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सबक़ - २१

क़ुरआन

इस्लाम का आ़लमी और अबदी मोअ़्‌जेज़ा

अम्बिया और मोअ़्‌जेज़ा

अम्बिया अ़लैहिमुस्सलाम हमेशा रोशन और वाज़े़ह दलीलों के साथ मब़्ऊस होते रहे ताकि लोगों को इस बात का यक़ीन हो जाए कि वोह अल्लाह के नुमाइंदे हैं।

वोह अ़प्‌Àराद जिनका ज़मीर आईना था और जिनका दिल सरचश्मे की तऱह साफ़-ओ-शफ़्फ़ाफ़ था वोह निशानियों को देखते ही दिल-ओ-जान से उस पर ईमान ले आते थे। जिस वव़त फ़िरआ़ैन के जादूगरों ने येह देखा कि जनाब मूसा अ़लैहिस्सलाम का अ़सा अज़दहा बन कर उनकी रस्सियों को निगल रहा है, उन्हें इस बात का यक़ीन हो गया कि येह काम इन्सानी ह़ुदूद से बाहर है। वोह फ़िरआ़ैन की धमकियों की परवाह किए बग़ैर जनाब मूसा अ़लैहिस्सलाम पर ईमान ले आए।

जनाब ईर्सा (अ़.स.) के ह़वारियों ने जनाब ईर्सा (अ़.स.) के एअ़्‌जाज़ को देखा कि किस तऱह मुर्दा जिस्म में जान डाल दी और वोह ख़ुदा के ह़ुक्म से ज़िंदा हो गया। ह़वारी जनाब ईर्सा (अ़.स.) की सदाक़त और नबूवत पर ईमान ले आए और अपनी बे-जान रू़ह को उन के ज़िंदगी साज़ पैग़ाम से ह़याते नौ अ़ता की।

पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ़.) सिलसिलए अम्बिया की आख़िरी कड़ी और तमाम अम्बिया से अफ़ज़ल थे वोह ऐसा अबदी और आ़लमी दीन लाए जिसने तमाम गुज़श्ता आसमानी अदियान की तकमील की और जो क़यामत तक बाक़ी रहेगा। रसूले ख़ुदा (स.अ़.) रोशन और वाज़े़ह निशानियों के साथ मब़्ऊस हुए ताकि किसी को आपके दीन की हक़्क़ानियत और सदाक़त पर शक-ओ-शुब्हा न हो।

क़ुरआन एक अबदी मोअ़्‌जेज़ा

क़ुरआन इस्लाम की अबदीयत की सनद बन कर फ़िक्र-ओ-नज़र के उफ़ुक़ पर आफ़ताब बन कर नमूदार हुआ।

क़ुरआन वोह मश्अ़ल है जो बशरीयत के वसीअ़्‌ तरीन उफ़ुक़ और इन्सानी उक़ूल की वुस्अ़तों में फ़रोज़ाँ है और हमेशा आफ़ताब की तऱह नूर अ़प्‌Àशाँ है और रहेगा। वोह अल्लाह का दीन है जिसकी शुआ़़एँ आफ़ताब की शुआ़ओ की तऱह सारी काएनात में फैली हुई हैं और तमाम इन्सानों को सआ़दत और कामियाब रास्ते की तरफ़ निशानदेही कर रही हैं।

इस में हेदायत के तमाम बुनियादी उसूल ज़िक्र कर दिए गए हैं।

वोह अ़क़ाएद हो या ख़ालिक़-ओ-मख़्लूक़ के राबते या इन्सानों के आपस में एक दूसरे से तअ़ल्लुक़ात। सब का तज़्केरा इतने नर्म और जज़्ज़ाब अंदाज़ से किया है जैसे पहाड़ के दामन में पाक साफ़ शीरीं और ह़सीन आबशार।

इस में इन्सानों की समाजी ज़िम्मेदारियों का तज़्केरा और ज़िंदगी बसर करने के बेहतरीन उस्लूब की तअ़्‌लीम  इस में तबक़ाती इख़्तेलाफ़ और समाजी ना बराबरी के मुकम्मल ख़ातमे के फ़ितरी उसूल   क़ुरआन इन्सान की बरतरी का ख़ाहाँ, बरादरी और बराबरी का मुतमन्नी और उनकी अअ़्‌ला तर्र्बियत का अ़लम बरदार है।

