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सबक़ - २७

शूरा

तमाम मुसलमान इस बात पर मुत्तफ़िक़ हैं कि पैग़म्बर सल्लल्लाहो अ़लैहे व आलेही व सल्लम मअ़्‌सूम हैं और आपका क़ौल ख़ुदा का क़ौल और आपकी मज़ीी ख़ुदा की मज़ीी है और अगर ऐसा न होता तो ख़ुदावंद आलम बग़ैर किसी क़ैद-ओ-शर्त के आपकी एताअ़त और पैरवी का ह़ुक्म न देता। लेहाज़ा पैग़म्बर (स.अ़.) का ह़ुक्म, ख़ुदा का ह़ुक्म है और उस की एताअ़त हर एक पर वाजिब है।

इस के अ़लावा आयतों में मिलता है कि पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ़.) ख़ुदा का सलाम हो उन पर उनको लोगों पर ह़ाकिमीयत ह़ासिल है और आपका ह़ुक्म हर एक की मज़ीी और उस की ख़ाहिश पर फ़ौक़ियत रखता है और इज्तेमा़ई मसाएल में आपका फ़ैसला वाजिबुल अ़मल है।

इन तीनों में से बअ़्‌ज़ येह हैंः

اَلنَّبِیُّ اَوْلٰی بِالْمُوْمِنِیْنَ مِنْ اَنْفُسِھِمْ۔

(१) अन्नबीयो औला बिल मोअ्‌मेनी-न मिन अन्फ़ोसेहिम

मोअ्‌मेनीन की बनिस्बत नबी को उन पर ज़्यादा इख़्तेयारात ह़ासिल हैं।

وَمَا كَانَ لِمُؤْمِنٍ وَلَا مُؤْمِنَةٍ إِذَا قَضَى اللَّهُ وَرَسُولُهُ أَمْرًا أَن يَكُونَ لَهُمُ الْخِيَرَةُ مِنْ أَمْرِهِمْ ۔

(२) वमा का-न लेमोअ्‌मेनिन वला मोअ्‌मे-नतिन एज़ा क़ज़ल्लाहो व रसूलोहू अम्रन अन यकू-न लहुमुल ख़े-य-रतो मिन अम्रेहिम

(सूरए अ़हज़ाब, आयत ३६)

जब ख़ुदा और उस का रसूल किसी मसअले में कोई फ़ैसला करे तो किसी भी मोअ्‌मिन मर्द या औरत को येह ह़क़ ह़ासिल नहीं है कि वोह ख़ुद कोई चीज़ इख़्तेयार करे।

इन आयात की तफ़सीर पर ग़ौर करने से येह बात बिल्कुल वाज़े़ह हो जाती है कि पैग़म्बर (स.अ़.) का ह़ुक्म हर सूरत में वाजिबुल अ़मल है ख़ाह वोह ज़ाती मसाएल ही क्यों न हों क्योंकि दूसरी आयत ख़ुद एक ज़ाती मसअले में नाज़िल हुई है और वोह है ज़ैनब की शादी ज़ैद से।

अ़रबों में एक जाहिली रस्म येह थी कि वोह बड़े और सर्वत मंद ख़ानदानों के अ़लावा कहीं और शादी नहीं करते थे। पैग़म्बर (स.अ़.) ने अ़रबों की इस रस्म को तोड़ने के लिए अपनी फुफीज़ाद बहन ज़ैनब की शादी अपने आज़ाद कर्दा ग़ुलाम ज़ैद से तै की। जाहिली रुसूम इस शादी की इजाज़त न दे रही थीं। उस वक़्त येह आयत नाज़िल हुई जिसने तमाम जाहिली रुसूमात को यकसर क़लमज़द कर (मिटा) दिया। इस मौक़अ़्‌ पर आयत ने नाज़िल हो कर वाज़े़ह कर दिया कि ज़ाती मसाएल में भी पैग़म्बर सल्लल्लाहो अ़लैहे व आलेही व सल्लम का ह़ुक्म नाफ़िज़ है।

(तफ़सीर नूरुस्सक़लैन, जि॰ ४, स॰ २८०)

فَلَا وَرَبِّكَ لَا يُؤْمِنُونَ حَتَّىَ يُحَكِّمُوكَ فِيمَا شَجَرَ بَيْنَهُمْ ثُمَّ لَا يَجِدُواْ فِي أَنفُسِهِمْ حَرَجًا مِّمَّا قَضَيْتَ وَيُسَلِّمُواْ تَسْلِيمًا

फ़ला व रब्बे-क ला योअ्‌मेनू-न ह़त्ता यो़हक्केमू-क फ़ीमा श-ज-र बै-नहुम सुम्म ला यजेदो फ़ी अन्फ़ोसेहिम ह़-र-जन मिम्मा क़ज़ै-त व योसल्लेमू तस्लीमन

(सूरए निसा, आयत ६५)

क़सम है आपके रब की उस वक़्त तक उनका ईमान ह़क़ीक़ी न होगा जब तक येह अपने मसाएल -ओ-इख़्तेलाफ़ात में आपको ह़ाकिम क़रार न दें और आप जो फ़ैसला करें उसे क़बूल करें और दिल में भी उस के ख़ेलाफ़ कोई तंगी म़हसूस न करें और मुकम्मल आपके फ़ैसले के सामने तस्लीम हों।

क्या पैग़म्बर (स.अ़.) अक्सरीयत के ताबेअ़्‌ हैं?

