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सबक़ - ३०

मौत के बअ़्‌द

मौत

‘‘एक दिन येह घर छोड़ देना है।’’

हाँ, जिसको न मौत आई है और न कभी आएगी वोह सिर्फ़ ख़ुदा की ज़ात है और हम बंदगाने ख़ुदा एक दिन ज़रूर इस दुनिया से रुख़्सत हो जाएँगे।

हर-रोज़ ग़ुरूबे आफ़ताब हमारी रे़हलत की शा़एराना मिसाल है। ख़ुशा बहाल! अगर दूसरे दिन हम सूरज की तरह चमकते दमकते रोशनी फैलाते हुए क़यामत के उफ़ुक़ से नमूदार हों और यही अहम है वर्ना हमारा ग़ुरूब यक़ीनी है। मौत एक ह़क़ीक़त है जो हर एक के लिए ज़रूरी है किसी को भी इस से मफ़र्र नहीं है।

ग़ौर तलब बात येह है कि मौत के बअ़्‌द क्या होगा क्या हम नाबूद हो जाएँगे? मौत हमारी ज़िंदगी की आख़िरी मंज़िल है इस के बअ़्‌द कुछ नहीं? या हम मौत के बअ़्‌द भी ज़िंदा रहेंगे और अगर ज़िंदा रहेंगे तो किस तरह?

वोह लोग जो ख़ुदा के मोअ़्‌तक़िद नहीं हैं वोह ख़याल करते हैं कि मौत इन्सान की आख़िरी मंज़िल है। मौत के बअ़्‌द इन्सान बिल्कुल नाबूद हो जाएगा। बस यही चंद रोज़ा ज़िंदगी है और इस के बअ़्‌द कुछ नहीं। लेकिन वोह लोग जो आसमानी दीन के क़ाएल हैं और व़ही पर ईमान रखते हैं और इस तर्ज़े फ़िक्र के सख़्त मुख़ालिफ़ हैं - वोह मौत को आख़िरी मंज़िल नहीं समझते बल्कि वोह मौत को बामे अबदीयत तक पहुँचने का ज़ीना समझते हैं। वोह मौत को क़यामत, बर्ज़ख़ और इस दुनिया के दरमियान एक वास्ता समझते हैं।

बर्ज़ख़

क़ुरआने ह़कीम की सैकड़ों वाज़े़ह आयतें, अइम्मा अ़लैहिमुस्सलाम की बेशुमार ह़दीसें येह बता रही हैं कि मौत इन्सान की आख़िरी मंज़िल और उस की नाबूदी नहीं है। मौत के बअ़्‌द भी इन्सान ज़िंदा रहेगा। नेअ़्‌मतों की आग़ोश में या अ़ज़ाब के हुजूम में हंगामए क़यामत तक बाक़ी रहेगा।

मौत और क़यामत के दरमियान की मुद्दत को ‘बर्ज़ख़’’कहा जाता है।

बर्ज़ख़ी ज़िंदगी एक ह़क़ीक़ी ज़िंदगी है, ख़याली और फ़र्ज़ी ज़िंदगी नहीं है। ख़ुदावंद आलम का इर्शाद हैः

لَا تَحْسَبَنَّ الَّذِينَ قُتِلُوا فِي سَبِيلِ اللّهِ أَمْوَاتًا ۚ بَلْ أَحْيَاءٌ عِندَ رَبِّهِمْ يُرْزَقُونَ ﴿١٦٩﴾ فَرِحِينَ بِمَا آتَاهُمُ اللّهُ مِن فَضْلِهِ

‘वोह लोग जो राहे ख़ुदा में शहीद हुए हैं उन्हें हरगिज़ मुर्दा ख़याल न करना वोह ज़िंदा हैं। अपने परवरदिगार के पास रिज़्क़ पा रहे हैं और जो कुछ अल्लाह ने अपने फज़्ल-ओ-करम से अ़ता किया है उस पर राज़ी और ख़ुश्नूद हैं।

वला त़ह्सबन्नल्लज़ी-न क़ोतेलू फ़ी सबीलिल्लाहे अम्वातन बल अ़ह्‌या-उन इन्द रब्बेहिम युज़़र्कू-न फ़रे़ही-न बेमा आताहुमुल्लाहो मिन फ़ज़्लेही - सूरए आले इमरान, आयत १६९-१७०

अगर ज़िंदगी ह़क़ीक़ी ज़िंदगी न हो तो इस जुम्ला ‘ज़िंदा’ हैं और अपने परवरदिगार के पास रिज़्क़ पा रहे हैं का कोई मफ़हूम न होगा।

‘मोअ्‌मिने आले यासीन’ जिसने अपनी क़ौम से वसीयत की थी कि जनाब ईसा अ़लैहिस्सलाम के नुमाइंदों की पैरवी करो मगर क़ौम ने उनकी पैरवी नहीं की। क़ुरआन ने इस को यूँ बयान किया है किः