बेमिसाल फ़साहत-ओ-बलाग़त

लुग़ात का इल्म, जुम्लों पर दस्तरस कोई दुश्वार काम नहीं है लेकिन जुम्लों की साख़्त, लफ़्ज़ों की तर्तीब, तर्ज़े अदा, दूसरों तक अपनी बात को इस तऱह पहुँचाना कि बात भी मुकम्मल हो जाए और फ़सा़हत-ओ-बलाग़त पर भी हर्फ़ न आने पाए। येह ज़रूर दुश्वार है और येह काम फ़साहत-ओ-बलाग़त के बारीक और दक़ीक़ उसूलों की रेआ़यत के बग़ैर नामुमकिन है ।

फ़साहत-ओ-बलाग़त के फ़न में येह वज़ाहत की गई है।

फ़साहत-ओ-बलाग़त तक़रीर हो या त़हरीर तीन बातों की रेआ़यत ज़रूरी हैः-

(१) अल्फ़ाज़ और मआ़नी पर दस्तरस

(२) क़ूवते फ़िक्र और ज़ौक़े सलीम

(३) क़ुदरते क़लम-ओ-बयान

अगर किसी ने अपनी तक़रीर में फ़साहत-ओ-बलाग़त के तमाम उसूलों की मुकम्मल पाबंदी की हो उस सूरत में भी वोह इस बात का दअ़्‌वा नहीं कर सकता कि उस की तक़रीर या त़हरीर को हर दौर में तमाम तक़रीरों और त़हरीरों पर फ़ौक़ियत ह़ासिल रहेगी।

लेकिन ख़ुदावंद आ़लम जिसके इल्म और क़ुदरत की कोई इंतेहा नहीं है उसने क़ुरआन में लफ़्ज़ों और जम्लों को इस तऱह तर्तीब दिया है कि बड़े से बड़ा अदीब उस जैसा कलाम पेश करने से आ़जिज़ है और क़ुरआन की अबदीयत और आँह़ज़रत (स.अ़.) की लाज़वाल नबूवत का यही राज़ है।

तारीख़ गवाह है क़ुरआन उस वव़त नाज़िल हुआ जब अ़रब की फ़साहत-ओ-बलाग़त अपने उरूज पर थी। अम्रुल़कैस और लबीद जैसे अ़ज़ीम शा़एर जिनकी अ़ज़्मत आज भी अ़रबी अदब में म़हफ़ूज़ है, मौजूद थे। कभी कभी उनका कलाम इतना दिल नशीन और मोअस्सर होता था कि उस को पर्दे या सोने की तख़्तियों पर लिख कर ख़ानए कअ़्‌बा पर लटका दिए जाते थे।

लेकिन जब क़ुरआन का सूरज तुलूअ़्‌ हुआ येह तमाम अदबी शहपारे सितारों की तऱह माँद पड़ गए। अ़रब के अदीब क़ुरआन की फ़साहत-ओ-बलाग़त देखकर मुजस्समए ह़ैरत बन गए। इस्लाम और आँह़ज़रत (स.अ़.) के जानी और शम्शीर ब-कफ़ दुश्मन अपनी तमाम तलाश और कोशिश के बावजूद भी क़ुरआन में एक इश्तेबाह तक न निकाल सके  क्योंकि येह उनके इख़्तेयार में न था।

दुश्मनों के फ़ैसले

ह़ज का मौसम था (इस्लाम से पहले भी ख़ास अंदाज़ में ह़ज का रवाज था।) हर तरफ़ से लोग मक्का में जमअ़्‌ हो रहे थे मगर क़ुरैश इस बात से सख़्त परेशान थे कि आँह़ज़रत (स.अ़.) की रेसालत और आपकी तअ़्‌लीमात से दूसरे मुतअ्‌स्सिर न हो जाएँ और दीन इस्लाम क़बूल कर लें।

क़ुरैश ने वलीद की सदारत में एक जलसा किया कि आँह़ज़रत (स.अ़.) की तरफ़ नारवा बातें मंसूब करके ह़ज़रत (स.अ़.) को बदनाम किया जाए ताकि बाहर से आने वाले ह़ज़रत (स.अ़.) के बयानात से मुतअ्‌स्सिर न हों बल्कि ह़ज़रत (स.अ़.) से दूर ही दूर रहें। एक ने कहा किः उनको ‘काहिन’ मशहूर किया जाए।

वलीद ने कहाः कोई इस बात को क़बूल नहीं करेगा क्योंकि उनकी बातें काहिनों की तऱह नहीं है।

