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सबक़ - २०

ह़ज़रत मो़हम्मद मुस्तफ़ा (स.अ.आ.स.)

अस्रे इन्तेज़ार-ओ-उम्मीद

गुज़श्ता अम्बिया अ़लैहिमुस्सलाम ने और ख़ासकर ह़ज़रत मूसा और ह़ज़रत ईसा अ़लैहेमस्सलाम ने अपने मानने वालों को इस्लाम के ज़हूर की बशारत दी थी। यहाँ तक कि पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ़.) की बअ़्‌ज़ ख़ुसूसीयात भी उनकी आसमानी किताबों में मौजूद हैं। लेहाज़ा यहूदी और ईसाई बल्कि दूसरे मज़ाहिब वाले भी इस्लाम का इस तरह़ इन्तेज़ार कर रहे थे जिस तरह़ कश्ती वाले साह़िल का इन्तेज़ार कर रहे हों जिसका बादबान भी ख़त्म हो गया हो, लंगर भी टूट गया हो और ग़़र्क हो जाना नज़्दीक हो।

(सीरए इब्ने हेशाम, जि.  १ स. २११-२२६)

बअ़्‌ज़ यहूदियों ने तो ह़ुकूमते इस्लामी के मर्कज़ भी तअ़्‌यीन कर दी थी कि वोह जगह ‘ओ़हद’ और ‘ईर’(ईर वोह पहा़डी है जिस के जुनूब में मदीना और शुमाल में ओ़हद वा़केअ़्‌ है। अल-जेबाल ज़मख़्शरी, स. ८ और १००) नामी पहाड़ी के दरमियान है। बहुतों ने तलाश बिस्‌यार के बअ़्‌द इस जगह का पता लगाया और वहीं जाकर बस गए और ज़हूरे इस्लाम का इन्तेज़ार करने लगे।

(रौज़ए काफ़ी, स. ३०८)

इस सिलसिले में क़ुरआन बेहतरीन गवाह है कि ‘तौरेत’ और ‘इंजील’ ने आँह़ज़रत (स.अ़.)की आमद की ख़बर दी है। क़ुरआन की चंद आयतें मुला़हेज़ा होंः

(१) (यहूदी और ईसाइयों का वोह गिरोह ऱह्मते ख़ुदा का मुस्त़हक़ है) जो उस रसूल और नबी की पैरवी करता है जो ‘उम्मी’ है जिसकी निशानियाँ तौरेत और इंजील में मौजूद हैं।

वोह पैग़म्बर ऐसा है जो उन्हें नेकियों का ह़ुक्म देता है और बुराइयों से रोकता है, पाक-ओ-साफ़ चीज़ों को उनके लिए ह़लाल करता है और गंदगी-ओ-नजिस चीज़ों को उन पर ह़राम करता है।

और सख़्त अ़हकाम का बोझ जो उनकी गर्दन पर था और वोह फंदे जो उनकी गर्दन में पड़े हुए थे उन सब को वोह पैग़म्बर उन से अलग कर देता है।

 فَالَّذِينَ آمَنُوا بِهِ وَعَزَّرُوهُ وَنَصَرُوهُ وَاتَّبَعُوا النُّورَ الَّذِي أُنزِلَ مَعَهُ  أُولَـٰئِكَ هُمُ الْمُفْلِحُونَ ﴿١٥٧﴾

जो लोग उस पर ईमान लाए, उस की इज़्ज़त की, उस की मदद की और उस नूर (क़ुरआन) की पैरवी की जो उस के साथ नाज़िल हुआ है तो यक़ीनन यही लोग कामियाब हैं।’

(सूरए अअ़्‌राफ़, आयत १५७)

(२) मो़हम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अ़लैहे व आलेही व सल्लम ख़ुदा के रसूल हैं और जो लोग उनके साथ हैं वोह काफ़िरों पर सख़्त और आपस में बड़े ऱह्म-दिल हैं।

तुम उन्हें इस ह़ाल में देखोगे कि वोह ख़ुदाए वाह़िद के सामने तन ब-रुकूअ़्‌ और सर ब-सुजूद हैं। ख़ुदा के फ़ज़्ल और उस की ख़ुशनूदी के ख़ास्तगार हैं, उनकी पेशानियों पर सज्दों के निशान हैं।

उनके यही औसाफ़ तौरेत में हैं और यही ह़ालात इंजील में भी मज़्कूर हैं।

वोह गोया एक खेती के मानिंद हैं कि उसने अपनी कोपल निकाली, फिर उस को क़ूवत पहुँचाई फिर वोह मोटी हो गई। फिर अपने पैरों (जड़) पर ख़डी हो गई और इतनी ताज़गी से किसानों को ख़ुश करने लगी, ताकि उनके ज़री़ए काफ़िरों का जी जलाए।

