कई सरदार मुअ़य्यन फ़रमाते ताकि अगर एक शहीद हो जाए तो लश्कर बग़ैर सरदार के न रहे और दूसरा उस की जगह ले ले।
हमारे सामने ऐसे नाम भी हैं कि जब पैग़म्बर अकरम सल्लल्लाहो अ़लैहे व आलेही व सल्लम मदीना से बाहर तशरीफ़ ले जाते थे तो उन्हें मदीना में अपना जानशीन मुक़र्रर करते थे। ताकि आँह़ज़रत सल्लल्लाहो अ़लैहे व आलेही व सल्लम की अ़दम मौजूदगी में मदीना बग़ैर रहनुमा के न रहे।
(वोह किताबें जो तारीख़े इस्लाम पर लिखी गई हैं जैसे सीरत इब्ने हेशाम वग़ैरह उनकी तरफ़ रुजूअ़् किया जाए।)
शीओं का कहना है कि इस अ़क़्ली दलील की रोशनी में येह बात क्यूँकर मुम्किन है कि पैग़म्बर अकरम सल्लल्लाहो अ़लैहे व आलेही व सल्लम दुनिया से रे़हलत फ़रमाएँ और अपना कोई जानशीन मुअ़य्यन न फ़रमाएँ?
- मुंदर्जा ज़ैल बातों में अ़क़्ल किस की ताईद करती है?
- पैग़म्बर अकरम सल्लल्लाहो अ़लैहे व आलेही व सल्लम की रे़हलत के बअ़्द इस्लामी समाज को रहनुमा की ज़रूरत न थी? याः
- पैग़म्बर अकरम सल्लल्लाहो अ़लैहे व आलेही व सल्लम अपने इंतेक़ाल के बअ़्द इस्लामी मुआशरे की अहम्मीयत के क़ाएल न थे? याः
- मुआशरे से आँह़ज़रत सल्लल्लाहो अ़लैहे व आलेही व सल्लम की दिलचस्पी ख़त्म हो गई। याः किसी को जानशीनी के लाएक़ नहीं पाते थे?
इन बातों में कौन सी बात स़ही़ह है? और कौन सी बात अ़क़्ल की कसौटी पर पूरी उतरती है?
पैग़म्बर अकरम सल्लल्लाहो अ़लैहे व आलेही व सल्लम के दिल में उम्मत का जो दर्द था - उम्मत के मसाएल में किस तरह उनके शरीके ह़ाल रहते थे और उनकी मुश्किलात के हल में कितना ज़्यादा कोशाँ रहते थे। जगह जगह रहनुमा और सरदार मुअ़य्यन फ़रमाते थे। ऐसी सूरत में क्योंकर मुम्किन है कि पैग़म्बर अकरम सल्लल्लाहो अ़लैहे व आलेही व सल्लम ने इतने अ़ज़ीम मसअले को नज़र अंदाज फ़रमाया।
इन ह़क़ाएक़ को मद्दे नज़र रखते हुए शीओं ने तारीख़े इस्लाम के इब्तेदाई माख़ज़ की छान बीन शुरूअ़् की। इस जुस्तजू में ऐसी बेपनाह चीज़ें दरियाफ़्त हुईं जिनसे वाज़े़ह हो गया कि पैग़म्बर अकरम सल्लल्लाहो अ़लैहे व आलेही व सल्लम ने जानशीनी के सिलसिले में कितने रोशन नुक़ूश और अ़हकाम सादिर फ़रमाए हैं।
जैसे - आयते वेलायत, ह़दीसे ग़दीर, ह़दीसे सफ़ीना, ह़दीसे सक़लैन, ह़दीसे ह़क़, ़ह़दीसे मंज़ेलत, ह़दीसे दअ़्वते ज़ुल अ़शीरा और बहुत सारी चीज़ें जो मोअ़्तबर किताबों में तफ़्सील-ओ-त़हक़ीक़ के साथ मौजूद हैं। आपकी इंसाफ़ पसंदी पर भरोसा करते हुए सिर्फ़ ह़दीसे ग़दीर का ज़िक्र करते हैं।
ह़दीसे ग़दीर
सन १० हिजरीी में पैग़म्बर अकरम सल्लल्लाहो अ़लैहे व आलेही व सल्लम ने ह़ज की नीयत से मक्का का सफ़र किया। पैग़म्बर अकरम सल्लल्लाहो अ़लैहे व आलेही व सल्लम ने येह ह़ज अपनी ज़िंदगी के आख़िरी अय्याम में अंजाम दिया। इसी लिए तारीख़ में इस ह़ज को हज्जतुल वेदाअ़् यअ़्नी अल वेदा़ई ह़ज कहा जाता है।