दूसरे ने कहाः दीवाना मशहूर किया जाए।

वलीद ने कहाः इसे भी कोई नहीं मानेगा उनकी बातें दीवानों जैसी नहीं हैं।

तीसरे ने कहाःउन्हें शा़एर मशहूर कर दिया जाए।

वलीद ने कहाः कोई इस तोह्मत को भी क़बूल नहीं करेगा क्योंकि अ़रब हर तऱह के शेअ़्‌र से वाकि़फ़ हैं और उस का कलाम शेअ़्‌र जैसा नहीं है।

चौथे ने कहाःजादूगर कहा जाए।

वलीद ने कहाः जादूगरों का ख़ास अंदाज़ है मसलन तागे में गिरह लगाना कुछ प़ढ कर उस पर फूँकना और दम करना और मो़हम्मद (स.अ़.) इस तऱह का कोई काम नहीं करते।

उस वव़त वलीद ने कहाः

ख़ुदा की क़सम इस शख़्स के कलाम में ख़ास क़िस्म की मिठास है और अ़जब कशिश है।

उस का कलाम उस दरख़्त के मानिंद है जिसकी ज़डें दूर तक गहराइयों में फैली हुई हैं और फलों की ज़्यादती ने उस की शाख़ों को झुका दिया है।

हम लोग बस येह कह सकते हैं कि इस की बातों में सेह्र है जो बाप, बेटे, शौहर-ओ-ज़ौजा और भाई भाई में जुदाई डाल देती हैं।

(वलीद का इशारा इस बात की तरफ़ है कि इस्लाम क़बूल करने के बअ़्‌द ताज़ा मुसलमान एक ऐसे रास्ते पर गामज़न हो जाते थे कि उन्हें अपने आप को मजबूरन दूसरों से अलग रखना प़डता था। पुराने अ़क़ाएद से दस्त बर्दारी की बेना पर रिश्तेदार उन से दस्तबर्दार हो जाते थे।)

वोह लोग जो अ़रब नहीं हैं और अ़रबी अदब से नावाक़िफ़ हैं उनके लिए क़ुरआन की फ़साहत-ओ-बलाग़त मअ़्‌लूम करने के लिए और येह जानने के लिए कि क़ुरआन फ़सा़हत-ओ-बलाग़त की किस बलंद मंज़िल का हामिल है उन अ़प्‌Àराद की तरफ़ रुजूअ़्‌ करना प़डेगा जो अ़रबी अदब में महारत रखते हैं और सुख़न शेनास हैं। तारीख़ में रसूले ख़ुदा सल्लल्लाहो अ़लैहे व आलेही व सल्लम के ज़माने के सुख़न शेनास अ़प्‌Àराद के एअ़्‌तेराज़ात म़हफ़ूज़ हैं। और आज भी जिन्हें अ़रबी अदब में महारत ह़ासिल है वोह क़ुरआन की अ़ज़्मत के मोअ़्‌तरिफ़ हैं।

इब्तेदाए इस्लाम से आज तक हर दौर में अदब शनास और नुक्ता संज अ़प्‌Àराद ने क़ुरआन की अ़ज़्मत का एअ़्‌तेराफ़ किया है और क़ुरआन का जवाब लाने से हमेशा अपने को आ़जिज़ और मजबूर पाया है।

मिस्र के बलंद पाया अदीब और आ़लिम ‘अब्दुलफ़त्ताह तिबारा का क़ौल हैः

हर ज़माने के उलमा और अदीबों ने क़ुरआन के मोअ़्‌जेज़ा होने का एअ़्‌तेराफ़ किया है और ख़ुद को उस से मुक़ाबले में आ़जिज़ पाया है।

तारीख़े अ़रब ऐसे अ़प्‌Àराद कसरत से पेश करती है जिन्हें नज़्म या नस्र में बलंद मुक़ाम ह़ासिल है जिससे दूसरे म़हरूम हैं जैसे ‘इब्ने मुक़़प़फअ़्‌’ ‘जाहिज़’ ‘इब्ने उमैद’ ‘फ़रज़दक़’ ‘अबू नवास’ ‘अबू तमाम’.... लेकिन येह सब के सब अ़ज़्मते क़ुरआन के सामने सरे तस्लीम ख़म किए हुए हैं और इस बात का एअ़्‌तेराफ़ करते हैं कि ‘क़ुरआन किसी इन्सान का कलाम नहीं है बल्कि व़ह्ये इलाही है।’

(रू़हुद्दीन अल-इस्लामी, स॰ ३०-३२, पाँचवाँ एडीशन)

बेमिसाल उस्लूब

मिस्र के आ़लमी शोहरत या़प्‌Àता और साहबे तर्ज़ अ़दीब ‘ताहा हुसैन’ का कहना है कि क़ुरआन नज़्म-ओ-नस्र के ह़ुदूद से बलंद-ओ-बाला है क्योंकि इस में ऐसी ख़ुसूसियतें पाई जाती हैं जो किसी नज़्म-ओ-नस्र में नहीं मिलती हैं लेहाज़ा क़ुरआन को न नस्र कहा जा सकता है और न नज़्म, हाँ इतना ज़रूर कहा जा सकता है किः

क़ुरआन, क़ुरआन है और बस .......