قِيلَ ادْخُلِ الْجَنَّةَ قَالَ يَا لَيْتَ قَوْمِي يَعْلَمُونَ ﴿٢٦﴾ بِمَا غَفَرَ لِي رَبِّي وَجَعَلَنِي مِنَ الْمُكْرَمِينَ ﴿٢٧﴾

जब उस से बहिश्त में दाख़िल होने को कहा गया। तो उसने कहा किः ‘काश मेरी क़ौम को येह मअ़्‌लूम हो जाता कि ख़ुदावंद आलम ने मुझे बख़्श दिया है और मुझे बुज़ुर्गों में शुमार किया है।

(सूरए यासीन, आयत २६-२७)

इस आयत में जिस बहिश्त का तज़्केरा किया गया है वोह यही बर्ज़ख़ी जन्नत है। सा़हेबान ईमान मौत और क़यामत की दरमियानी मुद्दत इस जन्नत में गुज़ारेंगे।

वोह लोग जिन्हों ने कुफ़्र इख़्तेयार किया और आख़िरी वक़्त तक गुनाहों में मुलव्विस रहे उनके बारे में इर्शाद होता है किः

जब उनमें से किसी एक को मौत आती है तो वोह येह कहता है कि परवरदिगार मुझे वापस पल्टा दे ताकि में नेक काम अंजाम दे सकूँ!

उस की येह तमन्ना पूरी न होगी और उस को येह जवाब मिलेगा किः

كَلَّا إِنَّهَا كَلِمَةٌ هُوَ قَائِلُهَا وَمِن وَرَائِهِم بَرْزَخٌ إِلَى يَوْمِ يُبْعَثُونَ ۔

कल्ला इन्नहा कले-मतुन हो-व क़ाएलोहा व मिन वराएहिम बर्ज़ख़ुन एला यौमे युब्अ़सू-न

हरगिज़ नहीं येह वोह बात है जिसे वोह सिर्फ़ ज़बान से अदा कर रहा है। (अगर उस को दुबारा पल्टा दिया जाए तो वही कुछ करेगा जो अब तक करता आया है) मौत के बअ़्‌द से क़यामत तक बर्ज़ख़ है।

(सूरए मोअ्‌मेनून, आयत ९९-१००)

इस सिलसिले में येह वा़केआ ख़ास तवज्जोह का तालिब हैः

जब जंगे बद्र का हंगामा ख़त्म हो गया और दुश्मन भाग गए, दुश्मन अपने कुछ लाशे मैदान में छोड़ गए थे और कुछ एक कुँवें में डाल गए थे। पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अ़लैहे व आलेही व सल्लम इस कुँवें के पास तशरीफ़ लाए और उन मुर्दों से फ़रमाने लगे किः

ऐ कुफ़्फ़ार! तुम क्या बुरे पड़ोसी थे, ख़ुदा के पैग़म्बर सल्लल्लाहो अ़लैहे व आलेही व सल्लम को उस के घर से निकाल दिया और उस से जंग पर आमादा हो गए। मैंने अपने परवरदिगार के वअ़्‌दे को सच्चा पाया। तुम्हारे परवरदिगार ने तुमसे जो वअ़्‌दा किया था तुमने उसे ह़क़ पाया।

उमर उस गुफ़्तुगू को सुन रहे थे। पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ़.) से कहने लगेः रसूले ख़ुदा सल्लल्लाहो अ़लैहे व आलेही व सल्लम येह मुर्दा जिस्म है येह आपकी बातों को क्यूँकर सुनेंगे जो आप उनसे गुफ़्तुगू कर हैं।

रसूले ख़ुदा सल्लल्लाहो अ़लैहे व आलेही व सल्लम ने इर्शाद फ़रमाया ख़ामोश रहो ख़ुदा की क़सम तुम उन से ज़्यादा नहीं सुनते। जिस वक़्त मैं यहाँ से चला जाऊँगा अ़ज़ाब के फ़रिश्ते, आहनी गुर्ज़ उनके सरों पर मारेंगे।

(श़हे अ़काएद, तालीफ़ शेख़ मुफ़ीद, स॰ ४१, बेह़ार जि॰ ६, स॰ २५४)

जिस वक़्त जंगे जमल ख़त्म हो गई ग़ुबारे जंग बैठ गया। मौलाए काएनात ह़ज़रत अ़ली अ़लैहिस्सलाम घोड़े पर लाशों के दरमियान गश्त कर रहे थे। ‘कअ़्‌ब इब्ने सौरा’ के जनाज़े पर पहुँचे। (उमर ने कअ़्‌ब को बसरे का क़ाज़ी मुअ़य्यन किया था और उस्मान की आख़िरी दौर तक क़ाज़ी रहा। येह शख़्स जब जंग करने आया था तो गले में क़ुरआन हमायल किए हुए था और अपने अह्ले-ओ-अ़याल के साथ इमाम अ़लैहिस्सलाम के ख़ेलाफ़ जंग करने आया था) इमाम के ह़ुक्म से उस के जिस्म को बिठाया गया। इमाम ने उस को मुख़ातब करके फ़रमायाः