बअ़्‌ज़ उलमाए अह्ले सुन्नत का अ़क़ीदा येह है कि अक्सरीयत की राय को पैग़म्बर (स.अ़.) की राय पर फ़ौक़ियत ह़ासिल है और पैग़म्बर (स.अ़.) के लिए ज़रूरी है कि वोह अक्सरीयत की राय की पैरवी करें।

गुज़श्ता आयात पर ग़ौर करने से इस नज़रिये की ह़क़ीक़त वाज़े़ह हो जाती है और उस की बे-सबाती का इल्म हो जाता है.... अह्ले सुन्नत ने अपने इस नज़रिये की ताईद में इस आयत को दलील बनाया हैः

فَبِمَا رَحْمَةٍ مِّنَ اللّهِ لِنتَ لَهُمْ وَلَوْ كُنتَ فَظًّا غَلِيظَ الْقَلْبِ لَانفَضُّواْ مِنْ حَوْلِكَ فَاعْفُ عَنْهُمْ وَاسْتَغْفِرْ لَهُمْ وَشَاوِرْهُمْ فِي الأَمْرِ فَإِذَا عَزَمْتَ فَتَوَكَّلْ عَلَى اللّهِ إِنَّ اللّهَ يُحِبُّ الْمُتَوَكِّلِينَ ۔

फ़-बेमा रह्मतिन मिनल्लाहे लिन्त लहुम व लौ कुन्त फ़ज़्ज़न ग़लीज़ल क़ल्बे लन्फ़ज़्ज़ू मिन ़हौले-क फ़अ़्‌फ़ो अ़न्हुम वस्तग़फ़िर लहुम व शाविरहुम फ़िल अम्रे फ़ एज़ा अ़ज़म-त फ़-तवक्कल अ़लल्लाहे इन्नल्ला-ह योह़िब्बुल मु-तवक्केली-न

(सूरए आले इमरान, आयत १५९)

‘येह अल्लाह की रह्मत है कि आप नर्म तबीअ़त कुशादा-रू हैं अगर आप तुंद-ख़ू और संग-दिल होते तो लोग आपके पास से चले जाते आप उनसे दरगुज़र कीजिए उनके ह़क़ में इस्तेग़फ़ार कीजिए और उनसे मसाएल में मश्वरा लीजिए अगर आपने किसी काम का इरादा कर लिया है अल्लाह के भरोसे पर उसे अंजाम दीजिए यक़ीनन अल्लाह उन लोगों को दोस्त रखता है जो उस पर भरोसा करते हैं।’

अगर अक्सरीयत की राय का ए़हतेराम मल्हूज़े ख़ातिर न होता तो कभी भी पैग़म्बर सल्लल्लाहो अ़लैहे व आलेही व सल्लम को लोगों से मश्वरा करने का ह़ुक्म न दिया जाता।

इस दलील का जवाब ख़ुद इसी आयत में मौजूद है कि पैग़म्बर (स.अ़.) अक्सरीयत के ताबेअ़्‌ नहीं हैं। इज्तेमा़ई मसाएल में पैग़म्बर (स.अ़.) ही को ह़ाकिमीयत का ह़क़ ह़ासिल है। मश्वरे के बअ़्‌द भी पैग़म्बर (स.अ़.) को येह इख़्तेयार ह़ासिल है कि वोह अपनी राय पर अ़मल करें क्योंकि इर्शादे ख़ुदावंदी येह है किः

‘उनसे मश्वरा कीजिए और अगर आपने ख़ुद किसी काम का इरादा कर लिया है तो अल्लाह के भरोसा पर कर डालिए.......’

अगर दूसरों की राय की पैरवी मक़सूद होती तो इस तरह होना चाहिए था कि ‘.....जब अक्सरीयत किसी बात पर मुत्तफ़िक़ हो जाए तो आप भी उसे क़बूल कीजिए और उस की पैरवी कीजिए.... ‘‘ बल्कि आयत ने बिल्कुल बरख़ेलाफ़ ह़ुक्म दिया है।

इस के अ़लावा तारीख़ में ऐसी मिसालें काफ़ी हैं जहाँ अक्सरीयत की राय को नज़र अंदाज़ किया गया है जैसे’ सुल़्हे हुदैबिया’(येह सुल़्ह ‘‘ह़ुदैबिया’’ नामी जगह पर वा़केअ़्‌ हुई थी इस लिए इसको सुल़्हे ह़ुदैबिया कहते हैं।) के मौक़अ़्‌ पर।

रसूले ख़ुदा सल्लल्लाहो अ़लैहे व आलेही व सल्लम ख़ानए कअ़्‌बे की ज़ेयारत के लिए मदीना से मक्का की तरफ़ रवाना हुए। जब आप मक्का के क़रीब पहुँचे उस वक़्त कुफ़्फ़ारे क़ुरैश का एक नुमाइंदा आँह़ज़रत (स.अ़.)की ख़िदमत में हाज़िर हुआ और कुफ़्फ़ार का पैग़ाम आँह़ज़रत (स.अ़.) की ख़िदमत में पेश किया कि कुफ़्फ़ार ने येह तै किया है कि आप मक्का तशरीफ़ न लाएँ। आँह़ज़रत (स.अ़.)ने इर्शाद फ़रमायाः हम जंग करने नहीं आए हैं बल्कि सिर्फ़ ज़ेयारत की ग़र्ज़ से आए हैं।

