ख़ुदा आख़िरी ह़ुज्जत
अ़द्ल गुस्तर ह़ज़रत इमाम महदी अ़लैहिस्सलाम की वेलादत २५५ हिजरीी १५ शाबान इराक़ के एक शह्र सामर्रार् में हुई। २६० हिजरीी में आपके वालिद का इंतेक़ाल हुआ और उसी वक़्त आप मन्सबे इमामत पर फ़ाएज़ हुए।
आपका नाम पैग़म्बर (स.अ़.) का नाम ‘मो़हम्मद’ और आपकी कुनियत पैग़म्बर (स.अ़.) की कुनियत ‘अबुल क़ासिम’ है। आपके वालिद हमारे ग्यारहवें इमाम ह़ज़रत हसन अ़सकरी अ़लैहिस्सलाम और आपकी वालेदा जनाब नरजिस ख़ातून सलामुल्लाह अ़लैहा हैं।
बअ़्ज़ एलल-ओ-अस्बाब की बेना पर आप इब्तेदा ही से पोशीदा रहे सत्तर साल तक आपके ख़ास क़ाएदीन के ज़रीए आप तक रसाई होती रही। इस सत्तर साल में आपके ख़ास नायब येह अफ़राद थे उस्मान इब्ने सईद, मु़हम्मद इब्ने उस्मान, ह़ुसैन इब्ने रौ़ह और अ़ली इब्ने मो़हम्मद समरी। इस ७० साल की मुद्दत को ‘ग़ैबते सुग़रा’ कहते हैं और इस के बअ़्द से’ ग़ैबते कुब्रा’ का आग़ाज़ होता है।
ग़ैबते कुब्रा की इब्तेदा से ज़हूर तक किसी ख़ास नायब का तअ़य्युन नहीं फ़रमाया है। इन दिनों लोगों की ज़िम्मेदारी येह है कि वोह फ़ुक़हा और मोअ़्तबर रावियाने ह़दीस जिन्हें दीनी मसाएल में दस्तरस हो उनकी तरफ़ रुजूअ़् करें और अपनी ज़िम्मेदारियाँ मअ़्लूम करें।
ह़ज़रत महदी अ़लैहिस्सलाम और आलमी इस्ला़ह
ह़ज़रत महदी और आलमी मुसलेह के ज़हूर का इन्तेज़ार सिर्फ़ शीओं से मख़्सूस नहीं है इस्लाम के दूसरे फ़िव़ेÀ बल्कि यहूदी और ईसाई और दुनिया के अ़ज़ीम दानिशवर एक आलमी मुसलेह के ज़हूर की ख़बर देते हैं।
ह़ज़रत दाऊद अ़लैहिस्सलाम की ज़बूर में है किः
‘...... ख़ुदावंद के मुंतज़िर ज़मीन के वारिस होंगे....’
‘.......ह़लीम-ओ-बुर्दबार ज़मीन के वारिस होंगे। से़हत-ओ-सलामती की उमूमियत से इस्तेफ़ादा करेंगे, नेकूकारों की ख़ुदा ताईद करेगा। ख़ुदा मुख़लिसों के दिन का इल्म रखता है। उनकी मीरास अबदी होगी। जिन लोगों ने इस से बरकत ह़ासिल की वोह ज़मीन के वारिस होंगे और जिन पर लअ़्नतें भेजी गई हैं वोह नीस्त-ओ-नाबूद हो जाएँगे। नेकूकार ज़मीन के वारिस होंगे और वोह हमेशा रहेंगे.....
क़ुरआन और अ़क़ीदए ह़ज़रत महदी अ़लैहिस्सलाम
क़ुरआन में एक ऐसे दिन का वअ़्दा किया गया है जिस दिन ह़क़ के परस्तार, अल्लाह के नेक बंदे, इस रूए ज़मीन के ह़ुक्मरान होंगे। दीने मुक़द्दस इस्लाम सारी दुनिया में फैलाएँगे जो दूसरे तमाम अदियान पर ग़ालिब होगा। इस के अ़लावा ऐसी मुतअ़द्दिद आयतें हैं जिनकी तफ़सीर ह़ज़रत महदी अ़लैहिस्सलाम से की गई है।
(१) व लक़द कतब्ना फ़िज़्ज़बूरे मिन बअ़्दिज़्ज़िक्रे अन्नल अर-ज़ यरिसोहा एबादेयस्साले़हून
(सूरए अम्बियाः आयत १०५)
इस किताब के बअ़्द हमने ज़बूर में येह बात लिख दी कि हमारे नेकूकार बंदे ज़मीन के वारिस होंगे।
अभी ज़बूर की जो इबारत नक़्ल की गई है, जिस में वज़ा़हत की गई है कि नेकूकार अफ़राद आलमी ह़ुकूमत के ह़ुक्मराँ होंगे।
(२) वअ़दल्लाहुल्लज़ी-न आमनू मिन्कुम व अ़मेलुस्साले़हाते ले-यस्तख़्लेफ़न्नहुम फ़िल अज़े कमस्तख़्लफ़ल्लज़ी-न मिन क़ब्लेहिम व-ल-योमक्केनन्न लहुम दी-नहुमुल्लज़िर्तज़ा लहुम व ल-योबद्देलन्नहुम मिन बअ़्दे ख़ौफ़ेहिम अम्मनन यअ़्बुदूननी ला युश्रेकू-न बी शैअन
(सूरए नूर, आयत ५५)
ख़ुदा ने उन लोगों से वअ़्दा किया है जो तुम में से ईमान लाए हैं और अ़मले साले़ह बजा लाए हैं वोह उन्हें ज़मीन पर अपना ख़लीफ़ा क़रार देगा जिस तरह उसने गुज़श्ता लोगों को ख़लीफ़ा मुअ़य्यन किया था। जिस दीन को अल्लाह ने पसंद किया है उसे मुस्त़हकम करेगा और उनके ख़ौफ़-ओ-ह़ेरास को अम्न-ओ-अमान में तब्दील कर देगा। सिर्फ़ मेरी (अल्लाह) की एबादत करेंगे और किसी को मेरा शरीक नहीं क़रार देंगे।
(३) व होवल्लज़ी अर्स-ल रसूलहू बिलहोदा व दीनिल ह़क़़्के ले-युज़्हेरहू अ़लद्दीने कुल्लेही व लौ करेहल मुश्रेकून
(सूरए सफ़, आयत ९)
वोह है जिसने अपने रसूल को हेदायत और दीने ह़क़ के साथ भेजा ताकि तमाम अदियान पर ग़लबा ह़ासिल करें अगरचे येह बात मुश्रेकीन को नागवार क्यों न लगे।
(४) व नुरीदो अन्न मुन्न अ़लल्लज़ीनस्तुज़़्एफ़ू फ़िल अज़े व नज्अ़-लहुम अइम्मतन व नज्अ़-लहुमुल वारेसी-न
(सूरए क़सस, आयत ५)
हमने इरादा कर लिया है कि कमज़ोरों (वोह ख़ुदा परस्त अफ़राद जिन्हें ज़ालिमों ने कमज़ोर-ओ-नातवाँ कर दिया था) को क़ाबिले एनायत क़रार देंगे उन्हें रहनुमा और ज़मीन का वारिस बनाएँगे।
इन आयतों से येह बात बख़ूबी वाज़े़ह हो जाती है कि इस दुनिया की ज़मामे ह़ुकूमत एक दिन ज़रूर नेकूकारों के हाथों में होगी ख़ुदा के शाइस्ता बंदे रहनुमा होंगे और दीने इस्लाम तमाम अदियान पर ग़ालिब आएगा।
ह़ज़रत महदी अ़लैहिस्सलाम और अह्ले सुन्नत की किताबें
उलमाए अह्ले सुन्नत ने इस सिलसिले में मुतअ़द्दिद रवायतें अपने मोअ़्तबर रावियों के ज़री़ए पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ़.) से नक़्ल की हैं। इन रवायतों से येह ह़क़ीक़त सामने आती है कि इमाम सब क़ुरैश से होंगे।
ह़ज़रत महदी अ़लैहिस्सलाम पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ़.) के नूरे नज़र और अली-ओ-ज़हरा के फ़र्ज़न्द होंगे। बहुत सी रवायतों में येह तश्री़ह है कि ह़ज़रत महदी अ़लैहिस्सलाम इमाम हुसैन अ़लैहिस्सलाम की नस्ल से होंगे। उलमाए अह्ले सुन्नत ने अपनी मोअ़्तबर किताबों में सैकड़ों ह़दीस ज़िक्र की हैं। बतौरे नमूना सिर्फ़ चंद की तरफ़ इशारा करते हैं।