 ऐ क़अ़्‌ब मैंने अपने ख़ुदा के वअ़्‌दे को ह़क़ पाया। तुमने भी अपने ख़ुदा के वअ़दे को सच्चा पाया।

इस के बअ़्‌द इमाम (अ़.स.) ने ह़ुक्म दिया कि उस को लिटा दिया जाए। इस के बअ़्‌द इमाम (अ़.स.) ने तलहा के लाशे से भी यही गुफ़्तुगू की।

उस वक़्त एक शख़्स ने इमाम की ख़िदमत में अ़र्ज़ कियाःआपके इस काम का क्या फ़ाएदा? येह लोग तो आपकी बातें सुन नहीं रहे हैं।

फ़रमाया ख़ुदा की क़सम! दोनों ने मेरी बातें सुनी हैं जिस तरह कुश्तगाने बद्र ने पैग़म्बर (स.अ़.) की बातें सुनी थीं।

(श़हे अ़क़ाएद, स॰ ४२, बेह़ार जि॰ ६, स॰ २५५)

‘हब्बा अ़र्नी’ का बयान है कि मैं ह़ज़रत अ़ली अ़लैहिस्सलाम के साथ ‘वादियुस्सलाम’ गया। इमाम अ़लैहिस्सलाम एक जगह ठहर गए ऐसा मअ़्‌लूम हो रहा था कि किसी से गुफ़्तुगू कर रहे हैं।

मैं भी काफ़ी देर तक खड़ा रहा यहाँ तक कि थक कर बैठ गया। बैठे बैठे भी थक गया फिर खड़ा हो गया। यहाँ तक कि थक कर फिर बैठ गया। जब मैं बिल्कुल थक कर चूर हो गया अपनी अ़बा लेकर इमाम (अ़.स.) की ख़िदमत में हाज़िर हुआ और अ़र्ज़ कियाः मौला मैं येह अ़बा बिछा देता हूँ आप कुछ देर इस पर आराम फ़रमाएँ। मुझे डर है कि ज़्यादा खड़े रहने से कोई तकलीफ़ पैदा न जाए।

फ़रमायाः ऐ हब्बा! इस तरह खड़े रहने से तकलीफ़ न होगी क्योंकि मैं मोअ्‌मिनों से बड़ी ख़ुशगवार बातें कर रहा हूँ।

अ़र्ज़ किया क्या वोह लोग भी इसी तरह हैं।

फ़रमायाः हाँ! अगर तुम्हारी आँखों से पर्दा उठा दिया जाए तो तुम देखोगे कि एक गिरोह दूसरे गिरोह से बातें कर रहा है।

अ़र्ज़ कियाः येह अज्साम हैं या अर्वाह?

फ़रमायाः अर्वाह। मोअ्‌मिन को दुनिया के किसी भी गोशे में मौत आए उस की रू़ह को येह ह़ुक्म मिलता है कि वोह वादियुस्सलाम में आए। येह वादी ज़मीन पर बहिश्त का एक टुक़डा है। मोअ्‌मेनीन की रू़हें दूर और नज़्दीक से यहाँ जमअ़्‌ होती हैं।

(काफ़ी जि॰ ३, स॰ २४३, बेह़ार जि॰ ६ स॰ २६७-२६८)

सवाले क़ब्र

रवायत से इस्तेफ़ादा होता है कि क़ब्र में रू़ह का बदन से एक ख़ास रब्त है गरचे उस नौ़ईयत का स़ही़ह इल्म हमको नहीं है।

ह़ज़रत इमाम जअ़्‌फ़र सादिक़ अ़लैहिस्सलाम का इर्शाद है कि जो कोई सवाले क़ब्र का इन्कार करे वोह हमारा शीआ नहीं है।

(काफ़ी, जि॰ ३, स॰ २४३, बेह़ार जि॰ ६, स॰ २६७-२६८)

जिस वक़्त मुर्दे को क़ब्र में लिटाते हैं सवाल के फ़रिश्ते क़ब्र में आते हैं, उस के दीन, अ़क़ाएद और अअ़्‌माल के बारे में सवाल करते हैं। अगर साहेबे ईमान और नेकूकार होता है तो मोअ्‌मेनीन के साथ वर्ना काफ़िरों और बदकारों के साथ मिल जाता है और क़यामत तक अपने हम जैसों के साथ रहेगा।

शेख़ सदूक़ अ़लैहिर्रह़्मा अपनी किताब एअ़्‌तेक़ादात में त़हरीर फ़रमाते हैं कि हमारा अ़क़ीदा है कि सवाले क़ब्र ह़क़ है जो स़ही़ह जवाब देगा उस की क़ब्र नेअ़्‌मतों और राहतों से भर जाएगी और क़यामत में जन्नत में जगह मिलेगी और जो स़ही़ह जवाब नहीं देगा उस की क़ब्र अ़ज़ाब का मर्कज़ होगी और आख़ेरत में उस का ठिकाना जहन्नम होगा।

