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सबक़ - २९

अबदी क़यामगाह

مَا خُلِقْتُمْ لِلْفَنَاءِ بَلْ خُلِقْتُمْ لِلْبَقَاءِ وَاِنَّمَا تُنْقَلُوْنَ مِنْ دَارٍ اِلٰی دَارٍ

मा ख़ुलिक़्तुम लिल फ़नाए बल ख़ुलिक़्तुम लिल बक़ाए व इन्नमा तुन्क़लू-न मिन दारिन एला दारिन

(बेह़ार, जि॰ ६ स॰ २४९)

तुम हमेशा के लिए पैदा किए गए हो फ़ना के लिए नहीं सिर्फ़ एक घर से दूसरे घर मुंतकि़ल हो जाओगे। (पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अ़लैहे व आलेही व सल्लम)

तमाम आसमानी मज़ाहिब ने इस बात की बाक़ा़एदा वज़ाहत की है कि मौत इन्सान की आख़िरी मंज़िल नहीं है। मौत के ज़री़ए इन्सान इस दुनिया से दूसरी दुनिया में मुंतकि़ल हो जाता है जहाँ उसे उस के अच्छे और बुरे अअ़्‌माल का बदला दिया जाएगा।

अम्बिया अ़लैहिमुस्सलाम और उनके पैरवकार इस नुक्ते पर-ज़ोर देते थे कि दुनिया का येह निज़ाम बेकार और बेमक़्सद नहीं है। इस दुनिया से जाने के बअ़्‌द उन तमाम अअ़्‌माल का ह़िसाब किताब होगा जो उसने इस दुनिया में अंजाम दिए हैं। इस लिए येह हज़रात अपने को यक़ीनी मुस्तक़बिल और आइन्दा पेश आने वाले वा़केआत के लिए आमादा करते थे। गोया दिल की ज़बान से येह जुम्ला दोहराते थे किः

رَبَّنَا مَا خَلَقْتَ هَذا بَاطِلاً سُبْحَانَكَ فَقِنَا عَذَابَ النَّارِ ۔

रब्बना मा ख़लक़-त हाज़ा बातेलन सुब़्हा-न-क फ़़केना अ़ज़ाबन्नारे

(सूरए आले इमरान, आयत १९१)

परवरदिगार तूने इस काएनात को बेमक़्सद पैदा नहीं किया तू बेमक़्सद काम से पाक-ओ-पाकीज़ा है हमें आतशे जहन्नम से म़हफ़ूज़ रख।

क़यामत के सिलसिले में बअ़्‌ज़ दलीलें मुलाहेज़ा हों।

(१) ख़ुदा की ह़िकमत और अ़दालत

तमाम आसमानी मज़ाहिब और तमाम अम्बिया अ़लैहिमुस्सलाम ने क़यामत के बारे में वज़ाहत की है और उस की तरफ़ लोगों को मुतवज्जेह किया है। इस के अ़लावा अ़क़्ल, ख़ुदा की ह़िकमत, अ़दालत और रह्मत भी क़यामत के यक़ीनी होने को बताती हैं।

ख़ुदावंद आलम की ह़िकमत इस बात का तक़ाज़ा करती है कि नेकूकारों को उनके अअ़्‌माल की जज़ा और बदकारों को उनके अअ़्‌माल की सज़ा मिलनी चाहिए। ज़ालिमों से मज़्लूमों को ह़क़ मिलना चाहिए। इसी के साथ साथ हम येह देखते हैं कि इस दुनिया में बहुत से नेकूकारों को जज़ा नहीं मिलती है और न बदकारों को मुकम्मल सज़ा मिलती है और न ज़ालिमों को उनके ज़ुल्म का भरपूर बदला मिलता है। बदकार अपनी तमाम बदकारियों के बावजूद इस दुनिया में रा़हत-ओ-आराम की ज़िंदगी बसर करते हैं और बग़ैर कोई सज़ा भुगते इस दुनिया से चले जाते हैं। ज़ालिम ख़ुश ख़ुश इस दुनिया से रुख़स्त होता है और मज़्लूम की आख़िरी सांस भी इसी बेचैनी में गुज़रती है।

अगर मौत ही को तमाम चीज़ों का ख़ातमा क़रार दिया जाए और उस के बअ़्‌द क़यामत और आख़ेरत का कोई तसव्वुर न हो तो इस सूरत में ख़ुदा की ह़िकमत, अ़दालत और रह्मत के बारे में क्या कहा जाएगा?