 وَعَدَ اللهُ الَّذِينَ آمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ مِنْهُم مَّغْفِرَةً وَأَجْرًا عَظِيمًا ﴿٢٩﴾

जो लोग ईमान लाए हैं और अच्छे अच्छे काम करते हैं ख़ुदा ने उन से बख़्शिश और अज्र अ़ज़ीम का वअ़्‌दा किया है।

(सूरए फ़त़्ह, आयत २९)

येह मिसाल उस ह़क़ीक़त की तरफ़ इशारा कर रही है कि पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ़.) और उनके जाँ बाज़ साथियों ने अपनी तब्लीग़ का आग़ाज़ सिफ़र से किया और औजे तरक़्क़ी तक पहुँचे। अपनी फ़ेदा कारी, ईमान, इत्ते़हाद और ईसार से सारी दुनिया को अंगुश्त बदंदाँ (ह़ैरान) कर दिया।

وَإِذْ قَالَ عِيسَى ابْنُ مَرْيَمَ يَا بَنِي إِسْرَائِيلَ إِنِّي رَسُولُ اللّهِ إِلَيْكُم مُّصَدِّقًا لِّمَا بَيْنَ يَدَيَّ مِنَ التَّوْرَاةِ وَمُبَشِّرًا بِرَسُولٍ يَأْتِي مِن بَعْدِي اسْمُهُ أَحْمَدُ  فَلَمَّا جَاءَهُم بِالْبَيِّنَاتِ قَالُوا هَـٰذَا سِحْرٌ مُّبِينٌ ﴿٦﴾

(३) जब मरियम के पेसर ईसा ने कहा ऐ बनी इस्राईल! मैं तुम्हारी तरफ़ ख़ुदा का पैग़ाम्बर हूँ, और जो किताब तौरेत मेरे सामने मौजूद है मैं उस की तस्दीक़ करता हूँ। मैं तुम्हें ऐसे रसूल की बशारत देता हूँ जो मेरे बअ़्‌द आएँगे और जिनका नाम अहमद (स.अ़.) होगा।।

(सूरए सफ़, आयत ६)

लेकिन जब वोह पैग़म्बर (अ़हमद (स.अ़.)) उनके पास वाज़े़ह-ओ-रोशन मोअ़्‌जेज़ात और दलीलें लेकर आए तो उन्हें उस की बशारत का यक़ीन न हुआ और कहने लगेः येह तो खुला हुआ जादू है।

الَّذِينَ آتَيْنَاهُمُ الْكِتَابَ يَعْرِفُونَهُ كَمَا يَعْرِفُونَ أَبْنَاءَهُمْ وَإِنَّ فَرِيقًا مِّنْهُمْ لَيَكْتُمُونَ الْحَقَّ وَهُمْ يَعْلَمُونَ

(४) जिनको हमने आसमानी किताब दी है वोह पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ़.) को इस तरह़ पहचानते हैं जिस तरह़ वोह अपनी औलाद को पहचानते हैं, उनमें से कुछ लोग तो ऐसे भी हैं जो दीदा-ओ-दानिस्ता (देखते और जानते हुए) ह़क़ बात को छिपाते हैं।

(सूरए बक़रा, आयत १४७; सूरए अन्आ़म आयत २०)

इन आयात से येह बात वाज़े़ह हो जाती है कि गुज़श्ता अम्बिया अ़लैहिमुस्सलाम ने पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ़.) की आमद की बशारत अपनी क़ौम को दी थी और पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ़.) की ख़ुसूसीयात और सिफ़ात भी बयान कर दी थीं, और इस का तज़्केरा उनकी मज़हबी किताबों में भी मौजूद था, ताकि आँह़ज़रत (स.अ़.) के ज़हूर और एअ़्‌लाने बेअ़्‌सत के बअ़्‌द अह्ले किताब के लिए किसी ा़किस्म का शक-ओ-शुब्हा बाक़ी न रह जाए।

अगर आँह़ज़रत (स.अ़.) के ज़माने के यहूदियों-ओ-ईसाइयों की किताबों में आँह़ज़रत (स.अ़.) का तज़्केरा न होता और आँह़ज़रत (स.अ़.) के ज़हूर की बशारत न दी गई होती तो आँह़ज़रत (स.अ़.) जैसे साहबे किरदार से येह बात बईद थी कि वोह अपनी रेसालत के इस्बात के लिए तमाम यहूदियों और ईसाइयों के सामने खड़े हो कर येह एअ़्‌लान करते हैं कि मेरा नाम, मेरी ख़ुसूसीयात तुम्हारी तौरेत और इंजील में मौजूद हैं।

अगर येह बशारतें उनकी किताबों में न होतीं तो येह अह्ले किताब कभी भी ख़ामोश न बैठते और आँह़ज़रत (स.अ़.) की रेसालत को ग़लत साबित करने के लिए अपनी किताबों के नुस्ख़े पेश कर देते और कहते कि दिखाइए इस में आपका तज़्केरा कहाँ है?