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मुस्नद |
तालीफ़ |
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अ़हमद इब्ने हंबल |
२४१ हिजरीी में वफ़ात पाई |
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स़ही़ह बुख़ारी |
’’ |
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बुख़ारी |
२५६ हिजरीी में वफ़ात पाई |
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सुनने अबी दाऊद |
’’ |
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सुलैमान इब्ने अशअ़स सजिस्तानी |
२७५ हिजरीी में वफ़ात पाई |
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स़ही़ह तिरमिज़ी |
’’ |
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मु़हम्मद इब्ने ईसा तिरमिज़ी |
२७९ हिजरीी में वफ़ात पाई |
मज़्कूरा बाला किताबें अह्ले सुन्नत की मोअ़्तबर तरीन किताबें हैं और उनके मुअल्लिफ़ अह्लेसुन्नत के बलंद पाया अ़ज़ीमुलमर्तबत उलमा और मोअ़्तबर मु़हद्देसीन हैं। येह अफ़राद या इमाम ज़माना अ़लैहिस्सलाम की वेलादत २५५ हिजरीी से पहले इंतेक़ाल कर चुके थे या उनकी वेलादत के थोड़े दिनों बअ़्द।
इस के अ़लावा
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मसाबीहुस्सनह |
तालीफ़ |
बग़वी |
५६१ हिजरीी में वफ़ात पाई |
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जामे़उल उसूल |
’’ |
इब्ने असीर |
६०६ हिजरीी में वफ़ात पाई |
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अलफ़ुतू़हातुल मक्कीया |
’’ |
मु़ह्युद्दीन अ़रबी |
६३८ हिजरीी में वफ़ात पाई |
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तज़्केरतुल ख़वास |
’’ |
सिब्ते इब्ने जौज़ी |
६५४ हिजरीी में वफ़ात पाई |
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फ़राएदुस्सिमतैन |
’’ |
ह़मवी |
७१६ हिजरीी में वफ़ात पाई |
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सवा़एक़ |
’’ |
इब्ने ह़जर हैसमी |
९७३ हिजरीी में वफ़ात पाई |
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यनाबी़उल मवद्दा |
’’ |
शेख़ सुलेमान क़ुन्दूज़ी |
१२९३ हिजरीी में वफ़ात पाई |
अह्लेसुन्नत के बअ़्ज़ बुज़ुर्ग उलमा ने ह़ज़रत इमाम ज़माना अ़लैहिस्सलाम के मौज़ूअ़् पर मुस्तक़िल किताबें त़हरीर की हैं जैसेः
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१. |
अलबयान फ़ी अख़्बारे सा़हेबिज़्ज़मान |
तालीफ़ |
अ़ल्लामा गंजी शाफ़़ई |
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२. |
एक़्दुद्दुरर फ़ी अख़्बारिल इमामिल मुन्तज़र |
’’ |
शेख़ जमालुद्दीन यूसुफ़ अद्दमिश्क़ी |
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३ |
महदी आले र्रसूल |
’’ |
अ़ली इब्ने सुल्तान अल हरवी अल ह़नफ़ी |
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किताबुल महदी |
’’ |
अबी दाऊद |
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५ |
अ़लामातुल महदी |
’’ |
जमालुद्दीन सोयूती |
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६ |
मनाकि़बुल महदी |
’’ |
ह़ाफ़िज़ अबी नुऐम इस्फ़हानी |
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७ |
अलक़ौलुल मुख़्तसर फ़ी अ़लामातिल महदी अल मुन्तज़र |
’’ |
इब्ने ह़जर |
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८ |
अलबुर्हानो फ़ी अ़लामाते महदी आख़ेरुज़्ज़मान |
’’ |
मुल्ला अ़ली मुत्तक़ी |
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९ |
अरबईन ह़दीस फ़िल महदी |
’’ |
अबुल उला हमदानी |
ह़ज़रत महदी अ़लैहिस्सलाम और शीआ
रसूले ख़ुदा सल्लल्लाहो अ़लैहे व आलेही व सल्लम और अइम्मा अ़लैहिमुस्सलाम से ह़ज़रत महदी अ़लैहिस्सलाम के बारे में तीन हज़ार से ज़ाएद अ़हादीस नक़्ल हुई हैं जो येह बताती हैं कि इमामे ज़माना अ़लैहिस्सलाम इमाम हुसैन अ़लैहिस्सलाम के नवें फ़र्ज़न्द हैं। आपके वालिद हसन अ़स्करी अ़लैहिस्सलाम और आपकी वालेदा जनाब नरजिस ख़ातून अ़लैहस्सलाम हैं। आपका नाम पैग़म्बर (स.अ़.) का नाम और आपका लक़ब महदी.... है। सामर्रा में आप की वेलादत हुई और बचपने ही में आप सायए पेदरी से म़हरूम हो गए। आप इस वक़्त ज़िंदा हैं और उस वक़्त तक ज़िंदा रहेंगे जब तक ख़ुदा चाहेगा। एक दिन आपका ज़हूर होगा और दुनिया को अ़द्ल-ओ-इन्साफ़ से भर देंगे जब कि वोह ज़ुल्म-ओ-जौर से भर चुकी होगी। बअ़्ज़ मस्लेहतों की बेना पर आप लोगों की निगाहों से पोशीदा हैं।
जब आप तशरीफ़ लाएँगे - (ख़ुदा वोह दिन जल्द लाए) कअ़्बा की दीवार पर तकिया देकर अपने दोस्तों को सदा देंगे उस वक़्त ३१३ अफ़्राद आपके पास जमअ़् हो जाएँगे। जनाब ईसा (अ़.स.) आसमान से रूए ज़मीन पर तशरीफ़ लाएँगे और ह़ज़रत की इक़्तेदा में नमाज़े जमाअ़त अदा करेंगे। दुनिया के गोशे गोशे में इस्लामी तअ़्लीमात और इस्लामी अ़हकाम फैलाएँगे और आपकी ह़ुकूमत में येह दुनिया जन्नत होगी।