येह बात क्यूँकर बावर की जा सकती है कि जिस आदिल, ह़कीम और मेह्रबान ख़ुदा ने इस दुनिया को वजूद बख़्शा है इस दुनिया में ज़ुल्म-ओ-जौर में गिरफ़्तार मज़्लूम बंदे ज़ुल्म सहते सहते इस दुनिया से रुख़स्त हो जाएँ और उनके साथ इन्साफ़ न हो?

हम सब यही कहेंगेः येह रविश सरासर ज़ुल्म है, आम इन्सान की ह़िकमत, अ़दालत और रह्मत हरगिज़ इस बात की सज़ावार नहीं है चेजाएकि ख़ुदावंद ह़कीम और आदिल इस तरह का काम अंजाम दे। वोह ख़ुदा जिसको हमारी ख़िल्क़त से कोई फ़ाएदा नहीं पहुँचता। हमारी ख़िल्क़त का फ़ाएदा ख़ुद हमें पहुँचता है ताकि हम नेक-अअ़्‌माल अंजाम दे कर बलंद दर्जात ह़ासिल करें। क्या मुम्किन है कि इन्सान की सलाह़ियतों को बाक़ा़एदा बार आवर होने से पहले ही वोह इस सारे सिलसिले को मुन्क़तअ़्‌ कर दें और बात ना-मुकम्मल रह जाए?

यक़ीनन ख़ुदा हर अअ़्‌माल-ओ-किरदार का मुकम्मल बदला दूसरी दुनिया में देगा। ज़र्रा बराबर भी फ़रो गुज़ार नहीं करेगा।

أًمْ حَسِبَ الَّذِينَ اجْتَرَحُوا السَّيِّئَاتِ أّن نَّجْعَلَهُمْ كَالَّذِينَ آمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ سَوَاء مَّحْيَاهُم وَمَمَاتُهُمْ سَاء مَا يَحْكُمُونَ وَخَلَقَ اللهُ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضَ بِالْحَقِّ وَلِتُجْزَىٰ كُلُّ نَفْسٍ بِمَا كَسَبَتْ وَهُمْ لَا يُظْلَمُونَ ۔

अम ह़सेबल्लज़ीनज-त-रहुस्सय्येआते अन नज्अ़-लहुम कल्लज़ी-न आमनू व अ़मेलुस्साले़हाते सवाअन म़ह्याहुम व ममातोहुम सा-अ मा य़ह्कोमू-न व ख़-लक़ल्लाहुस्समावाते वल अर्ज़ बिल ह़क़़्के व-लेतुज्ज़ा कुल्लो नफि़्सन बेमा कसबत व हुम ला युज़्लमू-न

(सूरए जासिया, २१-२२)

‘.....जिन लोगों ने बुरे काम किए हैं वोह येह गुमान करते हैं कि हम उन्हें उन लोगों के मानिंद क़रार देंगे जो ईमान लाए हैं और नेक काम किए हैं। क्या उनकी ज़िंदगी और मौत नेकूकारों की ह़यात-ओ-मौत के बराबर है? येह लोग कितना बुरा फ़ैसला करते हैं और ख़ुदावंद आलम ने आसमानों और ज़मीन को ह़क़ के साथ पैदा किया जिसने जो कुछ भी किया है उसे उस का बदला दिया जाएगा और उन पर ज़रा भी ज़ुल्म नहीं किया जाएगा।

इस के अ़लावा बअ़्‌ज़ अअ़्‌माल की सज़ा इस दुनिया में नहीं मिल सकती जैसे किसी शख़्स ने एक ऐटमी बम फेंक कर लाखों इन्सानों को नीस्त-ओ-नाबूद कर दिया इस दुनिया में उस का एक मर्तबा क़त्ल कर देना क्या लाखों इन्सानों के ख़ून का बदला हो जाएगा। हरगिज़ नहीं बल्कि इस ज़ुल्म की मुकम्मल सज़ा बस आख़ेरत में मिल सकती है जहाँ एक मर्तबा के क़त्ल से अबदी मौत न होगी बार-बार ज़िंदा किया जाएगा और सज़ा दी जाएगी।

और इस के अ़लावा इस दुनिया की ज़िंदगी मुख़्तलिफ़ क़िस्म की परेशानियों से घिरी हुई है येह दुनिया इस लाएक़ नहीं है कि ख़ुदा उसे नेकूकारों की जज़ा क़रार दे। वोह लोग जिन्हों ने अपनी सारी ज़िंदगी ख़ुदा की मज़ीी के मुताबिक़ गुज़ारी, सारी उम्र बंदगाने ख़ुदा की ख़िदमत करते रहे। इस राह में अपनी जान को भी अ़ज़ीज़ न रखा बल्कि वक़्त आने पर उस को ख़ुदा की राह में क़ुर्बान कर दिया। ख़ुद मुसीबत उठा कर दूसरों को मौत से नजात दिलाई। क्या ऐसे लोगों के अअ़्‌माल का बदला यही चंद रोज़ा दुनिया क़रार पा सकती है। ख़ुदा की अ़दालत इस फ़ानी दुनिया को नेकूकारों के अ़मल का बदला क्यों क़रार देगी।