लेकिन तारीख़ इस बात की गवाह है कि उन लोगों ने इस आसान रास्ते को छो़डकर आँह़ज़रत (स.अ़.) की मुख़ालेफ़त की हर मुम्किन कोशिश की और इम्कान भर तब्लीग़े इस्लाम की राह में रो़डे अटकाए, जंग के लिए भी आमादा हो गए। मगर अपनी किताबें न पेश कीं।

येह इस बात की वाज़े़ह दलील है कि आँह़ज़रत (स.अ़.)का तज़्केरा आपका इस्मे मुबारक, आप (स.अ़.) की ख़ुसूसीयात और सिफ़ात उनकी किताबों में मौजूद थीं, जिनसे वोह वाकि़फ़ भी थे।

चंद तारीख़ी शवाहिद

इस्लाम से पहले मदीना में दो गिरोह ज़िंदगी बसर कर रहे थेः-

(१) यहूदी जो पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ़.) के शौ़के दीदार में अपना अस्ली वतन छो़डकर यहाँ आबाद हो गए थे।

(रौज़ए काफ़ी, स. ३०८)

(२) औस और ख़ज़रज, जो यमनी बादशाह ‘तुब्बअ़्‌’  के ख़ानदान के अफ़राद थे। तुब्बअ़्‌ जिस वक़्त मदीना पहुँचा और उसे येह मअ़्‌लूम हुआ कि पैग़म्बर (स.अ़.) ह़िजरत करके यहीं तशरीफ़ लाएँगे और यहीं ह़ुकूमते इस्लामी तश्कील पाएगी तो उसने दो क़बीलों से कहा तुम लोग यहीं रहो और जब ह़ज़रत (स.अ़.) का ज़हूर हो तो उनकी नुसरत और मदद करना। अगर मुझे उनकी ज़ेयारत नसीब हुई तो मैं भी उन (आँह़ज़रत (स.अ़.)) की मदद करूँगा।

(बे़हारुल अनवार, जि.  १५)

येह लोग मदीना में रह गए, धीरे धीरे उनकी तअ़्‌दाद ब़ढती गई, इसी एअ़्‌तबार से उनकी ताक़त में भी एज़ाफ़ा होता गया। येह इतने ताक़तवर हो गए कि यहूदियों पर ह़मला करने लगे। उनके माल-ओ-मताअ़्‌ पर क़ब्ज़ा करने लगे, और रफ़्ता-रफ़्ता येह बात भी उनके ज़ेह्नों से निकल गई कि उनके बुज़ुर्ग यहाँ क्यों आबाद हुए थे, और उस का सबब क्या था।

इन लोगों के मुक़ाबले में यहूदी कमज़ोर पड़ते थे, वोह पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ़.) के ज़हूर को सोच कर अपने दिल को तस्कीन दे लेते थे कि ज़हूर के बअ़्‌द इन तमाम मज़ालिम का ख़ातमा हो जाएगा और फिर वोह आराम से ज़िंदगी बसर करेंगे। उन लोगों के बारे में क़ुरआन का इर्शादः

وَلَمَّا جَاءَهُمْ كِتَابٌ مِّنْ عِندِ اللَّـهِ مُصَدِّقٌ لِّمَا مَعَهُمْ وَكَانُوا مِن قَبْلُ يَسْتَفْتِحُونَ عَلَى الَّذِينَ كَفَرُوا فَلَمَّا جَاءَهُم مَّا عَرَفُوا كَفَرُوا بِهِ ۔فَلَعْنَةُ اللَّـهِ عَلَى الْكَافِرِينَ ﴿٨٩﴾

‘इस्लाम से पहले यहूदी कहा करते थे कि इस्लाम की आमद से कुफ़्फ़ार को शिकस्त उठाना प़डेगी और इसी तरह़ एक दूसरे को दिलासा देते थे लेकिन जब इस्लाम ज़ाहिर हुआ तो उस को पहचानने से इन्कार कर दिया और उसे क़बूल न किया।’

(सूरए बक़रा, आयत ८९)

‘इब्ने ह़वाश’ का शुमार उलमाए यहूद में होता है। पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ़.) के शौ़के दीदार में उसने शाम की रिहाइश तर्क करके मदीना में सुकूनत इख़्तेयार की। लेकिन उस की ह़यात तक ह़ज़रत (स.अ़.) मब़्ऊस नहीं हुए थे। इस लिए उसने मरते वक़्त यहूदियों से कहाः