ह़ज़रत इमाम ज़ैनुल आबिदीन अ़लैहिस्सलाम हर जुमुआ (जुमअ़्‌) को मस्जिदे नबवी में लोगों को इन अल्फ़ाज़ से नसीह़त फ़रमाते थेः

ऐ लोगो तक़्वा और परहेज़गारी इख़्तेयार करो तुम्हारी बाज़गश्त ख़ुदा की तरफ़ है जो यहाँ नेकी करेगा वोह मुस्तक़बिल में उसे देखेगा। और जिस के अअ़्‌माल नापसंदीदा होंगे उस की येह तमन्ना होगी कि उस के और उस के अअ़्‌माले बद के दरमियान बड़ा फ़ासेला होता। ख़ुदा तुम्हें अपने अ़ज़ाब से डराता है।

अफ़सोस ऐे फरज़ंदे आदम! तू किस क़द्र ग़ाफ़िल है लेकिन तुझसे ग़फ़लत नहीं बरती जाएगी। मौत सबसे पहले तेरी तरफ़ आएगी और तुझे गिरफ़्तार करेगी। गोया मौत का वक़्त आ पहुँचा है मौत का फ़रिश्ता तेरे सिरहाने खड़ा है और तुम्हारी रू़ह तुमसे वापस ले लेगा - तुम क़ब्र में तन्हा होगे। सवाल के फ़रिश्ते सवाल की ख़ातिर तुम्हारे पास आएँगे और येह सवाल करेंगे।

पहला सवालः उस ख़ुदा के बारे में होगा जिसकी एबादत करते थे और उस पैग़म्बर सल्लल्लाहो अ़लैहे व आलेही व सल्लम के बारे में होगा जो तुम्हारी तरफ़ मब़्ऊस किया गया। और उस दीन के बारे में सवाल होगा जिसके तुम मोअ़्‌तक़िद थे और उस किताब के बारे में जिस पर तुम ईमान लाए और उस इमाम के बारे में जिसकी वेलायत तुम पर वाजिब की गई थी, और जिसकी तुम एताअ़त करते थे। तुम्हारी उम्र के बारे में सवाल होगा कि कहाँ मसरफ़ की। माल-ओ-सर्वत के बारे में पूछा जाएगा कहाँ से ह़ासिल किया और किस जगह ख़र्च किया। बस इन सवालों के बारे में अपना मुहासिबा करो और जवाब के लिए तैयार रहो।

अगर साहेबे ईमान और परहेज़गार होगे, अपने दीन को ख़ूब जानते होगे, अपने इमाम और रहबर की पैरवी करते होगे और ख़ुदा के दोस्तों को दोस्त रखते होगे, ख़ुदा उस दिन तुम्हारी ज़बान पर ह़क़ के कलेमात जारी करेगा तुम्हें जन्नत और अपनी मर्ज़ी की बशारत देगा। नेअ़्‌मत और रह्मत के फ़रिश्ते तुम्हारे इस्तेक़बाल को आएँगे और अगर येह तैयारियाँ न होंगी तो तुम्हारी ज़बान लुक्नत करेगी और कोई जवाब न बन पडेगा। उस वक़्त तुम्हें अ़ज़ाबे जहन्नम की ख़बर दी जाएगी। अ़ज़ाब के फ़रिश्ते आग और खौलते हुए पानी से तुम्हारा इस्तेक़बाल करेंगे।

(अमाली सदूक़, स॰ ३०१, बेह़ार जि॰ ६, स॰ २२३)

अ़ज़ाबे क़ब्र

दुनिया में इन्सान का जैसा किरदार होगा क़ब्र के मसाएल उस से ला तअ़ल्लुक़ न होंगे। जिन लोगों ने परहेज़गारी की ह़ालत में जान जाने आफ़रीन के सिपुर्द की होगी उनकी क़ब्र बर्ज़ख़, बहिश्त का नमूना होगी। वोह अपनी नेकियों को नूरानी और ख़ूबसूरत शक्लों में देखेगा। ह़ज़रत इमाम हसन अ़स्करी अ़लैहिस्सलाम का इर्शाद है किः

जिस वक़्त मोअ्‌मिन मौत की आग़ोश में सो जाता है उस वक़्त छः नूरानी और ख़ूबसूरत शक्लें उनमें एक सबसे ज़्यादा नूरानी, ख़ूबसूरत और मुअ़त्तर होगी उस के साथ उस की क़ब्र में दाख़िल होंगी। दाहिने, बाएँ, ऊपर, नीचे, सिरहाने और पाईने पा ख़डी हो जाएँगी। जो सब से नूरानी, ख़ूबसूरत होगी वोह दूसरों से दरियाफ़्त करेगी कि तुम कौन हो? दाहिनी जानिब वाली कहेगी मैं नमाज़’ हूँ। बाएँ तरफ़ वाली कहेगी मैं’ ज़कात’ हूँ। सामने वाली कहेगी में ‘रोज़ा’ हूँ, सिरहाने वाली कहेगी में ‘हज’ और उमरा’ हूँ पाईने पा वाली कहेगी मैं इस की वोह नेकियाँ हूँ जो इसने अपने भाईयों के ह़क़ में की हैं। उस वक़्त सब मिलकर उस नूरानी और ख़ूबसूरत शक्ल से दरियाफ़्त करेंगे कि तुम कौन हो जो हमसे अअ़्‌ला हो?