काफ़ी गुफ़्त-ओ-शनीद के बअ़्‌द क़ुरैश सुल़्हे के लिए तैयार हो गए पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ़.) ने मख़्सूस शराएत के साथ सुल़्ह कर ली। मुसलमानों को येह सुल़्ह अच्छी न लगी वोह चाह रहे थे कि ताक़त के बल-बूते मक्का में दाख़िल हो जाएँ।

(सीरत इब्ने ह़ेशाम, जि. ३, स॰ ३२१)

आँह़ज़रत (स.अ़.) ने इर्शाद फ़रमाया मैं ख़ुदा का बंदा हूँ और उस का रसूल हूँ। मैं हरगिज़ ख़ुदा के ह़ुक्म की ना-फ़रमानी नहीं कर सकता हूँ और न वोह मुझसे दस्त बरदार होगा।

(तारीख़ तबरी, जि॰ ३, स॰ १५४६, मत्बूआ लन्दन)

यहाँ अ़क़्ली तौर पर चंद सवाल हो सकते हैं किः

पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ़.) को मश्वरा करने का जो ह़ुक्म दिया गया है उस का मफ़हूम क्या है?

पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ़.) इस लिए मश्वरा करते थे ताकि लोगों की फ़िक्र-ओ-नज़र का ए़हतेराम हो अ़क़्ल को तरक़्क़ी की राह पर लगाया जाए और इस्लाम की तब्लीग़ में नई राहों की निशानदेही हो और उन लोगों की रोक-थाम हो सके जो कार शिकनी (मुख़ालेफ़त) करते रहते हैं क्योंकि जब उनको मश्वरे में शामिल कर लिया जाएगा तो वोह भी अपने को शरीके कार ख़याल करेंगे और ए़हसासे कमतरी का शिकार न हो कर कार शिकनी (मुख़ालेफ़त) नहीं करेंगे लेकिन मश्वरों में आँह़ज़रत (स.अ़.) अक्सरीयत के ताबेअ़्‌ नहीं थे। अगर वोह किसी की राय पर अ़मल करते थे वोह सिर्फ़ इस लिए कि वही पैग़म्बर (स.अ़.) की राय होती थी।

किसी भी मोअ़्‌तबर किताब में नहीं मिलता कि पैग़म्बर (स.अ़.) ने अक्सरीयत की राय का इत्तेबाअ़्‌ किया हो और अक्सरीयत की राय की बुनियाद पर कोई फ़ैसला किया हो।

 क्या पैग़म्बर (स.अ़.) के बअ़्‌द किसी शूरा की तश्कील हुई?

येह बात वाज़े़ह हो चुकी है कि पैग़म्बर (स.अ़.) की राय अक्सरीयत की राय के ताबेअ़्‌ नहीं है बल्कि अक्सरीयत की राय पर पैग़म्बर (स.अ़.) की राय को बरतरी और फ़ौक़ियत ह़ासिल है। पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ़.) का हत्मी फ़ैसला ह़ज़रत अ़ली अ़लैहिस्सलाम का इंतेख़ाब था जिसका एअ़्‌लान आपने ग़दीर के मौक़अ़्‌ पर फ़रमाया और लोगों को पहचनवा दिया कि मेरे बअ़्‌द मेरा जानशीन कौन होगा।

वफ़ाते पैग़म्बर (स.अ़.) के बअ़्‌द पैग़म्बर (स.अ़.) के जानशीन के सिलसिले में राए-ओ-मश्वरा करना ख़ुदा और रसूल (स.अ़.) की सरीही मुख़ालेफ़त है जिसकी कोई क़ीमत नहीं है इस ह़क़ीक़त को नज़र अंदाज़ करते हुए आइये देखें कि पैग़म्बर (स.अ़.) के बअ़्‌द किसी शूरा की तश्कील हुई या नहीं और अगर शूरा की तश्कील हुई तो उस में अक्सरीयत थी कि नहीं।

सबसे पहले मोअ़्‌तबर तारीख़ों की रोशनी में’ सक़ीफ़ा बनी सा़एदा’ के वा़केआ पर एक नज़र डालते हैं।

सक़ीफ़ा बनी सा़एदा पर एक नज़र

जब पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ़.) ने इस दुनिया से अपनी आँखें बंद कर लीं उस वक़्त अंसार ‘सक़ीफ़ा बनी सा़एदा’ में जमअ़्‌ हुए और कहने लगेः

पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ़.) के बअ़्‌द ह़ुकूमत-ओ-वेलायत’ सअ़्‌द इब्ने उबादा’ को सौंप देते हैं। सअ़्‌द उस वक़्त मरीज़ होने के बावजूद वहाँ मौजूद थे ख़ुदा की हम्द-ओ-सना के बअ़्‌द कहने लगेः