‘पैग़म्बर मो़हम्मद (स.अ़.) की ज़ेयारत के शौक़ में और उनके इश्क़ में, मैंने शाम की आसूदा ज़िंदगी को तर्क कर दी और यहाँ आ गया और यहाँ रोटी और खजूर पर क़नाअ़त की। अफ़सोस कि मेरी तमन्ना पूरी न हुई, लेकिन येह यक़ीन कर लो कि वोह मक्का में मब़्ऊस हो गया और ह़िजरत करके यहाँ आएगा। वोह ग़ेज़ा में एक टुकड़ा रोटी और खजूर पर इक्तेफ़ा करेगा। उस की ज़िंदगी इस क़द्र सादा होगी कि बग़ैर ज़ीन के मरकब पर सवार होगा। उस की ह़ुकूमत की कामियाबी ह़ैरत अंगेज़ होगी। वोह किसी से डरेगा नहीं जो लोग उस की ह़क़-ओ-ह़क़ीक़त की राह में सद्दे राह बनेंगे वोह उन्हें रास्ते से हटा देगा।

(इस्बातुल होदात, जि.  १, स. ८४; बे़हारुल अनवार, जि.  १५, स. २०६ और सीरए इब्ने हेशाम, जि.  १,स. ३३)

‘ज़ैद इब्ने अ़म्र’ हेजाज़ के रहने वाले थे, दीने मुक़द्दसे इब्राहीम की त़हक़ीक़ का शौक़ पैदा हुआ, उसी जुस्तुजू में मक्का से शाम, शाम से मूसल का सफ़र किया, लेकिन जितना ही ज़्यादा तलाश किया, उतनी ही कम कामियाबी हुई। आख़िर कार एक ईसाई आ़लिम ने उनसे कहाः इस वक़्त दीने इब्राहीमी के आसार ख़त्म हो चुके हैं, लेकिन अ़न्क़रीब तुम्हारी ही सरज़मीन पर एक पैग़म्बर मब़्ऊस होगा तुम्हें उस की गुफ़्तार-ओ-किर्दार में अपना मतलूबा दीन मिल जाएगा।

ज़ैद मक्का वापस हो गए, लेकिन रास्ते में उन्हें क़त्ल कर दिया गया।

पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ़.) ज़ैद को नेकी से याद करते थे और फ़रमाते थेः

‘ज़ैद वोह हैं जो दीन ख़ुदा तक पहुँचने की राह में क़त्ल कर दिए गए।

(बे़हारुल अनवार, जि.  १५, स. २०४)

ईसाई आ़लिम’ बहीरा’ ने आँह़ज़रत (स.अ़.) को बचपने में देखा। जो बातें उसने अपनी किताबों में प़ढी थीं उस से उसने आँह़ज़रत (स.अ़.) को पहचान लिया और ह़ज़रत अबूतालिब (अ़.स.) से जो उस वक़्त आँह़ज़रत (स.अ़.) के हमराह थे कहने लगाः

‘येह पैग़म्बर होंगे इनकी हेफ़ाज़त करो और जल्द वापस चले जाओ।

(सीरए इब्ने हेशाम, जि.  १, स. १८०-१८३)

‘नस्तूर’ का शुमार ईसाई उलमा में होता है, उसने जिस वक़्त आँह़ज़रत (स.अ़.) को जवानी के आ़लम में देखा तो उसने वाज़े़ह लफ़्ज़ों में आँह़ज़रत (स.अ़.) की रेसालत की बशारत दी और कहाः

पैग़म्बरे आख़िरुज़्ज़माँ यही हैं।

(तबक़ात इब्ने सअ़्‌द, जि.  १, (ह़िस्सा अव्वल) ८३)

मुक़द्दस किताबों की इन पेशीन गोइयों की बेना पर बअ़्‌ज़ लोगों ने इस्लाम के आग़ाज़ ही में हँसी ख़ुशी इस दअ़्‌वत को क़बूल किया और बग़ैर किसी जब्र-ओ-एकराह के मुसलमान हो गए।

अह्ले मदीना का रुज़्हान इस्लाम की तरफ़

जिस वक़्त पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अ़लैहे व आलेही व सल्लम को ख़ुदा की तरफ़ से येह ह़ुक्म मिला कि वोह ज़ाहिरी तौर पर अपनी रेसालत का आग़ाज़ करें और लोगों को इस्लाम की दअ़्‌वत दें, उस ज़माने में भी एक तरी़के का ह़ज राएज था। ह़ज के मौक़अ़्‌ पर काफ़ी लोग इकट्ठा हो जाते थे। इस मौक़अ़्‌ से पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ़.) फ़ाएदा उठाकर लोगों से मुलाक़ात करते थे और उनके सामने इस्लाम पेश करते थे। एक मर्तबा आप (स.अ़.) ने मिना में क़बीलए ‘ख़ज़रज’ के चंद अफ़राद से मुलाक़ात की, दरियाफ़्त फ़रमायाः

‘तुम लोग किस क़बीले से तअ़ल्लुक़ रखते हो।’?