ह़ज़रत (अ.स.) के सिलसिले में जो ह़दीसें शीआ और सुन्नी उलमा ने अपनी किताबों में ज़िक्र की हैं वोह बेशुमार हैं। तफ़्सील के लिए ‘बेह़ारुल अनवार’, और ‘मुंतख़बुल असर’ का मुतालआ किया जा सकता है। मुंतख़बुल असर के मुअल्लिफ़ ने ह़दीसों की जो फ़ेहरिस्त मुरत्तब की है उसे हम यूँ नक़्ल कर रहे हैं बअ़्द में चंद ह़दीसें भी ज़िक्र करेंगे।
मौज़ूअ़् ह़दीसों की तअ़्दाद
वोह ह़दीसें जिनमें येह बताया गया है कि इमाम बारह हैं।
पहले इमाम ह़ज़रत अ़ली अ़लैहिस्सलाम और आख़िरी इमाम ह़ज़रत इमाम महदी सलामुल्लाह अ़लैह हैं। ५८
वोह ह़दीसें जिनमें ह़ज़रत (अ.स.) के ज़हूर की ख़ुश-ख़बरी दी गई है। ६५७
वोह ह़दीसें जो येह बताती हैं कि ह़ज़रत महदी अ़लैहिस्सलाम रसूलुल्लाह (स.अ़.) के फ़र्ज़न्द हैं। ३८९
वोह ह़दीसें जो येह बताती हैं कि ह़ज़रत (अ.स.) का नाम पैग़म्बर (स.अ़.) का नाम और ह़ज़रत (अ.स.) की कुनियत पैग़म्बर की कुनियत है। ४८
वोह ह़दीसें जो येह बताती हैं कि ह़ज़रत अमीरुल मोअ्मेनीन की नस्ल में से हैं। २१४
वोह ह़दीसें जो येह बताती हैं कि ह़ज़रत फ़ातेमा ज़हरा सलामुल्लाह अ़लैहा की नस्ल में से हैं। १९२
वोह ह़दीसें जो येह बताती हैं कि ह़ज़रत इमाम हुसैन अ़लैहिस्सलाम की नस्ल में से हैं। १८५
वोह ह़दीसें जो येह बताती हैं कि ह़ज़रत इमाम हुसैन अ़लैहिस्सलाम के नवें फ़र्ज़न्द हैं। १४८
वोह ह़दीसें जो येह बताती हैं कि ह़ज़रत इमाम ज़ैनुल आबिदीन अ़लैहिस्सलाम की नस्ल से हैं। १८५
वोह रवायतें जो येह बताती हैं कि ह़ज़रत इमाम मो़हम्मद बाक़िर अ़लैहिस्सलाम की नस्ल से हैं। १०३
वोह रवायतें जो येह बताती हैं कि इमाम जअ़्फ़र सादिक़ अ़लैहिस्सलाम की नस्ल से हैं। १०३
वोह रवायतें जो येह बताती हैं कि इमाम मूसा काज़िम अ़लैहिस्सलाम की नस्ल से हैं। १०१
वोह रवायतें जो येह बताती हैं कि इमाम अ़ली रज़ा अ़लैहिस्सलाम की नस्ल से हैं। ९५
वोह रवायतें जो येह बताती हैं कि इमाम मो़हम्मद तक़ी अ़लैहिस्सलाम के तीसरे फ़र्ज़न्द हैं। ९०
वोह रवायतें जो येह बताती हैं कि इमाम अ़ली नक़ी अ़लैहिस्सलाम के फ़र्ज़न्द हैं। ९०
वोह रवायतें जो येह बताती हैं कि इमाम ह़सन अ़स्करी अ़लैहिस्सलाम के फ़र्ज़न्द हैं। १४६
वोह रवायतें जो यह बताती हैं कि ह़ज़रत के वालिद का नाम ह़सन है। १४७
वोह रवायतें जो येह बताती हैं कि दुनिया को अ़द्ल-ओ-इन्साफ़ से भर देंगे। १२३
वोह रवायतें जो येह बताती हैं कि उनकी ग़ैबत तूलानी है। ९१
वोह रवायतें जो येह बताती हैं कि उनकी उम्र मुबारक तूलानी होगी। ३१८
वोह रवायतें जो येह बताती हैं कि उनकी बदौलत इस्लाम सारी दुनिया में फैलेगा। ४७
वोह रवायतें जो येह बताती हैं कि बारहवें और आख़िरी इमाम हैं। १३६
ह़दीसों के अअ़्दाद-ओ-शुमार पर ग़ौर करने से अंदाज़ा होता है कि ह़ज़रत के बारे में जो रवायतें ज़िक्र हुई हैं वोह तवातुर की ह़ुदूद से कहीं ज़्यादा हैं। इतनी कसरत से रवायतें बहुत ही कम मौज़ूआत पर मिलती हैं। हर वोह शख़्स जो इस्लाम और पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ़.) का मोअ़्तक़िद है ह़ज़रत महदी अ़लैहिस्सलाम पर अ़क़ीदा रखना उस के लिए लाज़िमी और ज़रूरी है कि वोह इस वक़्त ज़िंदा हैं और ग़ैबत के पर्दे में ज़िंदगी बसर कर रहे हैं और एक दिन यक़ीनन उनका ज़हूर होगा।
अब चंद ह़दीसें
(१) यनाबी़उल मवद्दा के मुअल्लिफ़ अपनी किताब में रसूले ख़ुदा सल्लल्लाहो अ़लैहे व आलेही व सल्लम से येह ह़दीस नक़्ल करते हैं कि आँह़ज़रत सल्लल्लाहो अ़लैहे व आलेही व सल्लम ने इर्शाद फ़रमाया किः महदी मेरे फ़र्ज़न्दों में से हैं जिनके लिए ग़ैबत है और जब वोह ज़ाहिर होंगे ज़मीन को अ़द्ल-ओ-इन्साफ़ से इस तरह भर देंगे जिस तरह वोह ज़ुल्म-ओ-जौर से भर चुकी होगी।
(मुन्तख़बुल असर, स॰ २४९)
(२) इसी किताब में येह रवायत भी मज़्कूर है कि सलमान फ़ारसी का बयान है मैं रसूले ख़ुदा सल्लल्लाहो अ़लैहे व आलेही व सल्लम की ख़िदमत में हाज़िर हुआ उस वक़्त इमाम हुसैन अ़लैहिस्सलाम रसूले ख़ुदा सल्लल्लाहो अ़लैहे व आलेही व सल्लम की आग़ोश में थे। आँह़ज़रत (अ़.स.) की आँख और भौं का बोसा लेकर फ़रमा रहे थेः तुम करीम हो, करीम के फ़र्ज़न्द हो, करीम के भाई हो। तुम इमाम हो, इमाम के फ़र्ज़न्द हो, इमाम के भाई। तुम ह़ुज्जते ख़ुदा हो, ह़ुज्जते ख़ुदा के फ़र्ज़न्द हो, और ह़ुज्जते ख़ुदा के भाई। तुम तो ह़ुज्जत ख़ुदा के वालिद हो, तुम्हारा नवाँ फ़र्ज़न्द क़ाएम होगा।
(अलमहदी (अ़.स.), स॰ ६०)
(३) ‘इब्ने अबी दलफ़’ का बयान है कि मैंने ह़ज़रत इमाम अ़ली नक़ी अ़लैहिस्सलाम को फ़रमाते हुए सुना किः
मेरे बअ़्द मेरे फ़र्ज़न्द हसन इमाम होंगे और उनके बअ़्द उनके फ़र्ज़न्द क़ाएम’ इमाम होंगे जो दुनिया को अ़द्ल-ओ-इन्साफ़ से इस तरह से भर देंगे जिस तरह वोह ज़ुल्म-ओ-जौर से भर चुकी होगी।
(मुन्तख़बुल असर, स॰ २२५)
(४) ......‘हुज़ैफ़ा’ का बयान है कि पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ़.) ने इर्शाद फ़रमाया किः
अगर दुनिया के फ़ना होने में सिर्फ़ एक दिन बाक़ी रह जाएगा ख़ुदा उस दिन को इतना तूलानी करेगा कि मेरा एक फ़र्ज़न्द जो मेरा हम नाम होगा वोह ज़ाहिर होगा। सलमान ने दरियाफ़्त किया या रसूल अल्लाहः वोह फ़र्ज़न्द किस की नस्ल से होगा? ह़ज़रत (स.अ़.) ने इमाम हुसैन अ़लैहिस्सलाम के सर पर हाथ फेरते हुए फ़रमाया इस की नस्ल से।