(रू़हुद्दीन अल-इस्लामी, स॰ ३०-३२, पाँचवाँ एडीशन)

क़ुरआन की येह इम्तेयाज़ी ह़ैसियत नतीजा है क़ुरआने करीम के ख़ास अंदाज़े बयान, मख़्सूस ज़बान और जुदागाना उस्लूब का जो किसी अ़रबी अदब के किसी भी शहपारे में नहीं मिलती हैं।

मतालिब की यक्सानियत

कितना ही अच्छा लिखने वाला हो, कितना ही माहिरे फ़न हो, कितना ही ज़बान-ओ-बयान पर उबूर हो, कितना ही शीरीं बयान हो लेकिन उसका कलाम हर वक़्त यव्‌Àसाँ नहीं रहता। शराएत-ओ-ह़ालात के ले़हाज़ से उस में तब्दीलियाँ होती रहती हैं। तालीफ़-ओ-तसनीफ़ के इब्तेदाई दौर में जो ख़ुसूसीयात होती हैं वोह उन ख़ुसूसीयात से काफ़ी मुख़्तलिफ़ होती हैं जो दराज़ मुद्दत तजरबे और मश्क़ से ह़ासिल होती हैं। जैसे जैसे वव़त गुज़रता जाता है ज़बान-ओ-बयान में पुख़्तगी आती जाती है इस लिए बअ़्‌द की तस्नीफ़ात इब्तेदाई तस्नीफ़ात से मुख़्तलिफ़ और बेहतर होती हैं।

लेकिन क़ुरआने करीम जो २३ साल की मुद्दत में रफ़्ता-रफ़्ता और मुख़्तलिफ़ ह़ालात-ओ-शराएत में नाज़िल हुआ है वोह वसीअ़्‌-ओ-अ़रीज़ दरिया की तऱह है जो संगलाख़ वादियों, पथरीली ज़मीनों, पहाड़ के दर्रों, मुख़्तलिफ़ सहराओं से गुज़रे जिसका पानी आज तक हर जगह साफ़ और शीरीं मज़ा हो। क़ुरआन के मतालिब और तर्ज़ की यक्सानियत तअ़ज्जुब ख़ेज़ और ह़ैरत अंगेज़ है। येह बात उस वव़त और ज़्यादा तअ़ज्जुब आवर हो जाती है जब हम येह ग़ौर करते हैं कि क़ुरआन के बारे में मुख़्तलिफ़ जेहात से ब़ह्स की गई है मगर हर जगह उस की अ़ज़्मत और ख़ुसूसियत का वही एक आ़लम है।

वाज़े़ह है कि जिस फ़न में महारत और दस्तरस ह़ासिल की हो अगर उसी मौज़ूअ़्‌ पर क़लम उठाया जाए तो एक शाहकार सामने आएगा लेकिन अगर किसी दूसरे मौज़ूअ़्‌ पर क़लम उठाया जाए तो वोह दर्जा ह़ासिल न होगा जो अपने फ़न में ह़ासिल था। लेकिन क़ुरआन हर फ़न में मोअ़्‌जेज़ा है।

क़ुरआन के इल्मी मोअ़्‌जेज़ात

क़ुरआन की तश्री़ह के मुताबिक़ क़ुरआन का अस्ली मक़सद लोगों की हेदायत और रहनुमाई है। दुनिया-ओ-आख़ेरत में सआ़दत-मंद ज़िंदगी की निशानदेही है लेकिन ज़िम्‌नी तौर पर इल्मी ह़क़ाएक़ भी वाज़े़ह किए हैं। मुख़्तलिफ़ उलूम के मुतअ़द्दिद ह़क़ाएक़ पर रोशनी डाली है। येह भी क़ुरआनी एअ़्‌जाज़ की बेहतरीन दलील है। उस दौरे जाहिलीयत में ऐसे ह़क़ाएक़ की निशानदेही मोअ़्‌जेज़ा है। ज़ैल की सत्रों में इस के चंद नमूने मुलाहेज़ा फ़रमाइएः