‘क़बीलए ख़ज़रज से’

‘क्या तुम्हारे पास वक़्त है कि थोड़ी देर आपस में गुफ़्तुगू करें।’

‘बिल्कुल हम हाज़िर हैं।’

‘तुम्हें ख़ुदाए वाह़िद की तरफ़ बुलाता हूँ।’

उस वक़्त पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ़.) ने क़ुरआन की चंद दिल नशीन आयतें उन के सामने तिलावत कीं।

क़ुरआन की जाज़ेबीयत ने उन पर ऐसा असर किया कि बे-इख़्तेयार एक दूसरे से कहने लगे।

‘हम क़सम खा कर कह सकते हैं कि येह वही है जिससे यहूद हमको डराते धमकाते थे। यहूद हम पर सब्‌क़त ह़ासिल न करने पाएँ।’

वोह सब के सब मुसलमान हो गए और मदीना वापस जाकर इस्लाम की तब्लीग़ शुरूअ़्‌ कर दी। इन लोगों के बअ़्‌द पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ़.) ने ‘मुसअ़ब इब्ने उमैर’ को मदीना भेजा ताकि उन लोगों को क़ुरआन की तअ़्‌लीम दें और दूसरों को इस्लाम की तरफ़ बुलाएँ।

मुसअ़ब ने मदीना में काफ़ी तअ़्‌दाद में लोगों को मुसलमान किया। मिनजुम्ला उनमें क़बीलए ‘औस’ के सरदार ‘उसैद’ ने भी इस्लाम क़बूल कर लिया और अपने क़बीले वालों से कहाः

‘मो़हम्मद सल्लल्लाहो अ़लैहे व आलेही व सल्लम वही हैं जिनके बारे में यहूदी बराबर ख़बर देते रहे हैं।’

उसैद के पूरे क़बीले ने इस्लाम क़बूल कर लिया। इस तरह़ मदीना में इस्लाम फूलने फलने लगा। मक्का के बअ़्‌ज़ मुसलमान भी ह़िजरत करके मदीना चले आए और आख़िर कार ख़ुद पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अ़लैहे व आलेही व सल्लम ने मदीना की तरफ़ ह़िजरत की और ह़ुकूमते इस्लामी की बुनियाद डाली।

दास्ताने सलमान

जनाब सलमान ईरानी थे और एक किसान के बेटे थे। उनके वालेदैन आग के पुजारी और ज़रतश्ती थे। उस वक़्त जनाब सलमान का नाम ‘रूज़बह’ था। वालेदैन उन्हें बेपनाह चाहते थे। अपने दीनी अ़क़ाएद उन्हें सिखलाते थे और उन्हें किसी से मिलने नहीं देते थे।

एक दिन बाप के ह़ुक्म से खेती के काम से दूर जा रहे थे। रास्ते में गिरजा घर मिला जिसमें कुछ लोग ख़ुदा की एबादत और नमाज़ में मशग़ूल थे सलमान सोच में डूब गए, ग़ुरूबे आफ़ताब तक उन्हीं के पास रहे और सोचते रहे। आख़िर कार येह बात सलमान के ज़ेह्न नशीन हो गई कि उन लोगों का मज़हब उनके वालेदैन के मज़हब से बेहतर है।

दरियाफ़्त किया कि ‘इस दीन का मर्कज़ कहाँ है?

कहाः ‘शाम’

देर हो जाने की बेना पर बाप सख़्त परेशान था, एक आदमी को सलमान की तलाश के लिए भेजा।

जब सलमान घर वापस आए तो बाप ने सवाल कियाः कहाँ थे?