वोह कहेगीः मैं वेलायते मो़हम्मद-ओ-आल मो़हम्मद सल्लल्लाहो अ़लैहे व आलेही व सल्लम और उनकी दोस्ती और मो़हब्बत हूँ।

(मह़ासिने बकरी, जि॰ १, स॰ २८८, बेह़ार, जि॰ ६, स॰ १२४)

लेकिन वोह लोग जिन्होंने इस दुनिया को कु़प्रÀ की नजासतों और बदकिर्दारी से आलूदा कर रखा होगा जब येह लोग क़ब्रों में उतारे जाएँगे तो उसे अपने ह़क़ में तीरा-ओ-तारीक पाएँगे और वहाँ अ़ज़ाब के फ़रिश्ते तरह तरह का अ़ज़ाब नाज़िल करेंगे।

रसूले ख़ुदा सल्लल्लाहो अ़लैहे व आलेही व सल्लम एक अंसारी की तशीयी़ए जनाज़ा में शरीक हुए। दफ़्न के बअ़्‌द उस की क़ब्र पर बैठे और सर झुका कर तीन मर्तबा इर्शाद फ़रमायाः

ख़ुदाया! मैं अ़ज़ाबे क़ब्र से पनाह माँगता हूँ।

(अल मो़हजतुल बैज़ा, जि॰ ८, स॰ ३०२)

 कोई ज़रूरी नहीं है कि सवाले क़ब्र और अ़ज़ाबे क़ब्र को अपनी आँखों से देखें तब ईमान लाएँ बल्कि ईमान लाने के लिए बस इतना काफ़ी है कि अम्बिया (अ़.स.) और अइम्मा अ़लैहिमुस्सलाम और बुज़ुर्गाने दीन - ने इस की ख़बर दी है।

मुल्ला मो़हसिन फ़ैज़ काशानी रह्मतुल्लाह अ़लैह इर्शाद फ़रमाते हैं कि इस आँख में येह सलाह़ियत नहीं है कि उन चीज़ों को देख सके जो मलकूत में रूनुमा होती हैं और वोह चीज़ें जो आख़ेरत और बर्ज़ख़ में पेश आती हैं उनका तअ़ल्लुक़ मलकूत से है।

पैग़म्बर (स.अ़.) के अस्ह़ाब जिब्रईल के आने पर ईमान रखते थे गरचे ख़ुद जिब्रईल को नहीं देखते थे। अ़ज़ाबे क़ब्र भी एक मलकूती अम्र है इस के इदराक के लिए दूसरी हिस की ज़रूरत है जो सिर्फ़ अम्बिया (अ़.स.) और औलियाए इलाही के पास है।

(माख़ज़ साबिक़, स॰ ३०५)

मौत की याद

बअ़्‌ज़ लोग मौत के तज़्केरे से घबराते हैं और उस के बारे में सोचने से डरते हैं। कभी मौत की फ़िक्र ही नहीं करते गोया उन्होंने आबे ह़यात पी लिया है और हमेशा इस दुनिया में रहेंगे। इसी लिए तो मौत से ग़ाफ़िल हैं।

वोह इस बात को ख़ूब जानते हैं मगर तस्लीम नहीं करते कि जिस ज़ात को न मौत आई है और न कभी आएगी वोह सिर्फ़ ख़ुदा की ज़ात है। येह लोग मौत से ग़फ़लत की बेना पर बेमक़्सद ज़िंदगी बसर कर रहे हैं और अपनी इस्ला़ह की कोई फ़िक्र नहीं करते हैं। उनकी और हैवानों की ज़िंदगी में कोई ख़ास फ़़र्क नहीं है। उनका किरदार, उनकी रविश, उनके आदात-ओ-अत्वार ख़ुदा के बर्गुज़ीदा बंदों के किरदार और आदात-ओ-अत्वार से कोसों दूर हैं। पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अ़लैहे व आलेही व सल्लम फ़रमाया करते थे किः

मौत को बहुत ज़्यादा याद किया करो। इस से गुनाह में कमी होती है और इस दुनिया की तरफ़ से तवज्जोह हट जाती है जो रू़हानी इतेक़ा के मदारिज तै करने में कोई मदद न कर सके।

(अल मो़हजतुल बैज़ा, जि॰ ८, स॰ ३०५)

इस के बरख़ेलाफ़ कुछ लोग ऐसे भी हैं जो अइम्मा अ़लैहिमुस्सलाम के अ़हकाम की पैरवी करते हुए अक्सर मौत को याद किया करते हैं और हर चीज़ में आख़ेरत का फ़ाएदा तलाश करते हैं उनकी दुनिया वोह दुनिया है जो आख़ेरत की नेअ़्‌मतों का मुक़द्दमा बन सके। उनकी जुस्तजू, उनकी सई-ओ-कोशिश, हवा-ओ-हवस की बेना पर नहीं है। उनकी नज़रों में दुनिया की इतनी अहम्मीयत नहीं है कि जिसके ह़ासिल करने के लिए गुनाह जुर्म और ख़ेयानत की जाए। बल्कि येह लोग वुस्अ़ते दिल और पाक नीयतों के साथ इज्तेमा़ई ख़िदमात अंजाम देते हैं ताकि आख़ेरत के लिए ज़्यादा से ज़्यादा तोशा फ़राहम सकें।