आशिक़ाने नबूवत-ओ-रेसालत जो इस तारीख़ी सफ़र में पैग़म्बर के हम सफ़र थे और अअ़्माले ह़ज की जुज़्ईयात मअ़्लूम करना चाहते थे, मुवरेर्ख़ीन ने उनकी तअ़्दाद एक लाख बीस हज़ार बताई है और काफ़ी लोग मक्का में आप से मुलि़्हक़ हुए।
फ़रीज़ए ह़ज की अदाएगी के बअ़्द जब पैग़म्बर इस्लाम सल्लल्लाहो अ़लैहे व आलेही व सल्लम मदीना वापस तशरीफ़ ला रहे थे। ज़िल हिज्जा की अट्ठारह तारीख़ को’ ग़दीरे ख़ुम’ में येह आयत नाज़िल हुईः
या अय्योहर्रसूलो बल्लिग़ मा उन्ज़े-ल इलै-क मिन रब्बे-क व इन लम तफ़-अ़ल फ़मा बल्लग़-त रेसा-ल-तहू वल्लाहो यअ़्सेमो-क मिनन्नासे इन्नल्ला-ह ला यह्दिल क़ौमल काफ़ेरी-न
(सूरए माएदा, आयत ६७)
ऐ पैग़म्बर सल्लल्लाहो अ़लैहे व आलेही व सल्लम !वोह बात पहुँचा दीजिए जो आपके परवरदिगार ने आप पर नाज़िल फ़रमाई है अगर नहीं पहुँचाया तो उस की रेसालत को अंजाम नहीं दिया। ख़ुदा आपको लोगों के शर से म़हफ़ूज़ रखेगा।
मअ़्लूम हो रहा है कि एक अ़ज़ीम और अहम पैग़ाम को पहुँचाने की ज़िम्मेदारी ख़ुदा की तरफ़ से पैग़म्बर (स.अ़.) पर आएद की गई है।
लोग आपस में आहिस्ता-आहिस्ता बातें कर हैं।
ख़ुदा ने ह़ुक्म दिया है.......
सब ख़ुदा के ह़ुक्म का बेचैनी से इन्तेज़ार कर रहे हैं।
इसी दरमियान पैग़म्बर (स.अ़.) ह़ुक्म देते हैं कि यहीं सफ़र रोक दिया जाए और आने वालों का इन्तेज़ार किया जाए चुनांचे ह़ुक्म के मुताबिक़ अ़मल किया जाता है। कारवान ठहरता है। लोग ह़ुक्म सुनने के लिए खड़े हुए हैं और ग़दीरे ख़ुम का तवील-ओ-अ़रीज़, बेआब-ओ-गेयाह जलता और झुलसता हुआ मैदान है।
दोपहर का वक़्त है और आफ़ताब पूरी ताक़त से गर्मी बरसा रहा है।
आख़िर वोह कौन सा पैग़ाम है जिसके लिए ऐसे हंगामी वक़्त में लोगों को रोके रखा है तमाज़ते आफ़ताब से लोग झुलसे जा रहे हैं।
इतने में अज़ान की आवाज़ सुनाई दी। पैग़म्बर की इमामत में नमाज़, जमाअ़त से अदा की गई। ऊँटों के कोहान से एक बलंद जगह बनाई गई। पैग़म्बर अकरम सल्लल्लाहो अ़लैहे व आलेही व सल्लम वहाँ तशरीफ़ ले गए लोग दम-ब-ख़ुद (बिल्कुल ख़ामोश) पैग़म्बर अकरम सल्लल्लाहो अ़लैहे व आलेही व सल्लम पर नज़र जमाए हुए थे, सीनों में सांस रुकी हुई थी, सहरा के ज़रर्ाें की तरह लोग ख़ामोश खड़े थे, पैग़म्बर (स.अ़.) की आवाज़ पर कान धरे थे।
पैग़म्बर अकरम सल्लल्लाहो अ़लैहे व आलेही व सल्लम की ज़बाने मुबारक पर जो अल्फ़ाज़ जारी थे उनमें दिल-नवाज़ चश्मे की रवानी भी थी ख़ुन्की के साथ साथ मिठास भी सुनने वाले उन अल्फ़ाज़ से अपने जिगर की प्यास बुझा रहे थे। ख़ुदा की ह़म्द-ओ-सना के बअ़्द पैग़म्बर अकरम सल्लल्लाहो अ़लैहे व आलेही व सल्लम ने इर्शाद फ़रमायाः
- हम और तुम दोनों ही ज़िम्मेदार हैं (पैग़म्बर की ज़िम्मेदारी पैग़ाम पहुँचाना है और उस पर अ़मल करना लोगों की ज़िम्मेदारी है।) तुम क्या कहते हो।
- हम गवाही देते हैं कि आप (स.अ़.) ने ख़ुदा का पैग़ाम हम तक पहुँचाया और इस राह में बेशुमार ज़़ह्मतें बर्दाश्त कीं। ख़ुदा आपको बेहतरीन अज्र अ़ता फ़रमाए।
- क्या तुम लोग ख़ुदा की व़हदानियत और उस के बंदे मो़हम्मद (स.अ़.) की रेसालत के गवाह नहीं हो?