(२) मुकाफ़ात

इस दुनिया में अपनी आँखों से देखा और अपने कानों से सुना है कि जिन लोगों ने अपने वालेदैन पर ज़ुल्म-ओ-सितम किया, उनकी ज़िंदगी तल्ख़ियों से भरी गुज़री, या जिन लोगों ने अपने वालेदैन को क़त्ल किया वोह ़ऐन-जवानी में मौत का शिकार हो गए। और वोह लोग जिन्हों ने अपने वालेदैन के साथ नेकी का बर्ताव किया उन्हें उस का सिला राहत-ओ-आराम की सूरत में इसी दुनिया में मिला। जिन लोगों ने यतीमों के ह़क़ में ज़ुल्म किया उस की सज़ा उन्हें इसी दुनिया में ही भुगतनी पड़ी।

क़ुरआन ने इस ह़क़ीक़त की तरफ़ मुतवज्जेह किया है कि वोह लोग जिन्हें अपने कमज़ोर-ओ-नातवाँ यतीमों के बारे में ख़ौफ़-ओ-ह़ेरास लाहक़ है कि उनके बअ़्‌द उनका क्या होगा उन्हें (इस बात से डरना चाहिए कि दूसरे यतीमों पर ज़ुल्म-ओ-सितम न करें कहीं उस का बदला उनके यतीमों को न मिले) और तक़्वए इलाही इख़्तेयार करना चाहिए।

وَلْيَخْشَ الَّذِينَ لَوْ تَرَكُواْ مِنْ خَلْفِهِمْ ذُرِّيَّةً ضِعَافًا خَافُواْ عَلَيْهِمْ فَلْيَتَّقُوا اللّهَ وَلْيَقُولُواْ قَوْلاً سَدِيدًا ۔

वल यख़्शल्लज़ीन लौ त-रकू मिन ख़ल्फ़ेहिम ज़ुर्रीयतन ज़ेआफ़न ख़ाफ़ू अ़लैहिम फ़ल-यत्त़कुल्ला-ह वल य़कूलू क़ौलन सदीदन.

(सूरए निसा, आयत ९)

ह़ज़रत इमाम मो़हम्मद बाक़िर अ़लैहिस्सलाम इर्शाद फ़रमाते हैं ख़ुदावंद आलम ने यतीम का नाहक़ माल खाने में दो सज़ा रखी है दुनिया में परेशानियाँ और आख़ेरत में अ़ज़ाब।

(नूरुस्सक़लैन, जि.१, स॰ ३७०)

 बसा औक़ात इन्सान मसाएब-ओ-मुश्किलात में गिरफ़्तार हो जाता है अपने उन बदअअ़्‌मालियों की बेना पर जो उस से सरज़द होती है। दर ह़क़ीक़त येह मुसीबतें वोह दुनियावी अ़ज़ाब है जो इस दुनिया में मिल रहा है ताकि वोह होश में आए और अपने किरदार पर नज़रे सानी करे और उस की इस्ला़ह की कोशिश करे। क़ुरआन ह़कीम ने अपनी मुतअ़द्दिद आयतों में इस ह़क़ीक़त की तरफ़ इशारा किया है किः

وَمَا أَصَابَكُم مِّن مُّصِيبَةٍ فَبِمَا كَسَبَتْ أَيْدِيكُمْ وَيَعْفُو عَن كَثِيرٍ ۔

व मा असा-बकुम मिन मुसी-बतिन फ़-बेमा क-सबत ऐदीकुम व यअ़्‌फ़ू अ़न कसीरिन

(सूरए शूरा, आयत ३०)

तुम पर जो भी मुसीबत पड़ती है वोह तुम्हारे ही किए का नतीजा है

فَلْيَحْذَرِ الَّذِينَ يُخَالِفُونَ عَنْ أَمْرِهِ أَن تُصِيبَهُمْ فِتْنَةٌ أَوْ يُصِيبَهُمْ عَذَابٌ أَلِيمٌ ۔

फ़ल-य़ह्ज़रिल्लज़ी-न योख़ालेफ़ू-न अ़न अम्रेही अन तुसी-बहुम फ़ित्नतुम औ युसी-बहुम अ़ज़ाबुन अलीम

(सूरए नूर, आयत ६३)