(ज़ख़ाएरे उक़्बा, स॰ १३६)
(५) ‘मसअ़दा‘ने इमाम जअ़्फ़र सादिक़ अ़लैहिस्सलाम से रवायत की है कि आपने फ़रमायाः
हमारा क़ाएम हसन की सुल्ब से होगा (ग्यारहवें इमाम हसन अ़स्करी अ़लैहिस्सलाम) और हसन अ़ली की सुल्ब से (दसवें इमाम अ़ली नक़ी अ़लैहिस्सलाम) और अ़ली मो़हम्मद की सुल्ब से। (नवें इमाम मो़हम्मद तक़ी अ़लैहिस्सलाम) और मो़हम्मद अ़ली की सुल्ब से (आठवें इमाम अ़ली रज़ा अ़लैहिस्सलाम) और अ़ली मेरे इस फ़र्ज़न्द की सुल्ब से। उस वक़्त आपने सातवें इमाम मूसा काज़िम अ़लैहिस्सलाम की तरफ़ इशारा फ़रमाया। हम बारह इमाम हैं सब के सब मअ़्सूम और पाकीज़ा। ख़ुदा की क़सम अगर दुनिया के फ़ना होने में सिर्फ़ एक दिन बाक़ी रह जाएगा ख़ुदा उस दिन को इतना तूलानी करेगा कि हम अह्लेबैत के ‘क़ाएम’ का ज़हूर हो।
(इस्बातुल ह़ोदा, जि॰ २, स॰ ५६२)
समाजियात के माहेरीन और उनके नज़रियात
दुनिया के दानिशवरों का येह नज़रिया है कि इस वक़्त जो सारी दुनिया में ख़ूँरेज़ी, जंग, फ़साद, हंगामे, क़त्ल-ओ-ग़ारतगरी, रोज़ाना बढ़ते हुए जराएम का बाज़ार गर्म है उस की वजह येह है रू़हानी और जिस्मानी तक़ाज़ों और जरूरतों में तनासुब और तवाज़ुन बाक़ी नहीं रहा।
येह स़ही़ह है आज के इन्सान ने दुनिया को तस्ख़ीर कर लिया है समंदरों की तहों तक उस की रसाई हो चुकी है, चाँद पर वोह कमंद डाल चुका है लेकिन माद्दी एअ़्तबार से माला-माल होने के बावजूद रू़हानी और मअ़्नवी ले़हाज़ से बिल्कुल फ़क़ीर है।
येह बात बिल्कुल वाज़े़ह है कि ताक़त और ़कूवत की बुनियाद पर दुनिया में अ़दालत नहीं क़ाएम हो सकती सिर्फ़ जदीद टेक्नीक और माद्दी उलूम के सहारे भी इन्सान को अबदी सआदत नसीब नहीं हो सकती। इस के अ़लावा कोई और रास्ता नहीं है कि इन्सान अपने समाजी उमूर की इमारत ईमान और अख़्लाक़ की बुनियादों पर तअ़्मीर करे। एक आलमी मुसलेह की हेदायतों पर अ़मल करके आपको हलाकतों से नजात दिलाए। ख़ुलूस, सफ़ाए दिल, पाकीये बातिन और अ़द्ल-ओ-इन्साफ़ की फ़ेज़ा में ह़ुकूमत क़ाएम करे इस सूरत में येह इन्सानी समाज ह़ज़रत महदी अ़लैहिस्सलाम के ज़हूर-ओ-क़याम के लिए ज़मीन हमवार करेगा।
इमाम (अ़.स.) और तूले उम्र
हमारा येह अ़क़ीदा है कि इन्सान की तूलानी उम्र मु़हाल नहीं है क्योंकि क़ुरआन में सराहत से येह तज़्केरा मिलता है कि ह़ज़रत नूह अ़लैहिस्सलाम ने तूलानी उम्र पाई थी और उन्होंने सिर्फ़ ९५० साल तब्लीग़ और हेदायत में गुज़ारे।
(फ़-लबे-स फ़ीहिम अल्फ़ स-नतिन इल्ला ख़म्सी-न आमा. (सूरए अ़न्कबूत, आयत १४))
इल्मे ह़यातीयात की जदीद तहक़ीक़ात भी हमारे अ़क़ीदे की ताईद करती हैं। बड़े दानिशवरों का नज़रिया येह है कि अगर ग़ेज़ाओं और दवाओं में ज़रूरी ए़हतेयात बर्ती जाए तो इन्सान तूलानी ज़िंदगी बसर कर सकता है।
ह़ज़रत आयतुल्लाह सद्र अलैहिर्रह़्मा ने अपनी किताब ‘अलमहदी (अ़.स.) में एक मज़्मून ‘अलमुक़्ततिफ़’ नामी माहनामे के साल १३९५ हि. के तीसरे शुमारे से नक़्ल फ़रमाया है। इस मज़्मून में जो बातें ज़िक्र की गई हैं वोह हमारे मौज़ूअ़् से मुनासेबत रखती है इसलिए उस मज़्मून का ख़ुलासा हम यहाँ ज़िक्र कर रहे हैं।’ अ़ज़ीम दानिशवरों का कहना है कि हैवानी बदन के तमाम सिल सेल्स में हमेशा रहने की सलाह़ियत पाई जाती है। इन्सान हज़ारों साल तक ज़िंदा रह सकता है बशर्तेकि कोई ह़ादेसा उस के रिश्तए ह़यात को मुन्क़तअ़् न कर दे। येह बातें तख़्मीना नहीं हैं बल्कि इनकी बुनियाद मुसलसल त़हक़ीक़ और तलाश है।’’
जोन्स, बकिन्स यूनीवर्सिटी के प्रोफ़ेसर ‘डेमंड बर्ल’ का कहना है कि इन्सानी जिस्म के अअ़्ज़ा में हमेशा रहने की इस्तेअ़्दाद पाई जाती है। इस सिलसिले में सबसे पहली त़हक़ीक़ डाक्टर‘जाक लोब’ ने की थी उस के बअ़्द डाक्टर ‘वर्न लूइस’ ने अपनी शरीके ह़यात के तआवुन से त़हक़ीक़ कर के येह साबित किया था कि एक परिन्दे के जनीन को नमकीन पानी में ज़िंदा रखा जा सकता है। इस सिलसिले में बराबर तहक़ीक़ात होती रही यहाँ तक कि डाक्टर ‘अलेकसिस कार्ल’ ने मुसलसल तज्रेबात से येह साबित किया कि जिन अअ़्ज़ा पर तज्रेबात किए गए हैं उनमें बु़ढापे के आसार नज़र नहीं आते। बल्कि उन अज्ज़ा की ज़िंदगी ख़ुद उन जानवरों से ज़्यादा है जिनके बदन से येह अज्ज़ा लिए गए हैं। उसने जनवरी १९१२ ई. से अपने तज्रेबात का आग़ाज़ किया इस राह में ताक़त फ़र्सा मुश्किलात का सामना किया।
इन तज्रेबात से येह नताएज बरामद हुएः
(१) अगर ग़ेज़ाई मवाद में कमी न हो और जरासीम पैदा न होंं तो येह सेल्ज़ हमेशा ज़िंदा रह सकते हैं।
(२) येह अज्ज़ा ज़िंदा रहने के अ़लावा रुश्द-ओ-नुमू भी करते रहेंगे।
(३) जो गेज़ाएँ इन अज्ज़ा को मिल रही हैं उनसे रुश्द-ओ-नुमू का अंदाज़ा किया जा सकता है।
(४) वक़्त की रफ़्तार उन पर असर अंदाज़ नहीं होती। वक़्त के गुज़रने से येह कमज़ोर और बू़ढ़े नहीं होते। बु़ढापे के ज़रा से भी असरात उनमें नज़र नहीं आते। हर साल गुज़श्ता साल की तरह रुश्द-ओ-नुमू करते रहते हैं।
अगर येह सूरत है तो इन्सान को मौत क्यों आती है और आम तौर से उस की ज़िंदगी सौ साल से क्यों तजावुज़ नहीं कर पाती है।