‘......ऐ अंसार! इस्लाम में तुम्हें जो फ़ज़ीलत और मन्ज़ेलत ह़ासिल है वोह किसी और को ह़ासिल नहीं है। पैग़म्बर (स.अ़.) १३ साल तक मक्का में क़ुरैश के दरमियान तब्लीग़ करते रहे उन्हें बुत परस्ती से मनअ़्‌ करते और तौ़हीद की तरफ़ बुलाते रहे मगर ईमान लाने वाले सिर्फ़ चंद थे और वोह भी इतने कमज़ोर थे कि पैग़म्बर (स.अ़.) की तरफ़ से देफ़ाअ़्‌ नहीं कर सकते थे। यहाँ तक कि ख़ुदा ने तुम पर ए़हसान किया और पैग़म्बर (स.अ़.) ह़िजरत फ़रमा कर मदीना तशरीफ़ लाए तुमने उनका दीन क़बूल किया, उन पर ईमान लाए, उस पर साबित-क़दम रहे और उनके दीन की भरपूर हिमायत की, उनकी तरफ़ से देफ़ाअ़्‌ किया और जिस वक़्त रसूले ख़ुदा सल्लल्लाहो अ़लैहे व आलेही व सल्लम ने इस दुनिया से रेहलत फ़रमाई वोह तुमसे राज़ी-ओ-ख़ुश्नूद थे हाँ होशियार रहो कि तुम्हारे अ़लावा कोई और उनका जानशीन न होने पाए और येह मन्सब अंसार के अ़लावा किसी और को न मिलने पाए।’’

अंसार ने कहाः आपकी बातें बिल्कुल स़ही़ह हैं लेहाज़ा आप ही जानशीनी-ओ-ह़ुकूमत की ज़िम्मेदारियाँ सँभालिये और बअ़्‌ज़ येह कहने लगेः अगर क़ुरैश सामने आगए तो उस वक़्त क्या होगा?

बअ़्‌ज़ ने इस तरह जवाब दिया अगर क़ुरैश भी इस मन्सब के ख़ाहिशमंद नज़र आए तो हम उनसे येह कहेंगे कि तुम अपने लिए एक अलग अमीर मुअ़य्यन कर लो।

सअ़्‌द ने कहाः येह पहली नाकामी है।

येह बातें उमर तक पहुँचीं। उमर ने अबूबक्र के पास आदमी भेज कर उन्हें बुलाया उस वक़्त अबूबक्र रसूले ख़ुदा सल्लल्लाहो अ़लैहे व आलेही व सल्लम के घर में अ़ली (अ़.स.) के साथ थे पैग़ाम भेजा मैं यहाँ मसरूफ़ हूँ। उमर ने दुबारा पैग़ाम भेजा कि ताज़ा ख़बर है और तुम्हारी मौजूदगी नेहायत ज़रूरी है।

रसूले ख़ुदा सल्लल्लाहो अ़लैहे व आलेही व सल्लम की तज्हीज़-ओ-तव़फीन छोड़कर अबू बक्र चले आए और ह़ज़रत अ़ली अ़लैहिस्सलाम पैग़म्बर (स.अ़.) के ग़ुस्ल-ओ-कफ़न में मश्ग़ूल रहे उमर ने कहा तुम्हें नहीं मअ़्‌लूम कि अंसार सक़ीफ़ा में जमअ़्‌ हो गए हैं और सअ़्‌द को ख़लीफ़ा बनाने वाले हैं।

इस के बअ़्‌द येह दोनों अफ़राद वहाँ से जल्द रवाना हो गए रास्ते में ‘अबू उबैदा जर्राह’ से मुलाक़ात हुई उनको भी अपने साथ ले लिया और सक़ीफ़ा पहुँच गए।

अबू बक्र ने इस तरह गुफ़्तुगू का आग़ाज़ कियाः

ह़म्द-ओ-तअ़्‌रीफ़ है ख़ुदा के लिए और दुरूद हो पैग़म्बर (स.अ़.) पर ख़ुदा ने पैग़म्बर सल्लल्लाहो अ़लैहे व आलेही व सल्लम को इस लिए भेजा ताकि लोग ख़ुदाए वाहिद की एबादत करें। वोह जो मुतअ़द्दिद ख़ुदा के क़ाएल थे और इस बात के मोअ़्‌तक़िद थे कि यही हमारी शफ़ाअ़त करेंगे।

अ़रबों के लिए येह बात सख़्त दुश्वार थी कि वोह अपने आबा-ओ- अज्दाद के दीन को तर्क कर दें इस लिए ख़ुदावंद आलम ने सबसे पहले मुहाजिरों को येह फ़ज़ीलत दी कि वोह पैग़म्बर (स.अ़.) के दीन पर ईमान लाए और उनके साथ सख़्तियाँ बर्दाश्त कीं, नर्म-ओ-गर्म ह़ालात में उनके साथ रहे। लेहाज़ा इस मन्सब के सबसे ज़्यादा ह़क़दार मुहाजिर हैं और अंसार तुम्हारी फज़ीलतों से कौन इन्कार कर सकता है। मुहाजिरीन के बअ़्‌द सबसे बलंद दर्जा तुम्हारा ही है लेहाज़ा हम ह़ुक्मराँ-ओ-फ़रमाँ रवाँ हों और तुम वज़ीर, हम तुम्हारे मश्वरे के बग़ैर कोई काम अंजाम नहीं देंगे...’’