जो लोग ख़ुदा और उस के रसूल की नाफ़रमानी करते हैं उन्हें इस बात से डरना चािहिए कि उन पर कोई मुसीबत नाज़िल हो या किसी दर्दनाक अ़ज़ाब में गिरफ़्तार हों।

إِنَّ اللّهَ لَا يُغَيِّرُ مَا بِقَوْمٍ حَتَّى يُغَيِّرُواْ مَا بِأَنْفُسِهِمْ ۔

इन्नल्ला-ह ला युग़य्यरो मा बेक़ौमिन ह़त्ता युग़य्येरू मा बे अन्फ़ोसेहिम

(सूरए रअ़्‌द, आयत ११)

ख़ुदा किसी की भी ह़ालत उस वक़्त तक नहीं बदलता जब तक वोह ख़ुद अपने को न बदले।

गुज़श्ता अम्बिया अ़लैहिमुस्सलाम की बअ़्‌ज़ उम्मतें अपनी ना-फ़रमानी और सरकशी की बेना पर इसी दुनिया में मुब्तेलाए अ़ज़ाब हो चुकी हंै। क़ुरआन ह़कीम ने क़ौमे नूह, क़ौमे हूद, क़ौमे साले़ह, क़ौमे लूत और क़ौमे शु़ऐब ......की सरगुज़श्त बयान की है और उस अ़ज़ाब की तश्री़ह की है जो इसी दुनिया में उन पर नाज़िल हुआ।

(सूरए हूद वग़ैरा)

येह अ़ज़ाब, येह मुसीबतें और येह मुकाफ़ाते अ़मल इस बात की दलील है कि ख़ुदावंद आलम हरगिज़ ज़ुल्म-ओ-सितम पर राज़ी नहीं है और अअ़्‌माल का मुकम्मल बदला दूसरी दुनिया में देगा। येह दुनियावी अ़ज़ाब तो सिर्फ़ एक नमूना है। दुनियावी अ़ज़ाब देखने के बअ़्‌द यक़ीन हो जाता है कि इन्सान को ख़ुद उस के ह़ाल पर नहीं छोड़ा गया है बल्कि दूसरी दुनिया में उस के हर हर अ़मल का बाक़ा़एदा ह़िसाब किताब होगा।

यहाँ इस ह़क़ीक़त की तरफ़ तवज्जोह करना बहुत ज़रूरी है कि वोह मुसीबतें और मुश्किलें जो नेकूकारों पर नाज़िल होती हैं वोह उनके अअ़्‌माल की सज़ा नहीं है बल्कि वोह उनके किरदार की मज़ीद तअ़्‌मीर, रू़हानी इतेक़ा और बलंदिए दर्जात के लिए है। अगर बदकारों को इस दुनिया में उनके अअ़्‌माल की सज़ा न मिले तो इस का मतलब येह नहीं है कि ख़ुदा उनसे ख़ुश है और उन पर अपनी रह्मतें नाज़िल कर रहा है या भूल गया है बल्कि उन्हें अपने अअ़्‌माल का भरपूर बदला आख़ेरत में मिलेगा और ज़र्रा बराबर भी फ़रो गुज़ार नहीं किया जाएगा।

आख़ेरत इस्लामी नुक़्तए नज़र से

दूसरे आसमानी मज़ाहिब की बनिस्बत इस्लाम ने आख़ेरत पर ज़्यादा ज़ोर दिया है। इस्लाम में जिन मौज़ूआत को बहुत ज़्यादा अहम्मीयत दी गई है उनमें आख़ेरत सरे फ़ेहरिस्त है। क़ुरआने ह़कीम की एक हज़ार से ज़्यादा आयतें आख़ेरत के मौज़ूअ़्‌ और उस की जुज़्ईयात से मुतअ़ल्लिक़ हैं जब कि वोह आयतें जिनमें इन्फ़ेरादी, इज्तेमा़ई, मुआशरती .....अ़हकाम-ओ-क़वानीन बयान किए गए हैं जिन्हें ‘आयातुल अ़हकाम’ कहा जाता है उनकी तअ़्‌दाद पाँच सौ से कुछ ज़्यादा नहीं है। इसी बेना पर अ़क़ीदए क़यामत उसूले दीन में शामिल है जो भी इस का इन्कार करेगा वोह मुसलमानों के ज़ुमरे से ख़ारिज हो जाएगा।

जो आयतें आख़ेरत के सिलसिले में नाज़िल हुई हैं उन्होंने मुतअ़द्दिद पह्लूओं से आख़ेरत पर रोशनी डाली है और मुख़्तलिफ़ मौज़ूआत को बयान किया है सिर्फ़ चंद पह्लूओं को बतौर नमूना पेश करेंगे।