इस का जवाब येह है किः इन्सान और ह़ैवान के जिस्म में बेपनाह अज्ज़ा हैं जो एक दूसरे से मुख़्तलिफ़ और मुतफ़ावित होने के बावजूद आपस में एक दूसरे से मुर्तबित हैं कि एक की ज़िंदगी से दूसरे की ज़िंदगी और एक की कमज़ोरी और नातवानी से दूसरे की कमज़ोरी और नातवानी वाबस्ता हैं। ह़ादेसाती मौतें इस वजह से होती हैं कि जरासीम यकबारगी ़ह़मला कर देते हैं जिससे बहुत से अज्ज़ा मर जाते हैं जिसके नतीजे में इन्सान मौत की नींद सो जाता है। यही वजह है कि इन्सान की मुतवस्सित उम्र सत्तर या अस्सी साल है। तज्रेबे से जो बात साबित होती है वोह येह है कि मौत इस बेना पर नहीं आती कि इन्सान ७० या ८० साल का हो जाता है बल्कि मौत का असली सबब वोह अमराज़ और अ़वारिज़ हैं जवान अज्ज़ा पर ह़मला-आवर होते हैं और उन्हें काम करने से रोक देते हैं। इन अज्ज़ा के बेकार होने से दूसरे अज्ज़ा मुतअस्सिर होते हैं और अज्ज़ा का बाहमी रब्त ख़त्म हो जाता है जिसकी बेना पर दूसरे अज्ज़ा धीरे धीरे मौत का शिकार होते रहते हैं नतीजे में मौत वा़केअ़् हो जाती है।
अगर इल्म इतनी तरक़्क़ी कर ले कि येह अमराज़-ओ-अवारिज़ ख़त्म हो जाएँ या उनके असरात से अज्ज़ा-ओ-अअ़्ज़ा म़हफ़ूज़ रहें तो यक़ीनन इन्सान तूलानी ज़िंदगी बसर कर सकता है और तूलानी उम्र की राह में कोई रुकावट न होगी।
(अल महदी (अ़.स.), स॰ १३२-१३६)
जब येह बात वाज़े़ह हो गई कि तूलानी उम्र मु़हाल नहीं है तो येह मुम्किन है कि वोह क़ादिरे मुतलक़ ख़ुदा एक शख़्स को हज़ारों साल से ज़िंदा रखे। क्योंकि तूलानी उम्र के शराएत की फ़राहमी ख़ुदावंदे आलम के दस्ते क़ुदरत में है। वोह ऐसा निज़ाम बना सकता है जो मौजूदा निज़ाम पर फ़ौक़ियत रखता हो जैसा कि अम्बिया अ़लैहिमुस्सलाम के मोअ़्जिज़े के सिलसिले में उसने किया है। जनाब इब्राहीम अ़लैहिस्सलाम के लिए आग का सर्द हो जाना, जनाब मूसा (अ़.स.) के लिए अ़सा का अज़्दहा बन जाना। जनाब ईसा (अ़.स.) के लिए मुर्दों का ज़िंदा होना येह सब मअ़्मूल के ख़ेलाफ़ था लेकिन ख़ुदावंदे आलम ने अपनी क़ुदरत से एक ऐसे निज़ाम को ईजाद किया जो आम निज़ाम पर फ़ौक़ियत रखता है जिससे मोअ़्जेज़ात ज़ाहिर हुए। तमाम मुसलमान बल्कि यहूदी और ईसाई भी इन मोअ़्जेज़ात पर यक़ीन रखते हैं।
इसलिए ह़ज़रत इमामे ज़माना (ख़ुदा का सलाम हो उन पर) की तूले उम्र के सिलसिले में किसी भी एअ़्तराज़ की कोई गुंजाइश नहीं है अगर तूले उम्र को नामुमकिन माना जाए तो ख़ुद क़ुरआन और जदीद तहक़ीक़ात उस की तक़ज़ीब करेंगी और अगर येह कहा जाए कि तूले उम्र ना-मुम्किन तो नहीं है लेकिन मअ़्मूल और आम निज़ाम के ख़ेलाफ़ ज़रूर है। इस का जवाब येह है कि ह़ज़रत इमाम ज़माना अ़लैहिस्सलाम की उम्र भी अम्बिया अ़लैहिमुस्सलाम के मोअ़्जेज़े की तरह है। हर वोह शख़्स जो अम्बिया अ़लैहिमुस्सलाम के मोअ़्जेज़ात पर एअ़्तेक़ाद-ओ-यक़ीन रखता है उसे ह़ज़रत इमाम ज़माना की तूले उम्र के सिलसिले में ज़रा भी शक-ओ-शुब्हा नहीं करना चाहिए।
इमाम (अ़.स.) और ग़ैबत
ह़ज़रत (अ़.स.) की ग़ैबत के सिलसिले में बारहा पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ़.) ने इर्शाद फ़रमाया है और कसरत से अइम्मा अ़लैहिमुस्सलाम ने तज़्केरा किया है। ह़ज़रत की ग़ैबत को पैदाइश से पहले इस ह़द तक बयान किया गया था कि जो शख़्स भी ह़ज़रत इमाम ज़माना (अ़.स.) के वजूद पर ईमान रखता था वोह ह़ज़रत की ग़ैबत पर भी एअ़्तक़ाद रखता था। इस सिलसिले में मौज दर मौज रवायतें मिलती हैं यहाँ सिर्फ़ चंद का तज़्केरा कर रहे हैं।
१. पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ़.) ने इर्शाद फ़रमाया कि
मेरे फ़र्ज़न्दों में क़ाएम (अ़.स.) इस अ़ह्द की बेना पर जो मेरी तरफ़ से उन तक पहुँचेगा ऐसी ग़ैबत इख़्तेयार करेंगे कि अक्सर लोग येह कहने लगेंगे कि ख़ुदा को आले मो़हम्मद (स.अ़.) की ज़रूरत नहीं है। बअ़्ज़ अफ़राद उनकी वेलादत में शक-ओ-शुब्हा करेंगे जो शख़्स उस ज़माने को पाए वोह अपने दीन पर साबित क़दम रहे शक-ओ-शुब्हा को अपने ख़यालों में जगह न दे। शैतान को अपने ऊपर मुसल्लत न करे वर्ना उसे मेरे दीन और मेरी मिल्लत से ख़ारिज कर देगा।
(इस्बातुल होदा, जि॰ ६, स॰ ३८६)
ह़ज़रत अमीरुल मोअ्मेनीन अ़लैहिस्सलाम ने इर्शाद फ़रमायाः
हमारे क़ाएम की ग़ैबत ऐसी होगी जिसकी मुद्दत तूलानी होगी ......होशियार रहो! जो शख़्स अपने दीन पर साबित-क़दम रहेगा और ग़ैबत की तूलानी मुद्दत उसे संग दिल न बनाएगी (दीन से मुऩ्हरिफ़ न करेगी) वोह क़यामत में मेरा हम दर्जा होगा।
(इस्बातुल होदा, जि॰ ६, स॰ ३९४-३९५)
(१) मु़हम्मद इब्ने मुस्लिम का बयान है किः
इमाम जअ़्फ़र सादिक़ अ़लैहिस्सलाम को फ़रमाते सुना कि अगर अपने इमाम की ग़ैबत की ख़बर सुनना तो हरगिज़ इन्कार न करना।
(इस्बातुल होदा, जि॰ ६, स॰ ३५०)
४. अ़ल्लामा तबरसी अ़लैहिर्रह़्मा त़हरीर फ़रमाते हैं कि शीआ मु़हद्देसीन ने ग़ैबत की ह़दीसें उन किताबों में दर्ज की हैं जो ह़ज़रत इमाम मो़हम्मद बाकि़र और इमाम जअ़्फ़र सादिक़ अ़लैहिस्सलाम के ज़माने में लिखी गई हैं। उन बा-एअ़्तेमाद और क़ाबिले इत्मीनान मु़हद्देसीन में एक ‘ह़सन इब्ने म़हबूब’ हैं उन्होंने ग़ैबत से सौ साल क़ब्ल किताब’ मशीख़ा ‘त़हरीर फ़रमाई और उस में ग़ैबत की ह़दीसों को दर्ज किया है। मुंदर्जा ज़ैल ह़दीस उन्ही में से एक है......