- जन्नत, दोज़ख़, मौत, हश्र और क़यामत के मोअ़्तक़िद नहीं हो?
- हम इन सब बातों का इक़रार करते हैं और उनकी हव़क़ानियत की गवाही देते हैं।
- ख़ुदाया गवाह रहना इस के बअ़्द लोगों की तरफ़ रुख़ करके इर्शाद फ़रमायाः
- लोगो हम एक दूसरे से कौसर के किनारे मुलाक़ात करेंगे देखना है कि मेरे बअ़्द तुम लोग दो’ गराँ-बहा चीज़ों के साथ क्या सुलूक करते हो!
- ऐ रसूले ख़ुदा सल्लल्लाहो अ़लैहे व आलेही व सल्लम दो’ गराँ-बहा चीज़ें क्या हैं?
- ख़ुदा की किताब और मेरे अह्लेबैत। मुझे ख़ुदा ने येह ख़बर दी है कि दोनों उस वक़्त तक एक दूसरे से जुदा नहीं होंगे जब तक कौसर पर मुझसे मुलाक़ात न कर लें। देखो कभी इस पर सबक़त ह़ासिल करने की कोशिश न करना वर्ना हलाक हो जाओगे और अगर इस से अलग रहोगे तब भी हलाक हो जाओगे।
इस के बअ़्द ह़ज़रत अ़ली अ़लैहिस्सलाम को हाथों पर बलंद करते हैं ताकि तमाम लोग उन्हें देख लें और पहचान लें। उस के बअ़्द अपनी जानशीनी का आसमानी पैग़ाम इस तरह सुनाते हैं किः
अय्योहन्नास मन औलन्ना-स बिल मोअ्मेनी-न मिन अन्फ़ोसेहिम
लोगो! मोअ्मेनीन से किस को येह इख़्तेयार ह़ासिल है कि वोह उनका सरपरस्त, वली और ह़ाकिम हो और सबसे ज़्यादा ह़क़ रखने वाला हो?
- ख़ुदा और उस का रसूल बेहतर जानते हैं।
- ख़ुदा को मुझ पर वेलायत ह़ासिल है और मुझे मोअ्मिनों पर ख़ुद उनसे ज़्यादा इख़्तेयारात ह़ासिल हैं।
लेहाज़ाः
मन कुन्तो मौलाहो फ़हाज़ा अ़लीयुन मौलाहो
जिसका ‘मैं’ वली और सरपरस्त हूँ उस के येह ‘अ़ली’ भी वली-ओ-सरपरस्त हैं।
मेरे परवरदिगार इनके दोस्तों को दोस्त रख, और इनके दुश्मनों को दुश्मन, जो इनकी मदद करे तू उस की मदद फ़रमा और जो इनसे बरसरे पैकार हो तू भी उस से जंग कर।
जो लोग उस वक़्त यहाँ मौजूद हैं उनकी ज़िम्मेदारी है कि दूसरों तक इस पैग़ाम को पहुँचा दें। अभी लोग मुंतशिर नहीं हुए थे कि येह आयत नाज़िल हुईः
अलयौ-म अक्मल्तो लकुम दी-नकुम व अत्मम्तो अ़लैकुम नेअ़्मती व रज़ीतो लकुमुल इस्ला-म दीना
आज के दिन तुम्हारे दीन को कामिल और तुम पर नेअ़्मतें तमाम कर दीं और मैं राज़ी-ओ-ख़ुश्नूद हूँ कि तुम्हारा दीन इस्लाम हो। इस के बअ़्द पैग़म्बर अकरम सल्लल्लाहो अ़लैहे व आलेही व सल्लम ने तकबीर कहीः
अल्लाहो अकबर
ख़ुदा का दीन कामिल हो गया, ख़ुदा मेरी रेसालत और मेरे बअ़्द अ़ली की इमामत से राज़ी-ओ-ख़ुश्नूद हो गया।
इस के बअ़्द लोगों ने अ़ली अ़लैहिस्सलाम की ख़िदमत में मुबारकबाद पेश की। मुबारकबाद पेश करने वालों में जो लोग पेश पेश थे वोह थे, अबूबक्र और उमर जो येह कह रहे थेः
बख़्ख़िन बख़्ख़िन ल-क या अ़ली अस्ब़ह-त मौला-य व मौला कुल्ले मोअ्मेनिन व मोअ्मेनतिन.