क़यामत के यक़ीनी होने के सिलसिले में इर्शाद होता है किः

أَيَحْسَبُ الْإِنسَانُ أَن يُتْرَكَ سُدًى ۔

(१) अ य़ह्‌सबुल इन्सानो अन युत्‌र-क सुदा

(सूरए क़यामत , आयत ३६)

क्या इन्सान ने येह ख़याल कर लिया है कि उस को यूँ ही छोड़ दिया गया है? यअ़्‌नी उस के किरदार का ह़िसाब किताब न होगा।

وَمَا خَلَقْنَا السَّمَاءَ وَالْأَرْضَ وَمَا بَيْنَهُمَا بَاطِلًا ۚ ذَٰلِكَ ظَنُّ الَّذِينَ كَفَرُوا ۚ فَوَيْلٌ لِّلَّذِينَ كَفَرُوا مِنَ النَّارِ ﴿٢٧﴾ أَمْ نَجْعَلُ الَّذِينَ آمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ كَالْمُفْسِدِينَ فِي الْأَرْضِ أَمْ نَجْعَلُ الْمُتَّقِينَ كَالْفُجَّارِ ﴿٢٨﴾

(२) हमने आसमान-ओ-ज़मीन और जो चीज़ें उनके दरमियान है उन्हें बेकार नहीं पैदा किया है। येह तो उन लोगों का ख़याल है जो काफ़िर हो गए हैं और आतशे जहन्नम है काफ़िरों के लिए। वोह लोग जो ईमान लाए हैं और नेकूकार हैं क्या हम उन्हें उन लोगों के बराबर क़रार देंगे जो ज़मीन में फ़साद बर्पा करते हैं या परहेज़गारों और बदकारों को एक दर्जा देंगे?

(सूरए साद, आयत २७-२८)

وَلَا تَحْسَبَنَّ اللّهَ غَافِلًا عَمَّا يَعْمَلُ الظَّالِمُونَ إِنَّمَا يُؤَخِّرُهُمْ لِيَوْمٍ تَشْخَصُ فِيهِ الاَبْصَارُ ۔

वला त़ह्सबन्नल्ला-ह ग़ाफ़ेलन अ़म्मा यअ़्‌मलुज़्ज़ालेमू-न इन्नमा योअख़्ख़ेरोहुम लेयौमिन तश्ख़सो फ़ीहिल अब्सारो

(सूरए इब्राहीम, आयत ४२)

हरगिज़ येह गुमान न करना कि ख़ुदा ज़ालिमों से ग़ाफ़िल है ख़ुदा उन्हें उस दिन के लिए मोहलत दे रहा है जिस दिन आँखें अ़ज़ाब की शिद्दत से ख़ीरा हो जाएँगी उस वक़्त उन ज़ालिमों के अअ़्‌माल का ह़िसाब-ओ-किताब होगा।

मुश्रिक क़यामत पर यक़ीन नहीं रखते थे और इस को नामुम्किन ख़याल करते थे एक दिन ‘अबी इब्ने ख़लफ़’ एक बोसीदा हड्डी लेकर पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अ़लैहे व आलेही व सल्लम की ख़िदमत में हाज़िर हुआ और उस को अपनी चुटकियों से मसल कर कहने लगा किः

مَنْ يُحْيِي الْعِظَامَ وَهِيَ رَمِيمٌ ؟

मन यु़ह्‌यिल एज़ा-म व-हि-य रमीम?

(सूरए यासीन, आयत ७८)

इन बोसीदा और ख़ाकिस्तर हड्डियों को कौन ज़िंदा करेगा?

 (मज्म़उल बयान, जि॰ ८, स॰ ४३४, तफ़सीरुल बुरहान, जि॰ ४, स॰ १३)

येह शख़्स अपनी ख़िल्क़त की इब्तेदा को फ़रामोश कर चुका था ख़ुदा ने उस का जवाब यूँ दिया किः

قُلْ يُحْيِيهَا الَّذِي أَنشَأَهَا أَوَّلَ مَرَّةٍ وَهُوَ بِكُلِّ خَلْقٍ عَلِيمٌ ۔

क़ुल यु़ह्‌यीहल्लज़ी अन्श-अ-हा अव्व-ल मर्रतिन व हो-व बेकुल्ले ख़ल्कि़न अ़लीम

(सूरए यासीन, आयत ७९)

वोह ख़ुदा जिसने इब्तेदा में हड्डियों को पैदा किया और उन्हें ज़िंदगी दी वही दुबारा भी ज़िंदा करेगा उसे हर मख़्लूक़ का इल्म है।