येह लोग मौत से नहीं डरते। उनके सरदार और क़ाफ़ला सालार ह़ज़रत अमीरुल मोअ्‌मेनीन अ़ली अ़लैहिस्सलाम हैं। जब उनके सरे अक़दस पर दुश्मन की तलवार लगी है तो पहला जुम्ला यही था किः

فُزْتُ وَ رَبِّ الْکَعْبَۃ۔

फ़ुज़्तो व रब्बिल कअ़्‌बते

रब्बे कअ्‌बा की क़सम मैं कामियाब हो गया।

(मनाकि़बे इब्ने शह्रे आशोब, (तबअ़्‌ नजफ़), जि॰ ३, स॰ ९५ - बेह़ार, जि॰ ४२, स॰ २३९)

हाँ इस तंग-ओ-तारीक दुनिया से निकल कर आलमी अबदीयत की वुस्अ़तों में क़दम रखना कामियाबी और कामरानी है लेकिन उन्हीं के लिए जिन्हों ने ह़ज़रत अ़ली अ़लैहिस्सलाम के नक़्शे क़दम पर ज़िंदगी गुज़ारी हो। सारी उम्र पाकीज़गी में बसर की हो। रू़ह, जान और अफ़्कार की ततहीर, नफ़्स की पाकीज़गी। ख़ुदा की एबादत बंदगाने ख़ुदा की ख़िदमत उनकी ज़िंदगी का शेवा रहा हो।

ह़ज़रत अबूज़र से दरियाफ़्त किया गया किः हम मौत से क्यों बेज़ार हैं?

फ़रमायाः तुमने अपनी दुनिया आबाद की है और आख़ेरत वीरान। इस लिए तुम इस बात पर तैयार नहीं हो कि आबादी से बर्बादी की तरफ़ कूच करो।

(एअ़्‌तेक़ादे सदूक़, स॰ १६, अल मो़हजतुल बैज़ा, जि॰ ८, स॰ २५८, बेह़ार, जि॰ ६, स॰ १३७.)

पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अ़लैहे व आलेही व सल्लम इर्शाद फ़रमाते थे कि क्या तुम सब लोग बहिश्त में जाना चाहते हो? सबने कहा हाँ या रसूलल्लाह!

उस वक़्त आँह़ज़रत सल्लल्लाहो अ़लैहे व आलेही व सल्लम ने इर्शाद फ़रमाया किः

बस अपनी तमन्नाओं को कम करो। हमेशा मौत को निगाहों में रखो और ख़ुदा से डरते रहो।

(अल मो़हजतुल बैज़ा, जि॰ ८, स॰ २४६)

अज़ीज़ों और दोस्तों की मौत को याद करना, क़ब्रिस्तान जाना, मोअ्‌मेनीन की क़ब्रों की ज़ेयारत करना येह चीज़ें इबरत और नसीह़त ह़ासिल करने में बहुत मुफ़ीद हैं।

जन्नत

जन्नत वोह अबदी क़यामगाह है जिसे ख़ुदावंद आलम ने नेकूकारों को उनके अअ़्‌माल के सिले में अ़ता करेगा। जन्नत में हर तरह की नेअ़्‌मतें राहत रसानी के तमाम वसाएल, आराम के तमाम ज़रा़ए फ़राहम होंगे। वहाँ हर वोह चीज़ होगी जिसे वोह लोग चाहेंगे।

जन्नत में कीना, हसद, दुश्मनी.... का नाम-ओ-निशान न होगा। वहाँ सब भाई भाई की तरह ज़िंदगी बसर करेंगे। हर शख़्स वहाँ हमेशा रहेगा और किसी को कोई तकलीफ़ न होगी।

(सूरए ह़िज्र की आयात ४७-४८ से इस्तेफ़ादा)

पाक और मुख़्लिस बंदे जन्नत में करीमाना ज़िंदगी बसर करेंगे और बाइज़्ज़त रहेंगे। मख़मली तख़्तों पर तकिया लगाए आमने सामने बैठे होंगे एक दूसरे से दोस्ताना बातें कर रहे होंगे जवान ख़िदमत गुज़ार, साफ़-ओ-शफ़्फ़ाफ़ जाम-ओ-साग़र लिए उनके गिर्द होंगे और वोह शराब उनकी ख़िदमत में पेश करेंगे जिस में नशा न होगा और न सर दर्द और न अ़क़्ल-ओ-होश उस से मुतअ्‌स्सिर होगा।