मुबारक हो मुबारक हो ऐ अ़ली आप मेरे भी मौला हो गए और हर मोअ्मिन-ओ-मोअ़्मेना के भी मौला हो गए।
(अलग़दीर, जि॰ १, स॰ ९-११)
ह़दीसे ग़दीर की सनद
येह ह़दीस रावियों के तसलसुल के ले़हाज़ से इस दर्जा मुस्त़हकम है कि इस तरह की कम ह़दीसें मिलती हैं।
११० वोह अस्ह़ाब हैं जो ग़दीरे ख़ुम में मौजूद थे उन्होंने बग़ैर किसी वास्ते के येह ह़दीस पैग़म्बर अकरम सल्लल्लाहो अ़लैहे व आलेही व सल्लम से रवायत की है (अलग़दीर, जि॰ १, स॰ १४-६१) और ८४ ताबे़ईन ने भी येह ह़दीस रवायत की है।
(अलग़दीर, जि॰ १, स॰ ६२-७२, ताबे़ईन वोह लोग हैं जिन्हों ने ख़ुद पैग़म्बर अकरम (स.अ़.व.स.) को नहीं देखा बल्कि आँहज़रत के स़हाबा को देखा।)
इंसाफ़ पसंद अह्ले सुन्नत दानिशवर और उलमा ने ख़ाह वोह मुवर्रिख़ हों या मुफ़स्सिरे क़ुरआन...... सबने अपनी अपनी किताबों में वाक़अ़ए ग़दीर को तफ़्सील से ज़िक्र किया है। अलग़दीर में इस तरह के ३५० उलमा का ज़िक्र मौजूद है।
मुतअ़द्दिद उलमा ने इस मौज़ूअ़् पर मुस्तक़िल किताबें लिखी हैं। अ़ल्लामा अमीनी ने ‘अलग़दीर’ में इस तरह के २६ उलमाए अह्ले सुन्नत का ज़िक्र किया है और उन किताबों की ख़ुसूसीयात भी ज़िक्र की हैं।
लुग़त लिखने वालों ने भी लफ़्ज़े ‘अलग़दीर’ के त़हत वाक़अ़ए ग़दीर लिखा है।
इस तरह ह़दीसे ग़दीर की सनद के बारे में किसी क़िस्म के शक-ओ-शुब्हा की गुंजाइश नहीं है हाँ वोह लोग ज़रूर इन्कार कर सकते हैं जो दिन दोपहर सूरज के मुन्किर हो जाएँ।
ह़दीसे ग़दीर का मफ़हूम
ख़ुद ह़दीसे ग़दीर और उस के अतराफ़ में ऐसे रोशन शवाहिद मौजूद हैं जिससे साफ़ पता चलता है कि पैग़म्बर अकरम सल्लल्लाहो अ़लैहे व आलेही व सल्लम ह़ज़रत अ़ली अ़लैहिस्सलाम को अपना जानशीन-ओ-ख़लीफ़ा मुअ़य्यन कर रहे थे। ज़ैल की सत्रों में बअ़्ज़ शवाहिद ज़िक्र करते हैं।
(१) इस ह़दीस में जो’ मौला’ का लफ़्ज़ इस्तेअ़्माल किया गया है वोह ख़ुद बेहतरीन दलील है।
मौला वोह शख़्स जिसे वेलायत, इमामत, सरदारी, ह़ुक्मरानी, फ़रमान रवाई और जिसे हर एक पर बाला दस्ती हो। क्योंकि पैग़म्बर अकरम सल्लल्लाहो अ़लैहे व आलेही व सल्लम ने अपने लिए भी यही लफ़्ज़ इस्तेअ़्माल फ़रमाया है।
मन कुन्तो मौलाहो फ़़हाज़ा अ़लीयुन मौला....