इस के बअ़्‌द इर्शाद फ़रमायाः

जिसने आसमानों और ज़मीन को पैदा किया क्या वोह इन जैसा पैदा करने पर क़ुदरत नहीं रखता? क्यों नहीं। वोह क़ुदरत रखता है वोह बड़ा ही जानने वाला ख़ालिक़ है।

أَوَلَيْسَ الَّذِي خَلَقَ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضَ بِقَادِرٍ عَلَى أَنْ يَخْلُقَ مِثْلَهُم بَلَى وَهُوَ الْخَلَّاقُ الْعَلِيمُ ۔

अ-व-लैसल्लज़ी ख़-ल-क़स्समावाते वल अर-ज़ बेक़ादेरिन अ़ला अन यख़्लो-क़ मिस्लहुम बला व होवल ख़ल्ला़कुल अ़लीम

(सूरए यासीन, आयत ८१)

सा़हेबान ईमान और काफ़िरों के अंजाम, बहिश्त में मोअ्‌मेनीन को क्या क्या नेअ़्‌मतें मिलेंगी और काफ़िरों को दोज़ख़ में किस किस तरह का अ़ज़ाब दिया जाएगा। इस सिलसिले में इर्शाद होता है किः

فَأَمَّا مَن طَغَىٰ وَآثَرَ الْحَيَاةَ الدُّنْيَا فَإِنَّ الْجَحِيمَ هِيَ الْمَأْوَىٰ وَأَمَّا مَنْ خَافَ مَقَامَ رَبِّهِ وَنَهَى النَّفْسَ عَنِ الْهَوَىٰ فَإِنَّ الْجَنَّةَ هِيَ الْمَأْوَىٰ ۔

फ़-अम्मा मन तग़ा व आ-सरल ह़यातद्दुन्या फ़इन्नल ज़ही-म हियल मअ्‌वा व अम्मा मन ख़ा-फ़ मक़ा-म रब्बेही व नहन्नफ़-स अ़निल हवा फ़इन्नल जन्न-त हियल मावा

(सूरए नाज़ेआत, आयत ३७ - और उसके बअ़्‌द की आयतें ४१ तक)

जिसने सरकशी की और दुनिया को आख़ेरत पर तर्जीह दी तो यक़ीनन उस का ठिकाना जहन्नम है। और जो अपने रब से डरा और ख़ाहिशाते नफ़्स से परहेज़ किया तो यक़ीनन उस की क़यामगाह जन्नत है।

مَنْ عَمِلَ سَيِّئَةً فَلَا يُجْزَىٰ إِلَّا مِثْلَهَا وَمَنْ عَمِلَ صَالِحًا مِّن ذَكَرٍ أَوْ أُنثَىٰ وَهُوَ مُؤْمِنٌ فَأُوْلَئِكَ يَدْخُلُونَ الْجَنَّةَ يُرْزَقُونَ فِيهَا بِغَيْرِ حِسَابٍ ۔

मन अ़मे-ल सय्येअतन फ़ला युज्ज़ा इल्ला मिस्लहा व मन अ़मे-ल साले़हन मिन ज़-करिन औ उन्सा व हो-व मोअ्‌मेनुन फ़ उलाए-क यद्‌ ख़ुलूनल जन्न-त युर्ज़़कू-न फ़ीहा बेग़ैरे ह़ेसाबिन

(सूरए मोअ्‌मिन, आयत ४०)

जो बुरा काम करेगा उस को ऐसी ही सज़ा मिलेगी और जो नेक काम करेगा ख़ाह मर्द हो या औरत और बा-ईमान होगा वोह जन्नत में जगह पाएगा और उसे बे-ह़िसाब रिज़्क़ दिया जाएगा।

आख़ेरत के अ़ज़ाब की शिद्दत को बयान किया ताकि लोग बुराइयों से दूर रहें और तक़्वए इलाही इख़्तेयार करें इस सिलसिले की येह आयतें मुलाहेज़ा होंः

يَا أَيُّهَا النَّاسُ اتَّقُوا رَبَّكُمْ إِنَّ زَلْزَلَةَ السَّاعَةِ شَيْءٌ عَظِيمٌ ﴿١﴾ يَوْمَ تَرَوْنَهَا تَذْهَلُ كُلُّ مُرْضِعَةٍ عَمَّا أَرْضَعَتْ وَتَضَعُ كُلُّ ذَاتِ حَمْلٍ حَمْلَهَا وَتَرَى النَّاسَ سُكَارَىٰ وَمَا هُم بِسُكَارَىٰ وَلَـٰكِنَّ عَذَابَ اللّهِ شَدِيدٌ ﴿٢﴾

या अय्योहन्नासुत्त़कू रब्बकुम इन्न ज़ल्ज़-लतस्साअ़ते शैउन अ़ज़ीम. यौ-म तरौनहा तज़हलो कुल्लो मुज़ेअ़तिन अम्मा अर्ज़अ़त व त-ज़-आे कुल्लो ज़ाते ह़म्लिन ह़मलहा व तरन्ना-स सुकारा वमा हुम बेसुकारा वलाकिन्‌-न अ़ज़ाबल्लाहे शदीद.