(१) मौसमियात का शुमार जदीद उलूम में होता है। पुराने ज़माने में अब्र-ओ-बाद, बारिश और तूफ़ान.... के बारे में मअ़्‌लूमात ज़्यादातर ख़याली हुआ करती थीं उस की कोई इल्मी और ठोस बुनियाद नहीं थी।

नाख़ुदा और किसान क़राएन की बुनियाद पर पेशीन गोइयाँ किया करते थे मगर उस की ह़क़ीक़त से नावाक़िफ़ थे। इसी तऱह हज़ारों साल गुज़र गए।

१७वीं सदी ईसवी में थर्मामीटर और १९ वीं सदी में टेलीग्राफ़ का वजूद अ़मल में आया। मौसमियात से मुतअ़ल्लिक़ दूसरी ज़रूरी चीज़ें भी रफ़्ता-रफ़्ता वजूद में आती रहीं। बीसवीं सदी के पहले ५० साल में Vilhelm Byerkness बर्कनेस मौसमियात के बारे में कुछ उसूल-ओ-क़वानीन बनाने में कामियाब हुआ।

इस के बअ़्‌द दूसरों ने मज़ीद त़हक़ीक़ और तलाश-ओ-जुस्तजू के बअ़्‌द इस इल्म को और फैलाया और नए इन्केशाफ़ात किए। किस तऱह बादल बनता है और किस तऱह बारिश होती है। ओले कब गिरते हैं, बिजली कब चमकती है, गरज और चमक क्यों होती है। गर्म एलाक़ों में तूफ़ान क्यों आता है। बादल कब बरसता है और कब नहीं बरसता। इसी तऱह के बहुत सारे मसाएल ....

(बाद-ओ-बारान दर क़ुरआन १९-२५)

मौसमियात के सिलसिले में जिन बातों का इन्केशाफ़ आज की इल्मी त़हक़ीक़ ने किया है क़ुरआन उन ह़क़ाएक़ की तरफ़ १४ सौ साल क़ब्ल इशारा कर चुका है।

आज येह बात साबित हुई है अगर बादल पानी से पूरी तऱह भरा हुआ है तो येह ज़रूरी नहीं कि बारिश हो ही जाए और अगर बारिश हो तो उस के क़तरे इतने बारीक हों कि हवा में मु़Àअल्लक़ रह जाएँ और ज़मीन तक न आएँ मगर वोह हवा जो समुंदर के खारी पानी से उठी है उस में नमक के जो ग़ैर-मरई (न दिखाई देने वाले) ज़र्रात होते हैं उस की वजह से पानी के क़तरे ज़मीन तक आ जाएँ।

या येह कि बर्फ़ से ढके पहाड़ों पर जो सर्द हवाएँ चलती हैं वोह बारिश के बारीक क़तरात को एक दूसरे में जमा दें और ओले की शक्ल में बादलों के दरमियान ज़मीन पर गिरें।

जब कि क़ुरआने करीम ने १४ सौ साल क़ब्ल इशारा किया थाः

وَأَرْسَلْنَا الرِّيَاحَ لَوَاقِحَ فَأَنزَلْنَا مِنَ السَّمَاءِ مَاءً فَأَسْقَيْنَا﴿٢٢﴾

हमने हवाओं को ‘तल्क़ी़ह’(तल्क़ी़ह यअ़्‌नी नर मादे को मादनिया तक पहुँचाना। नर मादा का वजूद फूल पौदों दरख्तों में भी होता है और हवाओं के ज़री़ए आपस में राबेता बरक़रार होता है। इन हवाओं को ‘लवा़के़ह’ कहा जाता है।)

 के लिए चलाया जिसके ज़री़ए हम आसमान से पानी बरसाते हैं और तुम्हें सेराब करते हैं।

(२) हवाई जहाज़ की ईजाद के बअ़्‌द इन्सान को येह मौक़अ़्‌ फ़राहम हुआ कि वोह बादलों से ऊपर निकल कर वहाँ की भी दुनिया देखे इस से पहले किसी को इस का इल्म न था कि इन्सान के सर पर बर्फ़ के पहाड़ भी हैं।

लेकिन क़ुरआन ने यक़ीन के साथ फ़रमायाः

وَيُنَزِّلُ مِنَ السَّمَاءِ مِن جِبَالٍ فِيهَا مِن بَرَدٍ ﴿٤٣﴾

ख़ुदा (बर्फ़ और ओले) बर्फ़ के उन पहाड़ों से नाज़िल करता है जो आसमान में हैं।

(सूरए नूर, आयत ४३)