उन्होंने सारा वा़केआ़ बयान कर दिया। बाप ने कहा तुम्हारे बुज़ुर्गों का दीन बहुत बेहतर है।

रूज़बह ने जवाब दिया कि मैं सोचने के बअ़्‌द इस नतीजा पर पहुँचा हूँ कि उन लोगों का दीन हमारे बुज़ुर्गों के मज़हब से कहीं बेहतर है।

येह सुन कर बाप को और ज़्यादा ग़ुस्सा आ गया, रूज़बह को बुरा भला कहा और घर में क़ैदद कर दिया।

रूज़बह ने पोशीदा तौर पर एक आदमी के ज़री़ए ईसाइयों के पास येह पैग़ाम भेजाः जिस वक़्त शाम के ताजिर यहाँ आएँ और अपने सारे काम अंजाम देकर शाम वापस जाने लगें तो उस की इत्तेलाअ़्‌ मुझे कर दी जाए ताकि पोशीदा तौर पर घर से बाहर आऊँ और ख़ुफ़िया तरी़के से शाम जाऊँ।

चुनाँचे ऐसा ही किया गया और रूज़बह शाम पहुँच गए। वहाँ उन्होंने एक बुज़ुर्ग ईसाई आ़लिमे दीन की बारगाह में हाज़िरी दी और उस से येह दरख़ास्त की कि वोह उन्हें अपनी ख़िदमत गुज़ारी के लिए रख ले ताकि उस से इल्म ह़ासिल करें और ख़ुदा की एबादत करें। उस आ़लिम ने रूज़बह की येह दरख़ास्त क़बूल कर ली।

जब उस आ़लिम का इंतेक़ाल हो गया तो रूज़बह ने उसी आ़लिम के मश्वरे के मुताबिक़ दूसरे जय्यद उलमा के पास हाज़िरी दी और उनसे कस्बे फ़ैज़ किया।

इस सिलसिले के आख़िरी आ़लिम जो शाम में ‘अ़मूरिया’ नामी जगह में रहता था। रूज़बह ने उस से मरते वक़्त, येह दरख़ास्त की कि वोह उन्हें येह मश्वरा दें कि अब किस आ़लिम की ख़िदमत में हाज़िरी दूँ। उस आ़लिम ने कहाः

मुझे इस वक़्त किसी आ़लिम का इल्म नहीं है, लेकिन बहुत जल्द सरज़मीने अ़रब पर एक पैग़म्बर मब़्ऊस होगा वोह अपने वतन से उस जगह ह़िजरत करेगा जिसे खजूर के दरख़्तों ने अपने साया में ले लिया है और येह सरज़मीन दो रेगिस्तानों के दरमियान है।

उस अ़ज़ीमुल मर्तबत शख़्सीयत की बअ़्‌ज़ ख़ुसूसीयात इस तरह़ हैंः

वोह तोहफ़े जो उस की इज़्ज़त-ओ-ए़हतेराम के साथ उस की ख़िदमत में पेश किए जाएँगे उन्हें वोह क़बूल कर लेगा, लेकिन ‘सदक़ा’ को हाथ नहीं लगाएगा और उस के शानों के दरमियान मोह्रे रेसालत है।

अगर तुम वहाँ जा सकते हो तो चले जाओ।

उस आ़लिम की वफ़ात के बअ़्‌द रूज़बह ने एक तेजारती क़ाफ़ेले से बात की, जो अ़रब जा रहा था कि उन्हें भी अपने हमराह अ़रब ले चले।

उन लोगों ने रूज़बह की येह ख़ाहिश क़बूल कर ली, लेकिन क़ाफ़ेले वालों ने रास्ते में ख़ेयानत की और उन्हें ‘बनूक़रेज़ा’ के हाथों ग़ुलाम बनाकर फ़रोख़्त कर दिया। येह यहूदी उन्हें अपने काम काज के सिलसिले में मदीना की तरफ़ ले गया।

रूज़बह जैसे ही वहाँ पहुँचे येह देखकर उनकी ख़ुशी की इंतेहा न रही कि येह वही जगह है जिसके बारे में उस आ़लिमे दीन ने बयान किया था। रूज़बह अपने मालिक के खजूर के बाग़ में हँसी ख़ुशी काम करने लगे और ह़ज़रत मो़हम्मद सल्लल्लाहो अ़लैहे व आलेही व सल्लम के ज़हूर का इन्तेज़ार करने लगे। चूँकि चारों तरफ़ से सख़्त पाबंदियों में घिरे हुए थे लेहाज़ा ज़्यादा तलाश-ओ-जुस्तुजू न कर सके।

आख़िर कार इन्तेज़ार की घड़ियाँ ख़त्म हुईं। शबे हिज्र आख़िर को पहुँची और सुब्हे वेसाल नमूदार हुई। पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ़.) ने अपने चंद अस़्हाब के हमराह मदीने से नज़्दीक जगह तशरीफ़ ले गए। रूज़बह को आपके आने की इत्तेलाअ़्‌ मिल गई।