(सूरए ह़ज, आयत १)

ऐ लोगो! अपने परवरदिगार से डरो और तक़्वा इख़्तेयार करो यक़ीनन क़यामत का ज़लज़ला बड़ा ही ख़ौफ़नाक है जिस दिन तुम देखोगे कि अ़ज़ाब की शिद्दत से माँ अपने शीर ख़ार बच्चे को भूल जाएगी, ह़ामेला औरत अपना ह़म्ल गिरा देगी। लोगों को मदहोश पाओगे जो मदहोश नहीं है बल्कि अ़ज़ाब की शिद्दत ने उनके होश उ़़डा दिए हैं।

فَإِذَا جَاءَتِ الصَّاخَّةُ ﴿٣٣﴾ يَوْمَ يَفِرُّ الْمَرْءُ مِنْ أَخِيهِ ﴿٣٤﴾ وَأُمِّهِ وَأَبِيهِ ﴿٣٥﴾ وَصَاحِبَتِهِ وَبَنِيهِ ﴿٣٦﴾ لِكُلِّ امْرِئٍ مِّنْهُمْ يَوْمَئِذٍ شَأْنٌ يُغْنِيهِ ﴿٣٧﴾

जिस वक़्त क़यामत की हौलनाक सदा बलंद होगी, जिस दिन भाई, माँ, बाप, शौहर, ज़ौजा औलाद सब एक दूसरे से फ़रार कर रहे होंगे (उस दिन हर इन्सान सिर्फ़ अपनी फ़िक्र में होगा दूसरे से बिल्कुल लापरवाह होगा)

(सूरए अ़बस, आयत ३३-३७)

يَوْمَ تَجِدُ كُلُّ نَفْسٍ مَّا عَمِلَتْ مِنْ خَيْرٍ مُّحْضَرًا وَمَا عَمِلَتْ مِن سُوءٍ تَوَدُّ لَوْ أَنَّ بَيْنَهَا وَبَيْنَهُ أَمَدًا بَعِيدًا ۔

यौ-म तजेदो कुल्लो नफि़्सन मा अ़मे-लत मिन ख़ैरिन मो़हज़रन वमा अ़मे-लत मिन सूइन तवद्दो लौ अन्न बै-नहा व बैनहू अ-मदन बईदन

(सूरए आले इमरान, आयत ३०)

जिस दिन हर इन्सान अपने तमाम अच्छे और बुरे अअ़्‌माल अपने सामने पाएगा उस वक़्त उस की ख़ाहिश येह होगी कि काश उस के और उस के अअ़्‌माल के दरमियान तूलानी फ़ासेला होता।

इन आयात के अ़लावा सैकड़ों आयतें क़यामत और ह़िसाब-ओ-किताब के मसाएल बयान करती हैं। अगर इन आयात पर ग़ौर किया जाए और उनके मफ़ाहीम पर तवज्जोह दी जाए तो इन्सान की रविश में ज़रूर तब्दीली आएगी और वोह कोई भी काम बग़ैर ग़ौर-ओ-फ़िक्र के अंजाम नहीं देगा। तक़्वा और परहेज़गारी इख़्तेयार करेगा। आख़ेरत की आसाइशों के लिए इसी दुनिया से वसाएल फ़राहम करेगा। पाक तीनत मुसलमान आख़ेरत के ख़ौफ़ से, अपने किरदार, अख़्लाक़, बल्कि अपने अफ़्कार को भी पाक रखते हैं और रोज़े ह़िसाब से पहले ख़ुद अपना मुहासेबा करते हैं रातों को ख़ुशगवार नींद से बेदार हो कर गर्म बिस्तरों को छोड़ कर शब के सन्नाटे में ख़ुदा की एबादत करते हैं, उस से राज़-ओ-नियाज़ करते हैं, अपने अअ़्‌माल का जाएज़ा लेते हैं। वोह कोई भी काम हवा-ओ-हवस की बेना पर अंजाम नहीं देते बल्कि अपने अख़्लाक़, किरदार आदत-ओ-अतवार की तरबियत और पाकीज़गी में मुन्हमिक रहते हैं।

‘सअ़्‌सा इब्ने सौहान’ का बयान है कि नमाज़े शब के लिए मस्जिदे कूफ़ा पहुँचा। ह़ज़रत अ़ली अ़लैहिस्सलाम ने हमारे साथ नमाज़ पढी।