ख़ुद पैग़म्बर अकरम सल्लल्लाहो अ़लैहे व आलेही व सल्लम ने अपने मौला होने की वज़ाहत इस तरह फ़रमाई है कि।
अय्योहन्नास मन औलन्ना-स बिल मोअ्मेनी-न मिन अन्फ़ोसेहिम
लोगो! किस को सब पर बालादस्ती और सबसे ज़्यादा इख़्तेयारात ह़ासिल हैं?
पैग़म्बर अकरम सल्लल्लाहो अ़लैहे व आलेही व सल्लम की औलवीयत का मतलब येह है कि पैग़म्बर अकरम सल्लल्लाहो अ़लैहे व आलेही व सल्लम के ह़ुक्म को हर एक ह़ुक्म पर और पैग़म्बर (स.अ़.) की मर्ज़ी को हर एक की मर्ज़ी पर फ़ौक़ियत ह़ासिल है। पैग़म्बर (स.अ़.) का ह़ुक्म वाजिबुल अ़मल है और उस की एताअ़त ज़रूरी है। पहले जुम्ले में पैग़म्बर (स.अ़.) की जो औलवीयत वाज़े़ह की गई है उसी औलवीयत की तरफ़ दूसरे जुम्ले में इशारा किया गया है ताकि दोनों जुम्लों का आपस में रब्त बरक़रार रहे और कलामे पैग़म्बर (स.अ़.) बेरब्त न होने पाए।
इस जुम्ले से जो मफ़हूम ज़ेह्न में आता है वोह इस तरह है कि पैग़म्बर (स.अ़.) ने फ़रमायाः
क्या मुझे तुम्हारी बनिस्बत ख़ुद तुम पर ज़्यादा इख़्तेयारात ह़ासिल नहीं हैं? सब ने कहा यक़ीनन आपको हम पर सबसे ज़्यादा इख़्तेयारात ह़ासिल हैं।’ उस वक़्त पैग़म्बर अकरम सल्लल्लाहो अ़लैहे व आलेही व सल्लम ने इर्शाद फ़रमाया जो इख़्तेयारात मुझे तुम पर ह़ासिल हैं वही तमाम इख़्तेयारात मेरे बअ़्द अ़ली को ह़ासिल हैं। अ़ली तमाम मुसलमानों के मौला और मेरे जानशीन हैं।
इस ह़दीस में इस के अ़लावा मौला का कोई और मफ़हूम मुराद नहीं लिया गया है बकि़या दूसरे तमाम मआना बेरब्त हैं..... उस चिलचिलाती दोपहर में पैग़म्बर सल्लल्लाहो अ़लैहे व आलेही व सल्लम का क़ाफ़ेलों को रोकना और उस धूप में वहाँ ठहरना इस वा़केआ की अ़ज़्मत और तारीख़ी ह़ैसियत को वाज़े़ह कर रहा है। अगर बात इतनी ज़्यादा अहम न होती तो हरगिज़ पैग़म्बर सल्लल्लाहो अ़लैहे व आलेही व सल्लम लोगों को इस तरह न रोकते। और येह तो कोई बात न हुई कि पैग़म्बर (स.अ़.) इतने बड़े क़ाफ़ेले को ऐसी जगह सिर्फ़ येह बताने के लिए रोकें कि’ अली’ मेरे दोस्त हैं।’
(२)पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ़.) ने इस के बअ़्द येह जुम्ला इर्शाद फ़रमायाः ‘ख़ुदाया जो अ़ली की मदद करे तू भी उस की नुसरत फ़रमा और जो अ़ली की मदद न करे उसे अपनी रह्मत से म़हरूम रख।’
पैग़म्बर सल्लल्लाहो अ़लैहे व आलेही व सल्लम को मअ़्लूम था कि उनके बअ़्द इस्लाम की तब्लीग़ और नश्र-ओ-इशाअ़त के लिए ज़रूरी है कि अ़ली के हाथ मज़बूत हों। अ़ली के पास क़ुदरत हो, ताक़त हो, लोग उनके साथ रहें ताकि इस्लाम फैल सके और इस्लामी ह़ुकूमत को इस्ते़हकाम ह़ासिल हो। ह़ुकूमत के इस्ते़हकाम के लिए जहाँ आदिल रहनुमा की ज़रूरत है वहाँ येह भी ज़रूरी है कि लोग मुकम्मल उस की एताअ़त करें उस के ह़ुक्म की ना-फ़रमानी न करें और पैग़म्बर (स.