‘ह़बाब इब्ने मुंज़र’ ने खड़े हो कर कहाः..... ऐ अंसार! होशियार रहो! ह़ुकूमत तुम्हारे हाथों से न जाने पाए लोगों ने तुम्हारे साए में ज़िंदगी बसर की है। कोई भी तुम्हारे बराबर नहीं हैं। एक दूसरे की मुख़ालेफ़त न करो ताकि काम ख़राब न होने पाए। अगर येह लोग हमारी रियासत-ओ-ह़ुकूमत को तस्लीम नहीं कर रहे हैं तो हमारा अलग एक अमीर हो और उन का अलग ह़ाकिम।

उमर ने कहाः.... येह तो हरगिज़ न होगा अ़रब तुम्हारी ह़ुकूमत पर हरगिज़ राज़ी न होंगे क्योंकि पैग़म्बर (स.अ़.) तुम में से न थे।

हुबाब ने दुबारा कहाः

ऐ अंसार बेदार रहो और होशियार इस की और इस के दोस्तों की बातों पर ध्यान न दो येह तुम्हारे हुक़ूक़ पामाल कर देंगे अगर येह लोग तुम्हारी बात न मानें तो उन्हें अपने शह्र से बाहर निकाल दो। और ह़ुकूमत की बागडोर अपने हाथों में ले लो। ख़ुदा की क़सम तुम ही सबसे ज़्यादा ह़क़दार हो।

उमर ने कहाः ख़ुदा तुझे ग़ारत करे।

ह़ुबाब तुम्हें ग़ारत करे।

इस दरमियान अबू उबैदा खड़े हुए और कहने लगेः.......

ऐ अंसार तुम ही वोह पहले गिरोह हो जो रसूल (स.अ़.) पर ईमान लाए और उनकी मदद की लेहाज़ा रद्द-ओ-बदल में तुम पहल न करो।

उस वक़्त’ बशीर इब्ने सअ़्‌द खड़े हुए और कहने लगेः.....

ऐ अंसार! हमने मुशरिकों से जेहाद किया और दीन में जो सबक़त ह़ासिल की वोह सिर्फ़ रज़ाए ख़ुदा की ख़ातिर और अल्लाह ही की ख़ुशनूदी के लिए हमने ज़़ह्मतें बर्दाश्त कीं।

अबूबक्र कहने लगेः......येह उमर और येह अबू उबैदा जर्राह इन दोनों में जिसके हाथ पर चाहो बैअ़त कर लो।

उन दोनों ने कहा ख़ुदा की क़सम आप हम सबसे बेहतर हैं आपकी मौजूदगी में हम क़तई इस मन्सब की लेयाक़त नहीं रखते हैं। आप हाथ बढाएँ ताकि हम आपकी बैअ़त करें।

उमर और उबैदा बैअ़त करने के लिए बढ़े ही थे कि बशीर इब्नेे सअ़्‌द जो अंसार में से थे और क़बीलए औस से तअ़ल्लुक़ रखते थे.......(औस-ओ-ख़ज़रज मदीना के दो बडे क़बीले थे जिन में पुरानी रन्जिश थी और यही रंजिश और रक़ाबत इस बात का सबब हुई कि क़बीलए औस ने अबूबक्र की बैअ़त करने में सबक़त ह़ासिल की ताकि सअ़्‌द इब्ने ओेबादा को ख़ेलाफ़त न मिलने पाए।) ने सब से पहले अबूबक्र के हाथ पर बैअ़त कर ली।

क़बीलए औस के दूसरे अफ़राद ने जब येह देखा कि बशीर ने पहल कर दी है और क़ुरैश को अपने से बेहतर जाना है। क़बीलए ख़ज़रज के अफ़राद सअ़्‌द इब्ने आेबादा को ख़लीफ़ा बनाना चाहते हैं तो एक दूसरे से कहने लगेः

अगर ख़ज़रज इस मन्सब पर फ़ाएज़ हो गए तो उनको हमेशा के लिए येह फ़ज़ीलत ह़ासिल हो जाएगी लेहाज़ा उठो और फ़ौरन अबूबक्र के हाथ पर बैअ़त करो।

 इसी हंगामे में उमर और सअ़्‌द इब्ने आेबादा आपस में दस्त-ओ-गरेबाँ हो गए। उमर ने लोगों से कहा इस को क़त्ल कर दो..... और सअ़्‌द ने आख़िर दम तक अबूबक्र की बैअ़त नहीं की।

(जिन लोगों ने अबूबक्र की बैअ़त नहीं की है उन की तअ़्‌दाद काफ़ी है जैसे बनी हाशिम, अ़ब्बास और उनकी औलाद, ह़बाब इब्ने मुंज़र, सलमान फ़रसी, अबूज़र, अ़म्मार, मेक़दाद, ज़ुबैर, ख़ुज़ैमा, उबई बिन कअ़्‌ब, फ़र्दा, ख़ालिद, बर्रा बिन आज़िब वग़ैरह (फ़ुसूलुल मुहिम्मा, स॰ ४५), तबरी जिल्द ४, स॰ १८३७ के बअ़्‌द से इख़्तेसार के साथ))

फ़ैसला कीजिए

सक़ीफ़ा के वा़केआत में किसी तरह भी शूरा नहीं था और येह मुनज़्ज़म साज़िश थी ह़ज़रत अ़ली अ़लैहिस्सलाम के ह़क़ को ग़स्ब करने के लिए और रेयासत ह़ासिल करने के लिए ......इन दलीलों पर तवज्जोह फ़रमाइए।