अबू बसीर का बयान है किः मैंने ह़ज़रत इमाम जअ़्फ़र सादिक़ अ़लैहिस्सलाम की ख़िदमत में अ़र्ज़ किया कि ह़ज़रत इमाम बाक़िर अ़लैहिस्सलाम फ़रमाया करते थे कि क़ाएमे आले मो़हम्मद की दो ग़ैबत होगी एक तूलानी दूसरी मुख़्तसर। फ़रमायाः हाँ अबू बसीर इन दोनों ग़ैबतों में एक तूलानी तर होगी।
(अअ़्लामुल वरा, स॰ २१६)
इस बयान के मुताबिक़ रसूले ख़ुदा सल्लल्लाहो अ़लैहे व आलेही व सल्लम और अइम्मा ताहिरीन अ़लैहिमुस्सलाम ने ह़ज़रत वलीये अ़स्र की ग़ैबत के बारे में उसी तरह ह़दीस बयान फ़रमाई है जिस तरह ह़ज़रत की वेलादत और वजूद के सिलसिले में बयान फ़रमाई हैं। ह़ज़रत के वजूद के अ़क़ीदे के साथ साथ ह़ज़रत की ग़ैबत के अ़क़ीदे की भी तअ़्लीम दी है।
जनाबे शेख़ सदूक़ अ़लैहिर्रह़्मा सय्यद हिमयरी से नक़्ल फ़रमाते हैं किः ‘मैं मु़हम्मद इब्ने ह़नफ़िया’ का ग़ुलू की हद तक मोअ़्तक़िद था और उनकी ग़ैबत पर अ़क़ीदा रखता था यहाँ तक कि ख़ुदावंद आलम ने ह़ज़रत इमाम जअ़्फ़र सादिक़ अ़लैहिस्सलाम के ज़रीए मुझ पर ए़हसान फ़रमाया आतशे जहन्नम से नजात दिलाकर राहे रास्त की हेदायत फ़रमाई और वोह इस तरह कि जब दलीलों के ज़री़ए ह़ज़रत इमाम जअ़्फ़र सादिक़ अ़लैहिस्सलाम की इमामत मुझ पर वाज़े़ह और रोशन हो गई। एक दिन ह़ज़रत जअ़्फ़र सादिक़ अ़लैहिस्सलाम की ख़िदमत में अ़र्ज़ कियाः ऐ र्फ़ज़ंंदे रसूल (स.अ़.) आपके आबा-ओ-अज्दाद से ग़ैबत की ह़दीस हम तक पहुँची हैं। आप येह इर्शाद फ़रमाएँ कि येह ग़ैबत किस शख़्स को नसीब होगी?
फ़रमायाः वोह शख़्स मेरी नस्ल का छटा फ़र्ज़न्द होगा और रसूले ख़ुदा सल्लल्लाहो अ़लैहे व आलेही व सल्लम के बअ़्द बारहवाँ इमाम होगा जिस सिलसिले के पहले इमाम ह़ज़रत अ़ली इब्ने अबी तालिब अ़लैहिस्सलाम और आख़िरी इमाम क़ाएम ब-ह़क़, ख़ुदा की आख़िरी ह़ुज्जत कारख़ानए क़ुदरत के आख़िरी शाहकार ह़ज़रत साहेबुज़्ज़मान हैं।
(कमालुद्दीन, जि॰ १, स॰ ११२)
क्यों इमाम ग़ाएब हैं?
पिछले अस्बाक़ में येह बात ज़िक्र की जा चुकी है कि इमाम और जानशीनीये पैग़म्बर सल्लल्लाहो अ़लैहे व आलेही व सल्लम का वजूद बेशुमार जेह्तों से लाज़िम और ज़रूरी है जैसे रफ़्ए इख़्तेलाफ़ात, क़वानीने एलाही की स़ही़ह तफ़सीर, मअ़्नवी और बातिनी हेदायत ख़ुदाए रह्मान-ओ-रहीम ने रसूले ख़ुदा सल्लल्लाहो अ़लैहे व आलेही व सल्लम के बअ़्द अमीरुल मोअ्मेनीन अ़लैहिस्सलाम को और उनके बअ़्द उनके फ़र्ज़न्दों को यके बअ़्द दीगरे इमाम मुअ़य्यन फ़रमाया है।
येह बात बदीही (वाज़े़ह) है कि इमामे ज़माना (अ़.स.) की भी वही सारी ज़िम्मेदारियाँ हैं जो उनसे पहले इमामों की थीं। अगर रुकावटें न होतीं तो दूसरे इमामों की तरह येह भी ज़ाहिर होते और लोग उनसे तमामतर फ़वाएद ह़ासिल करते। लेकिन इमाम ज़माना (अ़.स.) इब्तेदा ही से निगाहों से ग़ाएब क्यों हैं? इस सवाल के जवाब में येह कहा जा सकता है किः
ख़ुदावंद आलम की ह़िकमत पर एअ़्तेक़ाद-ओ-ईमान रखने के बअ़्द ज़रूरी नहीं है कि हम ग़ैबत का फ़लसफ़ा और उस की इल्लत तलाश करें क्योंकि ग़ैबत की असली इल्लत न जानने से हमें कोई ज़रर नहीं पहुँचेगा। बहुत सी ऐसी चीज़ें हैं जिनकी इल्लत और फ़लसफ़े से हम नावाक़िफ़ हैं। येह बस इतना काफ़ी है कि हम बेपनाह ह़दीसों और दलीलों के ज़री़ए येह यक़ीन रखें कि ख़ुदा ने अपनी ह़ुज्जत को भेजा है और बअ़्ज़ मस्ले़हतों की बेना पर हमारी निगाहों से दूर परदए ग़ैबत में रखा है।
बअ़्ज़ रवायतों से पता चलता है कि ग़ैबत का असली फ़लसफ़ा ज़हूर के बअ़्द वाज़े़ह होगा।
‘अब्दुल्लाह फ़ज़्ल हाशमी’ का बयान है कि मैंने ह़ज़रत इमाम जअ़्फ़र सादिक़ अ़लैहिस्सलाम को फ़रमाते हुए सुना किः ‘‘साहेबुल अम्र’’ के लिए यक़ीनन एक ऐसी ग़ैबत होगी जिसमें अह्ले बातिल शक-ओ-शुब्हा में मुब्तेला हो जाएँगे। मैंने दरियाफ़्त किया येह क्यों? फ़रमाया उन एलल-ओ-अस्बाब की बेना पर जिनके बयान करने की हमें इजाज़त नहीं है।
अ़र्ज़ कियाः उस की ह़िकमत क्या है?