हर क़िस्म के परिन्दों का गोश्त वहाँ मौजूद होगा जिस चीज़ को वोह चाहेंगे वोह फ़ौरन उनके पास आ जाएगी।

येह उन नेकियों का सिला होगा जो उन्होंने इस दुनिया में अंजाम दी हैं। (सूरए वा़केआ की आयात ११-२४ और सूरए साफ़्फ़ात की आयात ४७-९३ से इक़्तेबास व इस्तेफ़ादा) जन्नती अफ़राद आपस में एक दूसरे से गुफ़्तुगू करेंगे। एक कहेगा ऐ बहिश्ती दोस्तो दुनिया में मेरा एक दोस्त था जो ग़ुरूर-ओ-तकब्बुर से येह कहा करता था किः

क्या तुम्हें येह यक़ीन है कि जब मर जाएँगे और इस ज़मीन में नापैद हो जाएँगे फिर दुबारा ज़िंदा किए जाएँगे और अपने अपने अअ़्‌माल का सिला पाएँगे।

ऐ दोस्तो चलो उस को देखें कि वोह किस ह़ाल में है।

जब येह लोग नज़र उठा कर देखेंगे तो उसे जहन्नम में पाएँगे।

येह शख़्स उस से कहेगा ख़ुदा की क़सम तुम मुझे भी अपनी तरह हलाक करना चाहते थे। अगर ख़ुदा की तौफीक़ मेरे शामिले ह़ाल न होती उस वक़्त मैं भी तुम्हारी तरह अ़ज़ाब में गिरफ़्तार होता।

उस वक़्त जन्नती लोग एक दूसरे से कहेंगेः अब हमें दुबारा मौत न आएगी। वही आख़िरी थी जो गुज़र गई अब हमें कोई अ़ज़ाब नहीं झेलना पडेगा। हाँ यही है अ़ज़ीम कामियाबी।

 जो इस तरह की जन्नत का आर्जूमंद है उसे अ़मल करना चाहिए।

لِمِثْلِ ھٰذَا فَلْیَعْمَلِ الْعَامِلُوْنَ۔

लेमिस्ले हाज़ा फ़लयअ़्‌मलिल आमेलू-न

(सूरए सा़पफात आयत ६१)

जहन्नम

जहन्नम काफ़िरों और गुनाहगारों की जगह है जहाँ के अ़ज़ाब और शिकंजा का इस दुनिया की मुसीबतों से कोई मुक़ाबला नहीं किया जा सकता।

ख़ुदावंद आलम ने जहन्नम की हौलनाकी की तस्वीर क़ुरआन में इस तरह खींची हैः

वोह लोग जिन्होंने हमारी आयतों का इन्कार किया अ़न्क़रीब आतशे जहन्नम में फेंक दिए जाएँगे जब उनके बदन की जिल्द जल कर गिर जाएगी। हम उनके बदन पर दूसरी जिल्द च़ढा देंगे ताकि दुबारा जलें और हमारे अ़ज़ाब का मज़ा चखें। यक़ीनन ख़ुदा क़ादिर और ह़कीम है।

(सूरए निसा, आयत ५६)

काफ़िरों के लिए आग का लेबास तैयार किया जाएगा। उनके सरों पर जहन्नम का खौलता हुआ पानी डाला जाएगा जिससे उनकी जिल्द बल्कि पूरा बदन आग हो जाएगा। आहनी गुर्ज़ उन के सरों पर बरसाए जाएँगे।

जब येह लोग जहन्नम और उस के अ़ज़ाब से निकलना चाहेंगे दुबारा वापस कर दिए जाएँगे और उनसे कहा जाएगा कि ख़ुदा की आतशीं अ़ज़ाब का ज़ाएक़ा चखो।

(सूरए ह़ज, आयात १९-२३ से इस्तेफ़ादा)

जहन्नमी अफ़राद अपने निगहबानों से कहेंगे किः अपने परवरदिगार से दरख़ास्त करो कि एक दिन के लिए हमें अ़ज़ाब से नजात दे दे।

दोज़ख़ के निगहबान कहेंगेः कि क्या पैग़म्बर (स.अ़.) मोअ़्‌जेज़ात और रोशन दलीलों के साथ तुम्हारी हेदायत के लिए नहीं आए थे?

वोह कहेंगेः हाँ आए तो थे।

निगहबान कहेंगेः जिसे चाहो फ़रियाद के लिए बुलाओ। काफ़िरों की फ़रियाद का कोई फ़ाएदा न होगा।

(सूरए मोअ्‌मिन, आयात ४९-५० से इस्तेफ़ादा)

إِنَّ جَهَنَّمَ كَانَتْ مِرْصَادًا لِلْطَّاغِينَ مَآبًا لَابِثِينَ فِيهَا أَحْقَابًا ۔

इन्न जहन्न-म कानत मिर्सादन लित्ताग़ी-न मआबन लाबेसी-न फ़ीहा अ़ह्क़ाबन

यक़ीनन दोज़ख़ सरकशों और सितमगरों की ताक में है येह वोह जगह है जहाँ येह लोग दराज़ मुद्दत तक रहेंगे।