(१) सक़ीफ़ा जाते वक़्त उमर ने सिर्फ़ अबूबक्र को इत्तेलाअ़्‌ दी जब कि उस वक़्त रसूले ख़ुदा सल्लल्लाहो अ़लैहे व आलेही व सल्लम के घर में अस्ह़ाबे रसूल (स.अ़.) और ह़ज़रत अ़ली अ़लैहिस्सलाम भी मौजूद थे। अबूबक्र येह ख़बर सुनते ही पैग़म्बर (स.अ़.) की मुसीबत भूल गए और ख़ामोशी से वहाँ से निकल आए। अगर वाक़ई कोई मुनज़्ज़म साज़िश न थी तो अबूबक्र ने उमर से क्यों कहा कि बनी हाशिम और दूसरे अस्ह़ाब को भी इत्तेलाअ़्‌ कर दी जाए.... इस वक़्त इस मसअला को रहने दो। पहले पैग़म्बर (स.अ़.) को दफ़्न कर दें उस के बअ़्‌द ख़ेलाफ़त के मसअले को तै करेंगे।

क्या शूरा इसी को कहते हैं कि तीन आदमी एक जगह जमअ़्‌ हो जाएँ और चर्ब ज़बानी से एक दूसरे को ख़लीफ़ा बनाएँ दूसरे को डराएँ धमकाएँ और लोगों को धोका देकर और बज़ोरे शम्शीर बैअ़त ले लें। अहम शख़्सीयतों को वा़केआत से बिल्कुल बे-ख़बर रखें और अगर कोई इख़्तेलाफ़ करे उस को क़त्ल की धमकी दें और कहेंः

इस अ़मल की मुख़ालेफ़त उम्मत के इज्माअ़्‌ और मिल्लत के मसअले के ख़ेलाफ़ है। जो मुख़ालेफ़त की बात करे वोह बाग़ी है और उस का ख़ून ह़लाल है और इन्ही बातों को बहाना बना कर कुछ लोगों को सूली दी जाए और कुछ को शह्र-बदर किया जाए।

इस अ़ज़ीम मसअला में मश्वरा करते वक़्त अगर बनी हाशिम और दूसरे बुज़ुर्ग अस्ह़ाब नहीं बुलाए जा सकते थे, कम-अज़-कम ह़ज़रत अ़ली अ़लैहिस्सलाम को मुत्तलाअ़ किया ही जा सकता था?

(२) उस वक़्त सक़ीफ़ा फ़ुटबाल का मैदान हो रहा था?

चर्ब ज़बानी और ख़ुद-सताई के बअ़्‌द अबू बक्र अंसार से कहते हैं कि येह ‘उमर’ है और येह है ‘अबू उबैदा’ जिसके हाथों पर चाहो बैअ़त कर लो यअ़्‌नी इन दोनों के ख़लीफ़ा होने में किसी भी शक-ओ-शुब्हा की गुंजाइश नहीं है इन दोनों में से किसी एक को ख़लीफ़ा होना है।

येह दोनों अफ़राद भी अपने पुराने पढ़े हुए सबक़ को दोहराते हैं और ख़ेलाफ़त का गेंद अबूबक्र की तरफ़ ‘पास’ कर देते हैं और कहते हैं कि आपकी मौजूदगी में हमें येह जुरअत कहाँ?

उलमाए अह्ले सुन्नत ने इस ड्रामे का नाम ‘उम्मत का इज्माअ़्‌ और शूरा’ रखा है।

(३) सक़ीफ़ा के वा़केआ को अ़र्सा गुज़रने के बअ़्‌द उमर ने अपनी ख़ेलाफ़त के ज़माने में इस बात की सराहत की है कि सक़ीफ़ा में’ शूरा’ ओ-’ इज्माअ़्‌’ नहीं हुआ था। उमर ने मिम्बर पर कहाः

‘मैंने सुना है कि तुम में से किसी ने येह कहा है कि अगर उमर का इंतेक़ाल हो जाए तो हम फ़ुलाँ की बैअ़त कर लेंगे कोई इस फ़िक्र में न रहे इन्न बै-अ़-त अबी बकरिन कानत फ़ल्ततन यक़ीनन अबू बक्र की बैअ़त एक ह़ादेसाती वा़केआ थी यअ़्‌नी इस में किसी मश्वरे और इज्माअ़्‌ का सवाल न था और येह बात अब नहीं होने वाली वोह एक बात थी जो हो गई।

स़ही़ह है कि अबूबक्र की बैअ़त एक ह़ादेसाती वा़केआ थी जो बग़ैर सोचे समझे अंजाम पज़ीर हुआ। ख़ुदा ने इस के शर से म़हफ़ूज़ रखा......अब तुम्हारे दरमियान कोई भी अबूबक्र जैसा नहीं है कि सरदाराने क़ौम उस की एताअ़त करें।

अगर शूरा और इज्माअ़्‌ हुआ था अस्ह़ाब पैग़म्बर (स.अ़.) ने आज़ादी से अपनी राय दी थी तो अबूबक्र की बैअ़त ह़ादेसाती वा़केआ कैसे हो गई और कैसे येह बात मशहूर हो गई कि अबूबक्र की बैअ़त बग़ैर सोचे समझे अंजाम पा गई?