(३) इन्सान गरचे ज़मीन की हदों से गुज़र कर चाँद की वादी में पहुँच गया है लेकिन उन जगहों पर ज़िंदा मौजूद की तलाश सिर्फ़ नज़रिया और थ्यूरी की हद तक मह़दूद है सिर्फ़ एह़तेमाल की बुनियाद पर येह बात कही जाती है कि दूसरी जगहों पर भी ज़िंदा चीज़ें होंगी।

लेकिन क़ुरआन बग़ैर किसी इब्हाम के फ़रमाता है किः

وَمِنْ آيَاتِهِ خَلْقُ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ وَمَا بَثَّ فِيهِمَا مِن دَابَّةٍ۔ وَهُوَ عَلَىٰ جَمْعِهِمْ إِذَا يَشَاءُ قَدِيرٌ ﴿٢٩﴾

आसमानों और ज़मीन की ख़िल्क़त और इन दोनों में चलने फिरने वाली चीज़ें अल्लाह की निशानियाँ हैं और वोह इस बात पर क़ादिर है कि जब चाहे उन्हें यक्जा कर दे।

(सूरए शूरा, आयत २९)

(४) सूरए यासीन की ३६ वीं आयत में इर्शाद होता हैः

سُبْحَانَ الَّذِي خَلَقَ الْأَزْوَاجَ كُلَّهَا مِمَّا تُنبِتُ الْأَرْضُ وَمِنْ أَنفُسِهِمْ  وَمِمَّا لَا يَعْلَمُونَ  ﴿٣٦﴾

पाक और मुनज़्ज़ह है वोह ख़ुदा जिसने तमाम चीज़ों का जोड़ा पैदा किया वोह चीज़ें जो ज़मीन से उगती हैं और ख़ुद उनमें और जिसको वोह नहीं जानते।

सूरए ताहा की ५३ वीं आयत में इर्शाद हुआः

 وَأَنزَلَ مِنَ السَّمَاءِ مَاءً فَأَخْرَجْنَا بِهِ أَزْوَاجًا مِّن نَّبَاتٍ شَتَّىٰ ﴿٥٣﴾

हमने आसमान से पानी बरसाया और उस से मुख़्तलिफ़ सब्ज़ियों के जोड़े पैदा किए।

जिस वव़त इल्म मह़दूद था और मुफ़स्सिरीन को इस का इल्म नहीं था कि सब्ज़ियों और फूलों के भी जोड़े होते हैं वोह इन आयात की त़प्‌Àसीर इस तऱह करते थे कि हर सब्ज़ी की दो क़िस्म पैदा की है इसी लिए ज़ौजीयत का लफ़्ज़ इस्तेअ़्‌माल किया गया है। लेकिन आज की त़हक़ीक़ात ने येह बात साबित कर दी है कि सिर्फ़ इन्सानों और ह़ैवानों ही में जोड़े नहीं हैं बल्कि सब्ज़ियों और फूलों में भी जोड़े पाए जाते हैं, वहाँ भी रिश्तए ज़ौजीयत बरक़रार है।

आज की त़हक़ीक़ ने येह साबित कर दिया है कि हवाओं के ज़री़ए रिश्तए ज़ौजीयत बरक़रार होता है और बसा औक़ात फूलों और सब्ज़ियों पर बैठने वाले कीड़े येह काम अंजाम देते हैं।

क़ुरआन की मुबारिज़ तलबी

क़ुरआन सिर्फ़ फ़साहत-ओ-बलाग़त का मोअ़्‌जेज़ा नहीं बल्कि इन्सानी अफ़्कार के तमाम मैदान में मोअ़्‌जेज़ा है।

सुख़न शनास के लिए फ़साहत-ओ-बलाग़त के ले़हाज़ से।

ह़ुकमा के लिए ह़िकमत के ले़हाज़ से।

उलमा के लिए इल्म के ले़हाज़ से।

इसी लिए क़ुरआन हर एक को मुख़ातब करके कहता हैः

अगर तुम येह कहते हो येह कलाम इन्सान का कलाम है तो ऐसा कलाम तुम भी पेश करो।

 