फ़रमाया वही ह़िकमत है जो इस से पहले की ह़ुज्जतों की ग़ैबत के बारे में थी। येह हिकमतें ह़ज़रत के ज़हूर के बअ़्द ही ज़ाहिर होंगी। जिस तरह जनाब ख़िज़्र के कामों की ह़िव्Àमतें। (कश्ती में सूराख़ करना, जवान का क़त्ल, गिरती हुई दीवार को सीधा करना) इब्तेदा में मअ़्लूम न हो सकीं। येह हिकमतें उस वक़्त ज़ाहिर हुईं जब जनाब मूसा (अ़.स.) ह़ज़रत ख़िज़्र से जुदा हुए।
ऐ र्फ़ज़ंदे फ़ज़्ल ग़ैबत अम्रे इलाही और अस्रारे ख़ुदावंदी है चूँकि ख़ुदा को ह़कीम जानते हैं इस लिए हमें इस बात का यक़ीन है कि उस का कोई काम ह़िकमत से ख़ाली नहीं है अगरचे उस की तफ़्सीीलात से हम नावाक़िफ़ ही क्यों न हों।
(इस्बातुल होदा, जि॰ ६, स॰ ४३८)
बअ़्ज़ रवायतों से इस्तेफ़ादा होता है कि ग़ैबत के बअ़्द ज़ाहिरी फ़वाएद भी हैं जिनमें से चंद का तज़्केरा करेंगे।
(१) लोगों की आज़्माइश
ग़ैबत का एक फ़ाएदा लोगों की आज़्माइश है ताकि वोह लोग जो साहेबे ईमान नहीं हैं उनकी ह़क़ीक़त वाज़े़ह हो जाए और वोह लोग जिनके दिल की गहराइयों में ईमान की ज़डें मौजूद हैं वोह मसाएब और सख़्तियाँ बर्दाश्त करके और पुख़्ता हो जाएँ ग़ैबत पर उनका ईमान और ज़्यादा कामिल हो जाए ताकि सआदत और सवाब के बलंद दर्जात ह़ासिल कर सकें।
इमाम मूसा काज़िम अ़लैहिस्सलाम ने इर्शाद फ़रमाया किः
जिस वक़्त मेरा पाँचवाँ फ़र्ज़न्द निगाहों से पोशीदा होगा उस वक़्त दीन पर साबित क़दम रहो और होशियार रहो ताकि कोई तुम्हें दीन से मुऩ्हरिफ़ न कर सके। सा़हेबुल अम्र के लिए एक ऐसी ग़ैबत होगी जिसमें अ़क़ीदत मंदों का एक गिरोह उनसे दस्त-बरदार हो जाएगा। येह ग़ैबत एक आज़्माइश है जिससे ख़ुदा बंदों का इम्ते़हान लेगा।
(बेह़ारुल अनवार, जि॰ ५२, स॰ ११३)
(२) क़त्ल से ह़ेफ़ाज़त
तारीख़ का मुतालआ करने से रहबराने दीन अइम्मए बरहक़ अ़लैहिमुस्सलाम से ख़ुलफ़ाए वक़्त के जो रवाबित रहे हैं वोह बख़ूबी वाज़े़ह हो जाते हैं और येह ह़क़ीक़त रोशन हो जाती है कि अगर बारहवें इमाम भी ज़ाहिर होते तो अपने आबा-ओ-अज्दाद की तरह क़त्ल कर दिए जाते या उनको ज़ह्र दे दिया जाता क्योंकि हर एक इस बात से वाकि़फ़ था कि ख़ानदाने पैग़म्बर सल्लल्लाहो अ़लैहे व आलेही व सल्लम, अ़ली अ़लैहिस्सलाम और फ़ातेमा सलामुल्लाह अ़लैहा (ख़ुदा का सलाम हो इन सब पर) के फ़र्ज़न्दों में एक ऐसी ज़ात ज़ाहिर होगी जो ज़ालिमों, जाबिरों और सितमगरों की बिसाते ह़ुकूमत तह कर देगी और वोह इमाम हसन अ़स्करी अ़लैहिस्सलाम का फ़र्ज़न्द होगा। इस लिए अ़ब्बासियों ने उनको क़त्ल करने की भरपूर कोशिश की मगर ख़ुदावंद आलम ने उनकी ह़ेफ़ाज़त की और दुश्मनों को सख़्त मायूसी का सामना करना पडा।
ज़ोरारा ह़ज़रत जअ़्फ़र सादिक़ अ़लैहिस्सलाम से येह रवायत नक़्ल करते हैं कि क़ाएम अ़लैहिस्सलाम के ज़हूर से पहले तूलानी ग़ैबत है अ़र्ज़ कियाः क्यों?
फ़रमायाः क़त्ल से म़हफ़ूज़ रहने के लिए। येह ग़ैबत उस वक़्त तक बाक़ी रहेगी यहाँ तक कि उनकी ह़ुकूमत के अस्बाब फ़राहम हो जाएँ और ज़ालिमों जाबिरों की ह़ुकूमत पर ग़लबा ह़ासिल करने के लिए ज़मीन हमवार हो जाए।
(मुन्तख़बुल असर, स॰ २६९)
ग़ैबत में वजूद इमाम (अ़.स.) का फ़ाएदा
अभी हम येह बात कह चुके हैं कि ख़ुदावंदे आलम ने इमामे ज़माना अ़लैहिस्सलाम को इस लिए मुअ़य्यन फ़रमाया है कि वोह लोगों के दरमियान रहें और उनकी हेदायत करते रहें। लेकिन येह अ़वाम ही है जो ह़ज़रत (अ़.स.) के ज़हूर की राह में रुकावट बने हुए हैं जिस वक़्त लोग ऐसी ह़ुकूमत के लिए आमादा हो गए जिसकी बुनियाद अ़द्ल-ओ-इन्साफ़ पर हो जिसमें हर एक के ह़क़ का पूरा पूरा ख़याल रखा जाए, तमाम इस्लामी अ़हकाम बग़ैर किसी ख़ौफ़-ओ-ह़ेरास के नाफ़िज़ किए जाएँ उस वक़्त ह़ज़रत (अ़.स.) का ज़हूर हो जाएगा। लेहाज़ा ख़ुदावंद आलम की तरफ़ से कोई कमी नहीं तक़सीर ख़ुद हमारी अपनी है जिसकी बेना पर इमाम निगाहों से पोशीदा हैं और आलमी ह़ुकूमत के क़याम में ताख़ीर हो रही है। येह बात भी जान लेना चाहिए कि वजूदे इमाम (अ़.स.) का फ़ाएदा सिर्फ़ ज़ाहिरी हेदायत और रहबरी में मुऩ्हसिर नहीं है बल्कि निज़ामे काएनात और निज़ामे शरीअ़त के ले़हाज़ से और भी बहुत से फ़ाएदे हैं जिसके लिए इमाम (अ़.स.) का ज़ाहिर होना ज़रूरी नहीं है।
वजूदे इमाम (अ़.स.) का एक बेहतरीन फ़ाएदा येह है कि इमाम ख़ालिक़ और मख़्लूक़ के दरमियान वास्तए फ़ैज़ हैं। अपनी जगह येह ह़क़ीक़त मुतअ़द्दिद दलीलों और ह़दीसों से साबित हो चुकी है कि अगर इमाम (अ़.स.) न हों तो ख़ालिक़ और मख़्लूक़ के दरमियान राबेता मुन्क़तअ़् हो जाए क्योंकि ख़ुदा के तमाम फ़ुयूज़ात और बरकतें इमाम ही के ज़री़ए लोगों तक पहुँचती हैं। ह़दीसों में इस मज़्मून की मुतअ़द्दिद ह़दीसें मिलती हैं किः लौ बक़ीयतुल अर्ज़ बे-ग़ैरे इमाम ले-साख़त.... अगर ज़मीन बग़ैर इमाम के रह जाए तो धँस जाए।