(४) उमर का कहना है कि’ पैग़म्बर (स.अ़.) की वफ़ात के बअ़्‌द अ़ली-ओ-ज़ुबैर और उनके साथी हमारी मुख़ालेफ़त करने लगे और फ़ातेमा (स.अ़.) के घर में जमअ़्‌ हुए। क्या इतनी वाज़े़ह मुख़ालेफ़त से चश्मपोशी (क़त़्ए नज़र) की जा सकती है। जब कि ख़ुद उमर ने उन लोगों की मुख़ालेफ़त का एअ़्‌तेराफ़ किया है?......

क्या इसी को इज्माअ़्‌ कहते हैं?

(५) अगर ख़ेलाफ़त का मसअला शूरा से हल होना था तो पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ़.) को अपनी ज़िंदगी में उस के उसूल-ओ-ज़वाबित की तरफ़ कम-अज़-कम इशारा तो करना ही चाहिए था कि मेरे बअ़्‌द ख़लीफ़ा का इंतेख़ाब इस तरह होगा.....येह बात अ़क़्ल की कसौटी पर पूरी नहीं उतरती कि जिस पैग़म्बर (स.अ़.) ने छोटे छोटे मसाएल बयान किए हों मअ़्‌मूली मअ़्‌मूली बातों की तरफ़ इशारा क्या हो। इतने अ़ज़ीम मसअला में क्यों ख़ामोश रहे - इशारतन भी कोई बात नहीं कही?

किस तरह ह़ज़रत अ़ली (अ़.स.) के ह़क़ को ग़स्ब किया गया?

हर समाज में ऐसे अफ़राद पाए जाते हैं जो ह़ुकूमत अपने हाथों में लेकर अ़वाम पर ह़ुक्मरानी करना चाहते हैं। येह लोग हमेशा इस फ़िक्र में रहते हैं कि किस तरह अपना मक़सद ह़ासिल किया जाए और किस तरह फ़ुर्सत से इस्तेफ़ादा किया जाए ख़ाह इस राह में ख़ुदा और रसूल (स.अ़.) के अ़हकाम पामाल ही क्यों न हों।

ख़ेलाफ़त और जानशीनीये पैग़म्बर (स.अ़.) के सिलसिले में ऐसे मुतअ़द्दिद ज़ेह्न तारीख़ के सफ़़हात पर नज़र आ रहे हैं वोह लोग जो सक़ीफ़ा में जमअ़्‌ हो कर इस्लाम का दमभर रहे थे वोह कुछ इस तरह के थे

इस सिलसिले में पैग़म्बर (स.अ़.) की बीमारी के वक़्त के चंद वा़केआत पेश करते हैं।

लश्करे उसामा

जिस ज़माने में पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ़.) मरीज़ थे और साहेबे फ़राश थे उस वक़्त आपने पाक सीरत और रास्त बाज़ (सच्चे) जवान ‘उसामा इब्ने ज़ैद’ को येह ह़ुक्म दिया कि अपनी सरदारी में लश्कर ‘मोअत्ता’ की तरफ़ ले जाओ।

इस लश्कर में मुहाजिर-ओ-अंसार थे जिसमें अबूबक्र, उमर और उबैदा जर्राह वग़ैरह भी शामिल थे। पैग़म्बर (स.अ़.) बार बार ताकीद फ़रमा रहे थे कि इस लश्कर से जुदा न हो जाए। यहाँ तक कि एक मर्तबा उसामा ने आँह़ज़रत (स.अ़.)से दरियाफ़्त कियाः क्या आप इजाज़त देते हैं कि आपकी सेहत याब होने तक हम मदीना ही रहें?

फ़रमायाः जल्दी सफ़र करो। ख़ुदा के नाम से अपना सफ़र आग़ाज़ करो।

...... इस ह़ालत में अगर में लश्कर लेकर चला जाऊँ तो मेरा दिल आप ही में लगा रहेगा और फ़िक्रमंद रहूँगा।

फ़रमायाः सफ़र करो अल्लाह तुम्हें कामियाबी अ़ता करेगा।

...... मुझे येह अच्छा नहीं लगता कि मैं आने वालों से आपकी ख़ैरियत दरियाफ़्त करूँ।

फ़रमायाः जो मैं ने तुम्हें ह़ुक्म दिया है बस उसी पर अ़मल करो......

इस के बअ़्‌द आँह़ज़रत (स.अ़.) बेहोश हो गए जब होश आया फ़रमायाः

‘ख़ुदा लअ़्‌नत करे उस पर जो उसामा के लश्कर से अलग हो’(श़हे नह्जुल बलाग़ा, इब्ने अबिल ह़दीद, जि॰ २, स॰ २१, मतबूआ दर चहार जिल्द) इस के बअ़्‌द भी उमर-ओ-अबूबक्र इस लश्कर से अलग हो गए और मदीना वापस आ गए।

 २. क़लम-ओ-दवात

पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ़.) ने अपनी ज़िंदगी के आख़िरी दिनों में येह ह़ुक्म दिया कि काग़ज़-ओ-क़लम लाया जाए ताकि में ऐसी चीज़ लिख दूँ जिससे तुम मेरे बअ़्‌द गुमराह न हो।

लेकिन बअ़्‌ज़ ने कहाः........ येह तो हिज़यान कह रहे हैं।

(तारीख़े तबरी, जि॰ ४, स॰ १८६, स़ही़ह मुस्लिम किताबुल वसीयत)

इब्ने अ़ब्बास का बयान है किः

उमर की ख़ेलाफ़त के इब्तेदाई दिनों में उमर के पास गया।

उमर ने पूछाः ..... क्या अभी भी वोह (अ़ली अ़लैहिस्सलाम) अपने को ख़लीफ़ा जानते हैं?