قُل لَّئِنِ اجْتَمَعَتِ الْإِنسُ وَالْجِنُّ عَلَىٰ أَن يَأْتُوا بِمِثْلِ هَـٰذَا الْقُرْآنِ لَا يَأْتُونَ بِمِثْلِهِ وَلَوْ كَانَ بَعْضُهُمْ لِبَعْضٍ ظَهِيرًا ﴿٨٨﴾

(१) अगर तमाम इन्स-ओ-जिन्न मिलकर क़ुरआन का जवाब लाने का तहय्या कर लें तब भी क़ुरआन का जवाब नहीं ला सकते गरचे एक दूसरे की भरपूर मदद क्यों न करें।

(सूरए असरा, आयत ८८)

أَمْ يَقُولُونَ افْتَرَاهُ  قُلْ فَأْتُوا بِعَشْرِ سُوَرٍ مِّثْلِهِ مُفْتَرَيَاتٍ وَادْعُوا مَنِ اسْتَطَعْتُم مِّن دُونِ اللّهِ إِن كُنتُمْ صَادِقِينَ ﴿١٣﴾ فَإِلَّمْ يَسْتَجِيبُوا لَكُمْ فَاعْلَمُوا أَنَّمَا أُنزِلَ بِعِلْمِ اللَّـهِ وَأَن لَّا إِلَـٰهَ إِلَّا هُوَ فَهَلْ أَنتُم مُّسْلِمُونَ ﴿١٤﴾

(२) कहते हैं कि क़ुरआन को झूटी निस्बत दी गई है उनसे कह दीजिए ऐसे ही दस सूरे तुम भी ले आओ और ख़ुदा के अ़लावा जिसको चाहो बुला लो अगर सच्चे हो। और अगर तुम्हें जवाब न दें तो जान लो कि येह इल्म ख़ुदा से नाज़िल हुआ है और उस के अ़लावा कोई और ख़ुदा नहीं है।

(सूरए हूद, आयत १३)

وَإِن كُنتُمْ فِي رَيْبٍ مِّمَّا نَزَّلْنَا عَلَىٰ عَبْدِنَا فَأْتُوا بِسُورَةٍ مِّن مِّثْلِهِ

(३) जो चीज़ हमने अपने बंदे (मो़हम्मद (स.अ़.)) पर नाज़िल की है अगर उस में तुमको शक है तो उस जैसा एक सूरा ले आओ।

(सूरए बक़रा, आयत २३)

तारीख़ गवाह है कि उस वव़त से आज तक किसी को येह जुअर्त न हो सकी कि वोह क़ुरआन का जवाब ला सके। अलबत्ता रसूले ख़ुदा सल्लल्लाहो अ़लैहे व आलेही व सल्लम के ज़माने में और आपकी वफ़ात के बअ़्‌द कुछ लोगों ने जवाब लाने की ज़रूर कोशिश की थी जैसे मुसैलमा, सज्जाह, इब्ने अबिल आ़ैजा मगर किसी को कामियाबी नसीब न हुई और हर एक को अपनी आ़जिज़ी का एअ़्‌तेराफ़ करना प़डा।

इस्लाम के दुश्मनों ने पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ़.) को तऱह तऱह की ईज़ाएँ पहुँचाईं उनका इक़्तेसादी मुहासेरा किया गया। क़त्ल की साज़िशें हुईं मगर क़ुरआन का जवाब न बन सका।

आज भी इस्लाम को नाबूद करने के लिए अ़रबों डालर ख़र्च किए जा रहे हैं। अगर येह लोग आज भी क़ुरआन का जवाब ला सकते तो कभी भी इतने मसारिफ़ (अख़्राजात) बर्दाश्त न करते। क़ुरआन का जवाब दुश्मनाने इस्लाम की बहुत बड़ी कामियाबी होगी और इस्लाम के ख़ेलाफ़ भरपूर सनद। तऱह तऱह के मज़ालिम, नित नए फ़ित्ने गवाह हैं कि दुश्मनाने इस्लाम क़ुरआन का जवाब लाने से आ़जिज़ हैं।

दूसरों के एअ़्‌तेराफ़ात

तरक़्क़ी और इतेक़ा के इस दौर में योरपी दानिशवरों ने क़ुरआन के मोअ़्‌जेज़ा होने का एअ़्‌तेराफ़ किया है।

इटली की एक ख़ातून जो ‘नापल’ यूनीवर्सिटी में उस्ताद हैं उनका कहना है कि इस्लाम की आसमानी किताब भरपूर मोअ़्‌जेज़ा है जिसकी तक़लीद नामुमकिन है।’