अ़.) के जानशीन की हर बात को अपनी तमाम बातों पर तर्जीह दें। इसी लिए पैग़म्बर (स.अ़.) ने अ़ली के दोस्तों के ह़क़ में दुआ और उनके दुश्मनों के लिए बद्दुआ की ताकि लोगों को येह मअ़्लूम हो जाए कि अ़ली की मुख़ालेफ़त ख़ुदा के ग़ज़ब और पैग़म्बर (स.अ़.) की लअ़्नत का सबब है।
(३) पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ़.) ने ख़ुत्बे की इब्तेदा में इर्शाद फ़रमाया है किः
क्या तुम लोग ख़ुदा की व़हदानियत और उस के बंदे मो़हम्मद (स.अ़.) की रेसालत की गवाही नहीं देते हो? सब ने कहा बेशक हम तस्दीक़ करते हैं उस के बअ़्द आँह़ज़रत (अ़.स.) फ़रमाया तुम्हारा वली और ह़ाकिम कौन है? उस के बअ़्द इर्शाद फ़रमाया जिसका में वली और ह़ाकिम हूँ अ़ली भी उस के वली और ह़ाकिम हैं।
ख़ुदा की व़हदानियत और पैग़म्बर (स.अ़.) की रेसालत के बअ़्द अ़ली अ़लैहिस्सलाम की वेलायत का तज़्केरा इस बात की दलील है कि वेलायत से ह़ज़रत अ़ली की इमामत मुराद है। अगर उम्मत के अ़लावा वेलायत का कोई और मफ़हूम लिया जाए तो जुम्लों में रब्त बाक़ी नहीं रहेगा। सब जानते हैं कि पैग़म्बर (स.अ़.) सबसे ज़्यादा फ़सीह-ओ-बलीग़ थे इस लिए येह बात बिल्कुल नामुनासिब है कि पैग़म्बर (स.अ़.) ऐसे जुम्ले इर्शाद फ़रमाएँ जिसमें आपस में कोई रब्त न हो।
(४) पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ़.) के एअ़्लान के बअ़्द लोग ह़ज़रत अ़ली अ़लैहिस्सलाम की ख़िदमत में मुबारकबाद पेश कर रहे थे। येह मुबारकबाद तहनियत उस वक़्त स़ही़ह होगी जब येह तस्लीम किया जाए कि ह़ज़रत अ़ली अ़लैहिस्सलाम को ख़ुदा और रसूल की तरफ़ से एक बलंद और अ़ज़ीम मन्सब मिला था वर्ना मअ़्मूली सी बात के लिए इस तरह की मुबारकबादी कुछ भली नहीं मअ़्लूम होती।
(५)
या अय्योहर्रसूलो बल्लिग़ मा उन्ज़े-ल इलै-क मिन रब्बे-क व इन लम त़प्Àअ़ल फ़मा बल्लग़-त रेसा-लतहू वल्लाहो यअ़्सेमो-क मिनन्नासे
ऐ पैग़म्बर (स.अ़.) पहुँचा दीजिए उस चीज़ को जिसे आपके रब ने आप पर नाज़िल किया है और अगर आपने नहीं पहुँचाया तो आपने उस की रेसालत को अंजाम नहीं दिया और अल्लाह आपको लोगों के (शर) से म़हफ़ूज़ रखेगा।
अह्लेसुन्नत के उलमा गवाह हैं कि येह आयत ह़ज़रत अ़ली अ़लैहिस्सलाम की जानशीनी के सिलसिले में ग़दीर के दिन नाज़िल हुई है।
(अ़ल्लामा अमीनी ने ‘‘अलग़दीर’’ में उलमाए अह्लेसुन्नत के ३० ऐसे उलमा का तज़्केरा किया है जिन्होंने येह एअ़्तेराफ़ किया है कि येह आयत ह़ज़रत अ़ली (अ़.स.) के बारे में नाज़िल हुई है)