........... हाँ

............ क्या उनका येह ख़याल है कि पैग़म्बर (स.अ़.) ने उनके ख़ेलाफ़त की बाक़ा़एदा तस्री़ह की थी?

..........हाँ यक़ीनन बहुत ही साफ़ और वाज़े़ह है। मैंने इस सिलसिले में ख़ुद अपने वालिद से दरियाफ़्त किया। उन्होंने फ़रमाया अ़ली जो फ़रमा रहे हैं वोह बिल्कुल स़ही़ह है।

उमर ने कहाः..... पैग़म्बर (स.अ़.) अपनी ज़िंदगी के आख़िरी दिनों में उनके नाम की सराहत करना चाहते थे मगर मैंने येह काम न होने दिया.....

(श़हे इब्ने अबिल ह़दीद, जि॰ २, स॰ ५६३)

इस जुम्ले से येह बात भी साबित हो गई कि किसी शख़्स ने पैग़म्बर (स.अ़.) की तरफ़ हिज़यान की निस्बत दी थी। क्या उमर पैग़म्बर (स.अ़.) से ज़्यादा समझते थे। उम्मत की मस्ले़हतों को ज़्यादा बेहतर दर्क कर रहे थे जिसकी बेना पर पैग़म्बर सल्लल्लाहो अ़लैहे व आलेही व सल्लम को तस्री़ह करने से रोक दिया कि वोह अ़ली के नाम की वज़ाहत न करें।

इन वा़केआत की रोशनी में येह नताएज सामने आते हैं किः

जो लोग मस्नदे ख़ेलाफ़त पर बिराजमान हुए वोह पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ़.) की रे़हलत के वक़्त बल्कि उस से पहले ही ख़लीफ़ा बनने की फ़िक्र में थे और इस के लिए पहले ही से नक़्शा (मन्सूबा) बना चुके थे। येह सारी बातें जाह तलबी की निशानियाँ हैं।

यही जाह तलबी इस बात का सबब हुई कि इस राह में जो रुकावटें हैं उन्हें दूर किया जाए। सअ़्‌द इब्ने आेबादा जो अबूबक्र की ख़ेलाफ़त के मुख़ालिफ़ थे और जिन्हों ने बैअ़त नहीं की थी उन्हें क़त्ल कर दिया और मशहूर कर दिया कि उन्हें ‘जिन्न’ ने क़त्ल किया है। ‘मालिक इब्ने नुवैरा’ वोह पाक-बाज़ और रास्त किरदार शख़्स जिसके बारे में पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ़.) ने फ़रमाया था जो शख़्स अह्ले बेहिश्त को देखना चाहता है वोह मालिक को देखे और जिसने पैग़म्बर (स.अ़.) की ज़बानी सुना था कि ख़ेलाफ़त सिर्फ़ ह़ज़रत अ़ली का ह़क़ है। पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ़.) की वफ़ात के बअ़्‌द जब मालिक मदीना आए और देखा कि दूसरों ने ख़ेलाफ़त पर क़ब्ज़ा जमा लिया है तो उन्होंने उस की मुख़ालेफ़त की जिसके नतीजे में ख़ालिद इब्ने वलीद ने उन्हें क़त्ल कर दिया और उनकी नामूस की बे-ह़ुर्मती की लेकिन ख़लीफ़ए वक़्त ने ख़ालिद से कोई बाज़पुर्स नहीं की और उसे कोई सज़ा नहीं दी।

इसी ज़माने में ‘फ़दक’ भी आले मो़हम्मद (स.अ़.) से छीन लिया गया।

‘फ़दक’ वोह एलाक़ा था जहाँ सरसब्ज़-ओ-शादाब बाग़ात लगे हुए थे और येह पैग़म्बर (स.अ़.) की इकलौती बेटी ह़ज़रत फ़ातेमा ज़हरा सलामुल्लाह अ़लैहा के इख़्तेयार में था, आप ही उस की मालिक थीं।

अबूबक्र ने उस पर क़ब्ज़ा कर लिया और ह़ज़रत ज़हरा सलामुल्लाह अ़लैहा के आदमियों को वहाँ से बाहर निकाल दिया। फ़ातेमा ज़हरा सलामुल्लाह अ़लैहा ने इस के ख़ेलाफ़ ए़हतेजाज किया।

अबूबक्र ने ह़ज़रत ज़हरा सलामुल्लाह अ़लैहा को एक सनद पेश की कि फ़दक उनकी मिल्कियत है।

लेकिन उमर ने इस सनद को पारा पारा कर दिया (सीरते हलबिया, जि॰ ३, स॰ २) और अबूबक्र ने इस का कोई असर नहीं लिया और न दूसरी सनद ह़ज़रत ज़हरा के ह़वाले की।

इन वा़केआत से बस यही बात समझ में आती है कि लोग दुनिया परस्त और जाह तलब थे उन्हें सिर्फ़ मन्सब-ओ-मुक़ाम की फ़िक्र थी जिसके ह़ुसूल के लिए हर काम करने पर तैयार थे।