(सूरए नबा, आयत २१-२३)

वाए हो ग़ीबत करने वाले तानाज़न पर! जो माल जमअ़्‌ करता है और बहुत ही मो़हब्बत से उसे शुमार करता है। वोह येह ख़याल करता है कि उस का माल उस को इस दुनिया में हमेशा बाक़ी रखेगा। हरगिज़ ऐसा नहीं है यक़ीनन वोह ‘‘ह़ोतमा’’ में झोंक दिया जाएगा। तुम्हें क्या मअ़्‌लूम कि ‘ह़ोतमा’ क्या है। वोह अल्लाह की रोशन की हुई आग है जो दिलों तक पहुँच जाएगी।

(सूरए होमज़ा, आयात १-९)

ह़ज़रत अ़ली अ़लैहिस्सलाम इर्शाद फ़रमाते हैं किः

यक़ीन करो तुम्हारे बदन की जिल्द इतनी नाज़ुक है कि वोह आतशे जहन्नम की गर्मी बर्दाश्त नहीं कर सकती है पस अपने ऊपर रह्म करो। तुम ने अपने को दुनिया की मुसीबतों में आज़्माया है तुम्हें अपनी नातवानी का इल्म है। अगर तुम्हारे बदन में कोई काँटा चुभ जाता है या तुम्हारा पैर ज़ख़्मी हो जाता है या गर्म रेत से तुम्हारा पाँव जलता है उस वक़्त कितना ज़्यादा बेचैन और मुज़्तरिब होते हो। पस उस वक़्त क्या ह़ाल होगा जब तुम जहन्नम की आग के दरमियान होगे। जब तुम्हारे पह्लू में दहकता हुआ पत्थर होगा और तुम्हारा हमनशीं शैतान होगा।

ऐ गिरोहे बंदगाने ख़ुदा! ख़ुदा रा! ख़ुदा रा! ख़ुदा को याद करो। सेहत की ह़ालत में क़ब्ल इस के कि बीमार हो। आसानियों और आसाइशों में क़ब्ल इस के कि परेशानियों में मुब्तेला हो। क़ब्ल इस के कि आज़ादी की राह बंद हो कोशिश करो कि आतशे जहन्नम से आज़ाद हो जाओ। ख़ुदा की राह में क़दम उठाओ। अपनी आमदनी उस की राह में ख़र्च करो, अपने बदन को रू़ह की तक़वियत के लिए इस्तेअ़्‌माल करो और देखो इस में कोताही न करो।

(नह्जुल बलाग़ा (फ़ैज़ुल इस्लाम), ख़ुतबा १८२ स॰ ५९४-५९९)

शेफ़ाअ़त

शेफ़ाअ़त क़ुरआन ह़कीम और रवायात के बअ़्‌ज़ मसाएल में शामिल है। शेफ़ाअ़त यअ़्‌नी किसी की बख़्शिश के लिए सेफ़ारिश करना।

येह सेफ़ारिश और शेफ़ाअ़त वही कर सकते हैं जिनको ख़ुदा ने इजाज़त दी होगी और उन्हीं चीज़ों की कर सकते हैं जिनकी ख़ुदा ने इजाज़त दी होगी। शेफ़ाअ़त की बुनियाद ख़ुदावंद आलम की रह्मत और उस का वसीअ़्‌ लुत्फ़ है। उसी से मोअ्‌मेनीन की उम्मीदें वाबस्ता हैं।

अगर ईमान लाने वाले में येह सलाह़ियत होगी कि वोह बख़्शिश और अ़फ़्व का मुस्तह़क़ क़रार पाए और इस के दर्जात बलंद हो। अगर उसे दुनिया में तौबा का मौक़अ़्‌ न मिला हो तब भी ख़ुदा उसे शेफ़ाअ़त की बेना पर बख़्श देगा ।

अम्बिया अ़लैहिमुस्सलाम, पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अ़लैहे व आलेही व सल्लम और अइम्मा अ़लैहिमुस्सलाम को ख़ुदावंद आलम ने शेफ़ाअ़त का ह़क़ अ़ता फ़रमाया। येह हज़रात उन लोगों की शेफ़ाअ़त करेंगे जो उस के मुस्तह़क़ होंगे।

अलबत्ता बअ़्‌ज़ अफ़राद की गुनाहें इतनी ज़्यादा संगीन होंगी कि जहन्नम में कुछ दिन रहे बग़ैर वोह शेफ़ाअ़त के मुस्तह़क़ न होंगे। और बअ़्‌ज़ गुनाहें ऐसी हैं जो शेफ़ाअ़त के इस्तेह़क़ाक़ को बिल्कुल सल्ब कर लेती हैं। रवायात में येह रवायत बराबर मिलती है किः

हम अह्लेबैत की शेफ़ाअ़त उस को नसीब न होगी जो नमाज़ को सुबुक समझेगा।

(काफ़ी जि॰ ३, स॰ २७०)

अल ह़म्दो लिल्लाहे अव्वलन व आख़ेरन - वस्सलाम