नमूने के लिए इस्लाम के अ़ज़ीम मुवर्रिख़ और मुफ़स्सिर और अह्लेसुन्नत के बलंद पाया आलिम ‘हाफ़िज़ अबू जअ़्फ़र मो़हम्मद इब्ने जरीर तबरी’ का बयान नक़्ल करते हैंः-
‘......जब ग़दीरे ख़ुम में येह आयत नाज़िल हुई पैग़म्बर (स.अ़.) ने इर्शाद फ़रमाया कि ख़ुदा की तरफ़ से जिब्रईल पैग़ाम लाए हैं कि मैं यहीं ठहरूँ और हर सियाह फ़ाम और सफ़ेद फ़ाम को येह बता दूँ कि अबूतालिब के फ़र्ज़न्द अ़ली अ़लैहिस्सलाम मेरे भाई, मेरे जानशीन और मेरे बअ़्द इस उम्मत के इमाम होंगे।
(अलग़दीर, जि॰ १, स॰ २१४, नक़्ल अज़ किताबुल वेलायत तबरी)
(६) वोह अश्आर-ओ-क़साएद जो उस वक़्त से आज तक ग़दीर और ह़ज़रत अ़ली अ़लैहिस्सलाम की जानशीनी के मौज़ूअ़् पर लिखे गए हैं। उन अश्आर-ओ-क़साएद की जो अदबी अहम्मीयत है वोह एक मुस्तक़िल ह़ैसियत है। इस के अ़लावा येह अश्आर हमारे मौज़ूअ़् पर भरपूर दलील हैं क्योंकि इन शोअ़्रा ने खुत्बए ग़दीर को वेलायत और जानशीनी समझ कर उस की तौज़ी़ह-ओ-तफ़सीर की है।
येह अश्आर और उन शोअ़्रा के तज़्केरे तारीख़ के दामन में म़हफ़ूज़ हैं। वोह अफ़राद जो अ़रबी अदब से वाक़फ़ीयत रखते हैं वोह’ अलग़दीर’ का मुतालआ करें। इस किताब में पहली सदी से आज तक के अश्आर और शोअ़्रा के तज़्केरे तर्तीब वार मज़्कूर हैं और उन पर नक़्द-ओ-तब्सरा भी किया गया है।
(७) पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ़.) और हमारे अइम्मा अ़लैहिमुस्सलाम ने १८ ज़िल्हिज्जा को इस्लाम और मुसलमानों की एक अ़ज़ीम ईद शुमार किया है ताकि हर साल ग़दीर का वा़केआ शद्द-ओ-मद्द (ज़ोर-ओ-शोर) के साथ दुहराया जाता रहे। पाँचवींं सदी के मशहूर-ओ-मअ़्रूफ़ आलिम ‘अबू रै़हान बेरूनी’ ने अपनी किताब ‘आसारुल बाकि़या’ में, ‘इब्ने तल़्हा शाफ़ई’ ने अपनी किताब’ मतालेबुस्सुऊल’ में ग़दीर के दिन को इस्लाम की ईद शुमार किया है। इसी तरह मशहूर अदीब और दानिशवर ‘अबू मंसूर सआलेबी’ ने अपनी किताब ‘सेमारुल क़ुलूब’ में शबे ग़दीर को इस्लाम की बा-अ़ज़मत शबों में शुमार किया है।
(८) मुनाज़रे - जब कभी ह़ज़रत अ़ली अ़लैहिस्सलाम या दूसरे अइम्मा अ़लैहिमुस्सलाम ने ह़दीसे ग़दीर को ख़ेलाफ़त-ओ-जानशीनी और इमामत के सिलसिले में दलील के तौर पर मुख़ालिफ़ीन के सामने पेश किया तो किसी ने भी येह नहीं कहा कि इस ह़दीस का तअ़ल्लुक़ ख़ेलाफ़त से नहीं है बल्कि हर एक ने ह़दीसे ग़दीर के इस्तेदलाल के मुक़ाबले में ख़ामोश रह कर ह़ज़रत अ़ली अ़लैहिस्सलाम की ख़ेलाफ़त को तस्लीम किया है।
(अलग़दीर, जि॰ १, स॰ १५९ से)