उसने अपने आपसे कहा कि येह बेहतरीन मौक़अ़्‌ है कि में अपने दरे मक़सूद को तलाश करूँ और उन निशानियों की जुस्तजू करूँ जो उस आ़लिम ने मुझे बताई थीं। इस ग़र्ज़ से जो ग़ेज़ा उनके पास थी उसे लिया और पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ़.) की ख़िदमत में हाज़िर हो गए। थोड़ी सी ग़ेज़ा पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ़.) की ख़िदमत में पेश की और कहा कि येह सदक़ा है और मो़हताजों के लिए मख़्सूस है, आपके साथियों में ज़रूरतमंद लोग मौजूद हैं, मेरी तमन्ना है कि आप इसे क़बूल फ़रमा लें।

पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ़.) ने वोह ग़ेज़ा अपने अस़्हाब को दे दी। रूज़बह बहुत ही ग़ौर से देख रहे थे कि पैग़म्बर (स.अ़.) ने उस ग़ेज़ा को इस्तेअ़्‌माल नहीं फ़रमाया। येह देखकर रूज़बह फूले नहीं समा रहे थे कि अ़लामत की तसदीक़ हो गई।

एक दूसरी ग़ेज़ा जो रूज़बह अपने हमराह लाए थे, उसे भी जल्दी जल्दी पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ़.) की ख़िदमत में पेश किया और अ़र्ज़ किया येह मेरी तरफ़ से हदिया है। दरख़ास्त करता हूँ कि आप इसे क़बूल फ़रमा लें।

पैग़म्बर सल्लल्लाहो अ़लैहे व आलेही व सल्लम ने ख़ंदा-पेशानी से उसे क़बूल फ़रमा लिया और उसे तनावुल फ़रमाया।

येह देखकर रूज़बह और ज़्यादा ख़ुश हुए।

रूज़बह पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ़.) के गिर्द घूम रहे थे कि उन्हें आख़िरी अ़लामत वोह मोह्र भी मिल जाए जो शानों के दरमियान है। पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ़.) रूज़बह का मतलब समझ गए इन्होंने अपने दोश मुबारक से लेबास हटा दिया ताकि वोह उस मोह्र को बाक़ा़एदा देख सकें।

रूज़बह ने उस मोह्रे रेसालत की ज़ेयारत की और इस्लाम क़बूल कर लिया। अब रूज़बह का नाम ‘सलमान’ रख दिया गया और उनको आज़ाद कराने के लिए भी वसाएल फ़राहम कर दिए गए। वोह भी पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ़.) के अस़्हाब में शामिल हो गए। जनाब सलमान अपनी फ़िक्र, ईमान, अ़क़ीदे की गहराइयों और वुस्अ़तों की बेना पर बहुत कम मुद्दत में पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ़.) के मुम्ताज़ तरीन शागिर्द बन गए।

(सीरए इब्ने हेशाम जि.  १, सफ़़हा २१४-२२२; तबक़ात इब्ने सअ़्‌द, जि.  ४, ह़िस्सा अव्वल, स. ५४-५६; बे़हारुल अनवार, जि.  २२ स. ३५५-३६८)

ह़क़ीक़त के वोह तमाम मुतलाशी जो इस ख़ुश्क और जलते हुए मा़हौल में तश्ना-कामी और तफ़तीदा जिगरी (दिल सोज़ी) की ज़िंदगी बसर कर रहे थे, जो सर चश्मए ह़यात और वजूद की तलाश में सरगर्दां थे। वोह तमाम निशानियाँ जो उन्होंने अपनी मुक़द्दस किताबों में प़ढी थीं या दूसरों से सुनी थीं, पैग़म्बरे सल्लल्लाहो अ़लैहे व आलेही व सल्लम की ज़ाते गेरामी में मिल गईं तो उन्होंने अपने को इस समंदरे ह़यात से मुंसलिक कर दिया। और इसी सर चश्मए ज़िंदगी से अपनी रू़ह और क़ल्ब-ओ-जिगर को जिला बख़्शी। गिरोह दर गिरोह अफ़राद इस्लाम के मोअ़्‌तक़िद होने लगे और आँह़ज़रत (स.अ़.)की रेसालत पर ईमान लाने लगे और क़ुरआन के अल्फ़ाज़ मेंः

يَدْخُلُونَ فِي دِينِ اللَّـهِ أَفْوَاجًا ﴿٢﴾

‘लोग फ़ौज दर फ़ौज दीने ख़ुदा में दाख़िल हो रहे हैं।’

(सूरए नस्र, आयत ३)

इस के साथ साथ यहूदियों और ईसाइयों में बअ़्‌ज़ ऐसे भी थे जिन पर ह़क़ीक़त बाक़ा़एदा रोशन हो गई थी। वोह पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ़.) को ख़ूब अच्छी तरह़ पहचानते थे, मगर उनका तअ़स्सुब, तंग-नज़री, जाह-ओ-मन्सब से वालहाना इश्क़ उनके लिए ईमान की राह में सख़्त रुकावट बन गया और आख़िर कार वोह ईमान न लाए।