नमाज़ के बअ़्‌द वोह क़िब्ला रुख़ बैठ गए और यादे ख़ुदा में डूब गए। किसी एक तरफ़ रुख नहीं किया यहाँ तक कि सूरज निकल आया। उस वक़्त आपने हमारी तरफ़ रुख़ करके इर्शाद फ़रमाया कि मेरे महबूब रसूले ख़ुदा सल्लल्लाहो अ़लैहे व आलेही व सल्लम के ज़माने में ऐसे अफ़राद थे जो सारी रात रुकूअ़्‌-ओ-सुजूद में बसर करते थे। सुबह के वक़्त उनके चेहरे उदास और ग़ुबार-आलूद रहते थे। सज्दे की कसरत से उनकी पेशानी पर घट्टा पड़ गया था। और जब मौत को याद करते थे तो इस तरह काँपते थे जैसे तेज़ आंधी में दरख़्त की शाख़ें। और इतना रोते थे कि आँसुओं से उनका लेबास तर हो जाता था। येह फ़रमाकर ह़ज़रत अ़ली अ़लैहिस्सलाम खड़े हो गए और फ़रमायाः और जो लोग बाक़ी रह गए हैं वोह ग़फ़लत में पड़े हुए हैं।

(इर्शाद, स॰ ११४, नह्जुल बलाग़ा तबअ़्‌ फ़ैज़, ख़ुतबा ९६ - मुख़्तसर तफ़ावुत से)

 एक दिन नमाज़े सुब्ह (सुबह) के बअ़्‌द रसूले ख़ुदा सल्लल्लाहो अ़लैहे व आलेही व सल्लम की निगाहें’ हारिसा’ नामी एक जवान पर पड़ीं जो ऊँघ रहा था चेहरा ज़र्द था आँखें अन्दर धँसी हुई थीं रसूले ख़ुदा सल्लल्लाहो अ़लैहे व आलेही व सल्लम ने उस से सवाल फ़रमाया कि किस ह़ाल में सुबह की?

उसने कहा मैंने यक़ीन की ह़ालत में सुबह की।

आँह़ज़रत सल्लल्लाहो अ़लैहे व आलेही व सल्लम फ़रमायाः हर यक़ीन की एक ह़क़ीक़त होती है तुम्हारे यक़ीन की ह़क़ीक़त क्या है?

उसने कहा मेरे यक़ीन ने मुझे रंजीदा कर दिया है, मेरी नींद उ़डा ले गया है और मुझे चिलचिलाती धूप में प्यासा कर दिया है गोया मैं अभी देख रहा हूँ कि क़यामत आ गई है। लोग ह़िसाब-ओ-किताब के लिए जमअ़्‌ हो गए हैं मैं भी उनमें शामिल हूँ। मैं देख रहा हूँ कि एक गिरोह बहिश्त की नेअ़्‌मतों से लुत्फ़ अ़ंदोज़ हो रहा है और जन्नत के तख़्‌तों पर बैठे एक दूसरे मह्वे गुफ़्तुगू हैं। और एक उस दूसरे गिरोह को देख रहा हूँ जो अ़ज़ाबे जहन्नम में मुब्तेला है और एक दूसरे से मदद माँग रहा है उनकी आवाज़ें बलंद हैं। जहन्नम के शोलों की आवाज़ मेरे कानों में आ रही है।

रसूले ख़ूदा सल्लल्लाहो अ़लैहे व आलेही व सल्लम ने अपने अस्ह़ाब से फ़रमाया कि ख़ुदावंद आलम ने अपने बंदे के दिल को ईमान के नूर से मुनव्वर कर दिया है। इस के बअ़्‌द आँह़ज़रत सल्लल्लाहो अ़लैहे व आलेही व सल्लम ने उस जवान से फ़रमायाः

अपनी इस ह़ालत की ह़ेफ़ाज़त करो, येह ह़ालत सल्ब न होने पाए।

उसने अ़र्ज़ किया रसूले ख़ुदा सल्लल्लाहो अ़लैहे व आलेही व सल्लम आप ख़ुदा से मेरे ह़क़ में येह दुआ फ़रमा दें कि ख़ुदा मुझे आपके सामने शहादत नसीब करे।

चुनांचे आँह़ज़रत सल्लल्लाहो अ़लैहे व आलेही व सल्लम ने येह दुआ दी।

कुछ दिन न गुज़रे थे कि एक जंग में ९ शहीदों के बअ़्‌द येह जवान दसवाँ शहीद था।

(उसूले काफ़ी, जि॰ २, स॰ ५३-५४)