एक मर्तबा ह़ज़रत अ़ली अ़लैहिस्सलाम ने कूफ़ा में ख़ुत्बा देते हुए इर्शाद फ़रमायाःतुम्हें ख़ुदा की क़सम देकर सवाल करता हूँ तुम में से जिसने भी ग़दीर के दिन पैग़म्बर अकरम सल्लल्लाहो अ़लैहे व आलेही व सल्लम की ज़बानी मेरी ख़ेलाफ़त और जानशीनी के बारे में सुना हो वोह खड़ा हो जाए। हाँ सिर्फ़ वही लोग सामने आएँ जिन्हों ने ख़ुद अपने कान से पैग़म्बर (स.अ़.) को फ़रमाते सुना हो। वोह लोग हरगिज़ न उठें जिन्हों ने दूसरों की ज़बानी वाक़अ़ए ग़दीर सुना हो.... येह सुनकर काफ़ी लोग खड़े हुए।
अह्लेसुन्नत के बुज़ुर्ग आलिम’ इमाम अ़हमद इब्ने हंबल का बयान है इस दिन जो लोग सामने आए उनकी तअ़्दाद तीस (३०) थी जिन्हों ने ह़दीसे ग़दीर की तस्दीक़ की।
येह बात भी ज़ेह्न में रहे कि उस वक़्त वाक़अ़ए ग़दीर को २५ साल गुज़र चुके थे और अस्ह़ाब की काफ़ी तअ़्दाद कूफ़ा में नहीं थी। काफ़ी स़हाबा का इंतेक़ाल हो चुका था और काफ़ी लोगों ने ज़ाती अग़राज़ की बेना पर गवाही नहीं दी थी।
जिस वक़्त ह़ज़रत इमाम हुसैन अ़लैहिस्सलाम ने मक्का के इस्लामी इज्तेमाअ़् में तक़रीर फ़रमाई उस वक़्त सात सौ (७००) स़हाबा और ताबईन मौजूद थे।(इन में २०० स़हाबा थे) इस तक़रीर में इमाम अ़लैहिस्सलाम ने फ़रमायाः
‘......तुम्हें ख़ुदा की क़सम क्या तुम नहीं जानते कि पैग़म्बर (स.अ़.) ने ग़दीर में अ़ली को ख़ेलाफ़त और वेलायत के लिए मुंतख़ब फ़रमाया था और फ़रमाया था कि हाज़िरीन की ज़िम्मेदारी है कि इस ख़बर को उन तक ज़रूर पहुँचाएँ जो यहाँ नहीं हैं’?
सब ने यक ज़बान हो कर कहाः..... ख़ुदा-गवाह है कि वा़केआ बिल्कुल इसी तरह है।
(अलग़दीर, जि॰ १, स॰ १५९-२१३ तक इस तरह के २२ मुनाज़रे और इस्तेदलालात पेश किए गए हैं)
इस सबक़ के इख़्तेताम पर उस तक़रीज़ का इक़्तेबास नक़्ल कर रहे हैं जो शह्रे ह़लब के बलंद पाया सुन्नी आलिम और वहाँ के इमामे जुमुआ’ शेख़ म़हमूद दौ़ह’ ने अलग़दीर पर लिखी है।
‘...... अलग़दीर किताब ने हक़ीक़तों को उस्तवार किया और ख़ुराफ़ात को नीस्त-ओ-नाबूद। वोह चीज़ें साबित की हैं जो हम नहीं जानते थे और उन बातों को बातिल क़रार दिया जिन्हें हम अपनी जेहालत की बेना पर कलेजे से लगाए हुए थे।
गुज़श्ता वा़केआत कुछ इस तरह पेश आए थे कि हम उनके बारे में कभी सोचते भी नहीं थे और उनके अस्रार-ओ-रुमूज़ से बिल्कुल बेख़बर थे। जब कि ज़रूरी था कि हम गुज़श्ता वा़केआत से दर्स ह़ासिल करते और तारीख़ी वा़केआत को ह़क़ाएक़ की बुनियाद पर परखते और उन्हें ह़क़ाएक़ की बुनियाद पर अपने अ़क़ाएद-ओ-अफ़्कार की इमारत तअ़्मीर करते .....’
आपने देखा कि अलग़दीर से पहले लोग किस तरह ह़क़ाएक़ से बेख़बर थे और ग़दीर के सिलसिले में सुनी उलमा की मअ़्लूमात किस ह़द तक थी। अलग़दीर के बअ़्द उलमा अपने आप को एक ऐसे समुंदर के किनारे पाते हैं जहाँ वाज़े़ह दलीलें और रोशन बराहीन मौजें मार रहे हैं। अलग़दीर के मुतालआ के बअ़्द हर एक यही कहता है किः ‘‘सूरज की रोशनी छिपने वाली नहीं है।’’