सर चश्मए ह़यात को पहचानते हुए भी सराबे ज़िन्दगी के आ़शिक़ थे, हट धर्मी से बअ़्‌ज़ न आए। राहे सआ़दत-ओ-नजात से कतराते रहे और हलाकते अबदी से हम-आग़ोश हो गए।

فَلَمَّا جَاءهُم مَّا عَرَفُواْ كَفَرُواْ بِهِ فَلَعْنَةُ الله عَلَى الْكَافِرِينَ

फ़लम्मा जा-अहुम मा अ़-र-फ़ू क-फ़-रू बेही फ़- लअ़्‌-नतुल्लाहे अ़लल काफ़ेरी-न

(सूरए बक़रा, आयत ८९)

‘जब वोह पैग़म्बर उन के पास आया जिसे वोह पहचानते थे तो उस का इन्कार कर दिया और उस पर ईमान न लाए। पस ख़ुदा की लअ़्‌नत हो काफ़िरों पर।’

अब इस सिलसिले की दो मिसालेंः-

(१) ‘ह़य इब्ने अख़्तब’ की बेटी सफ़िया का बयान हैः

जिस वक़्त ह़ज़रत मो़हम्मद सल्लल्लाहो अ़लैहे व आलेही व सल्लम ने मदीना ह़िजरत की और ‘क़ुबा’ में क़याम पज़ीर हुए उस वक़्त मेरे वालिद मेरे चचा ‘अबू यासिर’ के हमराह सुबह के झटपटे में (तड़के) उनकी तलाश में गए। जब येह लोग ग़ुरूबे आफ़ताब के वक़्त वापस आए मैं बच्चों की तरह़ खेलती हुई उनके पास गई वोह लोग ज़्यादा थके हुए नज़र आ रहे थे। मेरी तरफ़ कोई तवज्जोह न की। मेरे चचा मेरे वालिद से कह रहे थेः

आया येह वही शख़्स है?

ख़ुदा की क़सम! वही शख़्स है।

उस को पहचाना?

हाँ।

अब उस के बारे में तुम्हारा क्या ख़याल है?

ख़ुदा की क़सम! ता ज़िंदगी दुश्मनी करूँगा।

(सीरए इब्ने हेशाम, जि.  २, स. ५१८)

(२) एक रोज़ पैग़म्बरे अकरम सल्लल्लाहो अ़लैहे व आलेही व सल्लम ने ‘कअ़्‌ब इब्ने असद’ से फ़रमायाः

‘क्या तुम्हें शामी आ़लिम ‘इब्ने ह़वाश’ की बातें याद नहीं हैं और उन सिफ़ारिशात का तुम पर कोई असर नहीं हुआ।’

कअ़्‌ब ने कहाः’ मुझे वोह बातें याद हैं लेकिन मुझे यहूदियों की सरज़निश और मलामत का ख़ौफ़ है कि वोह येह ज़रूर कहेंगे कि ‘कअ़्‌ब क़त्ल होने से डर गया।’ इस लिए में आप पर ईमान नहीं लाऊँगा और ताज़िंदगी दीने यहूद पर बाक़ी रहूँगा।’

(इस्बातुल होदात, जि.  १, स. २५०)

क़ुरआने करीम उन सियाह दिल और कोरे बातिन (कीना-वर) लोगों को जो ख़ुद ही अपनी ह़यात-ओ-सआ़दत को बर्बाद कर रहे हैं, नुक़सान उठाने वाला समझता है। इर्शाद होता हैः

 بِئْسَمَا اشْتَرَوْا بِهِ أَنفُسَهُمْ أَن يَكْفُرُوا بِمَا أَنزَلَ اللّهُ بَغْيًا أَن يُنَزِّلَ اللّهُ مِن فَضْلِهِ عَلَىٰ مَن يَشَاءُ مِنْ عِبَادِهِ  فَبَاءُوا بِغَضَبٍ عَلَىٰ غَضَبٍ۔ وَلِلْكَافِرِينَ عَذَابٌ مُّهِينٌ ﴿٩٠﴾

‘उन्होंने अपने साथ बहुत बुरा बर्ताव किया कि उन लोगों ने सरकशी और हसद की बेना पर ख़ुदा की नाज़िल कर्दा चीज़ का इन्कार कर दिया, कि ख़ुदावंद आ़लम ने क्यों अपने फ़ज़्ल को बअ़्‌ज़ लोगों से मख़्सूस रखा है, उन पर ग़ज़ब टूट प़डा और काफ़िरों के लिए रुसवा-ओ-ज़लील करने वाला अ़ज़ाब है।’

(सूरए बक़रा, आयत ९०)