(उसूले काफ़ी, जि॰ १, स॰ १७८. तबअ़् आख़ूंंदी)
हाँ इमाम अ़लैहिस्सलाम इस काएनात का नुव़तए मर्कज़ी है। नौ़ए बशर का मुरब्बी और रहनुमा है लेहाज़ा निगाहों के सामने रहने या न रहने से कोई ख़ास फ़़र्क नहीं पड़ता। बासलाह़ियत और शाइस्ता अफ़राद के ह़क़ में इमाम (अ़.स.) की मअ़्नवी हेदायत हमेशा जारी है ख़ाह लोग उसे देख पाएँ या न देख पाएँ।
बअ़्ज़ रवायतों से इशारा मिलता है कि इमाम (अ़.स.) मोअ्मेनीन की बज़्म में आते रहते हैं लेकिन मोअ्मेनीन उन्हें पहचान नहीं पाते हैं। (उसूले काफ़ी, जि॰ १, स॰ ३३७. तबअ़् आख़ूंदी) ग़ैबत के ज़माने में भी इमाम (अ़.स.) दीन की ह़ेफ़ाज़त कर रहे हैं और शाइस्ता अफ़राद की अख़्लाक़ी तरबियत कर रहे हैं। ग़ैबत के ज़माने का वजूद ऐसा ही है जैसे बादलों की ओट में आफ़ताब कि उस के नूर और उस की ह़रारत से सारी काएनात बहरामंद हो रही है। इन असरात को देखते हुए बदली में आफ़ताब के वजूद से इन्कार कोर चश्म (अंधा) और कोरे बातिन (कीनावर) ही कर सकता है।
एक शख़्स ने ह़ज़रत इमाम जअ़्फ़र सादिक़ अ़लैहिस्सलाम से दरियाफ़्त किया कि ग़ैबत के ज़माने में लोग किस तरह वजूदे इमाम (अ़.स.) से इस्तेफ़ादा करेंगे?
इमाम ने इर्शाद फ़रमायाः जिस तरह बादलों की ओट में पोशीदा आफ़ताब से इस्तेफ़ादा करते हैं।
(मुन्तख़बुल असर, स॰ २७०-२७२)
इस सिलसिले में एक (डाक्टर क्रेन, सोरबोन यूनिवर्सिटी फ्रांस है) मुस्तश्रिक़ के बयान की तरफ़ आपकी तवज्जोह मब्ज़ूल कराना चाहते हैं।
‘मेरा अ़क़ीदा येह है कि सिर्फ़ मज़हबे शीआ वोह तन्हा मज़हब है जिसने ख़ालिक़ और मख़्लूक़ के दरमियान वास्ते को हमेशा म़हफ़ूज़ रखा है और हमेशा हेदायते इलाही के राबेते को बाक़ी रखा है। यहाँ वेलायत-ओ-हेदायत का सिलसिला इब्तेदा से आज तक क़ाएम है। यहूदियों ने सिलसिलए वेलायत-ओ-हेदायत को ह़ज़रत मूसा अ़लैहिस्सलाम पर ख़त्म कर दिया। ह़ज़रत ईसा अ़लैहिस्सलाम और ह़ज़रत मो़हम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अ़लैहे व आलेही व सल्लम की नबूवत पर ईमान न लाए। ईसाई इस सिलसिले को ह़ज़रत ईसा (अ़.स.) से आगे न बढा सके वोह ह़ज़रत मो़हम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अ़लैहे व आलेही व सल्लम की नबूवत के मोअ़्तक़िद न हुए। मुसलमानों में अह्ले सुन्नत इस सिलसिले में ह़ज़रत मो़हम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अ़लैहे व आलेही व सल्लम पर आकर रुक गए और आँह़ज़रत (स.अ़.)के बअ़्द येह सिलसिलए वेलायत-ओ-हेदायत मुन्क़तअ़् हो गया।
सिर्फ़ मज़हब शीआ वोह मज़हब है जो आँह़ज़रत सल्लल्लाहो अ़लैहे व आलेही व सल्लम की ख़त्मे नबूवत पर एअ़्तेक़ाद रखता है और इस मज़हब ने सिलसिलए वेलायत-ओ-हेदायत को आँह़ज़रत (स.अ़.)के बअ़्द इमामों के ज़री़ए म़हफ़ूज़ रखा है और येह सिलसिला क़यामत तक बाक़ी रहेगा।
हाँ तन्हा मज़हब शीआ वोह मज़हब है जहाँ ख़ालिक़ और मख़्लूक़ के दरमियान वास्तए फ़ैज़ हमेशा महफ़ूज़ और बाक़ी है। (और यही उस की हव़क़ानियत की दलील है)।
एक याददहानी
इमाम ज़माना अ़लैहिस्सलाम के अ़क़ीदे का मतलब येह है कि इन्सान और आलमे ग़ैब के दरमियान राबेता मुन्क़तअ़् नहीं हुआ है और जो इस अ़क़ीदे पर क़ाएम और साबित क़दम है उनके लिए ज़रूरी है कि वोह हमेशा ह़ज़रत की याद में रहें और उनका तज़्केरा करते रहें एक ग़ैबी मुस्लेह की आमद का इन्तेज़ार करते रहें।
इन्तेज़ार का म़प्Àहूम येह नहीं है कि सारे मुसलमान और शीआ हाथ पर हाथ धरे बैठे रहें और इस्लामी मक़ासिद की तरक़्क़ी और तौसीअ़् की कोई सई-ओ-कोशिश न करें। बल्कि जैसा कि हमेशा से उलमा कहते आए हैं कि हर मुसलमान और शीआ का फ़र्ज़ है कि जहाँ तक हो सके इस्लामी मुआशरे की तश्कील की कोशिश करे। इस्लामी उलूम-ओ-मआरिफ़ की नश्र-ओ-इशाअ़त की ह़त्तलइम्कान सई-ओ-कोशिश करे, ज़ुल्म और ज़ालिमों के ख़ेलाफ़ आवाज़ उठाए और अपने इम्कान भर उनका मुक़ाबला करे ताकि आदिलाना आलमी ह़ुकूमत के लिए ज़मीन हमवार हो सके। यअ़्नी समाज को इस तरह की तअ़्लीम दी जाए कि हर शख़्स अ़द्ल का ख़ूगर और इन्साफ़ का रसिया नज़र आए। अगर मुआशरे में ज़ुल्म-ओ-जौर की ह़ुक्मरानी है हर एक उस के ख़ेलाफ़ सदाए ए़ह्तेजाज बलंद करे और उन अअ़्माल से नफ़रत-ओ-बेज़ारी का इज़्हार करें।
हाँ हर मुसलमान का फ़र्ज है कि वोह ईमान और इस्लाम की राह में फ़ेदा कारी करे और हमेशा ह़ज़रत महदी अ़लैहिस्सलाम के इस्तेक़बाल की तैयारी में रहे। यअ़्नी अपनी ज़िंदगी के लिए ऐसे उसूल मुअ़य्यन करे जो ह़ज़रत के मन्सूबों के मुतज़ाद न हों ताकि वोह ह़ज़रत (अ़.स.) के जाँनिसारों, फ़ेदा कारों और मददगारों के क़दम से क़दम मिला कर उनकी सफ़ में खड़ा हो सके।