इस का अंदाज़े बयान अ़रबी अदब में बिल्कुल अछूता (अनोखा) है। इन्सान की रू़ह पर उस के असरात उस की इम्तेयाज़ी ह़ैसियत की बेना पर है। येह किताब क्यूँकर ‘मु़हम्मद (स.अ़.) की तालीफ़ हो सकती है जब कि उन्होंने किसी एक से भी तअ़्‌लीम ह़ासिल नहीं की।

हम इस किताब में इल्म के खज़ाने पाते हैं, जो अ़ज़ीम तरीन फ़लासफ़ा और सेयासतदानों की अ़क़्ल-ओ-फ़िक्र से बालातर हैं। इसी बेना पर कहा जा सकता है कि कोई तअ़्‌लीम याफ़्ता भी ऐसी किताब लिखने की क़ुदरत नहीं रखता है।

(पेश रफ़्ते सरी़ए इस्लाम, स॰ ४९ के बअ़्‌द)

उस्ताद सेंस (एीहो) का कहना है किः ‘क़ुरआन ऐसा उमूमी और मुकम्मल क़ानून है जिसमें किसी तरफ़ से भी बातिल का गुज़र नहीं है लेहाज़ा हर जगह और हर वक़्त की ज़रूरत है। अगर मुसलमान इस को बाक़ा़एदा इख़्तेयार करें और इस की तअ़्‌लीमात पर मुकम्मल अ़मल करें तो अपनी खोई हुई इज़्ज़त और क़यादत को दुबारा ह़ासिल कर सकते हैं।’

(त़प्‌Àसीर नवीन, स॰ ४२)

ड्रोलोएर (J.W.Droloer) का कहना है कि ‘क़ुरआन में अख़्लाक़ी बातें बहुत हैं क़ुरआन का तर्ज़े त़हरीर इतना ज़्यादा मुनज़्ज़म है कि हम जिस स़प़हा पर भी नज़र डालते हैं उस में हर एक की पसंद के अअ़्‌ला नमूने मिलते हैं। क़ुरआन का येह ख़ास अंदाज़ जो छोटे छोटे सूरों की शक्ल में है और इस में मतालिब, शेआ़र और क़वानीन के मुकम्मल नमूने नज़र आते हैं।

(तारीख़े तरक़्क़ीये फ़िक्रे अरूपा, स॰ ३४३-३४४ मत्बूआ़ लंदन)

आख़िर में इस ह़क़ीक़त की तरफ़ इशारा करना ज़रूरी है अगर हम क़ुरआन के बारे में ज़्यादा से ज़्यादा मअ़्‌लूमात ह़ासिल करें और इस किताब से ख़ूब उन्स पैदा करें, इस के बताए हुए रास्ते पर संजीदगी से अ़मल करें तो औज-ओ-तरक़्क़ी हमारा ही ह़िस्सा होगी।

हम मुसलमानों की अ़ज़्मत और तरक़्क़ी की बलंद पाया इमारत उस वव़त मुतज़लज़िल हो गई जब हमने इस आसमानी किताब के ह़ुक्म पर अ़मल करना छो़ड दिया और इस के बताए हुए रास्ते से मुऩ्हरिफ़ हो गए। हमने सिर्फ़ इस्लाम के नाम को काफ़ी जाना इस लिए बस नाम के मुसलमान रह गए।

अपनी खोई हुई इज़्ज़त हम उस वव़त ह़ासिल कर सकते हैं जब हम अपनी कज रफ़्तारी से बाज़ आएँ और अज़ सरे नौ मुसलमान हों। दिल-ओ-दिमाग़ को आयाते क़ुरआन से रोशन करें और उस के मुअ़य्यन कर्दा रास्ते पर ज़िन्दगी गुज़ारें।

ह़ज़रत रसूले ख़ुदा सल्लल्लाहो अ़लैहे व आलेही व सल्लम ने इर्शाद फ़रमाया है किः

اِذَا الْتَبَسَتْ عَلَيْكُمُ الْفِتَنُ كَقِطَعِ اللَّيْلِ الْمُظْلِمِ فَعَلَيْكُمْ بِالْقُرْآنِ۔

‘एज़ल त-बसत अ़लैकुमुल फ़े-तनो क-क़े-त़इल लैलिल मुज़्लिमे फ़-अ़लैकुम बिल क़ुरआने’

जब रात की सियाही की तऱह हर तरफ़ से तुमको फ़ित्ने घर लें तो तुम क़ुरआन से तमस्सुक इख़्तेयार करो।

(उसूले काफ़ी, जि॰ २, स॰ ५९९)